भारत का विभाजन: वर्तमान के भीतर सिसकता अतीत

भारत का विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की सबसे पीड़ादायक और अविस्मरणीय घटनाओं में से एक है. इसका कोई सटीक विवरण नहीं मिलता कि उस त्रासदी में कितने लोग मारे गए, कितनों का घर उजड़ गया, कितनों की लाशें नदियों में बह गई, कितने दुधमुंहे बच्चों ने अपने माता-पिता को खोया और कितनों का घर लूट लिया गया.

विभाजन की त्रासदी आज भी देश के भीतर रिस रही है. (फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

‘उन दिनों पाकिस्तान के बनाए जाने का ऐलान किया गया था और लोग तरह-तरह के अनुमान लगाने लगे थे कि भविष्य में जीवन की रूपरेखा कैसी होगी. पर किसी की भी कल्पना बहुत दूर तक नहीं जा पाती थी. मेरे सामने बैठे सरदारजी बार-बार मुझसे पूछ रहे थे कि पाकिस्तान बन जाने पर जिन्ना साहब बंबई में ही रहेंगे या पाकिस्तान में जाकर बस जाएंगे, और मेरा हर बार यही जवाब होता, बंबई क्यों छोड़ेंगे, पाकिस्तान में आते-जाते रहेंगे, बंबई छोड़ देने में क्या तुक है.’

भीष्म साहनी द्वारा रचित कहानी ‘अमृतसर आ गया’ का यह अंश विभाजन की विभीषिका और लोगों के मन में चल रहे हजारों सवालों का शानदार चित्रण करता है. वैसे हिंदी कथा साहित्य में विभाजन की त्रासदी को लेकर अनेकों कालजई रचनाएं की गई, जिनमें कृष्णा सोबती रचित ‘सिक्का बदल गया’ कहानी व यशपाल का ‘झूठा सच’ उपन्यास उल्लेखनीय है.

भारत का विभाजन भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की सबसे पीड़ादायक घटनाओं में से एक है. इस बात का कोई सटीक विवरण नहीं मिलता कि उस त्रासदी में कितने लोग मारे गए, कितनों का घर उजड़ गया, कितनों की लाशें नदियों में बह गई, कितने दुधमुंहे बच्चों ने अपने माता-पिता को खोया, कितनों की माताएं छूट गई और कितनों का घर-बार लूट लिया गया.

वास्तव में विभाजन एक-दो महीनों का परिणाम नहीं है बल्कि दो-तीन दशकों का परिणाम है. इस बात के तह तक जाने हेतु हमें कुछ ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख करते हुए आगे बढ़ना होगा. तभी जाकर इसके बहुआयामी दृष्टिकोण को समझ पाना संभव हो पाएगा.

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का लखनऊ अधिवेशन

बात सन् 1916 की है, जब भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और मुस्लिम लीग के मध्य लखनऊ सम्मेलन में एक समझौता हुआ था. उस सम्मेलन में मुसलमानों के लिए अलग ‘निर्वाचक-मंडल’ की व्यवस्था की गई. इस सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य साफ-साफ था कि भारत के हिंदू व मुसलमान अलग-अलग राजनीतिक समुदाय हैं.

मुसलमान सिर्फ मुसलमान को ही वोट देंगे और हिंदू सिर्फ हिंदू को. विद्वानों का मानना है कि यहीं से द्वि-राष्ट्र का सिद्धांत प्रबल हुआ. सही अर्थों में इसी समझौते ने भारत विभाजन की आधारशिला राखी. यदि अलग निर्वाचक मंडल नहीं स्थापित किया जाता तो शायद विभाजन की भावना उस समय के दोनों पक्षों के नेताओं के मन में नहीं आता.

सामाजिक पहलू

भारत में पीढ़ी दर पीढ़ी हिंदू व मुसलमान में वैमनस्य फैलता जा रहा था. करोड़ों भारतीय हिंदू और मुसलमान में पिछले कई वर्षों से उठा-पटक चल ही आ रहा था. जो एक मूल समस्या उन दिनों बनती चली जा रही थी. भारतीय परंपराओं का भी कम दोष नहीं था, धार्मिक व आर्थिक विडंबनाओ ने भी अपनी महत्ती भूमिका अदा की.

अंग्रेजों को भी मौका दिखा और उन्होंने ‘फूट डालो, राज करो’ वाली नीति अपनाई और सत्ता साधते रहे. फूट डालो और राज करो नीति के पीछे का कारण सन् 1857 का स्वतंत्रता संग्राम था, जहां हिंदू और मुसलमान ने कंधों से कंधा मिलाकर लड़ा था. अंग्रेजों को इस बात की भनक लग गई थी कि यदि भारत में सत्ता बनाए रखना है तो दोनों धर्मों के लोगों को आपस में लड़ाना होगा.

इन सबका परिणाम यह हुआ कि हिंदू और मुसलमान की आपसी नफ़रत चरम सीमा को लांघती चली गई. दोनों एक दूसरों के खून के प्यासे बनते गए. इतने बर्बर हुए कि उनमें और पशुओं में कोई अंतर नहीं बचा. 28 जनवरी 1933 को रहमत अली ने एक प्रस्ताव में साफ-साफ लिखा था कि भारतीय मुसलमानों को अपना राज्य अलग कर लेना चाहिए. उन्होंने आगे यह भी कहा कि भारत को अखंड रखने की बात फूहड़ और हास्यास्पद है.

मोहम्मद अली जिन्ना ने उस समय रहमत अली का पुरजोर विरोध किया. पाकिस्तान को एक ‘असंभव सपना’ कहा किंतु बाद में उन्होंने सत्ता लोलुपता हेतु पाकिस्तान बनाना स्वीकार किया.

आर्थिक पहलू

उस समय भारत में मुसलमानों की साक्षरता दर हिंदुओं की तुलना में कम थी. उद्योग व अन्य जगहों पर उनका प्रतिनिधित्व कम था. जिसके कारण वे आर्थिक रूप से पिछड़े थे. उस स्थिति में पाकिस्तान को विशेष रूप से मुसलमानों की आर्थिक स्थिति को बेहतर बनाने हेतु एक कारगर उपाय के रूप में देखा गया.

मुसलमानों को भी लगने लगा कि हिंदू बहुल भारत में उनके आर्थिक हितों की रक्षा नहीं हो पाएगी. राष्ट्रीय भाषा को लेकर बहस ने इस मतभेद को और पुष्ट करने का काम किया. हिंदी प्रस्ताव के समर्थकों ने मुसलमान समुदाय को अलग- थलग करने का काम किया.

शुरुआती दिनों में जो सर सैयद अहमद खां राष्ट्रवादी चिंतक थे, बाद में धार्मिक संकीर्णता के शिकार होकर इन मुद्दों में उलझ कर रह गए.

सन् 1937 के चुनाव परिणामों में हार से मोहम्मद अली जिन्ना को एक बड़ी सबक मिली. हार के पश्चात् उन्होंने जनता को सांप्रदायिक बनाया और पाकिस्तान की मांग को बुलंद करने का काम शुरु किया.

विभाजन से एक वर्ष पूर्व की देश की स्थिति

3 जून 1946 को  7:00 बजे ऑल इंडिया रेडियो से भारत के प्रमुख नेताओं ने वक्तव्य देकर बताया कि भारतीय भूखंड को दो अलग-अलग स्वतंत्र राष्ट्र में बांटने का समझौता कर लिया गया है. नेहरु जी ने अपने वक्तव्य के दौरान लोगों से आग्रह किया कि इसे शांतिपूर्वक स्वीकार कर लिया जाए. पर लोग अपने पड़ोसी तक के खून के प्यासे बन गए.

16 अगस्त 1946 को कलकत्ता में जो हुआ वह इतिहास का सबसे भयानक 24 घंटा साबित हुआ. हुगली नदी में न जाने कितनी लाशें समा गई जिसका कोई हिसाब नहीं मिला. प्रतिक्रिया में नोआखली भी धू- धूकर जल उठा. गांधीजी की प्रायश्चित यात्रा वहीं चल रही थी. बिहार भी इस आग से अछूता नहीं रहा.

डिकी बर्ड योजना

तत्कालीन वायसराय, लार्ड माउंटबेटन ने 3 जून 1947 को यह योजना प्रस्तावित की. गांधीजी के कड़े विरोध के पश्चात सभी दलों ने एक साथ एकजुट होकर प्रस्ताव का समर्थन किया और विभाजन के मुद्दे पर मुहर लगा दी. परिणामस्वरूप ब्रिटिश संसद ने उसी वर्ष 1947 का ‘भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम’ पारित किया.

इसमें दो स्वतंत्र राज्यों के निर्माण की घोषणा हुई- भारतीय संघ और पाकिस्तान. भारत के वायसराय और राज्य-सचिव पद को समाप्त कर दिया गया. साथ ही दोनों राज्य हेतु गवर्नर-जनरल की व्यवस्था की. लॉर्ड माउंटबेटन भारत के पहले गवर्नर-जनरल बने तो जिन्ना पाकिस्तान के.

विभाजन की अग्नि बरकरार है 

लाहौर शहर जल रहा था. जो हिंदू वहां थे उनकी पानी की आपूर्ति काट दी गई. जो भी पानी लेने निकलता उसकी हत्या कर दी जाती. शाह आलमी गेट वाले गुरुद्वारे को आग के हवाले कर दिया गया.

लाल ईंटों से बना अमृतसर रेलवे स्टेशन शरणार्थी कैंप के रूप में तब्दील हो चुका था. पश्चिमी पंजाब से आए हजारों हिंदू स्टेशन पर डेरा डाले बैठे थे. जब भी कोई ट्रेन आती वे दरवाज़े और खिड़कियों की तरफ़ लपक पड़ते. सबका कोई न कोई पीछे छूट रहा था. खोए हुए लोग ट्रेन में अपने खोए हुए को ढूंढते थे. जब नहीं मिलते तो सिर पटककर चिल्लाते थे.

पंजाब और बंगाल के हजारों लोग 15 अगस्त के शुभ अवसर पर खुशी के मारे उछले जा रहे थे, परंतु उन्हें पता नहीं था कि अगले ही क्षण किसी को पाकिस्तान जाना पड़ेगा और किसी का घर सदा के लिए छूट जाएगा.

उन लोगों को ये तक पता नहीं था कि जिस स्थान पर वे झूम रहे हैं वास्तव में वो हिंदुस्तान है या पाकिस्तान में.

भारत का विभाजन एक बुरे सपने जैसा है. इंसान की क्या ही बात करें, इससे जानवर भी नहीं बच सके. जो जानवर खूंटों में बंधे थे, जिनको उसका मालिक एक पहर भी भूखा नहीं रखता था, उन जानवरों ने भूख और प्यास से दम तोड़ दिया.

दशकों से रह रहे लोगों को अपने पूर्वजों की हवेली आनन-फानन में छोड़नी पड़ी. कई नहरें ऐसी थीं, जिसका प्रारंभ एक देश में था तो संचालन दूसरे देश में. किसी गांव की दर्जन भर झोपड़ियां एक देश में तो बाकी दूसरे देश में आ गईं. कई लोगों का मक़ान बीचों-बीच इसीलिए काट दिया गया क्योंकि आधा मक़ान भारत के हिस्से लगा तो आधा पाकिस्तान के.

यह आंच आज भी दोनों देशों को सुलगा रही है. भारत आज भी उस त्रासदी को जी रहा है.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)