अंग्रेज राज के दौरान प्रख्यात भारतीयों द्वारा ब्रिटिश साम्राज्य की स्तुति के तमाम किस्से हैं. लेकिन इन्हें तत्कालीन संदर्भ से देखने की जरूरत है.
मसलन हमारे गांव के गूगल रवींद्र सिसौदिया बताया करते थे कि उन्होंने ‘गॉड सेव द किंग’ के तीन संस्करण सुने हैं. एक उनकी माताजी सुनाती थीं, वे उत्तर प्रदेश, लखीमपुर-खीरी जिले के गोला गोकर्णनाथ के स्कूल में पढ़ती थीं, वहां प्रार्थना उर्दू में होती थी- ‘खुदाया जॉर्ज पंजुम की हिफाजत कर, हिफाजत कर.’
गौर करें, पंचम नहीं पंजुम. बाद में वे फतेहपुर, उत्तर प्रदेश आ गईं, वहां आर्य समाजी माहौल के स्कूल में हिंदी की प्रार्थना होती- यशस्वी रहें हे प्रभो हे मुरारे, चिरंजीवी राजा और रानी हमारे.
छत्तीसगढ़ के स्कूलों में ठेठ किस्म की प्रार्थना होती थी- ‘ईश राजा को बचाओ, हमारे राजा की जै, इस राजा को बचाओ.’
लगभग एक सदी पुरानी, सुनी-सुनाई याद रह गई ये बातें, रवींद्र सिसौदिया हमारे लिए सहज सुनाते हैं.
गुलामी के दौर के साहित्यकार: भारतेंदु हरिश्चंद्र
मुझे भारतेंदु का एक पद याद आता है- ‘राजपुत्र चिरंजीव’. लेकिन उससे पहले गुलामी के दौर के साहित्य और साहित्यकारों में एक छत्तीसगढ़ के पंडित सुंदरलाल शर्मा को याद करते चलें. उन्हें छत्तीसगढ़ का गांधी कहा जाता है.
1881 में जन्मे पं. सुंदरलाल, 1922 से 1932 के बीच एकाधिक बार जेल गए थे. जेल से ही ‘श्री कृष्ण जन्म स्थान समाचार पत्र’ हस्तलिखित सचित्र पत्रिका निकाली.

मगर इसके पहले उन्होंने 1902 में रचित और 1916 में प्रकाशित ‘विक्टोरिया-वियोग और ब्रिटिश-राज्य-प्रबंध-प्रशंसा’ पुस्तक में निवेदन किया था कि ‘राज-भक्ति-प्रचार करने के पवित्र उद्देश्य को लेकर मैंने इसकी रचना की थी. यदि उसमें सफलता हुई, तो मैं अपना परिश्रम सार्थक समझूंगा.’
महारानी विक्टोरिया की प्रशंसा में की गई इस रचना में पुलिस, अदालत, रेल, तार, डाक, म्युनिसिपैलिटी, पलटन, जहाज, कल कारखाना, सेटलमेंट, कृषि-बैंक, कोर्ट्स आफ़् वार्ड्स इत्यादि के शीर्षक से कविताएं शामिल हैं.
जगतसेठ अमीचंद अंग्रेजों का साथ देने के लिए इतिहास-प्रसिद्ध हैं, जिनके वंशज भारतेंदु हरिश्चंद्र हुए. 1876 में ‘भारत दुर्दशा’ नाटक छपा, ‘अंधेर नगरी चौपट्ट राजा’ नाटक प्रसिद्ध है ही.
भारतेंदु हरिश्चन्द्र ग्रंथावली-4 में संपादक ने लिखा है-
‘राजभक्ति की भावना भारतेंदु में कूट-कूटकर भरी हुई है. … महारानी विक्टोरिया के परिवार में किसी को छींक भी आई तो भारतेंदु ने कविता लिखकर उसके स्वास्थ्य की कामना की है. यह बात अलग है कि छींक स्वाभाविक प्रक्रिया में आई है पर भारतेंदु के लिए तो वह अवसर ही बनी है.’
ऐसी कुछ कविताएं हैं-
‘श्री राजकुमार सुस्वागत’, ‘प्रिंस ऑफ वेल्स के पीड़ित होने पर कविता’, या वाइसराय लार्ड रिपन के प्रति कविता ‘रिपनाष्टक’. भारतेंदु हरिश्चन्द्र ग्रंथावली में ‘राजभक्ति की कविताएं’ खंड के अंतर्गत उनकी ऐसी 15 कविताएं संकलित हैं. आश्चर्य है कि उनकी कविताओं में एक भी शायद ऐसी नहीं है जिसे देशभक्ति की कविता कहा जा सके.
इस संदर्भ में प्रासंगिक है कि भारतेंदु ने सन 1874 में ‘बालबोधिनी’ में प्रकाशित पौराणिक पात्र मदालसा की कथा को ‘मदालसोपाख्यान’ शीर्षक से पुनः सन 1875 में पुस्तिका के रूप में प्रकाशित कराया था. पुस्तिका के आरंभ में विवरण था कि ‘इसे पुस्तिका रूप में प्रिंस आव वेल्स बहादुर के शुभागमन के आनंद के अवसर में बालिकाओं में वितरण के अर्थ में अलग छपवाया गया.’ और यह भी कि ‘जिस लड़की को यह पुस्तक दी जाए उससे अध्यापक लोग पांच बार कहला लें ‘राजपुत्र चिरंजीव.’
1883 में भारतेंदु के एक अधूरे पत्र में उनके द्वारा ब्रिटिश राष्ट्रगीत का अनुवाद है जो इस प्रकार शुरू होता है- प्रभु रच्छहु दयाल महरानी, बहु दिन जिए प्रजा सुखदानी, हे प्रभु रच्छहु श्रीमहरानी, सब दिस में तिन की जय होइ, रहै प्रसन्न सकल भय सोइ, राज करे बहु दिन लों सोई, हे प्रभु रच्छहु श्रीमहरानी.
मगर 1874 में उन्होंने लिखा, बीस करोड़ (वाली आबादी) के भारतवर्ष को पचास हजार अंग्रेज शासन करते हैं ये लोग प्रायः शिक्षित और सभ्य हैं परंतु इन्हीं लोगों के अत्याचार से सब भारतवर्षीयगण दुखी हैं.
राष्ट्रगान पर वाद-विवाद
रवींद्रनाथ टैगोर रचित राष्ट्रगान पर वाद-विवाद होता रहा है. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इस पर लिखे ‘जन गण मन अधिनायक जय हे’ लेख में स्पष्ट किया है कि कवि ने बड़ी व्यथा के साथ श्री सुधारानी देवी को अपने 23 मार्च 1939 के पत्र में लिखा था कि ‘मैंने किसी चतुर्थ या पंचम जॉर्ज को ‘मानव इतिहास के युग-युग धावित पथिकों की रथ यात्रा का चिर-सारथी’ कहा है, इस प्रकार की अपरिमित मूढ़ता का संदेह जो लोग मेरे विषय में कर सकते हैं उनके प्रश्नों का उत्तर देना आत्मावमानना है.’

इस लेख में आगे स्पष्ट किया गया है कि- ‘असल में सन् 1911 के कांग्रेस के मॉडरेट नेता चाहते थे कि सम्राट दंपत्ति की विरुदावली कांग्रेस मंच से उच्चारित हो. उन्होंने इस आशय की रवींद्रनाथ से प्रार्थना भी की थी, पर उन्होंने अस्वीकार कर दिया था.
कांग्रेस का अधिवेशन जन गण मन गान से हुआ और बाद में सम्राट दंपत्ति के स्वागत का प्रस्ताव पास हुआ. प्रस्ताव पास हो जाने के बाद एक हिंदी गान बंगाली बालक-बालिकाओं ने गाया था, यही गान सम्राट की स्तुति में था. … विदेशी रिपोर्टरों ने दोनों गानों को गलती से रवींद्रनाथ लिखित समझकर उसी तरह की रिपोर्ट छापी थी. इन्हीं रिपोर्ट्स से आज का यह भ्रम चल पड़ा है.
यूं वार्तालाप, कथन, वक्तव्य या किसी साहित्यिक रचना के साथ आवश्यक नहीं कि उसमें इस्तेमाल किया गया शब्द कोई अकाट्य सत्य प्रमाणित करता हो. लेकिन संवेदनशील साहित्यिकों के साथ ऐसा तय कर दिया जाना समाज में अब आम है.
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के ‘माफीनामे’ पर भी एकांगी टिप्पणियां होती रही हैं. मनोभाव और उसके अनुरूप या परिस्थितिगत अभिव्यक्ति स्वाभाविक है, लेकिन उसके संदर्भ को परखना आवश्यक है.
(लेखक बायोडायवर्सिटी एक्सप्लोरेशन एंड रिसर्च सेंटर में ‘धरोहर’ परियोजना के प्रमुख हैं.)
