हाल ही में युवा लेखक विवेक कुमार शुक्ल का उपन्यास ‘अमरपुर’ वाणी प्रकाशन से ‘युवा वाणी’ के तहत प्रकाशित हुआ है. इसका शीर्षक अनायास अपनी ओर ध्यान खींचता है जहां लेखक ने ‘बेग़मपुर’ को काटकर ‘अमरपुर’ लिखा है. यह ना केवल पाठक को चौंकाता है बल्कि संवेदनहीनता के इस दौर में विषाक्त होते समय और समाज की राजनीति की ओर भी संकेत करता प्रतीत होता है.
उपन्यास से ही एक बानगी देखिए-
‘प्रदेश में उन दिनों जगहों के नाम बदलने की प्रतियोगिता चल रही थी, एक सरकार आती तो एक नाम रखती तो दूसरी सरकार दूसरा नाम. शहर के बाशिंदे जगहों को उनके पुराने नाम से पुकारते रहते, चिट्ठियां पुराने नाम वाले पतों पर पहुंचती रहतीं और बस किसी सरकारी विभाग में किसी फ़ाइल के पन्ने बढ़ते रहते. नयी चीजें बनाने की फुर्सत किसी सरकार के पास न थी. ‘
इस उपन्यास में उसी अमरपुर की कथा है जो कभी बेग़मपुर हुआ करता था लेकिन इसमें जो सवाल उठाए गए हैं, जो मौजूद बहसें हैं वे इस उपन्यास को अमरपुर से बाहर निकालकर राष्ट्रीय फलक तक इसका विस्तार करती हैं. यह उपन्यास आज के समकालीन दौर में कई बहसों को एक साथ समेटता है जिसमें अपने समय की आवाज और आहट साफ सुनाई पड़ती है.
विश्वविद्यालय का कोलाहल, छात्र-राजनीति के दांव-पेंच
उपन्यास में प्रवेश करते ही पाठकों का परिचय कुमारी यामिनी से होता है, जो विश्वविद्यालय में हिंदी की छात्रा हैं, कविताएं लिखती है और जिसे विश्वविद्यालय की ही एक दूसरी छात्रा मुग्धा से प्रेम हो जाता है. दोनों के बीच के इस आत्मीय-अंतरंग संबंध को यह शहर पचा नहीं पाता. इसी शहर में श्यामा प्रसाद मुखर्जी विश्वविद्यालय है (जो पहले अमरपुर विश्वविद्यालय हुआ करता था), विश्वविद्यालय का कोलाहल है, छात्र-राजनीति के दांव-पेंच हैं, उच्चता की ग्रंथि से पीड़ित जातियों का दंभ और अहंकार है और इन सबके बीच है यामिनी और मुग्धा की प्रेमकथा जो हमारे समाज के परंपरागत ढांचे में कहीं भी फिट नहीं हो पा रही.
यामिनी के कविता पाठ से शुरू हुए इस उपन्यास में मुग्धा को अपना जीवन स्वयं समाप्त कर लेने की अंतिम हद तक ले जाने वाली स्थितियों का ताना-बाना जिस तरीके से बुना गया है वह पाठकीय संवेदना को झकझोरता है,सोचने को मजबूर करता है और अनेक अनकहे प्रश्नों के साथ हमें छोड़ जाता है.
उपन्यास की कथायात्रा हमें एक ऐसे समय और परिवेश में ले जाती है जहां पूर्वांचल अपनी समस्त जटिलताओं और विद्रूपताओं सहित समूचे ठाठ के साथ मौजूद है लेकिन अपने विस्तार में यह भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए केवल पूर्वांचल की कथा ना कहकर समकालीन भारतीय समाज की विसंगतियों से हमारा साक्षात्कार कराती है.
कथा का केंद्र एक काल्पनिक शहर ‘अमरपुर’ है ‘ जहां लड़कियां घरों में रहती थीं, और सार्वजनिक जीवन के नाम पर कभी-कभी पल्स पोलियो के जुलूस या पौहारी महराज की शोभायात्रा में जाया करती थीं.
ये वो शहर था जहां नगर निगम तक के चुनाव में औरतें न थीं, मर्द थे, ट्रांसजेंडर थे पर औरतें न थीं, कभी कभार वो राजनीति में होतीं भी तो इसलिए कि उनके पति चुनाव लड़ नहीं सकते थे क्योंकि वो या तो जेल में थे या सीट महिला सुरक्षित हो गयी थी. ‘
लड़खड़ाती समाज व्यवस्था
उपन्यास में मुग्धा और यामिनी के अतिरिक्त रिपुदमन सिंह उर्फ़ रिपंन भैया और पिंटू मिश्रा जैसे किरदार भी हैं जो अपने राजनीतिक मंसूबों को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं और जिनका मानना है कि ‘कन्या जो हैं जांघों के नीचे दबी ही शोभा देती है, मूड़ पर चढ़ी नहीं. ‘ रवि पासवान जैसा चरित्र भी है जो हर स्थिति में सच के साथ खड़ा रहने का हौसला रखता है.
रिपंन भइया, पिंटू मिश्रा, त्रिपाठी जी, मिश्रा जी, मठ के महंत आदि किरदारों के माध्यम से लेखक ने समाज में जड़ जमाए पिछड़ेपन, सामंती अहंकार, मूल्यविहीन प्रशासन तंत्र और लड़खड़ाती समाज व्यवस्था को परत-दर -परत जिस सहजता और निर्ममता से उद्घाटित किया है, वह लेखक की सूक्ष्म अंतर्भेदी दृष्टि और संवेदनशीलता का परिचायक है. उपन्यास अवसरवादिता, संवेदनशून्यता, वर्तमान समाज में फल-फूल रही पतनशील राजनीति जैसी विकृतियों का पर्दाफाश करता है.
शहर की राजनीति में विश्वविद्यालय और मठ की महती भूमिका है. मठ समूचे शहर की राजनीति का केंद्र है और विश्वविद्यालय राजनीतिक गतिविधियों का अड्डा. लेखक के शब्दों में कहें तो ‘बिना मठ के आशीर्वाद के शहर में पत्ता तक नहीं हिलता था.’
विश्वविद्यालय में छात्र-संघ चुनाव की मांग, रिपंन भइया और पिंटू मिश्रा जैसे लोगों का विश्वविद्यालय परिसर में अचानक सक्रिय हो उठना, मुग्धा द्वारा चुनाव लड़ने की घोषणा, कुमारी यामिनी का मतदान में जीतने के बावजूद मतगणना में हार जाना आदि घटनाएं मिलकर पूर्वांचल के बहाने पूरे भारतीय समाज की जातीय संरचना, शोषण और दमन को बड़ी ही निर्ममता के साथ उजागर करती हैं, जहां नीची कही जाने वाली जातियों को ऊपर न आने देने के तमाम रास्ते अपनाए जाते हैं.
लेखक ने विभिन्न पात्रों के माध्यम से जाति का दंश और दंभ, पितृसत्ता की साजिश, स्त्री की निरीहता और सामाजिक विषमताओं को पूरी बेबाकी के साथ उभारा है. कुमारी यामिनी का असली नाम और जाति की बात सामने आते ही ‘अमरपुर की महादेवी’ कही जाने वाली कुमारी यामिनी की प्रतिभा गौण हो जाती है और जो शहर अब तक उससे और उसकी कविताओं से प्रेम करता था अचानक उसके खिलाफ हो जाता है.
स्त्री की पीड़ा और व्यथा का अंकन
उपन्यास स्त्री की उस पीड़ा और व्यथा का अंकन भी बहुत बारीकी और बेबाकी से करता है जिसके घाव शताब्दियों से उसकी अस्मिता पर अंकित हैं. मुग्धा को अपना जीवन समाप्त कर लेने तक ठेलने वाली स्थितियां इस बात का प्रमाण हैं कि समय बदला है, पारिवारिक व्यवस्थाएं बदली हैं, अधिकार चेतना बदली है लेकिन स्त्री की मूलभूत स्थिति में बहुत अंतर नहीं आया है.
यामिनी के नाम लिखी गई उसकी आखिरी चिट्ठी स्त्री जीवन से जुड़ी विडंबनाओं, विसंगतियों, त्रासदी और शोषण को बहुत ही संवेदनशीलता के साथ रेखांकित करती है. पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री के डर, आतंक और स्वत्वहीनता के अलग-अलग रंग हैं यहां.
इन सारी स्थितियों के बावजूद मुग्धा और यामिनी के रूप में लेखक ने ऐसा चरित्र गढ़ा है जो समाज की तमाम लड़कियों में हिम्मत और साहस भरती हैं. यामिनी में अपनी जाति को लेकर कोई संकोच का भाव नहीं है,उसके चरित्र में आत्मबल और दृढ़ता है और इसी आंतरिक ताकत से वह मतदान में जीत हासिल करती है.
यह बात दीगर है कि शहर को यह नागवार गुजरता है और समूची शक्तियां मिलकर उसके खिलाफ षड्यंत्र में एक साथ खड़ी हो जाती है. राजनीति, प्रशासन और पुलिस के गठजोड़ के जटिल जाल को लेखक ने यहां बहुत ही सहजता से साधा है.
मुग्धा का व्यक्तित्व एक सचेत नागरिक का है जो स्त्री की स्वतंत्रता और उनके अधिकारों के प्रति सजग है. लड़कियों के शोषण की कीमत पर मिलने वाला लोकतंत्र उसे स्वीकार नहीं है. वह स्त्री को सबसे पहले एक स्वतंत्र व्यक्ति और नागरिक के रूप में देखे-समझे जाने की हिमायत करती है- ‘स्त्री को मां, बहन, बेटी, स्त्री से परे एक व्यक्ति की तरह भी देखने की कोशिश कीजिए कभी. हम इस लोकतंत्र के नागरिक हैं, हमें बस वही रहने दीजिए. आपके इस लोकतंत्र को कहिए कि पहले हमें बतौर नागरिक देखना शुरू करे. कभी खुद से पूछियेगा कि दुनिया का सबसे सुंदर शब्द लोकतंत्र हमारी आपकी भाषा में पुल्लिंग ही क्यों है?’
राजनीति पर पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती
इतना ही नहीं,छात्र संघ का चुनाव लड़ने की घोषणा करके वह विश्वविद्यालय की राजनीति पर पुरुषों के एकाधिकार को भी चुनौती देती है. यामिनी के समझाने पर वह दृढ़ शब्दों में कहती है कि ‘चुनाव तो अब मैं लड़ूंगी यार! जीतना तो है नहीं पर ये बताना बहुत जरूरी है कि इस विश्वविद्यालय में चुनाव सिर्फ रिपंन भइया,शब्बीर भाई या पिंटू मिश्रा ही नहीं लड़ सकते बल्कि मुग्धा त्रिपाठी भी इनके सामने खड़ी हो सकती है. इनको ये बताना बहुत ज़रूरी है कि ये विश्वविद्यालय सिर्फ़ इनका नहीं है. ‘
अपने इस निर्णय में आने वाली बाधाओं और संघर्षों से हार मानने की बजाय उसका निश्चय और भी मजबूत होता जाता है. उसका यह कहना कि ‘अब रिपंन भइया और पिंटू मिश्रा की आंखों में आंखें डालकर बता देने का समय आ गया है कि हम उनकी जांघों के नीचे दबी योनियां भर नहीं हैं. ‘ उसके चरित्र की इसी दृढ़ता को बताता है.
अपनी अस्मिता और आत्मसम्मान की इस लंबी लड़ाई में पितृसत्ताक व्यवस्था उसे बार-बार तोड़ने की कोशिश करती है- कभी देह से, कभी मन से, कभी घरों में तो कभी सड़कों पर……. लेकिन इन्हीं संघर्षों के बीच मुग्धा और यामिनी जैसी लड़कियां उठ खड़ी होती हैं और अपना प्रतिरोध दर्ज करती हैं.
रिपंन भइया जैसे लोगों के तमाम प्रयासों के बावजूद यामिनी का मतदान में जीतना सदियों की जड़ मानसिकता में बदलाव का संकेत है. साथ ही उपन्यास इस बात की ओर भी संकेत करता है कि समाज को बदलने की चिंगारी समाज में ही कहीं न कहीं मौजूद है. रवि पासवान जैसे चरित्र की मौजूदगी को स्थितियों को बदलने की चेष्टा और उम्मीद की एक किरण के रूप में देखा जा सकता है जिसमें मनुष्यता का आग्रह प्रबल है.
व्यंग्यात्मकता और चुटीलापन उपन्यास में धड़कन की तरह मौजूद हैं. उपन्यास के सभी पात्र अपनी स्वाभाविकता के साथ ठीक उसी तरह परस्पर संवाद करते दिखाई देते हैं, जैसे पूर्वांचल क्षेत्र के लोग आपस में बतियाते हैं. पात्रों की यह सहज संवादधर्मिता एवं बतरस की कला इस उपन्यास के प्रति पाठक के भीतर एक सहज लगाव और जुड़ाव पैदा करती है.
इस उपन्यास के कथालोक में विचरण करना अनूठे अनुभवों से गुजरना है जहां कहन की अद्भुत शैली, व्यंग्य्य-बाणों की अंधाधुंध बौछार और भाषा की रवानगी, ये सभी एकसाथ उपस्थित हैं.
(डॉ. मीनू सिंह दिल्ली शिक्षा निदेशालय में प्रवक्ता हैं.)
