पटना: बिहार विधानसभा चुनाव में भाकपा (माले) की एकमात्र महिला प्रत्याशी दिव्या गौतम के राजनीति में प्रवेश की दिलचस्प कहानी है. कई बरस पहले जब दिव्या पटना में ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ा करती थीं, वह अक्सर सिन्हा लाइब्रेरी में पढ़ने जाती थीं. एक दिन पुस्तकालय किसी वजह से बंद था. ‘पुस्तकालय बंद था और उसके सामने ‘प्रतिरोध का सिनेमा’ नामक फिल्म फेस्टिवल चल रहा था,’ वह कहती हैं.
वह फिल्म देखने चली गईं. दिव्या के जीवन पर इन फिल्मों ने गहरा प्रभाव डाला. ये मसाला हिंदी फिल्में नहीं, ईरानी और कोरियन सिनेमा था. इस तरह सुशांत सिंह राजपूत की बहन को ‘प्रतिरोध के सिनेमा’ ने प्रेरणा दी. इन फिल्मों ने उनका जीवन बदल दिया.
जल्द ही दिव्या ने पटना कॉलेज में दाखिला ले लिया और छात्र आंदोलनों में भाग लेने लगीं. उस दिन से जो यात्रा शुरू हुई, वह आज विधानसभा चुनाव के प्रचार का रूप ले चुकी है.
चौंतीस वर्षीय दिव्या पटना ज़िले की दीघा विधानसभा सीट से लड़ रही हैं. इस विधानसभा सीट से 2020 में भाकपा माले के टिकट पर शशि यादव मैदान में थी. फिलहाल, वे बिहार विधानसभा परिषद की सदस्य हैं.
सवेरे के लगभग आठ बजे है. पटना मरीन ड्राइव जाने वाले अटल पथ के नीचे मछली मंडी के पास भाकपा माले और राजद के कार्यकर्ता बैठे हैं. वे अपने प्रत्याशी का इंतजार कर रहे हैं. छठ पर्व संपन्न होने के बाद चुनावी सरगर्मी तेज हो गई है. कुछ ही समय बाद महागठबंधन समर्थित भाकपा माले की उम्मीदवार की प्रत्याशी दिव्या गौतम समर्थकों की टोली के साथ पास के मोहल्ले में निकल जाती हैं.
मेगाफोन के जरिये कार्यकर्ता दिव्या गौतम जिंदाबाद के नारे लगाते हैं. दिव्या अपने पर्चे लोगों को देते हुए दीघा विधानसभा में बदलाव की अपील करती है.
सामान्य परिवार की कहानी
दिव्या के परिवार में किसी का कम्युनिस्ट विचारों से कोई वास्ता नहीं था. वे कहती हैं, ‘आरंभ में मेरे घर में कम्युनिस्ट विचारधारा वगैरह से किसी का कोई जुड़ाव नहीं था. इस विचार के प्रति किताबों ने आकर्षित किया.’
दिव्या गौतम का परिवार मूलतः खगड़िया जिले के बोरने गांव का निवासी है. इस गांव में उनके पिता भूपेंद्र सिंह का जन्म हुआ था. उनकी शादी के बाद पूरा परिवार सहरसा आ गया. दिव्या का जन्म सहरसा में ही हुआ. वहीं उनकी प्राथमिक पढ़ाई-लिखाई भी हुई. भूपेंद्र सिंह सिविल इंजीनियर थे. उनकी पोस्टिंग राज्य के विभिन्न कोनों में होती रहती थी.
जब दिव्या दस साल की हुईं, तो पढ़ाई के लिए उनकी बुआ अपने साथ पटना ले आईं. दिवंगत अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मां उषा सिंह दिव्या की बुआ थीं. कुछ समय बाद दिव्या की मां ललिता सिंह अपनी दोनों छोटी बेटियों- भव्या और प्रेरणा, को लेकर पटना आ गईं. उस वक्त डर लगा रहता था कि गांव की महिला पटना में अपने तीन बच्चों को कैसे संभाल पाएगी.
स्कूल के बाद दिव्या ने पटना कॉलेज में दाखिला ले लिया और फिर छात्र संगठन आइसा का दामन थाम लिया. कुछ समय बाद छात्र संघ चुनाव के लिए आइसा ने उन्हें प्रेसिडेंशियल उम्मीदवार बना दिया. 2012 दिसंबर में हुए चुनाव में वे मामूली अंतर से हार गईं. इसी दौरान दिल्ली में निर्भया कांड हुआ. जस्टिस वर्मा कमिटी की अनुशंसा को लागू करने के लिए कॉलेज में सांस्कृतिक मोर्चा बना. उन्होंने सांस्कृतिक संस्था हिरावल के साथ नाटक करना आरंभ किया. इस तरह थियेटर की दुनिया में आ गईं.

छात्र आंदोलन ने दिव्या गौतम को लगभग जकड़ लिया था. वे पटना और आंदोलनों से दूर नहीं होना चाहती थी. लेकिन मां ने समझाया कि राजनीति में आने के पहले पैरों पर खड़े हो जाओ.
फिर दिव्या ने हैदराबाद स्थित टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस के वीमेन स्टडीज में दाखिला ले लिया. यहां उन्होंने जेंडर और जाति की संरचना को गहराई से समझा. कुछ दिनों बाद जब हैदराबाद में रोहित वेमुला की आत्महत्या को लेकर उबाल आया, दिव्या ने उस आंदोलन में भी भागीदारी की.
इस बीच उन्होंने नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता का कोर्स किया और 2016 में झारखंड में उनकी नौकरी लगी. अभी नौकरी में एक साल पूरा हुआ थ कि मां का देहांत हो गया.
‘मेरी मां ने कहा था मेरे निधन पर तुम ही दाह संस्कार करना. हिंदू समाज में लड़कियों को ऐसा करने की इजाजत नहीं है. लेकिन मैंने यह किया.’ यह कहते हुए यह कहते हुए दिव्या फफक पड़ती हैं.
दिव्या नौकरी से इस्तीफा देकर घर लौट आईं और परिवार की देखभाल करने लगीं.
इन दिनों वे बिट्स पिलानी से पीएचडी कर रही थीं कि भाकपा (माले) की ओर से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव आया.
यह पूछे जाने पर कि चुनावी प्रत्याशी महिला और सामान्य महिला का जीवन कितना भिन्न है, वे कहती हैं, ‘अभी तो घूमते हुए लोग स्नेह से अपना वॉशरूम का उपयोग करने देते हैं. लेकिन सामान्य तौर पर ऐसा नहीं होता है. पब्लिक स्पेस में कोई वॉशरूम नहीं है. सड़क पर समान बेचने वाली महिला कहां जाती होंगी.’
वे मानती हैं कि चुनावी राजनीति, राजनीतिक एक्टिविज्म से बहुत अलग है.
भाकपा माले प्रत्याशी का प्रचार अभियान दीघा चौहटा पहुंचता है. दिव्या गौतम मेगाफोन के जरिये एक नुक्कड़ सभा को संबोधित करती है. वह रोजगार की समस्या, पलायन और अवैध निर्माण पर बात करती है.
भाकपा माले की अकेली स्त्री प्रत्याशी
101 सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ रही है और उसने 12 महिला उम्मीदवार उतारे हैं. जदयू ने कुल 13 महिलाओं को टिकट दिए हैं. भाकपा (माले) 20 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, इसमें से मात्र एक सीट पर महिला उम्मीदवार है. राजद ने 143 उम्मीदवारों की लिस्ट में कुल 24 महिलाओं को टिकट दिया है.
दिव्या गौतम को स्थानीय भाजपा विधायक संजीव चौरसिया से कड़ा मुकाबला मिल रहा है. संजीव पिछले दो चुनाव दीघा से लगातार जीते हैं.
रितेश रंजन सिंह उर्फ बिट्टू सिंह, जो पटना में मेयर पद का चुनाव लड़ चुके हैं, जनसुराज पार्टी के दीघा सीट से उम्मीदवार हैं. इस सीट पर राइट टू रिकॉल नामक पार्टी भी चुनाव लड़ रही है, जिसके उम्मीदवार प्रभाकर कुमार सिंह है.
दीघा विधानसभा क्षेत्र 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आया. 2010 में इस सीट पर पहली बार चुनाव हुआ. यह पटना साहिब लोकसभा सीट के अंतर्गत आती है. 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की तरफ से जदयू की पूनम देवी चुनाव जीती थीं.
भाजपा से अलग होने के बाद जदयू ने वर्ष 2015 में राजीव रंजन प्रसाद को मैदान में उतारा था. जदयू के साथ राजद और कांग्रेस का गठबंधन था. भाजपा ने संजीव चौरसिया को मैदान में उतारा. भाजपा उम्मीदवार ने कुल पड़े वोटों का 51.02 प्रतिशत हासिल कर जीत हासिल की. 2020 में भाजपा ने संजीव चौरसिया को लगातार दूसरी बार इस सीट से चुनावी मैदान में उतारा. इस बार उनके सामने महागठबंधन समर्थित भाकपा माले की उम्मीदवार शशि यादव मैदान में थी. संजीव चौरसिया को 97,044 वोट मिले जबकि शशि यादव को 50,971.
गौर करें, इस क्षेत्र में मतदान का प्रतिशत कम होता गया है. 2015 के विधानसभा चुनावों में मतदान प्रतिशत 42.17% था, जो 2019 में घटकर 38.76% और 2020 में मात्र 37% रह गया.
मतदाताओं की संख्या से दीघा विधानसभा सीट को बिहार का सबसे बड़ा निर्वाचन क्षेत्र माना जाता है. वर्ष 2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में यहां 4,60,868 पंजीकृत मतदाता थे. 2024 में यह संख्या बढ़कर 4,73,108 हो गई.
दीघा विधानसभा पटना का शहरी क्षेत्र है. इस सीट पर कुल मतदाताओं का लगभग पौने दो प्रतिशत ही ग्रामीण मतदाता है. इस विधानसभा सीट पर कुल 11 प्रत्याशी चुनावी मैदान में है. यहां पहले चरण में मतदान होना है.
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
