परिवार और शहर में महामारी से हुई मौतों के कारण पहले से ग़मगीन हो चुके माहौल में सन् 1631 में हुई मुमताज़ महल की मौत ने, माना जाता है, बादशाह शाहजहां को तोड़कर रख दिया था. आगरा में यमुना अपने बहने की दिशा बदलकर शहर से दूर हो रही थी और पानी की कमी एक बड़ी समस्या बन चुकी थी. आगरा की बेतरतीब और घनी बसावट फैलने की गुंजाइश में बाधा बन चुकी थी.
यहां रहकर भारत के पारंपरिक व्यापारिक मार्ग पर प्रभावी नियंत्रण भी मुश्किल हो रहा था जो किसी भी राज्य या शासक को स्वीकार्य नहीं होता. राजधानी को आगरा से हटाकर नए शहर में ले जाने का फ़ैसला ले लिया गया. सही स्थान के चयन के लिए शाहजहां के पास योग्य व्यक्तियों की कमी नहीं थी. ताजमहल बनाकर विख्यात हो चुके प्रमुख वास्तुकार उस्ताद अहमद लाहौरी के नेतृत्व में एक दल को रवाना किया गया जिसने यमुना के किनारे स्थल चयन किया और आज की पुरानी दिल्ली का बीजारोपण हुआ.
सवा सौ साल बाद कमोबेश वही परिस्थितियां मध्य भारत के गोंडवाना में राजा रतन सिंह के सामने थीं. महामारी में सामाजिक कुटुंब के सदस्यों की होती मृत्यु ने राजधानी को गाताडीह से उठाकर नए स्थान पर ले जाने की भूमि तैयार कर दी थीं. कुछ और कारणों ने निर्णय लेने में मदद की.
सफल राजधर्म निर्वहन के लिए राज्य की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था परिवर्तन चाह रही थी. उत्तर में बह रही महानदी देश का प्रमुख सैन्य और वाणिज्यिक जलमार्ग थी. वाणिज्यिक मार्ग पर प्रभावी हस्तक्षेप और नियंत्रण के लिए एक सक्षम सेना और कुशल प्रशासन के साथ साथ एक सम्मानजनक दूरी पर सुरक्षित स्थान पर उपस्थित रहना आवश्यक था.
महानदी का किनारा उत्तर और पश्चिम भारत के यात्रियों को तीर्थाटन पर जगन्नाथपुरी पहुंचाने का मार्ग बनाता था. तीर्थयात्रियों में बड़ी संख्या उन समूहों/व्यक्तियों की होती थी जो यात्रा पर रवाना होने के समय लौटने की अपनी सारी संभावनाएं घर की दहलीज़ पर छोड़कर विदा लेते थे. यदि जीवित लौटे तो उन स्थानों पर बसने की संभावना तलाशते जहां से हो कर वे गुजरे थे. वे अपने लिए सुविधाएं और सुरक्षा ढूंढते तो उन्हें आश्रय देने वाला राजा उनके बसने से अपने राज्य को होने वाला फ़ायदा देखता.
राजधानी को क़िले के भीतर एक ऐसे नए नगर में ले जाने का फ़ैसला हुआ जो सुरक्षित हो, व्यवस्थित हो, महानदी के समीप भी हो और सम्मानजनक दूरी पर भी, तथा जो नई आ रही आबादी को बसाने और तीर्थयात्रियों को ठहराने के लिए स्थान भी मुहैया कराता हो. निरंतर बढ़ती आबादी के निस्तार और खेतों की सिंचाई के लिए जहां पर्याप्त पानी हो, और शुद्ध पेयजल सदैव उपलब्ध हो.
इस तरह सन् 1760 में सारंगढ़ के क़िले और नगर का जन्म हुआ. इसी के साथ शुरू हुई इसके पान-पानी-पायलागी का नगर बनने की कथा.
कैसे बना मूड़ा
राजा रतन सिंह के भेजे आदिवासी विशेषज्ञों ने नए नगर के लिए जिस स्थान का चयन किया वहां वर्षा-जल-संचयन में आदिवासियों की पारंपरिक बुद्धिमत्ता के प्रदर्शन की भरपूर गुंजाइश थी. पहाड़ियों की तलहटी में नए बनने बसने जा रहे इस स्थान पर बारिश का पानी तीन दिशाओं से बहकर आता था. उन्होंने इसके संग्रहण और उपयोग के लिए सबसे ऊंचे स्थान पर एक बांध जैसा संग्रहण क्षेत्र बनाया जिसे मूड़ा कहा गया.
एक सौ बीस एकड़ में फैले मूड़ा में लगभग दस वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले पठार का वर्षा-जल बह कर आता था. मूड़ा से आगे विशाल और मज़बूत नालियों का एक जाल बनाया गया जिसमें से आगे बढ़ते हुए यहां का संग्रहित पानी बाईस तालाबों में सालभर का जल भराव सुनिश्चित करता था.
मूड़ा के दूसरे किनारे से पानी एक खंदकनुमा खाई में भेजा गया जो साल भर भरी रहकर क़िले के अंदर के नगर को सुरक्षा कवच प्रदान करती थी. खंदक या खाई का पानी एक नाले के रूप में परिवर्तित हो कर महानदी की दिशा में बढ़े इसके पहले घाट बनाए गए, नगरवासियों के लिए भी और तीर्थ यात्रियों के लिए भी. जिस तालाब में तीसरी बार फिल्टर हुआ पानी पहुंचता था उसे बाड़ी लगाकर खान-पान के लिए सुरक्षित रखा गया. कुछ सुरक्षा कर्मचारी सिर्फ़ यह सुनिश्चित करने के लिए तैनात किए गए कि किसी के गंदे हाथों या पैरों से पानी दूषित न हो.

अतिरिक्त पानी से लगभग चार सौ एकड़ खेतों में सिंचाई के लिए पानी पहुंचाया गया. भूमि के नीचे जल स्तर भी बढ़ा रहा. कुंओं की आवश्यकता अधिक नहीं थी पर जितने भी थे उनमें पानी लबालब भरा होता. गर्मी के दिनों में भी पेयजल अपेक्षाकृत ठंडा होता.
अपनी हाल की सारंगढ़ यात्रा में आए जल-पुरुष के नाम से विख्यात और मैग्सेसे पुरस्कार के विजेता राजेन्द्र सिंह के अनुसार आधुनिक भारत में वर्षा-जल-संचयन की ऐसी प्रणाली देखने का अवसर उन्हें जैसलमेर के अलावा कहीं नहीं मिला.
पान से रिश्ता
पानी को लेकर सारंगढ़ की ख्याति केवल इसकी प्रचुरता और पेयजल की शुद्धता के कारण नहीं थी. कुछ अलग था यहां के आब और हवा में. इसे पहचाना उस सामाजिक बिरादरी ने जो पारंपरिक रूप से इन दोनों का उपयोग कर जीवनयापन करती रही है.
1829 से 1872 के बीच सारंगढ़ में राजा संग्राम सिंह का शासन था. तीर्थ यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बन चुकी थीं. संन्यासियों के लिए- विशेषकर अषाढ़ से कार्तिक के बीच के चतुर्मास के दौरान रहने के लिए – दो मठ बन चुके थे. मंदिर बन चुके थे और मंदिरों तथा घाटों के आसपास तीर्थयात्रियों के ठहरने के लिए विशाल स्थान चिह्नित किए जा चुके थे.
उस काल में अनेक नई जातियों/समुदायों की बसाहट इस राज्य में हुई. इनमें से एक समूह 1840 और 1860 के बीच आया और इसने सारंगढ़ की पहचान ‘पान’ के साथ जोड़ी. यह समुदाय पान की खेती और उसके व्यापार के लिए जाना जाता था. इन्हें बरई (जो पान के उत्पादन में निपुण थे) और तम्बोली (या ताम्बोली) जिन्हें इस पान का बीड़ा (या ताम्बूल) बनाने में महारत हासिल थी, के नाम से जाना गया. पान से संबंधित या उसमें प्रयुक्त होने वाली सामग्री जैसे कत्था, चूना, सुपारी आदि का व्यापार करने वाले ‘पनसारी’ भी थे.
राजा संग्राम सिंह का कार्यकाल वह समय था जब छत्तीसगढ़ में मराठों के प्रभाव का पराभव अपनी पूर्णता की ओर था और अंग्रेज़ों के प्रभाव की शुरुआत हो रही थी. विदर्भ के नागपुर, अमरावती, वर्धा, बुलढाना जैसे क्षेत्रों में पान की खेती बहुत लोकप्रिय रही थी. मराठों के समय इस इलाक़े से छत्तीसगढ़ पहुंचे समुदाय के सदस्य आमतौर पर उन हिस्सों में बसे जो बाद में अंग्रेज़ों के द्वारा प्रशासित इलाक़े बने जैसे बिलासपुर-रायपुर-दुर्ग ज़िलों की पट्टी. इनमें छुईखदान नामक स्थान को इस समाज में विशेष महत्त्व प्राप्त है.

हालांकि इनकी आम पहचान बुंदेलखंड वाले आल्हा और ऊदल के इलाक़े से रही है, जबलपुर, सागर और दमोह के क्षेत्र पान के उत्पादन के लिए विख्यात थे. इस समुदाय में अनेक समूह थे जो आमतौर पर अपनी उत्पत्ति के स्थान के नाम पर विशिष्ट उप-वर्गों में जाने जाते थे जैसे मिर्ज़ापुर के पास चौरासी गांव वाले चौरसिया, महोबा वाले महोबिया, जबलपुर के पास पनागर पर पनागरिया. संभव है अलग-अलग समय कालों में अलग-अलग स्थानों से विस्थापन होने से ये विशेषण उत्पन्न हुए हों.
नागपंचमी पर्व या नाग (सर्प) की पूजा का इस समाज में बहुत अहम स्थान रहा है.
समाज में जो कहानी प्रचलित है उसके अनुसार, एक समय ऐसा भी था जब इस धरती पर पान नहीं था. ऐसे समय में हस्तिनापुर पर अपनी विजय के बाद हुए अश्वमेध यज्ञ की समाप्ति पर जब पांडव भाइयों ने पान खाने की इच्छा ज़ाहिर की तब संदेशवाहकों को धरती के भीतर, पाताल में सर्पों के राजा वासुकी के महल में भेजा गया.
नागराज (कुछ कहानियों में उनकी पत्नी) ने अपनी छोटी उंगली के शीर्ष जोड़ वाले भाग को काटकर संदेशवाहकों को दे दिया. यह हिस्सा ऊपर, धरती पर लाकर बोया गया और उसमें से पान की पहली लता उत्पन्न हुई. यही कारण है कि पान के फूल, बौर या बीज नहीं होते. लता या बेल को उसके शीर्ष जोड़ वाले भाग से काट कर बोया जाता है और नई बेल जन्म लेती है. इन्हें नाग-बेल भी कहा जाता है.
नागपंचमी इस समाज के लिए साल का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है. सारंगढ़ में अब बरेज नहीं बचे. किंतु जब तक थे, नागपंचमी के दिन बरई समुदाय के लोग बरेज पर फूल, नारियल आदि का चढ़ावा लेकर जाते और नाग देवता की पूजा करते. उस दिन बरेज में किसी भी पत्ती को हाथ नहीं लगाया जाता था.
बरेज की भूमि में सतत बनी रहती नमी और उसके अंदर की ठंडक और छाया सांपो की उपस्थिति को दावत देती है. पर बरई समाज में मान्यता रही कि उनके समाज को कभी सर्पदंश का सामना नहीं करना पड़ता. वैसे भी एक बरई के लिए बरेज (या बरेजा) किसी पवित्र धार्मिक स्थान से कम नहीं रहा. बिना स्नान किए और बिना स्वच्छ धुले कपड़े पहने किसी के लिए भी बरेज के अंदर प्रवेश निषिद्ध रहता था.
सारंगढ़ में बसने वाले परिवार आमतौर पर थवाईत और ताम्बोली उपनामों से जाने जाते रहे हैं. सारंगढ़ के सबसे बड़े और प्रतिष्ठित पनसारी भी थवाईत ही थे. शुरुआत में पान का उपयोग सीमित था. या तो समाज के उच्च वर्गों (यहां राजा पढ़ें) के विलास की सामग्री के रूप में उपयोग में लाया जाता था या पूजा-सामग्री के रूप में. इसकी उपलब्धता सुनिश्चित करने वाले बरई समाज की पूछ-परख और सम्मान बहुत था.
सारंगढ़ में इस समुदाय को बरेज बनाने के लिए पर्याप्त स्थान दिया गया. बरेज उस कम ऊंचाई की और सपाट छत वाली झोपड़ीनुमा बाड़ी को कहते हैं जिसके अंदर पान की बेलें विकसित होती हैं. (दरअसल ये बाड़ी या ‘बारी’ ही थीं जिन्होंने जीवनयापन के लिए इसका उपयोग करने वालों को ‘बराई’ नाम दिया.) पानी और राज्य संरक्षण मिला. देखते-देखते आकार में नागपुर के पान से छोटे और नरम तथा स्वाद में बंगाल से आने वाले पान की अपेक्षा मीठे और स्वादिष्ट पान का निर्यात सारंगढ़ राज्य की आय का प्रमुख साधन बन गया.
शीतल और शुद्ध पेयजल और स्वादिष्ट पान के साथ आगंतुकों का ‘पायलागी’ कहकर स्वागत करने वाले सारंगढ़ियों ने इसे ‘पान-पानी-पायलागी’ के शहर के नाम से विख्यात कर दिया.
समय बदला. 1951 में सारंगढ़ में पहला हैंडपंप स्थापित हुआ. हैंडपंप और नल के साथ घरों में बन रहे बाथरूमों ने तालाब और घाट से दूरियां पैदा कीं. तालाबों को जोड़ती नालियां पहले पटीं फिर उन पर दुकान और घर निर्मित होने लगे. समाज में पान बनाना और खाना रिवाज का हिस्सा नहीं रहे. खपत में कमी आने से बरेज पहले कम और फिर विलुप्त होने लगे. जीवनयापन के लिए बरई समाज ने अन्य ज़रिए ढूंढ लिए. नागपंचमी का वैभव भी छुईखदान जैसे कुछ स्थानों तक सीमित हो गया.
इसके बावजूद सारंगढ़ के साथ पान-पानी-पायलागी का परिचय आज भी शान से जुड़ा है.
(लेखक इतिहास-प्रेमी हैं, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं.)
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