हाल के वर्षों में नई शिक्षा नीति के तहत लागू की गई भाषा-आधारित नीतियों के कारण कई तरह के विरोधाभास सामने आए हैं. यह दक्षिण बनाम उत्तर का भी विवाद है, जहां हिंदी को बढ़ावा देने का आरोप दक्षिणी राज्य अक्सर लगाते रहे हैं. ऐसे विवादों के बीच भाषा को लेकर औपनिवेशिक काल में हुई बहसों को सामने रखती एक किताब आयी है, युवा अध्येता शुभनीत कौशिक की ‘भाषा की राजनीति, ज्ञान की परम्परा: हिंदी साहित्य सम्मेलन और हिंदी लोकवृत्त (1910-1965).’
इसका महत्त्व यह भी है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में यदि उन महत्वपूर्ण शहरों के नामों की सूची बनाई जाए जहां स्वतंत्रता के विचारों ने अपनी धार पाई, तो उसमें इलाहाबाद शीर्ष पर होगा. इलाहाबाद के बिना स्वतंत्रता आंदोलन की कल्पना भी कठिन है. ठीक वैसे ही हिंदी भाषा, लिपि, व्याकरण, समाज-विज्ञान, विज्ञान और विभिन्न विषयों पर हिंदी लेखन की चर्चा इलाहाबाद स्थित हिंदी साहित्य सम्मेलन और विज्ञान परिषद के बिना अधूरी होगी.
इलाहाबाद का साहित्यिक परिवेश
इलाहाबाद में साहित्यिक और राजनीतिक निर्मितियों के सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक कारणों पर बहुत कम शोधपूर्ण कार्य हुए हैं. आज भी इलाहाबाद के इतिहास को समझने के लिए हमारे पास शोधपरक किताबें कम ही मिलती हैं. इसके इतिहास पर 1936 ई. में प्रकाशित शालिग्राम श्रीवास्तव लिखित ‘प्रयाग प्रदीप’, हेरंब चतुर्वेदी लिखित ‘हिंदी के बहाने’ और सीए बेली की अंग्रेज़ी में लिखी किताब ‘लोकल रूट्स ऑफ इंडियन पॉलिटिक्स: इलाहाबाद, 1880–1920’ ही उपलब्ध हो पाती है. इसमें हेरंब चतुर्वेदी की पुस्तक इलाहाबाद के साहित्यिक परिवेश को समाज विज्ञान के दायरे में लाती है. अब इस फेहरिस्त में शुभनीत कौशिक की पुस्तक जुड़ गई है.
15 अक्टूबर को इलाहाबाद में निराला की पुण्यतिथि पर आयोजित एक सम्मान समारोह में साहित्यकार अब्दुल बिस्मिल्लाह ने कहा कि ‘अंग्रेज इस बात में सफल रहे कि उन्होंने हिंदी को हिंदुओं और उर्दू को मुसलमानों की भाषा बना दिया. विडंबना है कि आजादी के पचहत्तर साल होने पर भी हम यहीं मान रहे हैं.’
इस वक्तव्य के बाद इस किताब की महत्ता और बढ़ जाती कि हिंदी और उर्दू की धार्मिक अस्मिता से जुड़ाव क्या केवल अंग्रेज़ों की देन थी या इसमें भारतीय विद्वानों की भी कोई भूमिका थी? इन दोनों सवालों की पड़ताल बहुत गहन और सारगर्भित रूप से यह किताब करती है.
भारतीय भाषाओं के ‘मानकीकरण’ की प्रक्रिया
इसकी भूमिका में शुभनीत कौशिक ने लिखा है कि ‘उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्ध में ही भारतीय भाषाओं के ‘मानकीकरण’ की प्रक्रिया ने जोर पकड़ा.’ इसमें फोर्ट विलियम कॉलेज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. इसने न सिर्फ भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के द्विभाषी/बहुभाषी शब्दकोश तैयार किए, बल्कि भारतीय भाषाओं के मानक संस्करण भी तैयार किए. इन पुस्तकों का इस्तेमाल कंपनी के अधिकारी को प्रशिक्षित करने में हुआ. धीरे-धीरे यही परिघटना भाषाओं के मानकीकरण का स्त्रोत बन गई.
यहां तक तो अब्दुल बिस्मिल्लाह की बात सही प्रतीत होती है कि भाषाओं को मानकीकरण की प्रक्रिया के जरिए धीरे-धीरे धार्मिक अस्मिता से जोड़कर देखा जाने लगा.
किताब बताती है कि उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में ही हिंदी और उर्दू का संदर्भ महत्वपूर्ण हो उठा. इसमें जहां एक ओर भारतेंदु हरिश्चंद्र, राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद, प्रतापनारायण मिश्र, श्रीधर पाठक, महावीर प्रसाद द्विवेदी जैसे लेखक थे, तो दूसरी ओर मुहम्मद हुसैन आज़ाद, अतलाफ़ हुसैन हाली और शिबली नोमानी जैसे विद्वान थे. नागरी प्रचारिणी सभा और अंजुमन तरक्की-ए-उर्दू जैसे संस्थानों से पहले ही कई संस्थाएं भाषा को लेकर कार्य कर रहीं थीं.
इसके बाद किताब इलाहाबाद में स्थापित हिंदी साहित्य सम्मेलन के माध्यम से इलाहाबाद के राजनीतिक इतिहास के साथ भाषा से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों को सामने रखती है और यह समझने में मदद करती है कि हिंदी और उर्दू के बीच किस प्रकार के विवाद थे. यह विवाद मुख्यतः हिंदी को उर्दू से अलग करने की प्रवृत्ति, शब्दकोषों व व्याकरण, स्कूली पाठ्यक्रम के जरिए भाषा के मानकीकरण और दोनों भाषाओं की स्वायत्तता के प्रश्न से जुड़े विमर्शों पर केंद्रित था.
भाषा और राजनीति के अंतर्संबंध
इसके बाद यह मुख्यतः हिंदी साहित्य सम्मेलन के जरिए इस बहस को आगे बढ़ाती है. इसमें सम्मेलन द्वारा हिंदी के मानकीकरण, शब्दकोष निर्माण, हिंदी को संस्कृतनिष्ठ बनाने की कोशिशों, उसे राष्ट्रभाषा बनाने की बहसों तथा भाषा और राजनीति के अंतर्संबंधों को प्रस्तुत किया गया है.
यह किताब हिंदी साहित्य सम्मेलन के विभिन्न अधिवेशनों के माध्यम से हिंदी के पक्ष में दी गई दलीलों, उर्दू के विरोध और गांधी द्वारा सुझाए गए हिंदुस्तानी भाषा के विचारों को भी देश के विभिन्न हिस्सों में खोजती है.
इसके दूसरे अधिवेशन में ही हिंदी और हिंदू की उत्पत्ति पर अध्यक्षीय भाषण गोविंद नारायण राय ने दिया, जो आगे चलकर गहराता गया. यह विवाद यहां तक पहुंचा कि हिंदी और उर्दू दो अलग-अलग भाषाएं हैं और इनमें कोई समानता नहीं है. गोविंद नारायण ने कहा कि ‘हिंदी और उर्दू को अभिन्न और समान मानना अनुचित है.’
सन् 1922 में लाहौर अधिवेशन में सभापति पंडित जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी ने एक लंबी कविता पढ़ी-
‘हम हैं हिंदी के पुत्र हमारी हिंदी माता,
हिंदी-हिदू-हिंद नाम को निरखो नाता.
हिंदू हिंदी त्यागी बनत जो उर्दू दासा,
सो निज हाथन करत आपहैं अपनो नाशा.’ (पृष्ठ 33)
हालांकि भाषा को धर्म से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति का विरोध भी किया गया, जिसमें मदन मोहन मालवीय और अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ प्रमुख थे. मदन मोहन मालवीय हिंदी नागरी आंदोलन के अग्रणी नेता होने के बावजूद भाषा को धार्मिक अस्मिता से जोड़ने के विरोधी थे. लेकिन जब मदन मोहन मालवीय ने हिंदी, उर्दू और हिंदुस्तानी तीनों को एक ही भाषा कहा, लेकिन फिर भी भाषाओं को धार्मिक अस्मिता से जोड़ने की प्रक्रिया रुकी नहीं.
राष्ट्रीय आंदोलन में गांधी का प्रवेश
जब राष्ट्रीय आंदोलन में गांधी का प्रवेश होता है, वे सुझाव देते हैं कि हमें हिंदी और उर्दू की मिली-जुली भाषा ‘हिंदुस्तानी’ का प्रयोग करना चाहिए. उनके इस प्रस्ताव की हिंदी साहित्य सम्मेलन समेत देश के विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में आलोचना हुई.
लिपि का प्रश्न भी इस किताब में उठाया गया है- सरकारी कार्यालयों में किस लिपि (देवनागरी या फ़ारसी) का प्रयोग किया जाए. जब 1900 में देवनागरी लिपि अदालतों में प्रयोग के लिए स्वीकृत की गई, तब संयुक्त प्रांत के अखबारों और पत्रिकाओं में हुई बहसों का यह पुस्तक विश्लेषण करती है. बहुत जल्द दोनों लिपियों को धर्म से जोड़ दिया गया.
सुभाषचंद्र बोस ने 1938 के हरिपुरा अधिवेशन में अध्यक्षीय भाषण में कहा-
‘हिंदी और उर्दू के बीच का अंतर एक बनावटी मामला है. हिंदुस्तान के लिए सबसे नैसर्गिक राष्ट्रभाषा इन्हीं दोनों (हिंदी और उर्दू) भाषाओं का सम्मिश्रण होगी, जिसे देश के अधिकांश हिस्सों में रोजमर्रा के जीवन में लोग बरतते हैं. इस साझी भाषा को नागरी या उर्दू, दोनों लिपियों में लिखा जा सकता है.’ (पृष्ठ 57)
लेकिन दोनों ही तरफ़ के लेखकों व पत्र-पत्रिकाओं ने कांग्रेस नेताओं और गांधी के ‘हिंदुस्तानी’ प्रस्ताव का विरोध किया. गांधी द्वारा स्थापित ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति’ और हिंदी साहित्य सम्मेलन की नीतियों में अंतर इतना बढ़ गया कि गांधी ने स्वयं को सम्मेलन से अलग कर लिया. इसका मुख्य कारण भाषाओं को धार्मिक अस्मिता से जोड़कर देखना था.
‘हिंदुस्तानी क्या है?’
ऑल इंडिया रेडियो पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों पर भी भाषा का सवाल मंडराता रहा. जब दिल्ली और लाहौर के स्टेशनों से ‘हिंदुस्तानी’ में प्रसारण शुरू हुआ, तो हिंदी समर्थकों ने इसका विरोध किया. एक बार ‘हिंदुस्तानी क्या है?’ विषय पर विद्वानों को आमंत्रित किया गया. इसमें राजेंद्र प्रसाद, अबुल कलाम आज़ाद, जाकिर हुसैन, ताराचंद, अब्दुल हक़ और आचार्य नरेंद्र देव जैसे लोग शामिल थे. इसे पेशावर, लाहौर, दिल्ली, लखनऊ और कलकत्ता के रेडियो स्टेशनों से प्रसारित किया गया.
इस पुस्तक का सबसे महत्वपूर्ण भाग हिंदी भाषा की निर्मितियों को लेकर हुई बहसों का विश्लेषण है. इन बहसों में भारतीय राष्ट्र की परिकल्पना के संकेत दिखाई देते हैं. आखिरकार भाषा द्विराष्ट्र सिद्धांत के बनने में सहायक हुई.
यह पुस्तक यह भी बताती है कि भारत में हिंदी में इतिहास, भूगोल, गणित, विज्ञान और अन्य विषयों पर लेखन का इतिहास कैसे विकसित हुआ.
इलाहाबाद में स्थापित विज्ञान परिषद के जरिए विज्ञान को आमजन तक हिंदी भाषा में पहुंचाने के प्रयासों का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है. ‘विज्ञान’ पत्रिका की भूमिका, उसकी स्थापना, संस्थापक सदस्य, संपादक, प्रकाशित लेखों की प्रकृति और समकालीन प्रतिक्रिया का विस्तृत वर्णन मिलता है. औपनिवेशिक विज्ञान की सीमाएं थीं और भारतीय विज्ञान लेखकों ने इसमें हस्तक्षेप किया. आरंभिक विज्ञान-लेखन पर औपनिवेशिक प्रभाव था, जो धीरे-धीरे कम हुआ.
हिंदी में विज्ञान लेखन में आने वाली कठिनाइयों और उनके समाधान के प्रयासों, जैसे समितियों व परिषदों का गठन, तकनीकी शब्दावली निर्माण, विज्ञान शब्दकोश तैयार करने के दौरान भी भाषा का प्रश्न सामने आया.
हिंदी में इतिहास-लेखन की चुनौतियां
कुछ इतिहासकार मानते थे कि भारत में इतिहास-बोध नहीं था, वहीं दूसरी ओर एक वर्ग यह दावा करता रहा कि भारत में वे सभी तत्व पहले से मौजूद थे जो यूरोप में औद्योगिक क्रांति के दौरान विकसित हुए. यह विचारधारा इस मान्यता को भी जन्म देती रही कि भारत के वेदों में समस्त विज्ञान निहित है. यह पुस्तक उस धारणा को खंडित करती है कि भारतीय इतिहासकारों में इतिहास-बोध की कमी थी.
पुस्तक दिखाती है कि औपनिवेशिक काल के इतिहास-लेखन में धार्मिक दृष्टि का गहरा प्रभाव था. जैसे सर सैयद अहमद खान ने राजा शिवप्रसाद द्वारा मुगल काल को हिंसा और दमन का काल कहे जाने की आलोचना की. यह किताब काशी प्रसाद जायसवाल, वासुदेव शरण अग्रवाल और राहुल सांकृत्यायन द्वारा हिंदी में किए गए इतिहास-लेखन और उनकी वैचारिक प्रतिबद्धता का विश्लेषण करती है.
विज्ञान परिषद के दो सभापति – पंडित जगन्नाथ प्रसाद शुक्ल और कविराज प्रताप सिंह – वेदों को ज्ञान-विज्ञान का स्रोत मानते थे. वे यहां तक कहते थे कि ‘महाभारत में संजय द्वारा युद्ध का आँखों देखा हाल सुनाना रेडियो के आविष्कार से जुड़ता है.’
अंततः, यह पुस्तक साहित्यकार अब्दुल बिस्मिल्लाह के उस सवाल का जवाब देती है कि भाषाओं से धर्म को जोड़ने के सिर्फ़ औपनिवेशिक शासन नहीं जिम्मेदार था. हां, उसने उसकी पूर्वपीठिका जरूर तैयार की, लेकिन उसे बढ़ावा देने में भारतीय जनमानस की भी भूमिका महत्वपूर्ण थी.
यह इलाहाबाद के राजनीतिक और साहित्यिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्ययन है. आज जब भाषागत विवाद फिर से प्रखर हो रहे हैं, स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भाषाई अंतर्विरोधों को समझने के लिए यह पुस्तक आवश्यक है.
(लेखक इलाहाबाद स्थित जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान में शोध छात्र हैं.)
