दशहरा बीत चुका है. अब मेलों की ऋतु आएगी. नदियों के किनारे कार्तिक पूर्णिमा के मेले होंगे. अगहन में राम विवाह होगा और पूस-माघ में गंगा के स्नान. जगह-जगह मेले, अपार जन समुद्र और इसमें होंगे बांसुरी वाले. भला बांसुरी बेचने और खरीदने वालों के बिना कोई मेला होता है? जब तक कि कोई बच्चा बांसुरी के लिए मचले न, तब तक कोई मेला भला मेला है? मेले और बांसुरी से संबंधित इतनी सारी सुंदर बातों के बीच सब कुछ सुंदर नहीं है.
जो बांसुरी बनाते हैं, उनका जीवन बांसुरी की किसी धुन की तरह मनमोहक नहीं है. वह एक कठोर जीवन है. यह लेख उनके जीवन और उनकी जीविका को नम और नरम निगाह से बिहार और उत्तर प्रदेश की भूमि पर देखता है.
इलाहाबाद का गोविंद बल्लभ पंंत सामाजिक संस्थान गंगा के बाएं किनारे पर है और उससे कुछ ही दूरी पर कुंभ का जग प्रसिद्ध मेला लगता है. मेले में दुनिया भर से लोग आते हैं और उसमें बांसुरी बेचने वाले लोग प्राय: बिहार के सारण से आते हैं. पिछले 15 सालों में, 12 वर्ष के अन्तराल पर लगने वाले कुंभ के दो मेले लग चुके हैं.
वे 2013 में भी आए थे, 2025 में भी आए थे. 2025 में कुछ बिल्कुल किशोरावस्था की दहलीज पर खड़े, 12-13 साल के बच्चे थे. हमने बांसुरी बेचने वाले मिर्शिकार समुदाय के लोगों को दो जगह से देखा है- मेले के बाहर और मेले के अंदर.
बिहार की भूमि पर
बिहार के सारण जिला मुख्यालय, छपरा से मोहम्मदपुर तक सड़क जाती है. यहां से लगभग 21 किलोमीटर दूर हरे-भरे पेड़ों के बीच चेतन छपरा बाजार से आगे पुछरी गांव किनारे नहर के पास से पतली सड़क मिसकारी टोला पहुंचा देती है. गांव में पहुंचने से पहले ही, गांव के चारों ओर हर घर से धुंध की तरह हल्का धुंआ उठता दिखाई देता है.
आग पर सिंकते बांस की महक
गांव के टोलों में एक खास किस्म की महक उमड़ती है. यह महक बांसुरी के बांस को आग पर सेंकने से उत्पन्न होती है. बांसुरी बना रहे 60 वर्षीय मकसूद आलम ने बताया, ‘इस टोले की आबादी लगभग 1500 के आसपास है. बांसुरी बनाने के लिये इस विशेष किस्म की बांस को असम के सिलचर से मंगाया जाता है. दिनभर में लगभग 500 से 700 तक बांसुरी बना लेते हैं.’

बगल में बांस को बांसुरी का रूप देते हुए 24 वर्षीय मोहम्मद इम्तियाज़ ने बताया- ‘वे लगभग 12 साल से बांसुरी बनाने का काम करते हैं. 400-500 नग बांसुरी प्रतिदिन बना लेते हैं.’ शीशम के एक पेड़ के नीचे 50 वर्षीय मोहम्मद हसनैन का पूरा परिवार जमा है. उन्होंने बताया कि बचपन से ही वे इस कारोबार से जुड़े हैं. यहां पर किसी भी मिस्कारी परिवार के पास कोई खेती नही है. बांसुरी बनाना और उसे बेचना ही मुख्य कारोबार है.
आमतौर पर 11, 14 और 17 इंच की बांसुरी बनाई जाती है. बाज़ार को देखते हुए 13 इंच और 16 इंच की भी बांसुरी बनाई जा रही है. हसनैन बताते हैं कि यहां के बड़े ठेकेदार असम से बांस मंगाते हैं. हम तो 15-16 हज़ार रुपये में बांस का खरीदते हैं. लाल रंग का शर्ट, लुंगी और हवाई चप्पल पहने, सिगरेट का कश लगाते 35 वर्षीय इस्माइल मियां फोन पर बात खत्म कर कहते है,’राउरकेला से फोन आया था.
वहां से माल का ऑर्डर आया है. कल भेजना हैं.’ इस्माइल मियां के एक ही परिवार के सात लोग काम करते है- अकलू मियां और उनके दो बेटे- रमजान अली और तफजूल मियां. रमजान अली के दो लड़के सन्नावार मियां और मुन्नवर मियां, दोनों बांसुरी बनाते हैं.

परिवार की आजीविका बांसुरी पर निर्भर
इसी शीशम के पेड़ नीचे 28 वर्षीय जुल्फिकार आलम बांसुरी के लिए बांस को बहुत ही मनोयोग से बढ़िया रूप दे रहे हैं. उनके परिवार का इसी से गुजारा होता है. उनके सात बच्चे हैं- तीन लड़के और चार लड़कियां. बच्चे स्कूल जाते हैं. आखिरी के दो बच्चे बगल में खेल रहे हैं.
कभी कभार बाहर से लोग ऑर्डर कर मंगाते हैं. उन्हें उसके हिसाब से ट्रेन में बुक कर दिया जाता है. विभिन्न राज्यों और बड़े शहरों में भेजा जाता है. दशहरा या किसी पर्व त्यौहार के उपलक्ष्य में गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार,बंगाल समेत विभिन्न इलाकों में इसे भेजा जाता है. जिसका किराया एक बोरे का 130 से 160 रूपये के आसपास हो जाता है.
बांसुरी को बेचने के लिए इस गांव के लोग दूसरे प्रदेशों में भी जाते हैं. इस्माइल मियां बताते हैं- ‘फिर भी एक बोरा नही बिक पाता है. हम वहां पहुंचकर जैसे-तैसे रहते है, स्टेशन या अन्य कही लावारिस सेवा के पास ठहरते हैं. चार महीना घर से दूर रहते हैं. कुछ बचता नही है.’
बाहर जाने के बाद परेशानी बढ़ जाती है. इस्माइल आगे बताते हैं, ‘इतना पैसा नहीं होता है कि परदेस में कोई कमरा लेकर रहे, वैसे भी हमें देगा कौन? सब जाति-धर्म पूछता है. फिर मना कर देता है.’
इस्माइल बताते हैं, ‘1700 में एक बोरा मिलता है. इसे बनाने में 300 रुपये मजदूरी, 200 कोयला का, अरहर की खूंटी के लिए 500 लगता है. इसके अलावा बांसुरी में बेहतर छेद करने वाले को 500 रूपये दिया जाता है. इसे पोखरा कटाई कहा जाता है. यह बांसुरी विभिन्न प्रक्रिया से होकर गुजरता है. तब जाकर तैयार होता है. इसके बाद इस पर रंग चढ़ाया जाता है.’
दो रुपये में एक अहर का डंडा मिलता है. एक अरहर के डंडा से लगभग बीस बांसुरी बनाया जा सकता है.
बांसुरी बनाने के ये लोग अलावा शादी-ब्याह के दिन में बैंड-बाजा का भी काम करते हैं. 48 वर्षीय मोहम्मद एजाजुल ने बताया – ‘ तीन महीना इसी गांव में रहते है, बैंड पार्टी में काम करते हैं. इसके अलावा नौ महीना बांसुरी बेचने के सिलसिले में बाहर रहना पड़ता है. कब किस शहर में रहना होगा, मालूम नहीं.’

बांसुरी चली इलाहाबाद की ओर
सारण में जहां बांसुरी बनाना सदियों में अर्जित की गई एक कला है, वहीं इलाहाबाद के मेले में, भुसावल या मथुरा में बांसुरी बेचना एक परफ़ॉर्मेंस भी है. बांसुरी बेचने वाले लोग इसे बजा-बजाकर बेचते हैं. बच्चों को सिखाते हैं कि कैसे बांसुरी में फूंक मारते हैं. इलाहाबाद में हमने उन्हें 2010 के माघ मेले में देखा था लेकिन उन्हें ठीक से नोटिस करना शुरू किया अगले साल से.
मैंने पाया कि सब एक जैसे हैं. धीरे-धीरे पता चला वे बिहार के मुसलमान हैं और हर साल मेले में आते हैं. जब 2013 का कुंभ मेला लगा तो मैंने उनकी बातों को अपनी डायरी में लिखना शुरू किया. तब से लेकर, 2021 और 2022 में उनसे नहीं मिल सका लेकिन जब फिर गया तो वैसे ही मिले. 2013 में मैंने उन पर एक कविता भी लिखी थी. उसका अंतिम हिस्सा कुछ यों है :
गंगा मैया के तट पर
नाग वासुकि की सीढ़ियों पर
ख़्वाजा की दरगाह पर
महादेवा के शिवालय पर
माखनचोर किसन कन्हैया के मंदिर की देहरी पर
इसराफ़िल मियां और उनकी गोल
बेच रही है बांसुरी
वे बड़े इसरार से कहते हैं
हमारी बांसुरी ले लो भैया-बहनों
शायद एक दिन
इसमें बजने लगे तुम्हारी पीड़ा.
2013 में मैंने इसराफिल मियां से लंबी बात की थी लेकिन अगले वर्ष वे नहीं आए, उनके घर-परिवार के कुछ बच्चे आए थे. उनसे उनका हाल-चाल मिला. उन्होंने मुझे यह भी बताया था कि मिर्शिकार समुदाय पहले शिकार के परंपरागत काम में संलग्न था. वे बहुत छोटे जानवरों और पक्षियों को पकड़ते थे लेकिन 1972 के बाद इस सब पर रोक लग गई थी तो इस समुदाय ने अपने आपको बांसुरी बेचने, स्थानीय कस्बों में काम करने, शादी-विवाह के समय बैंड बजाने और जब यह सब न मिले तो दूसरों के खेतों के काम करना शुरू कर दिया.

गोरखपुर और उसके आसपास रहने वाला मिर्शिकार समुदाय
इन कई तरह के कामों से उनकी जीविका चलती है. मिर्शिकार समुदाय की एक बहुत छोटी सी जनसंख्या गोरखपुर और उसके आसपास रहती है. वे भी मेले में आते हैं. मेरा अनुभव कहता है कि उनकी बांसुरी उतनी सुगढ़ नहीं होती है जितनी बिहार में बनी बांसुरी.
हम इसे गंगा-जमुनी संस्कृति के मुहावरे में नहीं पेश करना चाहते हैं कि मुस्लिम जन हिंदू स्थानों पर बांसुरी बेच रहे हैं, बल्कि इसे एक व्यापक अर्थ में देखने की गुज़ारिश कर रहे हैं. बीसवीं शताब्दी में शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान ने बहुतों को बहुत कुछ दिया है लेकिन बहुतों का बहुत कुछ छीन लिया है.
प्रसिद्ध कन्नड़ विद्वान डी. आर. नागराज ने इसे टेक्नोसाइड कहा था- टेक्नोसाइड अर्थात तकनीक से तबाह कर दिए गए लोग. बांसुरी बेचने वाले मिर्शिकार समुदाय के जीवन में अभी आधुनिकता से मिलने वाली चीजें बहुत कम दिखाई पड़ती हैं और उनके पास जो हुनर है, उसका मोल कम होता जा रहा है. उनके गुण-गाहक कम होते जा रहे हैं. ऐसा लगता है कि वे समय के हाशिए पर बांसुरी की कोई उदास धुन बजाते जा रहे हैं.
कुंभ मेले में मैंने देखा कि बांसुरी बेचने वाले लोग इलाहाबाद में शहर के उस हिस्से में रहते हैं जहां से सुबह वे मेले में आसानी से जा सकें और शाम को ठीक से लौट सकें. इसके लिए वे दारागंज और झूसी के बाहरी इलाकों को चुनते हैं और आमतौर पर समूह में रहते हैं. इससे उन्हें भावनात्मक और आर्थिक सुरक्षा हासिल होती है और कम किराये में एक कोई डेरा साझा करते हैं.
प्राय: एक ही गांव-जंवार के होने के कारण वे आपस में बातचीत भी कर लेते हैं और प्रत्येक वर्ष अपने गोल में किसी को शामिल कर लेते हैं. बूढ़े लोग किशोरों और बच्चों को दुनियावी ज्ञान देते हैं कि मेले में कहां खड़े होकर कैसे बांसुरी बेची जानी चाहिए और किसी पर्व-त्यौहार पर क्या सावधानी बरतनी चाहिए.
जैसा पुलिस का स्वाभाव है, वह उनको एक जगह खड़े नहीं रहने देती है और किसी के जगह से दूसरी जगह जाने को कहती है. वे हमेशा उनका कहा मानते हैं और दूसरी जगह चले भी जाते हैं लेकिन वे जहां भी जाते हैं, दूर से दिखते रहते हैं.
उन्हें समूह में जाते हुए देखना एक अद्भुत दृश्य है. वे जैसे फूलों का कोई बड़ा सा गुच्छा लेकर जा रहे हैं. उनके हाथ में 6-7 फुट का बांस का एक डंडा है. उसके ऊपर बांसुरी को ठहरा देने वाली मुकुट जैसी संरचना है. उस पर वे 150 से 200 के करीब बांसुरी खोंस देते हैं.

बांसुरी के फेरे
अपने दोनों हाथों से बांस की वह लाठी लिए वे मेले में बिचरते रहते हैं. वे प्राय: वहां खड़े होते हैं, जिधर से श्रद्धालु स्नान-दान करके घर के लिए अथवा अपने डेरों के लिए निकलते हैं.
मेले में बिकने वाली उनकी बांसुरी लागत के एक या डेढ़ गुने दाम पर बिक जाती है. इस हिसाब से उनका जीवन बेहतर होना चाहिए था लेकिन ऐसा है नहीं. उन्हें जो लाभ मिलता है, उसी में से उन्हें बिहार से इलाहाबाद तक आने का किराया देना होता है, डेरे का किराया देना होता है. सुबह-शाम का भोजन देखना होता है.
बांसुरी प्रतिदिन नहीं बिकती बल्कि किसी पर्व के ही दिन बिकती है. पर्व के दिन यदि भीड़ बहुत ज्यादा होती है तो अपने ही दवाब के कारण वह रुक नहीं पाती है और बहुत तेजी से निकल जाती है. इलाहाबाद के कुंभ मेले में 29 जनवरी की रात में संगम नोज के पास जो दुर्भाग्यपूर्ण घटना हुई थी, उस दौरान रमाशंकर सिंह झूसी की तरफ रुके थे.
तो हमने देखा था कि उसके पहले यानी 13 जनवरी से लेकर 28 जनवरी तक बांसुरी वालों का कार्यव्यापार ठीक-ठाक चल रहा था लेकिन जैसे ही मेले में बार-बार भीड़ का दवाब बढ़ता तो वे व्यग्र हो जाते. उन्हें अपनी सुरक्षा की चिंता सताती और कभी-कभी वे उन जगहों पर खड़े नहीं हो पाते, जहां वे खड़े होकर बांसुरी बेचना चाहते थे.
प्रत्येक विक्रेता चाहता है कि उसकी दुकान ‘प्राइम लोकेशन’ पर हो, तभी सामान बिकेगा. मेले में बांसुरी या मुरमुरे बेचने वाला भी ध्यान रखता है. इस तरह आप प्रबंधन संस्थानों में पढ़ाये जा रहे व्यवसाय के सिद्धांतों को सहज रूप से फलित होते ज़मीन पर देख सकते हैं.
(आशुतोष कुमार पाण्डेय स्वतंत्र पत्रकार हैं. रमाशंकर सिंह इतिहासकार हैं.)
