हवाओं की दस्तक: समाजवाद से कॉरपोरेट दौर तक हिंदी पत्रकारिता का बदलता चेहरा

पुस्तक समीक्षा: हिंदी पत्रकारिता, समाजवाद और बदलते भारत के बीच एक पत्रकार की यह आत्मकथात्मक यात्रा उस दौर की साक्षी है जब अख़बार बिक रहे थे और ईमान भी. ‘हवाओं की दस्तक’ स्मृति, संघर्ष और स्वप्नभंग के बीच लोकतांत्रिक मूल्यों को बचाए रखने की ज़िद की कहानी है.

(साभार: राजकमल प्रकाशन)

एक 

वरिष्ठ पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी अपनी हालिया पुस्तक ‘हवाओं की दस्तक’ में जिस आहट का संकेत कर रहे हैं वे दुनियाभर में आज अपना असर दिखा रही है. यह संस्मरणात्मक पुस्तक झीलों की नगरी उदयपुर में फतहसागर के किनारे बचपन और कैशोर्य व्यतीत करने वाले पत्रकार की वाया जेएनयू, दिल्ली, अरब सागर के तट पर सपनों की नगरी मुंबई को अपना बनाने की कथा है.

एक नए भारत के निर्माण के साझे सपने को सच करने के लिए यह युवा पत्रकारिता, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में सक्रिय होता है. प्रौढ़ होते होते किशोर सपने दरकने लगते हैं. वैयक्तिक सफलताओं के बावजू़द देश और दुनिया का आशा के विपरीत दिशा में बदलते जाना और उससे उपजी निराशा झलकने लगती है.

वे लिखते हैं:

‘गांधी, लोहिया और जयप्रकाश के विचारों की दुनिया से प्रेरित यह हिंदी पत्रकार एक छोटे शहर से देश की राजधानी जाता है और बाद में उससे भी बड़े महानगर में पहुंच जाता है जहां आज़ादी के बाद की हिंदी पत्रकारिता आख़िरी सांसें ले रही है. वहां कॉरपोरेट पत्रकारिता की आहट सुनाई दे रही है.

समाज उस दौर में पहुंच रहा है जहां वो स्मृतिविहीन किया जा रहा है. निजीकरण, वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं बीच ध्रुवीकृत समाज बनने लगा है. बीस वर्ष में देखते-देखते पुरानी दुनिया इतनी तेजी से बदली कि नागरिक अधिकार, मज़दूर आंदोलन और मनुष्य की गरिमा ही नष्ट होती नज़र आने लगी.’

वे आगे लिखते हैं:

शहरी ग़रीबी के सबसे बड़े केंद्र में रहकर अपने जीवनानुभव लिखनेवाले इस हिंदी पत्रकार की सबसे बड़ी त्रासदी यह रही कि उसके सामने ही उसकी स्वप्निल दुनिया उजड़ गई.

साठोत्तरी पीढ़ी के मोहभंग की तुलना में यह स्वप्न-भंग कहीं अधिक गहन और भयानक है, क्योंकि यह परिवर्तन मूल्यगत स्तर पर हो रहा था. सत्ता और जनता के समक्ष ईमान भी बिक रहे थे. विवादास्पद कहे जाने वाले ढांचे के साथ धर्मनिरपेक्षता ढह रही थी. चमकती सड़कें और इमारतें बढ़ रही थीं और ग़रीबी भी, बाहर भी और इंसानों के भीतर भी.

देश बदल रहा था और लोगों की आंखों में देश और दुनिया को लेकर देखे सपने भी बदल रहे थे. लेकिन सपनों को बचाने का संघर्ष भी जारी था.

वे लिखते हैं:

‘बार-बार अपनी दुनिया को नष्ट होते देखने, तेज़ी से बदले समाज के बेदर्द हो जाने की परत-दर-परत कथा, जो थोड़ी आत्म भी है पर समाज की भी है, इसमें राजनीति भी है और यादें भी हैं और एक छोटे शहर से शुरू हुई यात्रा की बयानी भी है.’

दो 

सपने देखने वाला एक किशोर रहता था, झीलों की नगरी में. पिता नंद चतुर्वेदी कवि थे, वह भी समाजवादी. फिर समाजशास्त्र पढ़ा, देश की राजधानी में क्रांतिकारी समझे जाने वाले विश्वविद्यालय में. ‘दा’ यानी नंद चतुर्वेदी और उनकी कविता को अपने परिवेश के साथ देखने के लिए इस किताब का पहला खंड ‘झीलों की हथेली पर सोया शहर’ बड़ा रोचक और प्रामाणिक दस्तावेज़ है.

समाजवादी सपने के साथ मुंबई पहुंचे किशोर ने धर्मवीर भारती के संस्थान में पत्रकारिता सीखी. पूंजीवादी दुनिया से समाजवादी सपने की लड़ाई देश की आज़ादी के संघर्ष के समय से ही चली आ रही थी. पत्रकारिता भी इस लड़ाई का एक मोर्चा था. कोलाबा और कुर्ला, एक ही मुंबई के दो हिस्से, एक स्वप्न, एक दुःस्वप्न. किशोर युवा हुआ. ‘कुर्ला से कोलाबा’ पहुंच गया. वैयक्तिक सपने पूरे हुए, दुनिया बदलने का सामूहिक स्वप्न और दूर चला गया.

‘हवाओं की दस्तक’ किताब के लेखक अनुराग चतुर्वेदी. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

पिछली सदी के अंतिम दशकों में दुनिया बदली. देश भी बदला. इस पत्रकार ने देखा कि ‘मुंबई से लेकर दिल्ली तक सारे शहरों के चेहरे बदल गए. चमकदार शहरों के बीच अंधेरी झोपड़ियां बेबस हो गईं. पत्रकारिता धीरे-धीरे मनोरंजन में बदल गई और मीडिया एक उद्योग में तब्दील हो गया…राजनीति और मनोरंजन एक-से लगने लगे.’

बड़े बड़े समाचार पत्र और पत्रिकाएं कॉरपोरेट के दबाव में बंद हो गईं या अप्रासंगिक हो गईं. ‘एक दशक में वे सब अख़बार बंद हो गए, जो नई भाषा रच जन-संघर्षों को मज़बूती देते थे….. अब बाज़ार की शक्तियां ही समाज की गति तय करने लगीं.’

इस दौरान धर्मनिरपेक्षता का पैरोकार अख़बार सांप्रदायिक शक्तियों के हाथों में चला गया. देश की गंगा-जमुनी तहज़ीब और हिंदू-मुस्लिम भाईचारा देखते-देखते समाप्त होने लगा और इस सबमें कॉरपोरेट पूंजी से नियंत्रित अख़बार उत्साह से योग देने लगे. संपादकीय संस्था अप्रासंगिक हो गई.

देश और दुनिया में आ रहे इन आमूल बदलावों को समझने के लिए धर्मयुग, रविवार और महानगर के संपादकीय विभाग से जुड़े पत्रकार की एक प्रामाणिक इनसाइडर-स्टोरी के रूप में ‘हवाओं की दस्तक’ को पढ़ा जाना चाहिए. पत्रकारिता, राजनीति और फिल्म-जगत् की कई चर्चित हस्तियों के खूबसूरत पोर्ट्रेट इस पुस्तक और रोचक बनाते हैं. पक्ष स्पष्ट है लेखक का, लेकिन किसी व्यक्ति के प्रति कहीं द्वेष या पूर्वाग्रह नहीं है. एक पत्रकार की तटस्थता सर्वत्र है. भाषा में निर्लिप्त सहजता है. फतहसागर से अरब सागर तक, यह एक व्यक्ति की यात्रा नहीं हैं. पूरे देश की यात्रा है.

‘यह कहानी खोने के दर्द से जुड़ी है. धर्मयुग, रविवार और महानगर खो गए. हिंदी की जगह नहीं रही, समाजवाद नहीं रहा…सत्ता अपने क्रूर रूप में प्रकट हुई और देश के नागरिक धर्म और एक व्यक्ति को लेकर सम्बन्ध तोड़ने और जोड़ने लगे.’ यह शोध करना होगा कि क्यों और कैसे  हिंदीभाषी समाज इतना सांप्रदायिक हो गया है.

तीन

‘पैकेज ख़त्म, रिचार्ज करवाइए’ जैसे रोचक प्रसंग ठेठ बिहार की राजनीतिक और पत्रकारीय विवशता को रोचक अंदाज़ में सामने लाते हैं. लेखक आशंकित है, क्या वह निराश भी है?  वह लिखता है, ‘इस यात्रा की मंज़िल अभी भी दिखती नहीं है. तब लगता था समाज को बदलने की कोशिश करेंगे पर अब वह कोशिश कहीं नहीं दिखती – न व्यक्ति में, न समाज में.’

नंद चतुर्वेदी ने कभी लिखा था

युद्धरत रहो
जिसे बदलना है बदलेगा
ये वनस्पतियां जलेंगी नहीं
न यह कृति अनुर्वरा होगी

आज अनुराग लिखते हैं कि ‘हवाओं की दस्तकें जारी हैं, अगर हम इन्हें नहीं पहचानेंगे तो यह यात्रा सार्थक नहीं होगी.’ इस तरह यह यात्रा एक रिले रेस का रूप ले लेती है.

लेखिका राजस्थान विश्वविद्यालय में पढ़ाती हैं.