नेपाल की अधूरी क्रांतियां: इतिहास, हिंसा और भविष्य की खोज

नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली का इस्तीफ़ा केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है. यह दशकों से जमा हुई निराशा और अधूरी उम्मीदों का परिणाम है. नेपाल में वर्तमान हिंसा और अस्थिरता को समझने के लिए हमें पिछले कई दशकों की अधूरी क्रांतियों, संघर्षों और उनकी असफलताओं पर ध्यान देना होगा.

8 सितंबर, 2025 को 'जेन-ज़ी प्रोटेस्ट' के दौरान राजधानी काठमांडू में संसद भवन के बाहर की तस्वीर. (फोटो: एपी/पीटीआई)

1952 में फणीश्वरनाथ रेणु ने अपनी किताब ‘नेपाली क्रांति की कथा’ में राणा शासन के खिलाफ हुए आंदोलन को सिर्फ नेपाली घटना के रूप में नहीं देखा. उन्होंने इसे पूरे उपमहाद्वीप में लोकतंत्र और आम जनता की जागरूकता की जगी चेतना के हिस्से के रूप में प्रस्तुत किया. रेणु ने उस समय की जनता की मांग—गरिमा, न्याय और प्रतिनिधित्व—को मुख्य विषय बनाया और बताया कि साधारण लोग कैसे अपने अधिकारों और आत्म-सम्मान के लिए आवाज़ उठा रहे थे.

आज काठमांडू की सड़कों पर जो धुंआ और हिंसा दिखाई दे रही है, वह केवल राजनीतिक अस्थिरता नहीं है. यह रेणु के बताए गए उन अधूरे संघर्षों का ऐतिहासिक प्रतिफल है. तब की क्रांति पूरी नहीं हो सकी—सत्ता बदली लेकिन सामाजिक न्याय और शामिल लोकतंत्र की जड़ें कमजोर रहीं. यही अधूरी क्रांति आज के प्रदर्शनकारियों के हर नारे, हर फेंके गए पत्थर और हर बैरिकेड के पीछे छिपी निराशा को जन्म देती है.

रेणु की दृष्टि में, क्रांति केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं थी; यह सामाजिक न्याय, समानता और शामिल लोकतंत्र की पहली कोशिश थी. और आज की हिंसा इस अधूरी कोशिश का ऐतिहासिक प्रतिफल है. काठमांडू में उठती आवाज़ें, हिंसक या शांतिपूर्ण, उसी भूख और आकांक्षा की ध्वनि हैं जिसे रेणु ने दशकों पहले शब्दों में पिरोया था.

1951: पहली क्रांति, राणा शासन का पतन और लोकतंत्र का प्रारंभ

1951 में राणा कुलीनतंत्र गिरा. इस ऐतिहासिक बदलाव में नेपाली कांग्रेस, वामपंथी समूह और राजा त्रिभुवन की साझेदारी महत्वपूर्ण रही. भारत के मध्यस्थता प्रयासों से राजा बहाल हुए और राजनीतिक दलों को वैधता मिली, साथ ही चुनाव कराने का वादा भी किया गया.

बहुतों ने इसे स्वतंत्रता का नया सूर्योदय माना. फिर भी, जैसा कि फणीश्वरनाथ रेणु ने नेपाली क्रांति की कथा में लिखा है, यह केवल ‘आधा क्रांति’ थी. राजशाही अभी भी शक्ति में थी, नौकरशाही अपरिवर्तित रही और लोकतंत्रके वादे नाजुक थे. 1959 में नेपाल के पहले लोकतांत्रिक रूप से चुने गए प्रधानमंत्री बिश्वेश्वर प्रसाद (बी.पी.) कोइराला सत्ता में आए.

लेकिन केवल 18 महीने बाद, राजा महेन्द्र ने कोइराला को बर्खास्त कर दिया, संसद भंग कर दी और पंचायती व्यवस्था लागू कर दी. 1951 की आशाएं अधूरी रह गईं और नेपाल तीन दशकों तक ‘निर्देशित लोकतंत्र’ के दौर में चला गया.

1960–1990: पंचायत और विद्रोह के बीज

पंचायत युग में राजनीतिक पार्टियां प्रतिबंधित रहीं, असहमति दबाई गई और लोकतांत्रिक आवाज़ों को खामोश किया गया. छात्रों, मजदूरों और भूमिगत पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा उबल रही थी. वे सालों से अपने अधिकारों और प्रतिनिधित्व के लिए संघर्ष कर रहे थे, लेकिन राज्य संरचना ने उन्हें लगातार असफल किया. प्रशासनिक तंत्र, शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार की योजनाएं औपचारिक रूप से मौजूद थीं, लेकिन जमीन पर लागू नहीं हो रही थीं. धीरे-धीरे असंतोष का माहौल बनता गया और छोटे–छोटे विद्रोह समाज में फैलने लगे.

1980 के दशक के अंत में आर्थिक संकट, भ्रष्टाचार और सामाजिक असमानता ने जनता के गुस्से को और गहरा कर दिया. 1990 में जनता ने सड़कों पर उतरकर लोकतंत्र की मांग की. हज़ारों लोग प्रदर्शन में शामिल हुए, दर्जनों की मौत हुई, लेकिन राजा ने पीछे हटकर बहुदलीय लोकतंत्र की राह खोल दी. यह विद्रोह न केवल तत्कालीन राजशाही के खिलाफ था, बल्कि लंबे समय से दबाई गई आवाज़ों और अधिकारों की मांग का प्रतीक भी बना. इसने भविष्य की राजनीतिक चेतना का बीज बोया और देश में लोकतांत्रिक विचारधारा को मजबूती दी.

1990 का कमजोर लोकतंत्र

संविधान 1990 ने नई आशाएं जगाईं और नेपाल संवैधानिक राजशाही तथा बहुदलीय लोकतंत्र में परिवर्तित हुआ. यह कदम ऐतिहासिक था, क्योंकि लोगों ने वर्षों की कठोर राजशाही और असमानता के बाद पहली बार स्वतंत्र और खुली राजनीतिक प्रक्रिया देखी. जनता के बीच उत्साह था कि अब लोकतंत्र के माध्यम से उनके जीवन में बदलाव आएगा. राजनीतिक दलों ने सत्ता में आने की दौड़ शुरू की, लेकिन आपसी झगड़े और आंतरिक संघर्ष लोकतंत्र की स्थिरता में बाधा बने.

1991–2001 के बीच नौ सरकारें लगातार बदलीं. दलित, जनजाति, मधेसी और महिलाएं सत्ता से बाहर रहीं. ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी विकास की स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ. लोकतंत्र केवल राजधानी के भीतर प्रतीकात्मक रह गया, जबकि ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्रों में असमानता और असंतोष की जड़ें और मजबूत हो गईं. जनता को महसूस हुआ कि राजनीतिक बदलाव केवल शहरों में प्रतीकात्मक है और वास्तविक सुधार तक उनकी पहुंच नहीं है. इस अनुभव ने आगे चलकर माओवादी विद्रोह के बीज बो दिए.

1996–2006: माओवादी जनयुद्ध

1996 में नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) ने सशस्त्र विद्रोह शुरू किया. उनका ‘जनयुद्ध’ राजशाही को उखाड़ फेंकने और एक समावेशी गणराज्य स्थापित करने का लक्ष्य था. यह संघर्ष केवल राजनीतिक सत्ता की लड़ाई नहीं थी, इसमें जाति, वर्ग और लिंग आधारित असमानताओं के खिलाफ जनता की मांगें भी शामिल थीं. दस वर्षों तक चले इस युद्ध ने पूरे देश को झुलसा दिया. 17,000 से अधिक लोग मारे गए, हजारों गायब हुए, और ग्रामीण क्षेत्रों में सामाजिक और आर्थिक संरचनाएं बुरी तरह क्षतिग्रस्त हुईं. माओवादी विद्रोह ने यह स्पष्ट कर दिया कि पिछड़े वर्ग और कमजोर समुदाय लंबे समय से दबाई गई आवाज़ों को सुनने के लिए तैयार थे.

राज्य का दमन भी कठोर था. पुलिस और सुरक्षा बलों ने हिंसक अभियान चलाए, संदिग्धों को हिरासत में लिया और जनता के बीच डर का माहौल फैलाया. 2001 में शाही परिवार का नरसंहार, जिसमें राजा बिरेंद्र और कई परिवारजन मारे गए, राजशाही की वैधता को और कमजोर कर गया. इसके बाद, राजा ज्ञानेन्द्र की 2005 में सत्ता के अधिग्रहण की कोशिश ने माओवादी और मुख्यधारा की पार्टियों को एकजुट कर दिया. यह दशक नेपाल के लिए राजनीतिक अस्थिरता और सामाजिक विभाजन का प्रतीक बन गया.

2006: जनता आंदोलन और गणराज्य

अप्रैल 2006 में नेपाल में जनता आंदोलन II शुरू हुआ. यह आंदोलन नेपाल की आधुनिक राजनीतिक इतिहास में एक निर्णायक मोड़ था. लाखों लोग सड़कों पर उतरे, कर्फ्यू की अवहेलना की, और काठमांडू के प्रमुख मार्गों और चौराहों में लोकतंत्र की मांग के लिए प्रदर्शन किए. इस आंदोलन में प्रमुख रूप से नेपाली कांग्रेस के शेर बहादुर देउबा और माओवादी पार्टी के पुष्प कमल दहाल ‘प्रचंड’ और बाबुराम भट्टराई शामिल थे. इन नेताओं ने जनता के आक्रोशको राजनीतिक दिशा दी, साथ ही विभिन्न सामाजिक समूहों की मांगों को राष्ट्रीय मंच पर लाने का प्रयास किया.

जनता आंदोलन II केवल राजनीतिक दलों का संघर्ष नहीं था, बल्कि यह व्यापक जनता की दीर्घकालिक निराशा, सामाजिक अन्याय और लोकतंत्र की सच्ची आकांक्षा का प्रतिनिधित्व करता था. अंतरराष्ट्रीय दबाव और भारत की मध्यस्थता के कारण राजा ज्ञानेन्द्र को सत्ता छोड़ने और संवैधानिक समझौते पर सहमत होने के लिए मजबूर होना पड़ा.

इस आंदोलन का परिणाम ऐतिहासिक था: राजशाही का अंत हुआ और नेपाल गणराज्य घोषित किया गया. माओवादी पार्टी शांति प्रक्रिया में शामिल हुई और संविधान निर्माण की प्रक्रिया शुरू हुई. यह चरण नेपाल की लोकतांत्रिक यात्रा में निर्णायक साबित हुआ, क्योंकि पहली बार राजशाही की निरंकुश शक्ति को चुनौती दी गई और देश में समावेशी गणराज्य की नींव रखी गई. जनता की सक्रिय भागीदारी और राजनीतिक चेतना ने इसे आधुनिक नेपाल के इतिहास में एक अमिट क्षण बना दिया.

2015: संविधान और बहिष्कार

पहली संविधान सभा (2008–2012) अपने कार्य में असफल रही और गतिरोध में फंस गई. 2013 में दूसरी संविधान सभा का चुनाव हुआ, जिसने 2015 में नया संविधान तैयार किया. यह दस्तावेज़ संघवाद, धर्मनिरपेक्षता और गणराज्यवाद का वादा करता था. नेपाल के लिए यह लोकतंत्र का नया चरण था और उम्मीद की गई कि यह देश में स्थिरता और न्याय की नींव रखेगा.

लेकिन संविधान को सभी समूहों ने स्वीकार नहीं किया. मधेसी, थारू और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों ने इसे बहिष्कृत अनुभव माना. अप्रैल 2015 का विनाशकारी भूकंप पहले से ही देश को हिला चुका था और भारतीय सीमा पर लगी अनौपचारिक नाकेबंदी ने पीड़ा और बढ़ा दी. संवैधानिक विसंगति और असमान विकास ने पुराने सामाजिक और राजनीतिक तनावों को फिर से उभार दिया. इस दौर ने यह स्पष्ट कर दिया कि संरचनात्मक बदलाव के बिना लोकतंत्र अधूरा रहता है.

2015–2025: निराशा और उम्मीद

2015 के संविधान के बाद नेपाल ने गणराज्य के रूप में स्थिरता और समावेशी लोकतंत्र की दिशा में कदम बढ़ाया, लेकिन उम्मीदें अधूरी रहीं. विभिन्न सरकारें, चाहे नेपाली कांग्रेस हो, यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट (यूएमएल) यामाओवादी, अपनी जिम्मेदारियों में अक्सर विफल रहीं. संघवाद अधूरा रहा, स्थानीय प्रशासन कमजोर रहा औरवित्तीय संसाधनों की कमी ने विकास बाधित किया. भ्रष्टाचार व्यापक रूप से फैल गया और युवाओं के लिए रोजगारके अवसर सीमित रहे. शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी सेवाओं में सुधार अपेक्षित स्तर पर नहीं हुआ. ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्रों में जीवन की गुणवत्ता में खास सुधार नहीं दिखा.

2022 में बलेंद्र शाह, जिन्हें बालेन के नाम से जाना जाता है, काठमांडू के मेयर बने और लोक नायक के रूप में उभरे. उन्होंने प्रबंधन में सुधार लाया, अवैध निर्माणों को हटाया और स्थानीय प्रशासन की जवाबदेही बढ़ाने की दिशा मेंकदम उठाए. उनकी लोकप्रियता इस बात का संकेत थी कि जनता अब पारदर्शी और जिम्मेदार नेतृत्व की तलाश में है, लेकिन उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियां राष्ट्रीय स्तर की राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक कमजोरी को पूरी तरह नहीं बदल सकती थीं.

इतिहास के साए में 2025 का संघर्ष

9 सितंबर 2025 को प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली का इस्तीफ़ा केवल एक राजनीतिक घटना नहीं था; यह दशकों से जमा हुई निराशा और अधूरी उम्मीदों का परिणाम था. नेपाल में वर्तमान हिंसा और अस्थिरता को समझने के लिए हमें पिछले कई दशकों की अधूरी क्रांतियों, संघर्षों और उनकी असफलताओं पर ध्यान देना होगा.

1951 में राणा शासन का अंत हुआ, लेकिन राजशाही बरकरार रही, और जनता की उम्मीदें आधी रह गईं. 1960 में राजा महेन्द्र ने बी.पी. कोइराला की निर्वाचित सरकार को बर्खास्त कर दिया और पंचायती व्यवस्था लागू की, जिससे लोकतंत्र की नींव कमजोर पड़ गई. 1990 में बहुदलीय लोकतंत्र लौट आया, लेकिन सरकारें—जैसे गिरिजा प्रसाद कोइराला, कृष्ण प्रसाद भट्ट, माधव कुमार नेपाल और शेर बहादुर देउबा—राजनीतिक स्थिरता और सामाजिक समावेशन में सफल नहीं हो पाईं.

1996–2006 में माओवादी जनयुद्ध ने देश के सामाजिक और जातीय विभाजन को उभारा. 2006 में शेर बहादुर देउबा की सरकार और माओवादी नेता पुष्प कमल दहाल ‘प्रचंड’ के साथ समझौते के बावजूद गणराज्य और संविधान निर्माण में अनेक असमानताएं और अधूरे वादे रह गए. 2015 में संविधान लागू हुआ, लेकिन मधेसी, थारू और अन्य हाशिए पर रहने वाले समूहों को बहिष्कृत अनुभव करना पड़ा, और उनका विश्वास लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर कमजोर हुआ.

हर पीढ़ी ने लोकतंत्र, समान प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की मांग की, लेकिन हर बार आशाएं अधूरी रह गईं. आज सड़कों पर उठी आक्रोश की लहर इसी लंबित हिसाब और बार-बार टली हुई उम्मीदों का परिणाम है. यह संघर्ष केवल वर्तमान राजनीतिक अस्थिरता का नहीं, बल्कि दशकों से जमा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक अपूर्णताओं का प्रतिफल है.

भारत की भूमिका: अतीत से सबक

भारत ने नेपाल की राजनीति में दशकों से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है. 1951 में नेहरू के नेतृत्व में भारत ने राणा शासन के अंत में मध्यस्थता की और लोकतांत्रिक ताकतों को सत्ता में आने का अवसर दिया. इसे अक्सर ‘दिल्ली समझौता’ कहा जाता है. हालांकि राजशाही बरकरार रही, यह नेपाल में लोकतंत्र की पहली झलक थी. 1990 में जब जनता ने पूर्ण राजशाही के खिलाफ प्रदर्शन किया, तब राजीव गांधी के नेतृत्व में भारत ने राजा बिरेंद्र को समझौते के लिए प्रेरित किया, जिससे संवैधानिक लोकतंत्र की राह बनी. 2006 में माओवादी युद्ध के अंतिम चरण में, मनमोहन सिंह सरकार ने शांतिपूर्ण समझौते और गणराज्य की स्थापना में सहयोग किया.

लेकिन भारत की भूमिका हमेशा स्वागत योग्य नहीं रही. 1989 और 2015 की नाकेबंदी ने नेपाली जनता में असंतोष गहरा दिया. इससे यह धारणा बनी कि दिल्ली नेपाल को संप्रभु पड़ोसी के बजाय रणनीतिक गुट के रूप में देखता है. भारत–नेपाल संबंध अब संरक्षणवादी दृष्टिकोण से आगे बढ़कर वास्तविक साझेदारी के रूप में विकसित होने चाहिए. यह केवल रणनीति में नहीं, बल्कि साझा विरासत, सांस्कृतिक निकटता, खुले सीमा और लोकतांत्रिक मूल्यों में निहित है.

आज की स्थिति में भारत को नेपाल पर सत्ता थोपने के प्रयास से बचना चाहिए. मधेसी, जनजातीय और अन्य हाशिए पर रहने वाली आवाज़ों को सशक्त बनाया जाना चाहिए. साझा समृद्धि, जलविद्युत परियोजनाएं, सीमा पार व्यापार और सड़क नेटवर्क में निवेश दोनों देशों को लाभ देगा. सबसे महत्वपूर्ण, भारत को केवल रणनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक दृष्टिकोण से बोलना चाहिए, ताकि नेपाली जनता महसूस करे कि भारत उनके सपनों और आकांक्षाओं के साथ खड़ा है. यदि यह दृष्टिकोण नहीं अपनाया गया, तो चीन या अमेरिका जैसे बाहरी शक्तियों का प्रभाव बढ़ सकता है और भारत–नेपाल के रिश्तों में दूरी उत्पन्न हो सकती है. सम्मान और आपसी विश्वास पर आधारित संबंध ही लंबे समय तक टिक सकते हैं.

अधूरी उम्मीदों का संदेश

नेपाल का इतिहास बार-बार लौटता रहा है, जिसमें हर दशक नई आवाज़ों के साथ वही पुरानी मांगें दोहराई जाती हैं. आज का संकट केवल बेरोज़गारी या भ्रष्टाचार का नहीं है; यह 1951, 1990, 2006 और 2015 में किए गए वादों का लंबित हिसाब है.

नेपाल की जनता लगातार यह संकेत दे रही है कि बिना समावेशी लोकतंत्र और न्यायपूर्ण संस्थाओं के कोई स्थायी बदलाव संभव नहीं है. यही कारण है कि आज का संघर्ष सिर्फ सत्ता के लिए नहीं, बल्कि देश की आत्मा और उसकी असली स्वतंत्रता के लिए है. काठमांडू के लोग अपने अधिकार और गरिमा के लिए फिर से तैयार हैं, और उनके इस संकल्प को नजरअंदाज करना अब किसी के लिए आसान नहीं.

काठमांडू में धुआं घना है, लेकिन इसके नीचे लोग स्वतंत्र जीवन की तलाश में हैं.

(लेखक अशुतोष कुमार ठाकुर, समाज, साहित्य और कला पर नियमित लेखन करते हैं.)