भोजपुर: बिहार के भोजपुर जिले में ‘विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का दबाव’ एक शिक्षक की जिंदगी ले गया. आरा के मौलाबाग स्थित एसबी स्कूल के प्रधानाध्यापक और बीएलओ (बूथ लेवल ऑफिसर) सुपरवाइजर 59 वर्षीय राजेंद्र प्रसाद का 27 अगस्त को हृदय गति रुकने (कार्डियक अरेस्ट) से निधन हो गया. परिवार का कहना है कि उच्चाधिकारियों की डांट-फटकार, मतदाता सूची को व्यवस्थित करने का दबाव और बढ़ते काम का बोझ उनकी मौत का कारण बना. उनकी सेवानिवृत्ति में महज़ चार महीने बचे थे.
राजेंद्र प्रसाद के 28 वर्षीय बेटे आशीष राज अपने पिता को याद करते हुए भावुक हो कर कहते हैं, ‘आमतौर पर उन्हें मैं ही स्कूल छोड़ने जाता था. लेकिन 23 अगस्त को परीक्षा देने बनारस चला गया था. स्थानीय अस्पताल में उन्हें दिखाया गया था. डॉक्टर ने पटना आईजीआईएमएस में रेफर कर दिया था. लेकिन उस अस्पताल में बहुत भीड़ थी. जिसके बाद परिवार वाले उन्हें निजी अस्पताल ले गये जहां उन्हें आईसीयू में ले जाया गया.’
राजेंद्र प्रसाद इस वर्ष 31 दिसंबर को वे सेवानिवृत्त होने वाले थे.
आशीष ने बताया कि उनके पास बड़े अधिकारियों के फोन आते थे, ‘काम को लेकर ब्लॉक में आकर सफाई देने के लिये कहा गया था. उसके बाद उनकी तबियत खराब होने लगी थी. ऊपर से आ रहे दबाव को वे झेल नहीं पाये.’
बड़ी बेटी 26 वर्षीय दीपशिखा ने कहा,
पापा के स्कूल में उनसे मिलने गई थी. तभी उन्हें फोन पर किसी ने कहा कि पांच मिनट में ऑफिस नहीं पहुंचे तो बर्खास्त कर दिए जाएंगे. पापा ने जवाब दिया कि काम तो कर रहा हूं, आप ऐसे क्यों बोल रहे हैं. उस फोन के बाद पापा काफी डर गये थे. और उस दिन से चुप रहने लगे.
चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे गहन मतदाता पुनरीक्षण ने न सिर्फ मतदाताओं बल्कि बीएलओ और बीएलओ सुपरवाइजर को भी भारी दबाव में डाल दिया है. लगातार तनाव और काम के बोझ ने राजेंद्र प्रसाद के स्वास्थ्य पर गहरा असर डाला.
प्रसाद की 58 वर्षीय पत्नी अनारकली कहती हैं, ‘वे ऑफिस का काम घर पर कभी नहीं बताते थे. लेकिन एसआईआर शुरू होने के बाद से वे काफी तनाव में आ गये थे. पिछले दो महीनों में जब भी बात होती, वे झुंझलाकर जवाब देते थे. जबकि आमतौर पर वे गुस्सैल नहीं थे.’
भोजपुर जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर गंज गांव के रहने वाले राजेंद्र प्रसाद ने 1997 में बतौर शिक्षक नौकरी शुरू की. पहली पोस्टिंग नोखा में हुई, फिर बिहिया और उसके बाद आरा में पदस्थापित हुए. अनारकली बताती हैं, ‘मैं बच्चों की पढ़ाई के लिए पटना में किराए के मकान में रहती थी, वे गांव में रहते थे.’
सबसे छोटी बेटी कल्पना रानी, जो भौतिक विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं, कहती हैं, ‘16 अगस्त को आखिरी बार पापा से बात हुई थी. मैंने बताया कि वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय की प्री-पीएचडी परीक्षा पास कर ली है. वे खुश थे, लेकिन ज्यादा बात नहीं हो पाई. उस दौरान वे एसआईआर के काम में बेहद व्यस्त थे.’ कल्पना कहती हैं, ‘आईसीयू में उनसे मिलने गयी थी, तब उनकी आवाज़ जा चुकी थी.’

परिवार वालों के अनुसार 24 तारीख से ही उनकी आवाज़ बंद हो गयी थी.
राजेंद्र प्रसाद की 65 वर्षीय बहन शांति देवी बताती हैं, ‘वह चुनाव के काम में इतना बिजी हो गया था कि जब भी फोन करती थी तब वह कहता था हां, खाना खा लिया, अब फोन रखो, काम करना है.’
दीपशिखा कहती हैं, ‘पटना में रहते हुए पापा कभी-कभी आते थे, लेकिन पिछले ढाई महीनों से काम में व्यस्तता के कारण वे नहीं आये.’
अनारकली का आरोप है, ‘शिक्षा विभाग, ब्लॉक या जिला प्रशासन से कोई देखने नहीं आया. किसी तरह का मुआवजा नहीं दिया गया. सिर्फ स्कूल के सहकर्मी मिलने आये थे.’
आरा सदर प्रखंड विकास पदाधिकारी रवि रंजन ने द वायर हिंदी से कहा, ‘मैंने कभी उनको नहीं डांटा. स्वास्थ्य संबंधी जानकारी अगर उन्होंने दी होती तो हम उनसे काम नहीं लेते.’
जिला शिक्षा पदाधिकारी मानवेंद्र ने द वायर हिंदी से कहा, ‘राजेंद्र प्रसाद के निधन की खबर मेरे संज्ञान में नहीं है. आपने बताया तब जाना.’
सेवानिवृत्त शिक्षक और प्रसाद के फुफेरे भाई तेजबहादुर कहते हैं, ‘एसआईआर के काम से बीएलओ का स्वास्थ्य बिगड़ रहा है. इतना बड़ा काम इतने कम समय में करवाना गलत है. बीएलओ को दिन-रात मीटिंग और दबाव झेलना पड़ता है.’
आशीष राज का आरोप है, ‘एसआईआर का काम ही मेरे पिता की मौत का कारण बना. अधिकारियों का दबाव सबसे निचले स्तर के कर्मचारियों पर पड़ता है और उनका जीवन प्रभावित होता है.’
कई बीएलओ ने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि काम का दबाव असहनीय है. ‘दस मिनट में मीटिंग बुला लिया जाता है. बाढ़ और खराब सड़कों के बावजूद समय से पहुंचना पड़ता है. न पहुंचने पर डाट मिलती है. इस दौरान तबियत भी खराब हो जाती है. घर वाले भी ताने देते हैं कि ऐसी नौकरी क्यों कर रहे हो जिसमें परिवार के लिए समय ही नहीं है.’
अधिकांश बीएलओ सिर्फ इसी शर्त पर बात करते हैं कि उनकी पहचान न उजागर हो. एक बीएलओ ने कहा, ‘एसडीओ मैडम का निर्देश है कि मीडिया से बात नहीं करनी है.’
सारण जिले के सोनपुर प्रखंड के बीएलओ सनोज कुमार कहते हैं, ‘एसआईआर के दौरान तनाव बहुत था. बाढ़ में भी काम करना पड़ा. ऊपर से अधिकारी का दबाव अलग. इस दौरान परिवार में भी तनाव बढ़ गया.’
एक बीएलओ ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘शिक्षक जैसे प्रतिष्ठित पद पर नौकरी करने के बावजूद 50-55 साल की उम्र में अधिकारियों से डाट खाना पड़ रहा है.
भोजपुर जिले के सहार प्रखंड के बीएलओ राजू कुमार ने बताया, ‘शुरुआत में जब 11 दस्तावेज मांगे गये तो मतदाता विरोध करने लगे. समय बेहद कम था. मतदाता समझते थे कि नाम काटने-जोड़ने का काम बीएलओ करता है, जबकि असल में वह सिर्फ प्रक्रिया पूरी करता है.’
