फरीद ख़ां की कविताएं: लोकतंत्र की आड़ में फासीवाद का उद्घोष

पुस्तक समीक्षा: फ़रीद ख़ां के कविता संग्रह 'गीली मिट्टी पर पंजों के निशान' की कविताएं किसी भावावेश में लिखी गई हैं या किसी योजनाबद्ध तरीके से, मगर ये कविताएं हमारे समय का इतिहास रचती हैं.

इस देश का यह नया अध्याय, जिसका दस्तावेज़ीकरण फ़रीद ख़ां अपने इस संग्रह की कविताओं के ज़रिये करते चलते हैं. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

किसी किताब के महान होने की कसौटी होती है कि बार-बार पढ़ने जाने के बाद उससे आपका जी नहीं उबता. आप उसे कभी नहीं भूलते. कभी-न-कभी, कोई-न-कोई ऐसी घटना, ऐसा वाकिया, ऐसा हादसा या लम्हा आपकी आंखों के सामने से गुज़र जाता है कि बरबस ही आपको उस किताब की, उसकी किसी पैरा/कविता की, या किन्हीं पंक्तियों की याद हो आती है.

फ़रीद ख़ां का कविता संग्रह ‘गीली मिट्टी पर पंजों के निशान‘ ऐसी ही किताब है. 

फ़रीद ख़ां की कविताओं के बारे में मैंने सबसे पहले उदय प्रकाश से सुना था. उदय प्रकाश ने बताया था कि जब वह भारत भूषण पुरस्कार कमेटी के निर्णायक थे तो उन्होंने फ़रीद ख़ां की लंबी कविता एक और बाघ  के लिए उनके नाम का चुनाव किया था. हालांकि, जब उन्होंने इस बारे में फ़रीद ख़ां को सूचित किया तो उन्होंने कहा कि वह इस पुरस्कार के लिए निर्धारित आयु-सीमा पार कर चुके हैं.

उस कविता में आख़िर कवि ऐसा क्या बयान कर रहा है कि जिसको पढ़कर अंग्रेज़ी के लेखक अमिताव कुमार ने टिप्पणी करते हुए कहा था- ‘बाघ कविता’ के पोस्टर्स बनाकर छत्तीसगढ़ और झारखंड के जंगलों के हर पेड़ पर टांग देना चाहिए. जिससे लोग समझ सकें अपने समय की सच्चाइयां… कि उन्हें भी अब संग्रहालय या चिड़ियाघरों में रखने की परियोजना ज़ोरों से चल रही हैं.

एक दशक का दस्तावेज़ 

यह संग्रह पिछले उस दशक का दस्तावेज़ है, जब इस देश पर हिंदू-राष्ट्रवाद का ध्वज लहरा रहा है, जिसका मुखिया स्व-घोषित हिंदू हृदय सम्राट है, जो अल्पसंख्यकों को उनके कपड़ों से पहचान लेता है और गांधी के हत्यारों का महिमा-मंडन करने वालों को दिल से माफ़ करने तक की ज़ुर्रत तक नहीं कर पाता है.

इस देश का यह नया अध्याय, जिसका दस्तावेज़ीकरण फ़रीद ख़ां अपने इस संग्रह की कविताओं के ज़रिये करते चलते हैं, उसके लिखे जाने की शुरुआत 2013 में मुजफ़्फ़रनगर दंगों से होती है, जो वर्तमान तक आते-आते शाहीन बाग और दिल्ली दंगों तक अपने नुकीलों दांतों से मासूमों का लहू टपकाते चला आता है.

कवि-संपादक अरुण देव कहते हैं:-

‘इक्कीसवीं शताब्दी की युवा हिंदी कविता का बीज शब्द है- ‘भय’. यह अपने साये से डर जाने वाला अस्तित्तवादी भय नहीं है. यह भय पूंजी, व्यवस्था और सत्ता द्वारा पैदा किया गया है, जो साम्प्रदायिकता और हिंसा के निर्मम एवं नापाक गठजोड़ से और सघन हुआ है. यह भय अनेक शक्लों में हर जगह उपस्थित है.’

गीली मिट्टी पर पंजों के निशान  संग्रह की कविताएं इसी भय और इसके सत्ता के साथ नापाक गठजोड़ का बयाना है, जिसका ज़िक्र अरुण देव कर रहे हैं. हालांकि, इस संग्रह में कुछ ऐसी कविताएं भी हैं, जिन्हें लोककथाओं पर आधारित कविताएं कहा जा सकता है.

इन कविताओं में नानी का चश्मा से जुड़ी घर के बच्चों की उत्सुकता और फिर उस चश्मे के टूट जाने पर नानी की परेशानी तो है ही, इसमें हमारा वह गांव-समाज भी है, जिसको बीत जाने के बाद भी हम कसकर पकड़े रहते है. भले सपनों में ही सही. इसी गांव-समाज में छठ पूजा की याद में मुहल्ले-पड़ोस की औरतों के आपसी रिश्ते और उस रिश्ते में गहरे तक बैठे आपसी विश्वास की कुंजी भी है.

इसी कुंजी से बंधे पटना की किसी सड़क पर दुकान चलाने वाले दादा जी की साइकिल की कहानी भी है, जो चौरासी में गिरने वाले उस बड़े पेड़ के कारण आए ज़लज़ले में तबाह हो गए थे, जिससे हमारे देश के सबसे युवा प्रधानमंत्री ने तुलना की थी. इसी कड़ी में कवि हमें आपातकाल का एक लोकगीत भी सुनाता है, जो उस समय बिहार में गाया जाता था.

इस गीत में हमें गंगा के किनारे स्थित गंगा मस्जिद की दहलीज टकराती लहरों की सुरीली आवाज़ सुनाई देने लगती है, जिसकी मीनार से बाल्टी लटकाकर मस्जिद का मुअज़्ज़िन नमाज़ के लिए वुज़ु करने के लिए रस्सी से गंगा जल खींचा करता था.

रस्सी की यही बागडोर आगे हमें उस आंगन में ले जाती हैं, जहां अम्मी का चूल्हा बना रखा है. यह वही चूल्हा है, जिससे हमारी यादों के घरों की शान हुआ करती थी और हमारे घर की औरतों की हुनरमंदी, कशीदाकारी और होशियार का नमूना भी यही चूल्हा हुआ करता था. 

कृत्रिम विकास जब विनाश का पर्याय बनता है

लोककथाओं पर फ़रीद ख़ां जब कविताएं लिखते हैं तो वह सिर्फ़ यहीं तक नहीं रुकते. वह उन किस्सों-कहानियों को भी शामिल करते हैं, जो हमारे बचपन में चोटी काटने वाले, बच्चा अगवा करने वाले, लकड़ी सुंघाने वाले और इसी तरह के न जाने कितने काल्पनिक-घटनाक्रमों से जन्म लेते हैं.

इन्हीं काल्पनिक कहानियों में वह राजा भी आता है, जिसे छू देने भर से हर चीज़ के सोने हो जाने का वरदान मिला होता है. यही वरदान आख़िरी में उसके लिए हर कृत्रिम विकास के विनाश बन जाने की तरह अभिशाप साबित होता है. 

इन लोक-कविताओं से आगे उस बियाबान, डरावने, भयानक और दरिंदों से भरे जंगल में प्रवेश होता है, जहां सिवाय दुख, मातम और आक्रोश के कुछ भी नहीं नज़र नहीं आता. संग्रह में यह प्रक्रिया रात में स्वतः आने वाले किसी सपना के देखे जाने की तरह पूरी होती है.

इस तरह के सपने की शुरुआत बचपन के दादी-नानी के क़िस्सों, गांव के पुराने घरों, अम्मी-अब्बू के संघर्षों, स्कूल के यार-दोस्तों की चुलहबाज़ियों और उनके साथ खेले गए खेलों से होती है. फिर अगले ही पल जैसे ही आप करवट बदलते हैं तो पाते हैं कि अभी तक जो आपके साथ था, वह एकाएक गायब हो गया है.

गरम तवे पर पड़ती बारिश की बूंदों की तरह. अब आप तन्हा हैं, अकेले हैं और एक ऐसे खौफ़नाक़ जंगल में रास्ता तलाशते भटक रहे हैं, जिससे आपका सामना इससे पहले कभी नहीं हुआ था.

संग्रह में सत्ता की जुगाली करते झिंगुरों से भरे इस भयानक जंगल की शुरुआत मणिपुर की जानी-मानी सामाजिक कार्यकर्ता इरोम शर्मिला के उपवास से होती है. यह वही मणिपुर है, जो पिछले दो सालों से जल रहा है. जहां सैंकड़ों लोगों की मौत हो चुकी है और हज़ारों लोग विस्थापित हो चुके हैं. 

राष्ट्र-रूपी इस जंगल में कवि जैसे-जैसे आगे बढ़ता है, उसे लाल आंखों वाला व्यक्ति, अल्लाह की मियां की मौजूदगी पर संदेह, सरपट दौड़ती अफ़वाहें, हत्यारे, मैं काफ़िर हूं, जैसे उद्घोष करते लोग, मिलकर बदुद्आ करने की तमन्ना, बलात्कार की खबर, अपनी भाषा को भूलने की ख़्वाहिश, छिपकर रहने की मजबूरी, बुल्डोजर से रौंदे जाते घर, माननीय प्रधानमंत्री की सेहत का ख्याल और पिटने वाली औरतों का बयान का चश्मदीद होना पड़ता है.

यह वह समय है, जब इस देश के लोगों को सरकारी तंत्र के सामने असहाय छोड़ दिया गया है. जब ज़बान खोलते ही जेल में ठूंस देने का आम-चलन है और चुप रहना ही एक नागरिक का उत्तरदायित्व घोषित कर दिया गया है. ऐसे समय में इस तरह की कविताएं लिखना साहस का काम है. 

(शहादत युवा कथाकार और अनुवादक हैं. )