बाक़ी बची ज़िंदगी आदिवासियों के साथ बिताने का संकल्प ले कर जब तीस वर्षीय वेरियर एल्विन अपने भारतीय मित्र शाम राव हिवाले के साथ बैलगाड़ी में बैठकर 1932 में अमरकंटक के पास घने जंगल में करंजिया नामक गांव पहुंचे तब किसी के लिए कल्पना करना मुश्किल था कि एक दिन यह अंग्रेज उत्तर पूर्व के राज्यों को भारत का अभिन्न अंग बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा.
शुरुआत करने के लिए जेब में दो सौ रुपये थे और था मध्य-भारत के सबसे प्रभावशाली गोंड राजा सारंगढ़ के जवाहिर सिंह के लिए महात्मा गांधी का दिया संदर्भ.
स्वाभाव से विद्रोही एल्विन ऑक्सफोर्ड में शिक्षा पूरी करने के बाद सन् 1927 के नवंबर में भारत आए थे, पूना के क्रिस्टा सेवा संघ में शामिल हो कर ईसाई धर्म का प्रचार करने वाले पादरी के रूप में काम करने. पूना बाल गंगाधर तिलक और गोपाल कृष्ण गोखले की राष्ट्रवादी गतिविधियों का केंद्र था. दो माह के भीतर ही इनको महात्मा गांधी के आश्रम में जाने और उनके सानिध्य का मौक़ा मिलना शुरू हो गया.
तीन महीनों में साइमन कमीशन का आना हुआ और उन घटनाओं की शुरुआत हो गई, जिनकी परिणति लाला लाजपतराय की मृत्यु में हुई. बहुत कम समय के भीतर ही इतना कुछ हुआ कि उस घटनाक्रम से वेरियर प्रभावित होते चले गए. उनका विश्वास दृढ़ होता चला गया कि अंग्रेजों के हाथों जो हो रहा था वह ग़लत था और स्वयं एक अंग्रेज होने के नाते उनके लिए वांछित था कि भारतीयों के बीच रह कर इस अन्याय के प्रायश्चित और इसकी भरपाई के लिए जो भी संभव हो वह करें.
लक्ष्य तय हो जाने के बाद इन्होंने क्रिस्टा सेवा संघ से नाता तोड़ा, भारत में क्रिश्चियन मिशनरी गतिविधियों की मज़बूत संस्था और अंग्रेज़ी प्रशासन का विरोध मोल लिया और अपने आपको गांधी को समर्पित कर दिया. इस इच्छा या निर्णय को मूर्त रूप देने की प्रक्रिया अनेक चरणों से हो कर गुज़री थी.
एल्विन और राजा जवाहिर सिंह की मित्रता
गांधी ने उन्हें शहरों की मेहतर बस्तियों में भेजा. ठक्कर बप्पा के साथ दाहोद-झाबुआ इलाक़े में भीलों के बीच भेजा. बैतूल के जंगलों में गोंड आदिवासियों के बीच भेजा.
और अंत में सारंगढ़ के राजा जवाहिर सिंह, जवाहर लाल नेहरू और गांधी के सहयोगी जमना लाल बजाज ने निर्णय लेने में मदद की और एल्विन गोंड-बाहुल्य करंजिया पहुंचे.
शामराव हिवाले ने एक जगह लिखा ‘ (अपने) परिवार के चार सौ साल के इतिहास में वेरियर पहले सदस्य थे जिन्होंने धर्म और राजनीति में कट्टरवाद की संकरी गली को त्याग कर अपना अलग रास्ता चुना’.

एल्विन की कहानी में राजा जवाहिर सिंह का प्रवेश गांधी के ज़रिये हुआ था. जवाहिर सिंह गांधी के संपर्क में रणजीत पंडित के ज़रिए आए थे. लेकिन यह एक अलग कहानी का विषय है. एल्विन और राजा जवाहिर सिंह की मित्रता बहुत घनिष्ठ होती गई.
सारंगढ़ का महल एल्विन के साथ-साथ उनकी गोंड पत्नी कोसी तथा मित्र शामराव हिवाले का दूसरा घर बना. राजा जवाहिर सिंह एल्विन को आदिवासी संस्कृतियों की बारीकियों से परिचित कराने वाले शिक्षक बने.
गोंड संस्कृति को समझने की दिशा में एक शुरुआत
करंजिया पहुंचने के बाद पहला लक्ष्य था आदिवासियों के बीच स्वीकार्यता प्राप्त करना. रामचंद्र गुहा अपनी पुस्तक ‘सैवेजिंग द सिविलाईज़्ड, वेरियर एल्विन, हिज़ ट्राइबल्स, एंड इंडिया’ में लिखते हैं कि एल्विन ने दो मील दूर बोंदर गांव के गोंड पंडा बाबा से छत्तीसगढ़ी बोली सीखना प्रारंभ की.
पंडा बाबा उनके गाइड भी थे और मित्र भी. गोंड संस्कृति को समझने की दिशा में यह एक शुरुआत थी. पंडा बाबा अपने फ़न में कितने माहिर थे इसका पता एल्विन के द्वारा देवनागरी में लिखी पंक्तियों से चलता है. ये पंक्तियां एल्विन ने सारंगढ़ के गिरिविलास महल में रखी आगंतुक पुस्तक में लिखी थीं.
उन्होंने पहले लिखा: ‘संवरा के पांगे, राउत के बांधे, राजा के फांदे’. इसके बाद अंग्रेज़ी में लिखा: संवरा (एक आदिवासी समूह जो अपनी जादू-टोने की कला के कारण बहुत मांग में रहता है) का मायाजाल, राउत (गांव के मवेशियों की देखभाल करने वाला) के हाथों बंधी गांठ, और राजा का प्रेम पाश (राजा जवाहिर सिंह द्वारा फैलाया प्रेम का जाल), इन तीनों से बच कर निकलना संभव नहीं है.
एल्विन ने अपने प्रथम पुत्र का नाम रखा जवाहर. अपनी आत्मकथा ‘द ट्राइबल वर्ल्ड ऑफ वेरियर एल्विन’ में उन्होंने लिखा कि यह नाम उनके मित्र सारंगढ़ के राजा पर रखा था, ‘इसी नाम के अधिक मशहूर व्यक्ति पर नहीं ‘.
1947 में अंग्रेजों ने जब सत्ता सौंपी तब उत्तर-पूर्वी भारत में उनका नियंत्रण उस सारे भूभाग पर नहीं था जो भारत के नक़्शे में दिखाई देता था. शिलांग की आबोहवा और दार्जीलिंग जैसे स्थानों में एंग्लो-इंडियन बच्चों के लिए स्थापित किए गए स्कूलों के अलावा अंग्रेज़ों के हित सिर्फ़ तेल के कुंओं और चाय के बागानों तक सीमित थे. इस इलाक़े के राजनैतिक और प्रशासनिक नियंत्रण में अंग्रेज़ों की दिलचस्पी नहीं रही.
आज के मिज़ोरम, नगालैंड, मणिपुर, अरुणाचल और त्रिपुरा के इलाक़े या तो राजाओं के नियंत्रण में थे या आदिवासी कबीलों के. न केवल वहांं सरकार अनुपस्थित थी बल्कि लोगों ने पास भी अपने आप को ‘भारत’ के राजनैतिक नक़्शे का अंग मानने का कोई कारण नहीं था.

इंडियन फ्रंटियर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज
जवाहरलाल नेहरू ने इस इलाक़े को भारत से जोड़ने की मुहिम वेरियर एल्विन के हवाले की. नीति थी फ़ौजी ताक़त के इस्तेमाल की बजाए आदिवासियों का दिल और दिमाग़ जीत कर उन्हें तथा उनके इलाक़े को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाने की. एल्विन ने शिलांग के राजभवन के एक हिस्से में अपना निवास बनाया. प्रारंभिक पड़ताल के कई महीने खच्चरों की पीठ पर गुज़रे. अरुणाचल उन दिनों नेफ़ा कहलाता था.
एल्विन ने नेहरू को सुझाव दिया कि पूर्वोत्तर भारत की विशिष्ट परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यहांं की प्रशासनिक व्यवस्था के लिए (तब के) इंडियन सिविल सर्विस (आईसीएस) से अलहदा एक काडर खड़ा किया जाना चाहिए. नेहरू ने न केवल इंडियन फ्रंटियर एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विसेज (आईएफएएस) के गठन की मंज़ूरी दी बल्कि इसे विदेश मंत्रालय के अधीन रखा.
विदेश मंत्रालय नेहरू के पास ही था. इस काडर में भर्ती के लिए देश भर से आवेदन मंगाए गए. आवेदक सभी प्रकार की पृष्ठभूमि से थे – शिक्षक, फ़ौजी, प्रशासनिक. फ़ोकस नेफ़ा पर था.
वेरियर एल्विन और असम के राज्यपाल जयरामदास दौलतराम ने मिलकर साक्षात्कार किए और सक्षम लोगों का चयन किया. इसके बाद एल्विन के नेतृत्व में इन चयनित लोगों की कठिन ट्रेनिंग शुरू हुई. चयनित अधिकारियों को आदिवासियों के बारे में शिक्षित करने के लिए एल्विन ने एक गहन पाठ्यक्रम तैयार किया. भाषा-शास्त्र का एक विभाग खड़ा किया जिसमें अलग-अलग समूहों (कबीलों) की भाषा और संस्कृति का प्रशिक्षण दिया गया.

प्रेम और शांति-आधारित नीतियों की विफलता
एक लाइब्रेरी तैयार की जिसमें पिछले डेढ़ सौ सालों में अंग्रेज़ अधिकारियों, सैनिकों, यात्रियों जैसे लोगों के इस इलाक़े पर आधारित संस्मरणों को एकत्र किया गया. इन अधिकारियों के साथ एल्विन ने दौरे शुरू किए. दौरे छह से सात माह लंबे होते.
पूर्वोत्तर की ज़िम्मेदारी शरीर पर भारी पड़ रही थी पर इलाक़े और आदिवासियों के भारत के साथ एकीकरण का काम जारी रहा. 1962 के चीनी आक्रमण को नेहरू और एल्विन दोनों की प्रेम और शांति-आधारित नीतियों की विफलता का प्रमाण बताया गया. देश के अंदर हो रहे हमले ये दोनों बर्दाश्त नहीं कर पाए.
1964 में तीन महिने के भीतर इन दोनों मित्रों की मृत्यु हृदयाघात से हुई. फरवरी में एल्विन की शिलांग में और मई में नेहरू की दिल्ली में. 1968 में आईएफ़एएस को विघटित कर इसे आईएएस में विलीन कर दिया गया. इससे पहले, 1946 में राजा जवाहिर सिंह की मृत्यु के बाद से एल्विन के सारंगढ़ प्रवास खत्म हो चुका था.
लेकिन तब तक सारंगढ़ के आदिवासी समाज की लोक कथाएं और गीत उनकी पुस्तकों में स्थान पा कर संरक्षित हो चुके थे, और एल्विन की स्मृति सारंगढ़ की आगंतुक पुस्तिका में स्थाई निवास बना चुकी थी.
(लेखक इतिहास-प्रेमी हैं, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं.)
(इस श्रृंखला के सभी लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
