कभी-कभी किताबें हमें सीधे जीवन की ओर नहीं ले जातीं. वह हमें उन अनकहे अनुभवों के पास ले जाती हैं, जिन्हें हम बरसों से अपने भीतर ले जाते रहे हैं. अरुंधति रॉय का सद्यः प्रकाशित संस्मरण मदर मैरी कम्स टू मी वैसी ही एक किताब है. वह किताब जिसमें जीवन की सबसे घनिष्ठ और सघन स्मृतियां धीरे-धीरे एक कमरे में बिखरती जाती हैं, और हम चुपचाप बैठ कर सुनते रहते हैं.
इस किताब की केंद्रीय आकृति है, मैरी रॉय. एक मां, एक शिक्षिका, एक जुझारू महिला, जिसने अदालत में जाकर एक पूरी परंपरा को चुनौती दी थी. केरल की सीरियाई ईसाई स्त्रियों को संपत्ति का अधिकार दिलाने वाला यह मुकदमा आज भी आधुनिक भारतीय स्त्री की यात्रा का अहम पड़ाव है. लेकिन अरुंधति रॉय की नजर में मैरी रॉय केवल इस सार्वजनिक संघर्ष की प्रतीक नहीं हैं. वह कठिन थीं, कभी-कभी कठोर भी. उनकी कठोरता में प्रेम भी था, और अकेलापन भी. कभी-कभी लगता है कि वह प्रेम और कठोरता के बीच झूलती रहती थीं. अरुंधति बस उस झूलन को देखते हुए अपनी खुद की जगह खोजती रहीं.
स्मृति का बिखराव
किताब में हर वाक्य धीरे-धीरे उतरता है. घर की बातें, केरल की हरियाली, बारिश की खुशबू, किसी चित्र की रेखाएं, पिता की मौन उपस्थिति, बचपन के खेल…सभी स्मृतियां एक साथ आती हैं.
किताब की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी भाषा में है. यह भाषा कभी भारी नहीं लगती. सरल शब्द, छोटे वाक्य— सब मिलकर ऐसा अहसास पैदा करते हैं कि पाठक बैठकर सुनता है, अनुभव करता है, और हर शब्द के साथ अपने भीतर जाता है.
समय और स्मृति एक-दूसरे में घुलते हैं, वैसा ही अहसास इस किताब में बार-बार होता है. कोई घटना अचानक आती है: बचपन का कोई दृश्य, स्कूल का कोई प्रसंग, मां की झिड़की या एक क्षणभंगुर हंसी. ये दृश्य किसी कथा-रेखा में बंधे नहीं, बल्कि स्मृति की तरह बिखरे हुए हैं. और यही बिखराव इस किताब की असल ताक़त है.
इस बिखराव में एक आत्मीयता है, जैसे पुरानी तस्वीरों का एलबम खुला रह गया हो और हम बिना क्रम के किसी भी पन्ने पर ठहर जाएं. घटनाओं का कोई कालक्रम नहीं, बस स्मृतियों का एक तरल बहाव है, जिसमें निजी पीड़ा और छोटी-छोटी खुशियां एक-दूसरे से सामना करती हैं. यही असंगति पाठक को भीतर तक खींच लेती है, क्योंकि स्मृति स्वयं कभी रैखिक नहीं होती, वह हमेशा टुकड़ों में हमारे पास आती है.
मां की अधूरी तस्वीर
अरुंधति रॉय अपनी मां की तस्वीर को आदर्श या देवत्व का रूप नहीं देतीं. वह मां को उसी अपूर्णता के साथ दिखाती हैं, जिसके भीतर हम सब जीते हैं. मां ने उन्हें स्वतंत्रता दी, लेकिन उसी स्वतंत्रता ने एक दूरी भी पैदा की. बेटी बहुत जल्दी घर छोड़ देती है, और जब लौटकर आती है, तो नज़दीकी नहीं पाती, सिर्फ एक गहरी अनकही दूरी, जो मृत्यु के बाद भी बनी रहती है.
इस चित्र में मां का सौंदर्य और दृढ़ता एक साथ दर्ज है. एक ओर वे साहसी शिक्षिका और समाज सुधारक हैं, दूसरी ओर घर में बंद मां, जिनकी झिड़कियां बेटी को और दूर धकेल देती हैं.
अरुंधति अपनी स्मृतियों में यह नहीं छिपातीं कि प्यार और तिरस्कार के बीच मां का चेहरा कभी-कभी धुंधला भी हो जाता है. यही धुंधलापन उनकी मां की छवि को और वास्तविक बनाता है, किसी आदर्श की तरह स्थिर नहीं.
वह बताती हैं कि कैसे छोटे-छोटे अनुभवों ने उन्हें लेखन की ओर खींचा. कैसे वह अपने भीतर की संवेदनाओं को, दुनिया के साथ अपने जुड़ाव को, शब्दों में ढालने लगीं.
निजी पीड़ा और सामूहिक इतिहास
लोग आत्मकथाओं की ओर इसलिए खिंचे चले आते हैं क्योंकि वहां निजी पीड़ा और सामूहिक इतिहास साथ-साथ मौजूद रहते हैं. मदर मैरी कम्स टू मी भी उसी अनुक्रम का हिस्सा है. यहां मां और बेटी का रिश्ता केवल व्यक्तिगत स्मृति नहीं रह जाता; यह समाज की स्मृति बन जाता है, एक स्त्री के अकेलेपन और विद्रोह की मौन गवाही.
पढ़ते-पढ़ते लगता है कि समय का कोई ठिकाना नहीं. ऊटी की ठंडी, सख़्त और अस्थिर ज़िंदगी— उधार के मकानों की झोपड़ियां, बचपन के डर और छोटे छोटे साहस के क्षण— सब धीरे-धीरे लौट आते हैं.
केरल में मैरी रॉय द्वारा स्थापित स्कूल की बातें भी स्मृतियों के बीच छनकर आती हैं. शिक्षा और संघर्ष आपस में इतने गुंथे हुए थे कि हर अनुभव में उसका दाब महसूस होता है. दिल्ली स्कूल ऑफ आर्किटेक्चर में बिताए दिन— संघर्ष, देखने और सोचने की तीव्रता—आगे चलकर उसके लेखन में जगह बनाते हैं.
अरुंधति और प्रदीप कृष्ण का संबंध भी स्मृति की इसी जटिलता में पिरोया गया है. अरुंधति ने उनसे गहरा प्रेम किया, और यह प्रेम केवल निजी नहीं रहा; यह रचनात्मकता का साझा संसार बन गया. उन्होंने मिलकर कुछ ऐसी फ़िल्में बनायीं, जिनमें जीवन और कला का बुनाव स्पष्ट दिखता है. विवाह बिखर गया, लेकिन उसके भीतर की सृजनात्मक ऊष्मा और आपसी लगाव हमेशा जीवित रहे. अरुंधति उसे स्वीकार करती हैं, और साथ ही उससे दूरी भी बनाती हैं, मानो समय और अनुभव ने उसे अलग दिशा दिखा दी हो.
उनका भाई एलकेसी (ललित कुमार क्रिस्टोफ़र रॉय) स्मृतियों में हमेशा एक परछाई की तरह मौजूद रहता है, बचपन की भयावह और अस्थिर यादों के बीच. मां के भाई जी. आइज़ैक भी, जो परिवार की स्मृतियों की एक और धुरी हैं, कहानी में हल्की रोशनी की तरह झलकते हैं. और सबसे मार्मिक प्रसंग है बीस वर्षों बाद अपने पिता, राजीव ‘मिक्की’ रॉय से मुलाक़ात, दिल्ली के एक होटल में. यह पुनर्मिलन अजनबीयत और कोमलता दोनों से भरा है.
किताब पढ़ते हुए बार-बार यही एहसास होता है— व्यक्तिगत पीड़ा कभी केवल व्यक्तिगत नहीं होती. मैरी रॉय की लड़ाई, उनकी जिद, उनका अकेलापन, ये सब उस समाज की जटिलताओं का आईना हैं, जिसमें स्त्रियां बराबरी के अधिकारों के लिए लगातार संघर्ष करती रही हैं. यही कारण है कि यह आत्मकथा पढ़ते समय हम केवल एक परिवार नहीं देखते; हम अपनी ही सामूहिक स्मृति से सामना करते हैं.
मौन और विरासत
मदर मैरी कम्स टू मी पढ़ते समय लगता है जैसे हम किसी नाटक के बीच में पहुंच गए हों. मंच पर मां और बेटी हैं, लेकिन उनके बीच कोई संवाद नहीं, सिर्फ नजरें, मौन और अधूरे सवाल हैं. दृश्य धीमे हैं, मानो किसी आर्ट-फिल्म के लंबे शॉट्स, जहां शब्द कम हैं, पर मौन ही कथा बन जाता है. उस मौन में पीड़ा भी है और करुणा भी. मां और बेटी एक-दूसरे के भीतर झांकना चाहती हैं, पर कोई अदृश्य दीवार बीच में आ जाती है. यही अधूरी बातचीत, वही अनकहा, हमारी अपनी स्मृतियों में भी बचा रहता है.
यह किताब अरुंधति रॉय की निजी वापसी भी है. जिस मां ने समाज की परंपराओं को अदालत में चुनौती दी, उसी ने बेटी को एक कठिन, अनमनीय विरासत दी—कठोरता, विद्रोह और गहरी असहमति. यही असहमति उनकी भाषा को धार देती है, उनके राजनीतिक लेखन को सच्चा और असुविधाजनक बनाती है.
यह किताब उस लेखिका की जड़ों का मानचित्र है, जिसने अपनी लेखनी से दुनिया को स्पंदित किया.
अंतिम अधूरापन
आत्मकथाएं केवल स्मृति नहीं होतीं. वे हस्तक्षेप भी होती हैं. जब इतिहास को दोबारा लिखा जाता है और अभिलेखों को साफ-सुथरा किया जाता है, तब आत्मकथा अपनी व्यक्तिगत सच्चाई पर जोर देती है. वह वस्तुनिष्ठ होने का दावा नहीं करती, पर उसकी तत्कालिकता अनिवार्य होती है. अरुंधति रॉय का काम उसी क्षेत्र में आता है, जहां व्यक्तिगत स्मृति सामूहिक स्मृति बन जाती है.
किताब को पढ़कर हम उत्तर नहीं, बल्कि सवालों के साथ बाहर निकलते हैं. मिस मैरी वास्तव में कौन थीं? हमारे जीवन में कौन-सी मिस मैरी हैं, जिन्हें हमने अनदेखा किया, पर जो कभी भुलाई नहीं जा सकतीं?
अरुंधति रॉय कोई समाप्ति नहीं देतीं. वह हमें स्मृति की अनुभूति के साथ छोड़ती हैं—तीखी, अधूरी, आवश्यक. और ऐसा करते हुए वह सुनिश्चित करती हैं कि मिस मैरी हमारे पास भी आएंगी, बिना आमंत्रण, चुपचाप, उन शांत पलों में जब हम अकेले होते हैं और स्मृति के साथ बैठते हैं.
निर्मल वर्मा ने लिखा था कि मनुष्य का सबसे बड़ा अकेलापन वह है, जहां वह अपने सबसे करीबी संबंधों में भी अजनबी बना रहता है. रॉय की किताब उसी वाक्य का विस्तार है. यह मां और बेटी का रिश्ता है, लेकिन उससे भी ज्यादा यह उस अजनबीयत की कहानी है जो हर आत्मीयता के भीतर छिपी रहती है.
पढ़ते हुए अंत में एक अजीब-सा खालीपन रह जाता है, जैसे कोई दरवाज़ा आधा खुला छोड़ दिया गया हो. यही खालीपन हमें सोचने पर विवश करता है कि रिश्तों में पूर्णता का दावा कभी सच नहीं होता. स्मृतियां, चाहे कितनी भी लिखी जाएं, हमेशा कुछ रहस्य छोड़ देती हैं. और शायद इसी रहस्य में ही जीवन की असली गहराई है.
यह किताब हमें अधूरापन स्वीकार करना सिखाती है, और यही उसकी सबसे बड़ी विरासत है.
(आशुतोष कुमार ठाकुर एक मैनेजमेंट प्रोफेशनल हैं, साहित्य और कला पर नियमित लिखते हैं. उनसे ashutoshbthakur@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.)
