क़िस्सा सारंगढ़: जब मध्य प्रदेश के एकमात्र आदिवासी मुख्यमंत्री टैक्सी में शपथ ग्रहण के लिए पहुंचे

राजा नरेशचंद्र सिंह अकेले मुख्यमंत्री रहे जो पद की शपथ लेने के लिए काले पीले रंग की टैक्सी में बैठकर राजभवन पहुंचे थे. उन दिनों राज भवन के अंदर किसी टैक्सी का प्रवेश प्रतिबंधित था. राज्यपाल के सचिव ने आग्रह किया कि राजा साहब किसी अन्य वाहन में आ जाएं. लेकिन राजा साहब का तर्क था कि जब मेरे पास कोई वाहन नहीं था, यह टैक्सी सदैव मेरे साथ रही. आज मैं कैसे इसे छोड़ दूं.

राजा नरेशचंद्र सिंह मध्यप्रदेश के पहले और अब तक के एकमात्र आदिवासी मुख्यमंत्री थे. उनका कार्यकाल भी सबसे कम अवधि का था. मात्र तेरह दिन. (फोटो साभार: विकिपीडिया)

सामान्य ज्ञान की पुस्तकें पढ़कर मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवाओं को सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह के बारे में दो बातें अवश्य याद कराई जाती हैं. एक – वे मध्यप्रदेश के पहले और अब तक के एकमात्र आदिवासी मुख्यमंत्री रहे. दूसरा – उनका कार्यकाल सबसे कम अवधि का था. मात्र तेरह दिन का.

एक रोचक तथ्य, जो कभी चर्चित नहीं हुआ कि वे अकेले मुख्यमंत्री रहे जो पद की शपथ लेने के लिए काले पीले रंग की टैक्सी में बैठकर राजभवन पहुंचे थे. (उनके बाद शपथ लेने वाले दो मंत्रियों के नामों का भी ज़िक्र राजनैतिक इतिहास की चर्चाओं में नहीं आता.)

क़िस्सा 1967 में शुरू हो गया था. उस वर्ष भारत में विधायकों के द्वारा थोक में किए जाने वाले दलबदल से सरकारें बदलने की परंपरा शुरू हुई थी. एक के बाद एक कई राज्यों में कांग्रेस की सरकारें इस तरह टूटी थीं. मध्यप्रदेश भी अछूता नहीं रहा.

यहां चौथे आमचुनाव के बाद जुलाई 1967 में कांग्रेस की सरकार बनी थी. पंडित द्वारिका प्रसाद मिश्रा दोबारा मुख्यमंत्री बने. राजा नरेशचंद्र सिंह के अलावा डॉ. शंकरदयाल शर्मा, कुंजीलाल दुबे, श्यामाचरण शुक्ल, अर्जुन सिंह आदि मंत्री थे.

नवाबी दौर में भोपाल के बड़े तालाब के किनारे की पहाड़ी का नाम हुआ करता था शिमला हिल्स. नवाब साहब के ज़माने में इसमें एक अंग्रेज़ अधिकारी कुक साहब के लिए बड़े अहाते के साथ एक बंगला बना था जो कुक साहब के बंगले के नाम से जाना जाता था.

1956 के अंत में मध्यप्रदेश की राजधानी नागपुर से उठकर भोपाल पंहुची तो इस बंगले को पता मिला – 6 शिमला हिल्स और यही बंगला मंत्री राजा नरेशचंद्र सिंह का आधिकारिक निवास था.

कांग्रेस की सरकार गिरना

डी पी मिश्रा की सरकार बने बमुश्किल तीन महीने बीते थे कि एक मंत्री गोविंद नारायण सिंह के नेतृत्व में सैंतीस विधायकों ने कांग्रेस छोड़ कर लोक सेवक दल नाम की एक नई पार्टी के गठन की घोषणा कर दी. कांग्रेस की सरकार गिर गई.

1963 से 1967 के बीच द्वारिका प्रसाद मिश्र का मंत्रिमंडल राज्यपाल हरि विनायक पाटस्कर के साथ. (स्रोत: गिरिविलास पैलेस सारंगढ़ का संग्रह)

नवंबर के अंत में गोविंद नारायण सिंह ने संयुक्त विधायक दल के नेता के रूप में मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली. नई सरकार के गठन के साथ ही राजा नरेशचंद्र सिंह समेत कांग्रेस के बाक़ी सारे मंत्री और विधायक विपक्ष में पहुंच गए.

नरेशचंद्र सिंह के लिए भोपाल में रहने का कोई कारण नहीं बचा था. उन्होंने सामान पैक किया और परिवार तथा निजी स्टाफ़ के साथ सारंगढ़ लौटने का निर्णय लिया.

भोपाल छोड़ने से पहले उनसे सौजन्य भेंट करने नए मुख्यमंत्री गोविंद नारायण सिंह आए. बातों ही बातों में नरेशचंद्र सिंह ने नए मुख्यमंत्री को अपना आवास दिखाया और उन्हें वहीं रहने की सलाह दी. गोविंद नारायण सिंह ने सलाह मान ली और तब से वह बंगला 6, शिमला हिल्स (जिसे बाद में शामला और फिर शयामला हिल्स कहा जाने लगा) मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री का आधिकारिक निवास है.

दूसरे व्यक्ति जो बिदाई देने पहुंचे, वे थे मंत्रीमंडल में साथी रह चुके कनिष्ठ मंत्री युवा अर्जुन सिंह. वे स्वयं भी अपने लिए आवास की व्यवस्था करने में जुटे थे. उन्होंने नरेशचंद्र सिंह को सूचित किया कि चौदह सौ चौंसठ में उन्होंने अग़ल बग़ल में दो फ्लैट देखे हैं जिनमें दोनों के परिवार रह सकते हैं, लेकिन निर्माण पूरा होने में कुछ महीनों का समय है. उस दौर के भोपाल में संख्याओं का दबदबा था.

तब तक पुराने भोपाल के बगल में एक नया नगर बसाने की शुरुआत हो चुकी थी लेकिन नए भवनों का निर्माण कार्य पूरा नहीं हो पाया था. इस नए नगर का नामकरण तात्या टोपे पर किया गया था लेकिन शुरुआत से ही लोगों ने इसे टीटी नगर कहना शुरू दिया तो बिना औपचारिक घोषणा के सरकार ने भी यही नाम स्वीकार कर लिया.

‘तात्या टोपे” के बाद उस सरकारी नगर के भीतर बन रहे अन्य इलाक़ों के नामकरण की ज़हमत किसी ने मोल नहीं ली थी. सरकारी वर्ग व्यवस्था का निर्वहन करते हुए सबसे पहले तृतीय और चतुर्थ वर्ग के कर्मचारियों के लिए जो आवास बने उन्हे साउथ तथा नॉर्थ टीटी नगर कहा गया.

उसके बाद आसान रास्ता अपनाया गया. द्वितीय वर्ग के अधिकारियों के लिए बारह सौ पचास और प्रथम वर्ग के लिए उससे कुछ बड़े बने चौदह सौ चौंसठ फ्लैट बने.

यही संख्याएं इन इलाक़ों के आधिकारिक नाम में तब्दील कर दी गईं. कुछ हटकर ऊंचे पद वालों के लिए बंगले बने. ये भी संख्या के आधार पर चौहत्तर बंगले ही कहलाए.

नामकरण के प्रति आलस्य का सिलसिला तभी टूटा जब ऐसा करना अपरिहार्य हो गया. यह नौबत आई जब बड़े अधिकारियों की संख्या बढ़ने लगी और उनके लिए एक और कॉलोनी की आवश्यक हो गई.

गोविंद नारायण सिंह और नरेशचंद्र सिंह. (स्रोत: गिरिविलास पैलेस सारंगढ़ का संग्रह)

चोर-इमली की कहानी

चौदह सौ चौंसठ की एक ओर अरेरा हिल्स की एक वीरान बंजर पहाड़ी पर नए बंगलों के निर्माण का फ़ैसला हुआ. सत्तर के दशक की शुरुआत तक दूर से देखने पर इस पहाड़ी में घास भी नज़र नहीं आती थी.

अपवाद के रूप मे बीचों बीच इमली का एक विशाल वृक्ष ज़रूर था. कहा जाता था कि अपनी हर सफल मुहिम के बाद इलाक़े के चोर इस इमली के पेड़ के नीचे बैठ कर चोरी के माल का बंटवारा करते थे और इस कारण इस पहाड़ी को चोर-इमली के नाम से जाना जाता था.

सरकार के बड़े अधिकारियों और मंत्रियों के आवासीय क्षेत्र के लिए यह नाम क़तई स्वीकार्य नही था. भोपाल में किसी कॉलोनी के नामकरण की शुरुआत यहीं से हुई. लेकिन संख्या को मोह नहीं छूटा. इस पहाड़ी का नाम बदलकर ‘चार-इमली” किया गया. कालांतर में दूसरी संख्याएं निशात, महावीर और शिवाजी नाम के नगरों में परिवर्तित हो गईं लेकिन चोर-इमली चार-इमली ही बना रहा.

सारंगढ़ में रहने के लिए विरासत में मिला एक महल

भोपाल छोड़ने का दिन आया तो सरकारी गाड़ी ने राजा साहब को स्टेशन पंहुचा दिया. किसी सरकारी गाड़ी में यह उनकी अंतिम यात्रा थी. राजा साहब अब मात्र विधायक रह गए थे. 15 दिनों के बाद विधानसभा की कार्यवाही में हिस्सा लेने के लिए भोपाल वापस आना पड़ा. रहने के लिए सर्किट हाउस में आरक्षण हो गया था. समस्या थी वाहन की.

नरेशचंद्र सिंह जी ने एक राजा के रूप में हस्ताक्षर कर जब अपने राज्य का विलय भारतीय गणराज्य में किया था तब उनके पास सारंगढ़ में रहने के लिए विरासत में मिला एक महल था और जीवन यापन के लिये कृषि भूमि. ट्रक और बस (तब बसों को लॉरी कहा जाता था) से लेकर रोल्स रॉयस कार तक सभी प्रकार के चालीस वाहन थे.

लेकिन इस निस्पृह, अनासक्त, आदिवासी राजा को धन-सम्पत्ति संग्रहण से कभी मोह नहीं हुआ. विलय के बाद सारंगढ़ के एक पुराने पारसी व्यवसायी ने रायपुर बसने का निर्णय लिया. जाते समय राजा साहब के सामने अंतिम इच्छा के रूप में एक मांग व्यक्त की. राजा साहब ने इच्छा पूरी कर दी.

सारे चालीस वाहनों के साथ वर्कशाप के सारे सामान दान के रूप में रायपुर पंहुच गए. उस दिन के बाद से आजीवन राजा साहब के पास कभी किसी प्रकार का निजी वाहन नहीं रहा.

स्वयं की आवश्यकताएं सीमित थीं. जितने भी दिन मंत्री के रूप में नागपुर और भोपाल में रहे, अनाज सारंगढ़ से जाता रहा. मंत्री के रूप में उन्होंने राज्य में बहुत दौरे किये. लेकिन इसे अपनी ड्यूटी का हिस्सा मानते हुए सरकार से कभी यात्रा भत्ता नहीं लिया.

राजा साहब को वाहन की कमी कभी महसूस नहीं हुई. मंत्री के रूप में शासकीय वाहन उपलब्ध था. बच्चे हॉस्टल में थे. काम चल जाता था.

भोपाल का भटसुअर

पहली बार ऐसा हुआ कि भोपाल जाना हो रहा था और वहां कार नहीं थी. सरकारी अधिकारियों कर्मचारियों के नए बसे शहर में लोग सरकारी सिटी बस का उपयोग करते थे. रेलवे स्टेशन से पुराने भोपाल की सवारियां तांगों का और नए भोपाल वाले सिटी बस के अलावा तिपहिया लंबी नाक वाले टेंपो का इस्तेमाल किया करते थे. इस जर्मन सवारी गाड़ी का भारत में निर्माण 1962 में बजाज ऑटो ने शुरू किया था.

भोपाल में इसे भटसुअर कहा जाता था. स्टाफ के लोगों को जानकारी थी कि शामला हिल्स के पुराने आवास के पास ड्राइवर सरदार हुसैन रहते थे जिन्होंने राज्य परिवहन से सेवानिवृत के बाद एक टैक्सी ख़रीदी थी.

रोज़ वे अपनी टैक्सी लेकर न्यू मार्केट में खड़े रहते, पर तब तक नए भोपाल में टैक्सी का चलन शुरू नहीं हो पाया था. बस, फिर क्या था. सरदार हुसैन को टैक्सी के साथ स्टेशन बुला लिया गया.

उस दिन के बाद जब भी राजा साहब भोपाल में होते, रोज सुबह से शाम तक सरदार हुसैन अपनी टैक्सी ले कर हाजिर हो जाते. उन्हें भाड़े के रूप में अस्सी रुपये दिए जाते. बीस रुपये अलग से पेट्रोल के लिए. (एक लीटर पेट्रोल की क़ीमत उन दिनों एक रुपये से कम होती थी.)

देखते देखते 13 मार्च 1969 का दिन आ गया (कैसे आया और इसके आगे पीछे की कहानी एक अलग विषय वस्तु है). राजा नरेशचंद्र सिंह जी को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के लिए राज्यपाल का निमंत्रण मिला.

कार्यक्रम के बारे में जानकारी ले और दे रहे राज्यपाल के सचिव की स्थिति बड़ी विकट हो गई जब उन्हें बताया गया कि राजा साहब टैक्सी में पंहुचेंगे. राज भवन के अपने नियम कानून थे.

उनके अनुसार राज भवन के अंदर किसी टैक्सी का प्रवेश प्रतिबंधित था. उन्होंने आग्रह किया कि राजा साहब किसी अन्य वाहन में आ जाएं. राजा साहब का तर्क था कि जब मेरे पास कोई वाहन नहीं था, यह टैक्सी सदैव मेरे साथ रही. आज मैं कैसे इसे छोड़ दूं.

बात अंततः राज्यपाल के.सी. रेड्डी तक पंहुची. उनसे विशेष अनुमति मिलने के बाद राजभवन के कर्मचारियों को चैन मिला. राजा साहब पंहुचे और उन्होंने मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली.

और इस तरह अविभाजित मध्यप्रदेश के इतिहास में राजा नरेशचंद्र सिंह जी मुख्यमंत्री की शपथ लेने वाले प्रथम आदिवासी नेता के रूप में दर्ज हुए. हां, सरदार हुसैन को किसी ने नहीं बताया कि राजभवन के इतिहास में उनकी टैक्सी भी दर्ज हो गई थी.

(लेखक इतिहास-प्रेमी हैं, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं.)

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