सिलिकोसिस: खान के मजदूरों को धीमे-धीमे कुतरती बीमारी

सिलिकोसिस बीमारी पत्थर की खदानों और ईंट के भट्ठों से निकलने वाले धूल के कणों से होती है, जिससे फेफड़े बुरी तरह प्रभावित होते हैं. इससे मजदूरों की कार्यक्षमता के साथ उनकी उम्र भी घटती जा रही है, लेकिन उनके लिये मास्क भी मयस्सर नहीं.

सिलिकोसिस एक देशव्यापी बीमारी है, जिसकी चिंता किसी को नहीं है. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

यूट्यूब पर एक रिपोर्ट है जिसमें पत्रकार समदीश भाटिया राजस्थान के करौली जिले में कुछ मजदूरों से बात कर रहे हैं, जो आसपास के इलाके में पत्थर की खदानों में काम करते हैं. इनमें से अधिकतर लोग सिलिकोसिस नाम की बीमारी की चपेट में हैं.

सिलिकोसिस शब्द सिलिका से बना है. ये बीमारी पत्थर की खदानों और ईंट के भट्ठों पर निर्माण कार्य में निकलने वाली महीन धूल के कणों से होती है, जिससे फेफड़े बुरी तरह प्रभावित होते हैं. इससे पीड़ित मजदूरों की कार्यक्षमता के साथ उनकी उम्र भी घटती जा रही है, लेकिन आलम ये कि उन्हें एक अदद किट या मास्क भी मयस्सर नहीं. अगर कुछ हासिल है तो एक प्रमाण पत्र, जिसमें मनहूसियत भरा एक दिलासा है कि बीमार आदमी के मरने के बाद सरकार कुछ रूपये उसके परिवार को दे देगी. हालांकि इसकी भी कोई गारंटी है नहीं.

इसका अंदाज़ा इंडिया स्पेन्ड में प्रकाशित एक रिपोर्ट से लगाया जा सकता है, जो कहती है कि 2023 तक राजस्थान में इसके कुल 48,448 मामलों में से 31,869 ही प्रमाणित किए जा सके. शेष हजारों मजदूर अब भी अपनी लाचारी का सरकारी प्रमाणपत्र के बनने का मुंह ताक रहे हैं. यानि मुआवज़े के लिए बीमार भर होना काफ़ी नहीं है, बीमारी का सर्टिफिकेट भी चाहिए जिसे समय रहते बनवा पाना भी कोई युद्ध जीत लेने जैसा ही है.

‘विधवाओं का गांव’

यह रिपोर्ट खदानों के आस पास बसे उन गांवों का ज़िक्र भी करती है जिन्हें अब ‘विधवाओं का गांव’ कहा जाने लगा है क्यूंकि उनके खदान श्रमिक पति को सिलिकोसिस ने खा लिया है और अब उनके बच्चे भी वही काम करने को मजबूर हैं जिससे उन्होंने अपने पिता को असमय मरते हुए देखा.

उन सब बच्चों पर भी असमय मृत्यु का ख़तरा है और उनके परिवारों पर असहाय हो जाने का. 2015-17 के बीच राजस्थान में 449 मौतें इस बीमारी की वजह से हुईं.

करौली और आस पास के ज़िले जहां पत्थर निकलते हैं वहां बड़ी संख्या में मजदूर इस बीमारी से जूझ रहे हैं. इस इलाक़े में बहुत से गांव इसकी चपेट में हैं. वे लोग जो‌ फूलती सांस और हांफते फेफड़ों के साथ हथौड़े चला कर तोड़ते हैं चट्टानें, कि बन सकें बड़े बड़े संसद भवन, स्मारक, मंदिर और मूर्तियां, उनकी देह जवाब दे रही है, उनकी सांस फूल रही है और विडंबना तो यह है कि कोई दूसरा काम कर लेने का विकल्प भी नहीं है उनके पास.

राजस्थान जैसे राज्यों में, जहां पत्थर का काम एक प्रमुख रोज़गार सृजित करता है, वहांं तो यह समस्या विकट है ही, लेकिन यह बीमारी केवल करौली या धौलपुर या जोधपुर की नहीं है यह एक देशव्यापी बीमारी है. बाकी राज्यों में भी सिलिका डस्ट से होने वाली इस बीमारी की उपस्थिति है. लेकिन राजधानी के पर्यावरण को लेकर चिंतित ‘दिखने’ वाले हुक्मरान दिल्ली से इतर राजस्थान, झारखंड, गुजरात और कर्नाटक के क्षेत्रों में मरते इन मजदूरों की हालत पर चिंतित ‘दिखते’ भी नहीं.

‘श्रम जिसे किसी ने नहीं गाया’

अब जरा भारत की कला और स्थापत्य के कई प्रतीक याद कीजिये. भारत की इतनी महान मूर्त विरासत केवल राजाओं के प्रश्रय से नहीं, मजदूरों और कारीगरों के श्रम से भी बनी है. वह श्रम जिसे किसी ने नहीं गाया.

प्राचीन भारत के कला इतिहास का क्षेत्र मध्यपाषाणिक शैलचित्रों से लेकर चंदेलों के खजुराहो मंदिर समूह तक विस्तृत है. यह यात्रा हड़प्पा नगर नियोजन से आरंभ होती है और मथुरा और गांधार कला शैलियों पर आरूढ़ होकर, दीदारगंज यक्षिणी का हाथ पकड़ कर, सांची और भरहुत के महान स्तूपों को निहारती हुई, कुषाणों के देव कुलों को प्रणाम करती हुई, गुप्त सम्राटों के कला प्रेम की प्रयाग प्रशस्तियां बांचती है और राष्ट्रकूटों, चालुक्यों और होयसलों के मंदिरों पर मुग्ध होते हुए दक्षिणमुखी होकर वृहदेश्वर और चिदंबरम में नटेश शिव की दिव्यता को प्राप्त कर लेती है.

कला का पाठ्यक्रम, विभिन्न स्थापत्य शैलियों, कालखंड, सत्तारूढ़ राजवंश, निर्माण में प्रयुक्त पत्थरों और ईंटों के प्रकार, मूर्तिकला के प्रकार, प्रतिमा विज्ञान और मुद्राओं आदि पर केंद्रित रहा. मसलन, कौन सा मंदिर कब‌ बना, किसके शासनकाल में बना, मंदिर निर्माण की कौन सी शैली प्रयुक्त रही, लाल बलुआ पत्थर का इस्तेमाल हुआ या ग्रेनाइट का, अमुक पत्थर ही क्यूं लगाया गया, मूर्तियां किस प्रकार की बनाईं गईं, अमुक शैली की क्या विशेषता है, विष्णु की मूर्ति के लिए क्या शास्त्रीय नियम हैं, सूर्य के विग्रह में जूते क्यूं होते हैं, सप्तमातृकाओं के प्रतिमा लक्षण क्या हैं? जैन तीर्थंकरों के लांछन क्या हैं और बुद्ध के प्रतीकों को कैसे दर्शाया जाता है, बुद्ध की प्रथम मूर्ति किस शैली में बनी, उस पर मथुरा कला का प्रभाव था या गांधार कला का? इत्यादि.

मैंने बमुश्किल एक-दो बार, बनाने वालों का ज़िक्र सुना. पहला, सांची और भरहुत के कलाकार संभवतः पहले काष्ठ कलाकार थे क्योंकि यहां की कलाकृतियों पर काष्ठ कला का प्रभाव लगता है. दूसरी किंवदंती ये कि शाहज़हां ने ताजमहल बनाने वाले मज़दूरों के हाथ कटवा दिए थे. एक तीसरी दंतकथा कोणार्क सूर्य मंदिर के कारीगरों के बारे में भी सुनी थी.

मजदूर पीढ़ी दर पीढ़ी पत्थर काटते रहे, सुंदर मूर्तियों के लिए

प्राचीन मंदिरों के बनने में दशकों समय लगता था, कई बार दो पीढ़ियां लग जाती थीं. उस वक्त न तकनीक उपलब्ध थी न यांत्रिकी. सब कुछ कारीगरों, मजदूरों को ही करना‌ था. अपना जीवन खपाकर बनाया होगा उन्होंने कोई कीर्ति स्तंभ, कोई दशावतार मंदिर, कोई आमेर का क़िला और उस तैयार इमारत को इतिहास में राजा के वर्चस्व, विजय और महानता के प्रतीक रूप में देखा गया होगा. उन्हें भी रहा होगा सिलिकोसिस.

 पहली शताब्दी में प्लिनी, रोम के खदान मजदूरों में ऐसी बीमारी का उल्लेख करता है. भारत में चाणक्य भी खदान श्रमिकों में सांस की बीमारी की बात करते हैं और चरक ने इसे शिला-जात विकार कहा था आर्युर्वेद में इसके अलग अलग कारण और प्रकार वर्णित हैं. इस प्रकार, सिलिकोसिस भी उतनी ही पुरानी है जितना की सभ्यता का इतिहास.

औद्योगिक क्रांति के बाद के दिनों में ब्रिटेन में इसे माइनर्स डिज़ीज़ या स्टोनकटर्स डिज़ीज़ कहा जाने लगा था. अठारहवीं -उन्नीसवीं सदी में भारत में भी ब्रिटिश सरकार के प्रशासन ने यह पाया कि खदान मजदूरों में यह बीमारी फैलती जा रही है. इसको ध्यान में रखते हुए 1948 में इंडियन फैक्ट्रीज़ एक्ट आया जिसमें डस्ट कंट्रोल के लिए कायदे कानून थे. इसे सन् 86 में संशोधित भी किया गया.

हालांकि, पत्थर काटने जैसा काम करने वाले मजदूर इसके दायरे में नहीं रखे गए. वह तो भला हो राजस्थान के कुछ एनजीओ का जिनकी पहल की वजह से इस बीमारी की बेहतर डाक्यूमेन्टैशन और रिपोर्टिंग हो पाई है और मानवाधिकारों की एक लंबी लड़ाई के बाद राजस्थान में इस बीमारी के लिए 2019 में कानून बनाया जा सका. अब यह एक ‘नोटिफिएबल डिज़ीज़’ है.

लेकिन अब भी कुछ बदला नहीं जा सका है. इलाज की कोई सुविधा नहीं है और काम छोड़ देने की तो गुंजाइश ही नहीं.

चूंकि यह बीमारी केवल भारत की नहीं है, विश्वव्यापी है. इसीलिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी इसके लिए तमाम प्रयास हुए हैं. इन सबमें सबसे जरूरी कानून है अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संघ का  सेफ़्टी एंड हेल्थ इन माइंस कन्वेन्शन, जिसे कन्वेन्शन  c176 के तौर पर भी जाना जाता है. यह कानून खनिकों की स्वास्थ्य सुरक्षा पर कुछ बहुत महत्वपूर्ण नियम प्रस्तावित करता है.

यह कानून 1995 में बना था लेकिन 2024 तक केवल 35 देशों ने ही इसे स्वीकृति दी है और भारत 30 बरस के बाद भी इसका हिस्सा नहीं बन सका है जबकि इस कानून के निर्माण में भारत की भूमिका रही है.

अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संघ के कानून की ज़रूरत

इस पर सरकारों का तर्क ये रहा है कि हमारे पास पहले से ही प्रभावी कानून मौजूद हैं और हमें अंतरराष्ट्रीय श्रमिक संघ के कानून की जरूरत नहीं है. अमेरिका, आस्ट्रेलिया और अन्य विकसित यूरोपीय देशों को छोड़ दें तब भी, चीन और दक्षिण अफ्रीका जैसे विकास शील देशों ने भी इस दिशा में बेहतर काम कर लिया है. लेकिन आज भी राजस्थान के खनिकों के अधिकांश मजदूर इस बीमारी से ग्रसित हैं.

अज्ञेय याद आ रहे हैं और हैं उनकी यह कविता –

जो पुल बनाएंगे

वे अनिवार्यत:

पीछे रह जाएंगे.

सेनाएं हो जाएंगी पार

मारे जाएंगे रावण

जयी होंगे राम,

जो निर्माता रहे

इतिहास में

बंदर कहलाएंगे.

(श्वेता त्रिपाठी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)