हिंदी के सुप्रतिष्ठित कवि और विवादास्पद संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी का साहित्य और कला विषयक ‘कभी कभार‘ स्तंभ कई वर्षों से हिंदी भाषी प्रांतों में बहुपठित है. अभी सितंबर के पहले हफ़्ते में उन्होंने इस रविवारीय स्तंभ में लिखा: ‘पहले लेखक अग्रदूत होते थे, आज पत्रकार अग्रदूत हैं. वे आज सच्चाई के किस्सागोई सच के चौकीदार, हिंदी भाषा के नैतिक विवेक के प्रहरी हैं.’
उन्हें लगता है कि ‘हिंदी के कुछ पत्रकारों ने अपनी सक्षम मुखरता, यथार्थ पर अपनी पकड़, अपनी प्रखर निडर आलोचना से हिंदी के लेखकों को पीछे छोड़ दिया है.’
अशोक वाजपेयी ने हिंदी दिवस पर ‘द वायर हिंदी’ के संपादक आशुतोष भारद्वाज से बातचीत करते हुए फिर यही बात दुहराई है.
उन्हें स्मरण होगा कि भारत की आजादी के संघर्ष में हिंदी ने संग्राम की भाषा का रूप ले लिया था जिसमें साहित्य और पत्रकारिता की राष्ट्रीय साझेदारी थी. हिंदी साहित्य के इतिहास और उन दिनों की पत्रकारिता के इतिहास में हिंदी की इस पत्रकारिता का उल्लेख मिलता है. उस समय साहित्य और पत्रकारिता में कोई दूरी नहीं थी. उस समय वे पत्रकार अग्रदूत होते थे जो कवि और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भी थे. वे केवल वाग्वीर नहीं, कर्मवीर भी थे. वे ‘हिंदी के नैतिक विवेक के प्रहरी ‘ थे.
लेकिन अशोक वाजपेयी जिन्हें पत्रकार कह रहे हैं, वे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के यूट्यूबर हैं जो ज़्यादातर तात्कालिक राजनीतिक दुष्प्रचार के किस्से गढ़कर हमें बड़ी देर तक सुनाया करते हैं. उनकी इस किस्सागोई में पूरा राजनीतिक सच कहां प्रकट होता है? जब देश के सभी राजनीतिक दलों ने मिलकर राजनीति को भ्रष्ट कर दिया हो, तब इन अग्रदूतों को सबके झूठ उजागर कर सकना चाहिए. पर वे राजनीतिक पापों की गिनती करते हुए उन दलों के पाप छिपा लेते हैं जिनके पक्ष में वे यूट्यूब पर अपना आसन जमाकर बैठे हैं. इसे ‘प्रखर और निडर आलोचना’ कैसे कहा जा सकता है?
अशोक वाजपेयी जिन्हें अग्रदूत कह रहे हैं वे केवल वाग्वीर हैं, कर्मवीर नहीं. उनकी बोली में पक्षपातपूर्ण उग्रता अधिक है. वे इस डरावने राजनीतिक दृश्य की कोई तार्किक व्याख्या नहीं करते जो लोकतंत्र की नींव हिला रहा है. इन पत्रकार अग्रदूतों और राजनीतिक दलों के अधैर्य में काफी समानता है. ये केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन के पक्ष में हल्ला बोल रहे हैं और लोगों को तमाशबीन बना रहे हैं. ये विभेदकारी विस्तार में उलझाकर लोगों को व्यर्थ थकाते हैं. किसी को सोचने-समझने की प्रेरणा से भरते ही नहीं.
ये अग्रदूत देश की शिक्षा और सद्भाव के अध्यात्म पर कभी कोई वार्ता करते नहीं देखे जाते. लोकतंत्र केवल राजनीतिक कर्म तो नहीं है. वाजपेयी जी यह अनदेखा कर रहे हैं कि कुछ साहित्यकार आज भी हैं, गिनती में इन कथित अग्रदूतों की तुलना में भले ही कम, लेकिन वे आज भी बता पा रहे हैं कि लोकतंत्र कैसे खुद अपनी विफलताओं से सीखकर अपने आत्मबल को परिष्कृत कर सकता है.
महात्मा गांधी सहित हिंदी पत्रकारिता में जो अग्रदूत हुए हैं- माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, माधवराव सप्रे आदि. उन्होंने हिंदी साहित्य का दामन कभी नहीं छोड़ा. गांधी जी की प्रार्थना सभाओं में हिंदी ही नहीं, अनेक भारतीय भाषाओं की कविता रोज़ गायी जाती रही. उस समय नई चाल में ढलती आ रही हिंदी की उम्र लगभग पैंसठ साल ही थी.
यह खड़ी बोली हिंदी जल्दी ही अपने पांवों पर खड़ी होकर ‘भारत-भारती’ की अंगुली पकड़कर चलना सीख गई. इस हिंदी को उस समय की पत्रकारिता ने भी खड़ा किया.
कभी हम अपनी हिंदी सुधारने और कुछ विचार हासिल करने के लिए अख़बार पढ़ते थे. इस संवाद में शामिल प्रोफेसर अपूर्वानंद ने इसकी याद भी दिलाई. पर अब तो हिंदी के अख़बार अपनी इस जिम्मेदारी से बहुत दूर चले गए हैं. उनमें अब अंग्रेजी मिश्रित हिंदी का चलन है. अखबार और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया मिलकर हिंदी को इसी चाल में ढाल रहे हैं. वे बाज़ार के आगे अपनी स्वाधीनता खोकर उसके प्रचारक बन गए हैं.
मीडिया चैनल और यूट्यूबर विज्ञापन के भरोसे ही अपनी बैठक जमाये हुए हैं. नए लेखकों की हिंदी भी इसी अखबारी रास्ते का अनुगमन करने लगी है. धर्म, राजनीति और बाज़ार के गठबंधन ने ऐसे ‘अचूक अवसरवाद’ (यह पद वाजपेयी जी ने ही कभी गढ़ा था) के दरवाजे खोल दिए हैं कि जब जो चाहे अन्याय के पक्ष में हल्ला बोलकर भीड़ जुटा सकता है, भले ही उसका स्वर कितना ही लापरवाह और निरंकुश क्यों न हो. यूट्यूबर अग्रदूत यही कर रहे हैं. आश्चर्य होता है कि इनमें से कुछ वाजपेयी जी को ‘सच के चौकीदार’ लग रहे हैं!
स्वच्छंदता इन अग्रदूतों के इतनी सिर चढ़कर बोल रही है कि किसी को लोकमत परिष्कार करने का, जरिया और मुराद का ख़याल ही नहीं रह पा रहा है. सब अपनी-अपनी उग्रता के उग्रदूत हुए जा रहे हैं. देश और दुनिया में जीवन का वह रचनात्मक अंतर्निभर पड़ोस ही नहीं बच रहा जिसमें सह-अस्तित्व का सपना देखा गया था.
अशोक वाजपेयी ने बीती आधी सदी में साहित्य और कलाओं के अंतर्निभर पड़ोस में कुछ अग्रदूत खोजे हैं, और उनका गुणगान भी किया है. हमने वाजपेयी जी को एक बड़े कला आंदोलन का अग्रदूत होते हुए देखा है. वाजपेयी जी भूले तो नहीं होंगे जब पत्रकारिता के वाम-दक्षिण अग्रदूत उनकी रची कला संस्थाओं को मिटाने वाली राजनीति का ही समर्थन कर रहे थे. आज भी यूट्यूबरों की दुकानों में कला और साहित्य के लिए कोई जगह दिखायी नहीं देती है.
आज कोई भी अपनी दुकान यूट्यूब पर खोलकर और लेखकों के द्वारा लेखकों का अपमान करने का विवादास्पद धंधा करके अपना नाम कमा सकता है.
साहित्य-कलाविहीन पत्रकारिता में अग्रदूतों की खोज व्यर्थ है. कला-संस्कृतिकर्मी और कवि अशोक वाजपेयी से एक प्रश्न पूछने का भी मन है कि थोड़े ही सही, राजनीतिक अन्याय के विरुद्ध लेखक तो बोल रहे हैं पर क्या संगीतकार और चित्रकारों को कोई अन्याय दिखायी नहीं दे रहा. क्या उनके बीच कोई अग्रदूत नहीं हैं?
(ध्रुव शुक्ल वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
