ठाकुरगंज (जिला: किशनगंज, बिहार): मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने जिस गणना प्रपत्र को एसआईआर का एकमात्र रास्ता बताया था, वही जमीन पर भटका हुआ दिखता है.
चुनाव आयोग के मुताबिक जिन मतदाताओं ने अपना फॉर्म भरकर जमा किया, उनका नाम एसआईआर की ड्राफ्ट सूची शामिल होना था और जिन मतदाताओं के फॉर्म बिना भरे हुए वापस आए या नहीं आए, उनका नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं होना था. ऐसे मतदाताओं के बारे में माना गया था कि या तो वे कहीं स्थानांतरित हो गए या उनकी मृत्यु हो गई.
लेकिन बिहार के कुछ इलाके ऐसे हैं जहां उन मतदाताओं के नाम भी एसआईआर की ड्राफ्ट सूची में शामिल हैं, जो यहां रहते ही नहीं हैं और उन्होंने अपना फॉर्म ही नहीं भरा था.
नेपाल सीमा से महज़ पांच-छह किलोमीटर दूर एक गांव है बसेरबाटी. यह बिहार के मुस्लिम बहुल जिले किशनगंज के ठाकुरगंज ब्लॉक में स्थित है. यह न केवल नेपाल और पश्चिम बंगाल की सीमा के करीब है बल्कि, बांग्लादेश भी अधिक दूर नहीं है.
यहां पहुंचने के लिए हम नेशनल हाइवे- 327-ई को पीछे छोड़ गांव की सड़क लेते हैं. इस टूटी सड़क के एक ओर अनानास की खेती दिखती है, तो दूसरी ओर से चाय की पत्तियों की महक भी आती है.
सुबह करीब 10 बजे जब हम इस पंचायत के बूटीझरी गांव पहुंचते हैं, तो कच्चे-पक्के घर अधिक दिखते हैं, उनमें रहने वाले कम.
वार्ड सदस्य नंदकिशोर रजक बताते हैं कि अधिकतर लोग मजदूरी करने के लिए गए हुए हैं. इस इलाके के वोटर्स के नाम बूथ संख्या- 334 में दर्ज हैं.

इस बूथ पर कुल 817 वोटर्स के नाम हैं. कम-अस-कम दस के नाम चुनाव आयोग ने नोटिस भेजा है कि उन्होंने पूरे दस्तावेज़ नहीं दिए हैं.
मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो पूरे राज्य में ऐसे वोटर्स की संख्या तीन लाख से अधिक है. इनमें भी सीमांचल में सबसे अधिक, जिसका हिस्सा किशनगंज के साथ अररिया, पूर्णिया और कटिहार जिला है.

यह नोटिस इसलिए है कि उनका नाम एसआईआर ड्राफ्ट सूची में है, लेकिन उन्होंने अपने दस्तावेज़ जमा नहीं किए हैं. अब उन्हें अपने कागज़ जमा करने हैं, ऐसा नहीं करने पर उनकी नाम फाइनल लिस्ट से हट जाएगा.
इनमें 29 वर्षीय सुनीता बेसरा भी शामिल हैं.
वे अपने घर में नहीं हैं. उनके पति ताला हसदा भी मजदूरी करने के लिए बाहर हैं. वहां हमें उनकी दूसरी पत्नी मैदी बेसरा मिलती हैं. वे बताती हैं कि सुनीता ने दूसरी शादी कर ली है और यहां नहीं रहती.
सवाल उठता है कि अगर सुनीता बेसरा यहां नहीं रहतीं, तो उनका नाम एसआईआर ड्राफ्ट सूची में कैसे दर्ज हो गया?

बूथ संख्या- 334 (मिडिल स्कूल, चुरली, ठाकुरगंज), जहां सुनीता बेसरा का नाम दर्ज है, के बीएलओ- राजीव कुमार जयसवाल बताते हैं, ‘मेरे बूथ पर कुल 13 लोगों को नोटिस आया है. इनमें नसीमा खातून के परिवार को हाथों-हाथ नोटिस दिया. बाकी वोटर्स एब्सेंट हैं. तो हमने नोटिस उनके घर पर लगाकर और पड़ोस के दो-चार लोगों को गवाह बनाकर उन्हें एब्सेंट करके ऑफिस को सूचित कर दिया.’
नसीमा खातून के बारे में बीएलओ ने बताया कि वे शादी करके अपने ससुराल चली गई हैं, लेकिन इसकी सूचना मुझे नहीं मिली थी.
जब ये मतदाता यहां रहते ही नहीं, तो उनके फॉर्म किसने भर दिए और किसने जमा कर दिए?
मुख्य चुनाव आयुक्त का गणना प्रपत्र पर आग्रह
बीते महीने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने एक प्रेस कॉन्फ्रेस की थी. एक सवाल के जवाब में उनका कहना था, ‘एसआईआर की खासियत यह होती है कि वोटर लिस्ट को टोटली, मैक्सिमम प्यूरीफाई करने के लिए एक गणना प्रपत्र भरा जाता है और हर मतदाता जब उसको भरकर देता है, तो मतदाता सूची फ्रेश, एकदम नए तरीके से बनाई जाती है.’
ज्ञानेश कुमार ने जिस प्रपत्र को मतदाता सूची को सुधारने के लिए अकेला रास्ता बताया, वह बसेरबाटी ग्राम पंचायत में भटक कैसे गया?
बूथ संख्या- 332 के बीएलओ मोहम्मद तनवीर आलम ने कहा कि कुल 10 लोगों के नाम नोटिस आया था. इनमें एक ने अपने दस्तावेज़ जमा कर दिए. जब हमने बीएलओ से पूछा कि बाकी नौ का क्या हुआ, तो इसके जवाब में उन्होंने बताया कि वे सभी कहीं और शिफ्ट हो गए हैं.
तनवीर इन गड़बड़ियों की एक वजह ऊपर से (यानी अधिकारियों की ओर से) काम का अधिक प्रेशर होना बताते हैं. बिहार में एसआईआर को लेकर चुनाव आयोग की आलोचना हो रही है कि उसने काफी कम समय दिया है और काफी जल्दबाजी में फॉर्म भरे जा रहे हैं.

जब हमने जिन मतदाताओं के नाम नोटिस जारी किए गए हैं, उनके बारे में जानने के लिए बसेरबाटी की मुखिया अनुपमा देवी से पूछताछ की तो कोई पुख्ता जानकारी नहीं मिली.
उन्होंने कहा कि ग्राम पंचायत की आबादी काफी अधिक (22,000) है और वोटर्स 12,000 से अधिक हैं. इन वोटर्स में आधे से अधिक मुसलमान समुदाय के हैं. बाकियों में आदिवासी, दलित (रघुवंशी) और दूसरे कैटेगरी (ओबीसी, जनरल) हैं.
वहीं, जब हमने नोटिस और गणना प्रपत्र में हुई गड़बड़ी के बारे में ठाकुरगंज के निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी स्पर्श गुप्ता से बात की तो उन्होंने कहा, ‘ऐसा कैसे हो जाएगा! जिसका बीएलओ खुद लिखकर दिया है. चिन्हित करके दिया है, या जिनके पार्शियल विसंगति है या पूरा नहीं है, उसी आधार पर नोटिस दिया गया है. जो फॉर्म नहीं भरा है, उसको कैसे नोटिस जाएगा?’
हालांकि, बीएलओ ने कहा कि वे इस मामले को देखेंगे.

इस सवाल पर कि चुनाव आयोग को जो वोटर्स मौजूद ही नहीं हैं, उनके नाम नोटिस भेजने की जरूरत क्यों पड़ी, निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी स्पर्श गुप्ता ने बताया, ‘एसआईआर में अगर डॉक्यूमेंट्स नहीं दिया है तो हम उन्हें मौका दे रहे हैं.’
एसआईआर की प्रक्रिया में निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी, जो कि राज्य का एक अधिकारी होता है, की निर्णायक भूमिका होती है. अंतिम वोटर लिस्ट का प्रकाशन निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी ही करता है.
सीईसी ज्ञानेश कुमार ने उसी प्रेस कॉन्फ्रेंस में यह जानकारी दी थी कि 30 दिनों के भीतर बिहार के 7.89 करोड़ वोटर्स में से 7.24 करोड़ के गणना प्रपत्र मिले थे. लेकिन चुनाव आयोग के पास जो 7.24 करोड़ फॉर्म पहुंचे, क्या वैसे फॉर्म, जिन्हें वोटर ने नहीं भरा था, उन्हें भी हड़बड़ी में अपलोड कर दिया गया?
इन प्रश्नों के जवाब अभी भी अनुपलब्ध हैं.
(हेमंत कुमार पाण्डेय स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
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