आरा: बिहार में विधानसभा चुनाव से कुछ ही महीनों पहले निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अधिसूचना के बाद से विवादों में है. प्रक्रिया जारी रहने के दौरान भी अनियमितताओं के आरोप लगे और ड्राफ्ट मतदाता सूची आने के बाद से लगातार मतदाताओं के नाम कटने और विसंगतियों के मामले सामने आ रहे हैं.
इसी कड़ी में सामने आया है कि इस ड्राफ्ट सूची में भोजपुर जिला मुख्यालय आरा के वार्ड संख्या 10 में रहने वाले एक परिवार के कई सदस्यों का नाम मतदाता सूची से हटा दिया गया है. इतना ही नहीं, आरा स्थित एक मोंटेसरी स्कूल की शिक्षिका रही 74 वर्षीय मेरी टोप्पो को डिलिशन लिस्ट में मृत घोषित कर दिया गया है, जबकि उनके तीन बेटों – 40 वर्षीय चंदन टोप्पो, 38 वर्षीय क्लेरेंस टोप्पो और 36 वर्षीय अल्बर्ट टोप्पो- के नाम स्थानांतरित सूची में डाल दिए गए हैं.
विसंगतियों की फेहरिस्त यहीं ख़त्म नहीं होती. मेरी टोप्पो का लिंग परिवर्तित कर उन्हें पुरुष घोषित कर दिया गया है. उनके स्वर्गीय पति सिल्वेस्टर टोप्पो का नाम उनके पिता के तौर पर दर्ज कर लिया गया है और मेरी की उम्र को दस बरस कम कर 64 कर दिया गया है.
एसआईआर अभियान के दौरान मृत घोषित की गई मेरी टोप्पो द वायर हिंदी से कहती हैं, ‘मैं जिंदा हूं, लेकिन सरकार ने मुझे मृत घोषित कर दिया. अगर लिस्ट प्रकाशित नहीं होती तो हमें पता भी नहीं चलता. जबकि पिछले लोकसभा चुनाव में मैंने वोट दिया था और मेरा पूरा परिवार मतदान में शामिल हुआ था.’
मेरी टोप्पो के बेटे क्लेरेंस टोप्पो बताते हैं, ‘जब मैंने बूथ लेवल एजेंट (बीएलओ) से पूछा कि मेरी मां को मृत कैसे घोषित किया गया, तब उसने कहा कि उम्र के आकलन के आधार पर उन्हें मृत घोषित किया गया.’
क्लेरेंस टोप्पो बताते हैं, ‘एसआईआर की प्रक्रिया के दौरान बीएलओ न तो हमारे घर आया और न ही किसी से संपर्क किया. सूची का काम पूरा होने के बाद नाम प्रकाशित हुए, लेकिन हमने उस समय ध्यान नहीं दिया. बाद में जब नई सूची बूथ पर चिपकाई गई, तब मेरे मित्र अभिषेक द्विवेदी ने बताया कि मेरा नाम ‘स्थानांतरित’ और मां का नाम ‘मृत’ दिखा रहा है. तब हमें जानकारी मिली. इसके बाद बीएलओ घर आया और हमारे कागज़ लेकर गया. उसने आश्वासन दिया कि हमारे नाम जोड़ दिए जाएंगे.’
क्लेरेंस आगे बताते हैं, ‘जब मैंने बीएलओ से पूछा कि आपने पहले संपर्क क्यों नहीं किया, तब बीएलओ ने कहा कि पूर्व वार्ड पार्षद ने मुझे पहचानने से इनकार कर दिया था और वर्तमान पार्षद ने भी मेरी पहचान की पुष्टि नहीं की, इसलिए मेरा और मेरे परिवार का नाम हटा दिया गया.’

मेरी टोप्पो आगे कहती हैं, ‘सिल्वेस्टर टोप्पो से शादी के बाद मैं करीब 50 साल से आरा में रह रही हूं. मोंटेसरी स्कूल के छात्र मुझे अच्छी तरह जानते हैं. लोग मुझे पहचानते हैं. मैं स्वस्थ हूं, आपसे बात कर रही हूं, लेकिन मतदाता सूची में मृत हूं.’
क्लेरेंस के मित्र अभिषेक द्विवेदी कहते हैं, ‘डिलिशन सूची प्रकाशित होने के बाद मैं यादव विद्यापीठ प्लस टू हाई स्कूल स्थित बूथ संख्या 223 पर गया. वहां देखा कि क्लेरेंस का नाम ‘स्थानांतरित’ और उनकी मां का नाम ‘मृत’ दिखाया गया है. तब मैंने क्लेरेंस को बताया.’
जब इस बारे में वार्ड संख्या 12 के पार्षद प्रतिनिधि अभय श्रीवास्तव उर्फ बबलू से बात की गई तब उन्होंने फोन पर कहा, ‘बीएलओ मेरे पास सूची लेकर आया था. मैंने उसे कहा कि आप अपने स्तर से जांच कीजिए. शायद किसी ने कह दिया होगा कि क्लेरेंस की मां नहीं हैं, इसलिए बीएलओ ने उन्हें मृतकों की सूची में जोड़ दिया.’
वहीं, बीएलओ विनोद कुमार यादव का कहना है, ‘मेरी टोप्पो के नाम में पति की जगह पिता लिखा था और उम्र 74 साल दर्ज थी. स्थानीय स्तर पर उनके पहचान की पुष्टि न होने के कारण उन्हें मृत घोषित कर दिया गया.’
स्पष्ट है कि बीएलओ ने बगैर कोई पड़ताल किए एक बुजुर्ग स्त्री को मृत घोषित कर दिया और उनके बेटों को भी मतदाता सूची से हटा दिया.
साहित्यकार केडी सिंह का नाम भी सूची से गायब
ड्राफ्ट सूची में समस्याएं और भी हैं. हिंदी और भोजपुरी के वरिष्ठ साहित्यकार, आरा के चंदवा निवासी 87 वर्षीय डॉ. केडी सिंह का नाम न तो मतदाता सूची में है और न ही डिलिशन लिस्ट में.
केडी सिंह ने हिंदी और भोजपुरी में दर्जनभर किताबें लिखी हैं और ऋग्वेद का भोजपुरी अनुवाद भी किया है.
वे बताते हैं, ‘जब गहन पुनरीक्षण कार्यक्रम चल रहा था, तब बीएलओ आया था और आधार कार्ड ले गया था. लेकिन ड्राफ्ट सूची में मेरा नाम नहीं है. सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर डिलिशन लिस्ट निकली, उसमें भी नाम नहीं है. जबकि मेरी पत्नी 85 वर्षीय यशोदा देवी का नाम सूची में है.’

अपनी लिखी हुई किताबें दिखाते हुए केडी सिंह कहते हैं, ‘1961 में भारतीय डाक सेवा में नौकरी शुरू की और जनवरी 1998 में रिटायर हुआ. उसके बाद से किताबें प्रकाशित करता रहा हूं. सरकार आम जनता को परेशान कर रही है. पहचान साबित करने के लिए बार-बार दस्तावेज दिखाने पड़ते हैं. कभी नोटबंदी, कभी वोटबंदी, आम आदमी परेशान है.’
‘मैं और पत्नी यहीं रहते हैं, बच्चे बाहर हैं. नाम जांचने के लिए किसी को बुलाना पड़ता है. 2024 के लोकसभा चुनाव में हमने इसी सूची से वोट दिया था. इतनी जल्दी गड़बड़ी कैसे हो गई? अगर मतदाता सूची सुधारनी है तो सही तरीके से करें, जल्दबाजी में सब ख़राब हो जाएगा.’
वह कहते हैं, ‘मतदाता सूची सुधारने की मौजूदा प्रक्रिया हड़बड़ी वाली है. बीएलओ दोबारा आया था, लेकिन पता नहीं अब क्या करेगा. मेरे पास नौकरी और पेंशन के कागज़ हैं, लेकिन जिन बुजुर्गों ने नौकरी नहीं की, उनके पास तो कोई कागज़ नहीं होगा.’
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस प्रक्रिया के दौरान आधार कार्ड को शामिल करने के आदेश की उन्होंने सराहना की.

बीएलओ परेशान
अब जब ड्राफ्ट सूची में सुधार का आखिरी समय चल रहा है, लोगों में अफरा-तफरी का माहौल है. एक बीएलओ ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ‘इतने कम समय में हर घर जाकर मतदाताओं का सत्यापन करना बहुत मुश्किल है. स्वास्थ्य भी खराब हो रहा है. रात-भर काम करना पड़ता है. चुनाव आयोग को और समय देना चाहिए था.’
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
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