भारतीय भाषाएं: एक विराट सागर में समाहित होती नदियां

औपनिवेशक नज़रिए को हमारा भाषायी परिदृश्य विचित्र प्रतीत होता है. वे नहीं समझ पाते कि हमारे यहां एक बोली के ही कई क्षेत्रीय रूप हैं. यहां बोलियां और भाषाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई भी हैं और कभी अलग भी हो जाती हैं. जैसे, असमिया बांग्ला की एक बोली भी है और भिन्न भाषा भी है.

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(फोटो साभार: विकीमीडिया कॉमन्स)

महाराष्ट्र सहित कई प्रान्तों में हिंदी के विरोध की जड़ें इस औपनिवेशक धारणा में है कि भारतीय भाषाएं एक-दूसरे से अलग और स्वायत्त हैं. यह धारणा उपनिवेशकाल में साम्राज्यवादी स्वार्थ के के तहत बनाई गई. दरअसल भारतीय भारतीय भाषाएं एक-दूसरे जुड़ी हुई हैं और इनमें सदियों से आवाजाही का संबंध है.

औपनिवेशक दृष्टि हमारे भाषायी परिदृश्य को विचित्र समझता है. हमारे यहां कहते हैं कि बारह कोस पर बोली बदलती है. एक बोली के कई क्षेत्रीय रूप हैं. बोलियां और भाषाएं एक दूसरे से जुड़ी हुई भी हैं और कुछ मामलों में ये अलग भी हो जाती हैं. जैसे, असमिया बांग्ला की एक बोली भी है और अलग भाषा भी है.

हमारे प्राचीन और मध्यकालीन कवियों की रचनाएं भी एकाधिक भाषाओं में मिलती हैं. ये गुजराती में हैं, तो इनके राजस्थानी और ब्रज रूपांतरण भी मिलते हैं और यदि ये मराठी में हैं, तो ये गुजराती और अन्य भाषाओं में भी उपलब्ध हैं.

स्थिति यह है कि इन कवियों की रचनाओं पर एकाधिक भाषाओं के लोग अपनी होने का दावा करते हैं. उपनिवेशकाल में भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण करने वाले जार्ज ग्रियर्सन को यह देख कर बड़ा अचंभा हुआ. वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ‘भारत सचमुच विरोधी तत्त्वों की भूमि है और भाषाओं पर विचार करते समय तो ये तत्त्व और भी दृष्टिगोचर होते हैं.’

अमीर ख़ुसरो और अबुल फ़जल का भाषाओं के संबंध में नज़रिया

ग्रियर्सन से पहले अमीर ख़ुसरो और अबुल फ़जल, दोनों भारत में पैदा हुए थे, लेकिन यहां की भाषाओं के संबंध में उनका नज़रिया भी बाहरी था. अमीर ख़ुसरो के अनुसार ‘यहां के प्रत्येक देश में ऐसी विचित्र एवं स्वतंत्र भाषाएं प्रचलित हैं, जिनका एक दूसरे से कोई संबंध नहीं है.’

अबुल फ़जल का भी मानना था कि ‘हिंदुस्तान के विस्तृत भूभाग में अनेक बोलियां बोली जाती हैं. इनमें पर्याप्त अंतर है तथा ये परस्पर बोधगम्य भी नहीं हैं.’

भारतीय भाषाओं को ‘विविध’, ‘परस्पर अबोधगम्य’, ‘परस्पर विरोधी’ घोषित करना, मध्यकालीन और उपनिवेशकालीन विदेशी अध्येताओं का यह नज़रिया ठीक नहीं है, लेकिन विडंबना यह है कि अब अधिकांश भारतीय अध्येताओं का नज़रिया भी यही हो गया है.

जार्ज ग्रियर्सन के भारत प्रेम, भारत ज्ञान और वैदुष्य पर संदेह नहीं किया जा सकता. इस मामले में वे किसी भी देशी अध्येता से आगे हैं, लेकिन यह तो मानना ही पड़ेगा उनके संस्कार यूरोपीय थे और इस कारण ‘पूर्व’ के बारे में उनकी राय अच्छी और ऊँची नहीं थी. इसको लेकर उनके मन में कुछ पूर्वग्रह थे. उनका आग्रह था कि आधुनिक भारत को ‘पश्चिमी ज्ञान के प्रकाश’ में ही समझा जा सकता है.

उन्होंने भारत के भाषा सर्वेक्षण के अपने निष्कर्षों में इस संबंध में जो राय ज़ाहिर की, पश्चिम से अभिभूत हमारे ‘आधुनिक’ अध्येताओं ने उस पर ग़ौर ही नहीं किया. उन्होंने आग्रहपूर्वक इस लोकप्रिय कथन और धारणा को ख़ारिज़ कर दिया कि ‘प्रकाश पूर्व से आता है.’

उन्होंने लिखा कि ‘प्रकाश पूर्व से आता है, किंतु अभी इसमें तथा उस काल्पनिक प्रभात में जो अभी आने वाला है पर आया नहीं है, अंतर स्पष्ट करने के लिए हमें ज्ञान की निरंतर खोज में अनेक वर्षों तक प्रवृत्त होना पड़ेगा…भारत का वास्तविक ज्ञान हमें तब तक नहीं हो सकता जब तक हम पश्चिमी ज्ञान के प्रकाश में यहां की बत्तीस करोड़ जनता की आशा, भय और विश्वास का अध्ययन न करें.’

ज़ाहिर है, जिस नज़रिए और आग्रह के साथ वे भारतीय भाषाओं के अध्ययन में प्रवृत्त हुए, वो विदेशी था और उन्होंने जो निष्कर्ष निकाले वे भारतीय भाषाओं की सही तस्वीर पेश नहीं करते.

विडंबना यह है कि भारतीय भाषाओं के बारे में उनकी राय मान्य होकर अब हमारी समझ का हिस्सा हो गई है. अब हम अपनी भाषाओं के संबंध में उनके लगभग मान्य हो गए वर्गीकरण और विभाजन के सांचों-खांचों में ही सोचते-समझते हैं.

भारतीय भाषाओं के परस्पर संबंध और वैशिष्ट्य को बाहरी या विदेशी व्यक्ति अच्छी तरह नहीं समझ सकता, क्योंकि हमारे यहां सांस्कृतिक वैविध्य बहुत है और क्षेत्रीय विशेषताओं की भी बहुतायत है. कई बार ये क्षेत्रीय विशेषताएं इतनी अधिक मुखर होती हैं कि इनसे भाषा के अलग होने का भ्रम हो जाता है.

जार्ज ग्रियर्सन, अमीर ख़ुसरो और अबुल फ़जल सहित कई विदेशी नज़रिये वाले लोगों को ऐसा भ्रम हुआ था. उन्होंने क्षेत्रीय सांस्कृतिक विशेषताओं को आधार मानकर भाषा को अलग होने का दर्ज़ा दे दिया, जबकि ऐसा था नहीं. कोई सामान्य भारतीय भी यह आसानी से समझ जाएगा कि उसकी भाषा उसके अपने इलाके से बाहर कुछ बदल तो जाएगी, लेकिन अलग नहीं होगी. उसे यह भी अच्छी तरह पता है कि अपने इलाके या ‘देश’ से बाहर भी उसे संवाद में कोई ख़ास असुविधा नहीं होगी.

एक छोर की भाषा दूसरे छोर पर जाकर थोड़ी भिन्न लगने लगती है

ऐसा नहीं है कि यह स्थिति पूरे देश में हो. जहां किसी पहाड़ आदि की भौगोलिक बाधा से विभाजक हो, तो भाषाएं अलग भी होती हैं, लेकिन अधिकांश इलाकों में जहां संपर्क और संवाद की निर्बाध निरंतरता है, वहां एक ही भाषा बदलती हुई बहुत दूर तक जारी रहती है. फ़ैजाबाद-सुल्तानपुर की अवधी आरा-बलिया-छपरा पहुंचकर भोजपुरी हो जाती है.

भारत का भाषायी वैविध्य ‘विचित्र’ के रूप में जिस तरह से प्रचारित है, यह दरअसल वैसा है नहीं. यह विचित्र हमें भाषायी वर्गीकरण और विभाजन की औपनिवेशिक समझ के कारण दिखाई पड़ता है. उपनिवेशकाल से पहले तक जब भारतीय भाषाओं को औपचारिक पहचान नहीं मिली थी, तब यहां का भाषायी परिदृश्य अलग था. यहां की भाषाएं और बोलियां एक-दूसरे से इस तरह से संबद्ध थीं कि इनको पृथक् और वर्गीकृत करना कठिन था.

भारत के भाषा सर्वेक्षण के दौरान जार्ज ग्रियर्सन को इसी तरह की मुश्किल का सामना करना पड़ा. उनसे पहले तक तो यूरोपीय विद्वान् एक-दूसरे से भिन्न चरित्र और स्वभाव वाली भारतीय भाषाओं की भी इनकी परस्पर संबद्धता के कारण सदियों तक कोई अलग पहचान नहीं बना पाए. लंबे समय तक शब्द समूह की समानता के आधार पर कतिपय दक्षिण भारतीय भाषाओं को भी संस्कृत से उत्पन्न माना जाता रहा.

भाषाओं की एक-दूसरे से अलग पहचान

जार्ज ग्रियर्सन ने भारतीय भाषाओं का जो वर्गीकरण और विभाजन किया, उससे पहली बार भाषाओं को एक-दूसरे से अलग पहचान मिली. विडंबना यह है कि खींच-खांचकर कर किया गया वर्गीकरण और विभाजन तो हमारी भाषायी समझ का हिस्सा हो गया, लेकिन भारतीय भाषाओं की परस्पर घनिष्ठ संबद्धता संबंधी कई बातें जो सर्वेक्षण के दौरान सामने आईं, उन पर कम लोगों का ध्यान गया.

भारतीय भाषाएं एक-दूसरे से इस तरह जुड़ी हुई हैं कि वे एक-दूसरे से कहां और कैसे अलग होती हैं, यह तय करना मुश्किल काम है. ख़ास बात यह है कि यह बात इन भाषाओं की जीने और बरतनेवाला ही अच्छी तरह समझ सकता है. अकसर वे दूसरी भाषा की सीमा शुरू होने से पहले ही उसके जैसी होने लगती हैं. ग्रियर्सन ने भी सर्वेक्षण के दौरान यह महसूस किया.

उन्होंने इसके प्रतिवेदन के पूर्व कथन में भारत में क्षेत्रीय भाषाओं की सीमाओं की चर्चा करते हुए लिखा कि ‘‘सामान्यतः जब तक विशेष रूप से जाति (रेस) एवं संस्कृति में अंतर न हो या बड़ा पहाड़ या प्राकृतिक बाधा उपस्थित न करे, तब तक भारतीय भाषाएं एक-दूसरे में विलीन हो जाती हैं.’ मीरा सहित कई प्राचीन और मध्यकालीन कवियों की कविता की भाषा में गुजराती, राजस्थानी, ब्रज आदि अलग-अलग भाषाएं नहीं हैं. ये एक ही भाषा के क्षेत्रीय रूप हैं, जो कुछ दूर चलकर एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं.

दरअसल, इन कवियों की भाषा में एक ही भाषा के एक-दूसरे संबद्ध और एक-दूसरे में घुले-मिले क्षेत्रीय रूप हैं, जो अब औपनिवेशिक भाषायी समझ के कारण हमें अलग-अलग भाषाओं के रूप में दिखाई पड़ते हैं.

भाषा और क्षेत्रीय अस्मिता

भाषा को अपनी क्षेत्रीय अस्मिता के साथ जोड़कर देखने का चलन यहां उपनिवेशकाल में शुरू हुआ. उपनिवेशकाल से पहले तक तो भारत में भाषा के क्षेत्रीय रूपों को पहचान देने का आग्रह लगभग नहीं था. संस्कृत के बरक्स प्राच्य प्राकृत की मौजूदगी के संकेत 400 ई. से मिलने लगते हैं.

इसमें में भी क्षेत्रीय वैविध्य था. उद्योतन सूरि की आठवीं सदी की रचना ‘कुवलयमाला’ के अनुच्छेद 242 में 18 बोलियों का क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ सोदाहरण नामोल्लेख है, लेकिन ख़ास बात यह है कि यहां ये पृथक् अस्तित्व वाली भाषाओं के रूप में उल्लिखित नहीं हैं.

यहां भाषा एक है, लेकिन यह अलग-अलग क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ बोली जा रही है. भाषाएं यहां इस तरह एक-दूसरे से जुड़ी और एक-दूसरे में घुली-मिली थीं कि कि इनको भिन्न अस्मिता के साथ जोड़ कर देखना संभव भी नहीं था.

भारतीय भाषाओं को उनकी क्षेत्रीय विशेषताओं के आधार पर पहली बार वर्गीकृत और विभक्त करने वाले जार्ज ग्रियर्सन ने भी भाषा के मामले में भारतीयों के इस ख़ास नज़रिए को लक्ष्य किया. उन्होंने सर्वेक्षण के अपने प्रतिवेदन के पूर्वकथन में एक जगह लिखा कि

एक सामान्य भारतीय ग्रामीण यह नहीं जानता कि जिस बोली को वह बोल रहा है उसका नाम भी है. वह अपने यहां से पचास मील दूरी पर बोली जानेवाली बोली का नाम तो बता सकता है, किंतु जब उसकी बोली का नाम पूछा जाता है तो वह कह उठता है कि ‘ओह, मेरी बोली का तो कुछ नाम नहीं है, यह तो विशुद्ध भाषा है.’

बोलियों की नाम संज्ञाओं को मान्यता और स्वीकृति

भारत में देशभाषा अथवा बोलियों की नाम संज्ञाओं को मान्यता और स्वीकृति उपनिवेशकाल में मिली. यहां के लोग अपनी भाषा को देशभाषा या बोली कहते थे या फिर दूसरे लोग उसका क्षेत्र के आधार पर कोई नाम कौशली, गुजराती आदि रख देते थे.

हमारे उन प्राचीन और मध्यकालीन कवियों, जिनकी कविता की लोकप्रियता उतर भारत के बड़े भूभाग में थी, की अब यही विशेषताएं मुखर होकर अस्मिता का हिस्सा हो जाने के कारण हमें अलग भाषाओं के रूप में दिखाई पड़ती हैं.

पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी के अधिकांश उत्तर भारतीय साहित्य को आज की राजस्थानी गुजराती, ब्रज भोजपुरी आदि भाषायी पहचानों में देखना ठीक नहीं है. दरअसल पंद्रहवीं-सोलहवीं सदी में आज की प्रांतीय इकाइयों राजस्थान, गुजरात, उतरप्रदेश, मध्यप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, बिहार आदि में जो भाषा इस्तेमाल हो रही थी, वह कुछ क्षेत्रीय विशेषताओं को छोड़कर लगभग एक थी.

जार्ज ग्रियर्सन ने भी उपनिवेशकाल में भाषाओं का वर्गीकरण और विभाजन तो किया, लेकिन वे इस सच्चाई से परिचित थे कि क्षेत्रीय भिन्नताओं के साथ तमाम उत्तर भारत में एक ही भाषा इस्तेमाल होती थी. सर्वेक्षण के दौरान वे भी इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ‘राजपूताना, मध्यभारत तथा गुजरात के विस्तृत क्षेत्रों में दैनिक जीवन में व्यवहृत शब्द एवं शब्द समूह प्रायः समान है.

हां, उच्चारण में अंतर अवश्य है. इस प्रकार यह कहा जा सकता है और सामान्य लोगों का विश्वास भी यही है कि गंगा के समस्त कांठे में, बंगाल और पंजाब के बीच, अपनी अनेक स्थानीय बोलियों सहित केवल एक मात्र प्रचलित भाषा हिंदी ही है. इस भाषा की अलग-अलग और स्पष्ट क्षेत्रीय पहचान बहुत बाद में विकसित हुईं. गुजराती साहित्य के एक विशेषज्ञ आई.जे.एस. तारपुरवाला ने पंद्रहवीं-सोलहवीं सदीं की संत-भक्त कवयित्री मीरा की कविता के भाषिक वैविध्य के कारणों की बहुत युक्तिसंगत पड़ताल की है.

प्राचीन और मध्यकालीन कवियों की भाषाएं

तारपुरवाला के अनुसार ‘मीरा पर गुजरात, राजपुताना और पूरा मथुरा क्षेत्र अपना दावा करता है, लेकिन जिस समय में वह जी रही थी, उस समय इन क्षेत्रों में केवल एक ही भाषा-पुरानी गुजराती या पुरानी पश्चिमी राजस्थानी प्रचलित थी, इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि उनके पद अब उन तमाम क्षेत्रीय भाषाओं में मिलते हैं, जिन्होंने इस भाषा का स्थान ले लिया था.’

कबीर की भाषा के संबंध में भी भोलानाथ तिवारी की यही राय है. उन्होंने साफ़ लिखा कि ‘विभिन्न विद्वानों ने कबीर की भाषा को कोई एक बोली, राजस्थानी, अवधी, भोजपुरी आदि माना है. ऐसा मानना उचित नहीं कहा जा सकता. क्योंकि कबीर का रचनाकाल मोटे रूप से ईसा की पंद्रहवीं सदी है. उस समय तक ब्रज, राजस्थानी, अवधी, भोजपुरी आदि पूर्णतया अलग नहीं हुई थीं, जिस रूप में आज हैं.’

दरअसल, हुआ यह है कि कबीर, मीरा आदि की रचनाएं राजस्थान, गुजरात, मालवा, ब्रज आदि में उस समय लगभग समान रूप से व्यवहृत भाषा में हुईं, लेकिन जैसे-जैसे क्षेत्रीय भाषिक इकाइयों का पृथक् विकास हुआ, ये रचनाएं इन इकाइयों के अनुसार राजस्थानी, ब्रज, गुजराती आदि में ढलती गईं.

प्राचीन और मध्यकालीन कवियों की कविता को आज की अपनी-अपनी भाषायी पहचानों तक सीमित करने का आग्रह इधर बहुत बढ़ गया है. मीरा का जन्म, लालन-पालन और विवाह राजस्थान में हुआ, इसलिए कुछ विद्वानों की धारणा है कि केवल राजस्थानी मीरा की भाषा है और इससे इतर भाषाओं की मीरा की रचनाएं मीरा की रचनाएं नहीं हैं.

क्षेत्रीय आधार पर भाषाओं का विभाजन

हीरालाल माहेश्वरी का मानना है कि ‘मीरा का अधिकांश जीवन राजस्थान में बीता. वह वहीं जन्मी और ब्याही गई. केवल जीवन के अंतिम दिन गुजरात में बीते. उसकी वृंदावन यात्रा अथवा वहां निवास निराधार है. इस कारण शुद्ध गुजराती, शुद्ध पंजाबी और शुद्ध भोजपुरी भाषाओं में मिलने वाले पद अपने वर्तमान रूप में कदापि मीरा के नहीं हो सकते. शुद्ध ब्रजभाषा के पद भी संदेहास्पद ही हैं. अधिक से अधिक ऐसे पदों में मीरा की भावना भले ही सुरक्षित हो.

मीरा की भाषा राजस्थानी थी. इसी तरह के आग्रह अन्य प्राचीन और मध्यकालीन कवियों की भाषा के संबंध में भी है. इस तरह के आग्रह युक्तिसंगत नहीं हैं. दरअसल पंद्रहवी-सोलहवीं सदी में का क्षेत्रीय आधार पर भाषाओं का विभाजन नहीं हुआ था, लेकिन आगे चलकर ये पहचानें कुछ हद तक बनती गईं. इन कवियों की विभिन्न क्षेत्रों में प्रचलित कविता भी इन पहचानों में ढलकर गुजराती, ब्रज, राजस्थानी आदि होती गईं.

साफ़ है कि इन कवियों की ब्रज या गुजराती या राजस्थानी में मिलने वाली कविता इनकी ही है. यह अलग बात है कि बाद में यह निरंतर चलन में रहने के कारण इन पहचानों में अलग भी दिखाई देने लगीं.

भारत में प्रजातीय विविधता के कारण भाषायी वैविध्य है, लेकिन इस वैविध्य को अंदरूनी या भारतीय नज़रिये से समझा जाए, तो नतीजे प्रचारित से अलग प्रकार के आएंगे. एक तो अधिकांश उत्तर भारतीय भाषाओं अपनी उत्पत्ति से एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं. केवल क्षेत्रीय वैशिष्ट्य के कारण इस भाषा के कई रूप हो गए हैं और अब ये रूप क्षेत्रीय अस्मिता के साथ जुड़कर मुखर और प्रमुख भी हो गए हैं, अन्यथा इनका अधिकांश का व्याकरणिक गठन, शब्दावली और मुहावरा लगभग समान है.

सदियों के सहजीवन और आदान-प्रदान के कारण यहां की भिन्न परिवार वाली भाषाएं भी कुछ हद तक एक-दूसरे में घुल-मिल गई हैं. उनके शब्द समूह और मुहावरे भी एक दूसरे के निकट आ गए हैं. यहां लगता है कई भाषाएं हैं, लेकिन असल में ऐसा है नहीं. थोड़ा बारीकी और पास से देखा जाए, तो लगता है जैसे यहां भाषा से भाषा है या फिर भाषा में भाषा है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)