झारखंड की पलामू बाघ परियोजना लातेहार ज़िले के आदिवासियों के लिए परेशानी का सबब बनता जा रही है. 28 जनवरी 2025 को पलामू बाघ परियोजना के एक उच्च अधिकारी, प्रजेश जेना ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के समक्ष एक आवेदन जमा किया. यह लातेहार ज़िले के नवरनगो गांव के पुनर्वास से संबंधित था. आवेदन में यह बताया गया कि नवरनगो गांव पलामू बाघ परियोजना के कोर क्षेत्र में स्थित है, अतः इस गांव का स्वैक्षिक पुनर्वास बाघों के संरक्षण के लिए अति आवश्यक है.
इसी क्रम में चार अन्य गावों का नाम ज़िक्र किया जाता है – तनवई, पोलपोल, चापिया और टोटकी – जिनका पुनर्वास होना परियोजना के लिए अपेक्षित है. आवेदन में पुनर्वास हेतु चयनित जगह के लिए नवरनगो गांव के ग्राम सभा की सहमति (रजिस्टर की फ़ोटोकॉपी द्वारा) दिखाई जाती है. आवेदन में बताया जाता है कि गांव के कुल 84 परिवारों में से 19 परिवारों ने पुनर्वास की सहमति जताई है. यानी बाक़ी के 65 परिवार 15 लाख रुपये के एवज़ में नवरनगो गांव से चले जाएंगे.
पलामू बाघ परियोजना और पुनर्वास
पलामू बाघ परियोजना की शुरुआत वर्ष 1974 में हुई थी, जिसके तहत एक निर्धारित वन क्षेत्र को बाघों के संरक्षण के लिए घोषित कर दिया गया. बाघों के इस निर्धारित क्षेत्र को कोर क्षेत्र और बफ़र क्षेत्र में विभाजित किया गया. कोर क्षेत्र को किसी भी मानवीय हस्तक्षेप से दूर रखने की बात कही गई. वहीं बफ़र क्षेत्र की गतिविधियां सीमित रखी गई.
वर्तमान में पलामू बाघ परियोजना का कोर क्षेत्र कुल 414.08 वर्ग किमी है. राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकार (एनटीसीए) के अनुसार बाघों के उचित संरक्षण के लिए मानव-मुक्त कोर क्षेत्र का विस्तार 800-1000 वर्ग किमी तक किया जाना है. एनटीसीए के निर्देशानुसार, वे सभी गांव जो कोर क्षेत्र में आते हैं, उनमें स्वैक्षिक पुनर्वास को बढ़ावा दिया जाएगा.

इस पुनर्वास नीति के तहत संबंधित गांव वालों को पुनर्वास के लिए दो विकल्प प्रस्तुत किए जाएंगे: पहला, उन्हें 10 लाख (झारखंड में 15 लाख) की राशि दी जाएगी जिससे वे अपने पुनर्वास की व्यवस्था खुद कर लें; दूसरा, उन्हें दूसरे किसी गांव में 5 एकड़ भूमि (एवं अन्य सुविधाओं) के साथ बसाया जाएगा. नवरनगो गांव की पुनर्वास योजना इन्हीं सारी निर्देशों के अधीन है.
इस प्रकरण में सबसे पहला मुद्दा है ‘कोर क्षेत्र’ का. नवरनगो संबंधित इस आवेदन से पहले पलामू बाघ परियोजना के कोर क्षेत्र में 8 गांव हुआ करते थे: लाटू, कुज़रोम, रमनदाग, हेनार, गुटवा, गोपखाड़, विजयपुर और पंडरा. लेकिन 19 जून, 2024 को एनटीसीए के एक उच्च अधिकारी द्वारा पलामू बाघ परियोजना के मुख्य वन्यजीव वार्डन को भेजे पत्र में कोर क्षेत्र में 35 गावों के होने की बात कही गई.
यह पहली बार था जब अधिकांश लोगों कोर क्षेत्र में 8 से अधिक गांव होने की बात पता चली. इस संबंध में एनटीसीए को आरटीआई आवेदन डाला गिया, परंतु कोई जानकारी नहीं दी गई और बाक़ी 27 गांव की जानकारी उपलब्ध नहीं हो पाई. इन 27 गांव की सूची किसी भी सार्वजनिक मंच पर उपलब्ध नहीं है.
यहां दो प्रश्न उठते हैं: पहला, ये 27 गांव कौन से हैं और कहां स्थित हैं? दूसरा, क्या ये 27 गांव कोर क्षेत्र के हाल में बढ़ते दायरे के परिणामस्वरूप इस सूची में शामिल हुए हैं? अगर हां, तो क्या इन गावों को कोर क्षेत्र में शामिल करने की प्रक्रिया पूरी की गई – क्या राज्य सरकार ने वन्य संरक्षण अधिनियम (2006 संसोधन) के भाग 4(i) के तहत इससे संबंधित अधिसूचना क्यों जारी नहीं की? अगर सीधा पूछा जाए तो क्या ये 35 गांव पलामू परियोजना के निर्धारित कोर क्षेत्र के अंदर आते हैं?
नवरनगो गांव में कुल 84 परिवार रहते हैं, जहां की कुल आबादी 176 है. इनमें 123 बालिग़ लोग रहते हैं. नवरनगो के ग्राम सभा के रजिस्टर के अनुसार गांव के पुनर्वास हेतु इच्छुक ग्रामीणों ने 10 सदस्यों की पुनर्वास समिति बनाई (जिसमें सचिव और उपाध्यक्ष गांव के नहीं हैं – उनका नाम गांव के लोगों की सूची में शामिल नहीं है).
इस रजिस्टर में ये कहीं भी ज़िक्र नहीं है की ग्राम सभा ने 123 बालिग़ लोगों की आबादी में अपना न्यूनतम कोरम पूरा किया या नहीं; और जिन लोगों का पुनर्वास समिति में नाम नहीं है, क्या उन्होंने स्वैक्षिक पुनर्वास से इनकार किया या दूसरा विकल्प (15 लाख रुपए) स्वीकार किया.

दरअसल, ग्राम सभा की पहली बैठक जिसमें पुनर्वास पर फ़ैसला होना था, वहां स्पष्टता की कमी है. ग्राम सभा के 11 जनवरी 2025 के रजिस्टर के अनुसार जब गांव वाले पुनर्वास होने वाली जगह का निरीक्षण कर अपनी सहमति जताते हैं, उस नोट पर कुल 23 लोगों के हस्ताक्षर हैं, जिसमें कुछ लोग एक ही परिवार के हैं. पुनर्वास संबंधित आवेदन के अनुसार कुल 19 परिवारों ने पुनर्वास के लिए हामी भरी है.
यहां सबसे गंभीर प्रश्न उन लोगों से जुड़ा हुआ है जिन्होंने इस प्रक्रिया में भाग नहीं लिया है. प्रजेश जेना को यह स्पष्ट करना पड़ेगा कि क्या उनका आवेदन समूचे गांव को ख़ाली करने हेतु है या फिर सिर्फ़ उन घरों को, जो पुनर्वासित होना चाहते हैं. पिछले जितने भी पुनर्वास संबंधित आवेदन मंत्रालय को गए हैं, उनमें गांव की सूची में स्पष्ट ज़िक्र रहता था की गांव के कौन से परिवार किस विकल्प को चुन रहे हैं.
परंतु नवरनगो के आवेदन में कहीं भी लोगों के द्वारा विकल्प का चुनाव दर्शाया नहीं गया है. इससे संकेत यही निकलता है कि इस आवेदन के पीछे पूरे गांव की सहमति नहीं है. तो क्या नवरनगो को ख़ाली करने की प्रक्रिया ग़लत तरीक़े से हो रही है?
यह प्रक्रिया ग़लत है या नहीं, इसको जानने के लिए ज़रूरी है इस कड़ी से जुड़े लाटू-कुज़रोम गांव की पुनर्वास योजना को समझना. लाटू और कुज़रोम गांव पलामू बाघ परियोजना के कोर क्षेत्र में आते हैं. एनटीसीए के निर्देशानुसार इन गावों को जून 2017 में पुनर्वासित करने की प्रक्रिया शुरू की गई थी.
कुज़रोम के 120 परिवारों में से 70 परिवारों ने पुनर्वास (लाई और पैलापत्थल में) के समर्थन में हामी भरी. परंतु जब योजना को धरातल पर उतारने की बारी आई तो विभाग द्वारा कई सारी बाध्यताओं का हवाला दिया गया – जैसे एनटीसीए के खुद के निर्देश के विरुद्ध वन विभाग ने पुनर्वास हेतु 5 एकड़ भूमि देने से मना कर दिया.
इसके अलावा, लाटू कुज़रोम के आवेदन में लाई और पैलापत्थल में पुनर्वास हेतु कुल 166 हेक्टर (औसतन 410 एकड़) का ज़िक्र था. परंतु जानकारी आ रही है कि लाटू कुज़रोम के गांववासियों को पोलपोल गांव में बसाने की कोशिशें की जा रही हैं. यहां सवाल उठता है कि 5 साल के उपरांत भी जब सरकार और वन विभाग ने लाटू-कुज़रोम के लोगों की पुनर्वास योजना के साथ न्याय नहीं किया तो फिर नवरनगो के आदिवासी समाज के साथ कैसे न्याय होगा?
इस कड़ी में आख़री ज़िक्र जैगिर गांव का है. 29 जुलाई 2025 को पलामू बाघ परियोजना के डायरेक्टर का वक्तव्य आता है की जैगिर गांव के सभी 160 लोगों को पोलपोल में पुनर्वासित कर दिया गया है.
जैगिर गांव को पोलपोल में बसाने से संबंधित आवेदन पिछले 9 दिसंबर को परियोजना के एक उच्च अधिकारी, कुमार आशीष ने जमा किया था. इस आवेदन की राज्य समीक्षा में पाया गया कि इसमें कई सारे दस्तावेज – गांव वालों की सूची, उनकी स्वीकृति – मौजूद नहीं है, और इस आवेदन को ‘अधूरा’ करार दिया गया.
यह प्रक्रिया यहीं ठहर चुकी है. परंतु परियोजना के डायरेक्टर के बयान से पता चलता है कि इसे अनदेखा कर गांववालों को पुनर्वासित कर दिया गया है. क्या पुनर्वास प्रक्रिया के कोई मायने हैं, अगर उच्च वन अधिकारी यूं ही इनको नज़रंदाज़ करते रहेंगे?
इन सभी प्रकरणों में सरकार या वन विभाग की मंशा केवल बाघों के लिए ज़मीन उपलब्ध कराने पर टिकी हुई है. यह मंशा न केवल आदिवासी हित एवं विचारधारा के विपरीत है, बल्कि यह वन्य संरक्षण अधिनियम (1972), जिसका हवाला खुद एनटीसीए देती है और वन अधिकार अधिनियम 2006 के संसोधन के विरुद्ध है. इस क़ानून (संसोधन) के भाग 4(i) और 5(ii) के विपरीत है जिसमें यह स्पष्ट लिखा है कि कोई भी कोर क्षेत्र संबंधित नीतियां आदिवासियों के अधिकार को क्षति नहीं पहुंचाएंगी.
क़ानून में इस बात का भी ज़िक्र है कि सरकार को आदिवासियों के साथ मिलकर तय करना होगा कि आदिवासियों के कोर क्षेत्र में रहने से वन्य जीवन पर क्या असर पड़ता है. इन क़ानूनों के मूल में कहीं न कहीं आदिवासियों के प्रकृति के प्रति लगाव की स्वीकृति है. आदिवासी समुदाय इन निर्धारित क्षेत्रों में बाघों (और अन्य प्राकृतिक सृष्टि) के साथ सदियों से रहता आ रहा है. परंतु वन विभाग की पुनर्वास नीतियों में ऐसी भावना की कमी छलकती है.
ऐसे में आदिवासी समाज की ओर से एक सवाल उठता है: जब सरकारी विभाग ही सरकारी प्रक्रियाओं की अनदेखी कर आदिवासी समाज को उत्पीड़ित करता है, तो आदिवासी समाज क्या करेगा?
लेखक झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता हैं.
