असेबलिंग इंडियाज़ कॉन्स्टिट्यूशन: एक सामूहिक स्वप्न को अभिव्यक्ति देता संविधान

पुस्तक समीक्षा: ऑर्नित शानी और रोहित डे की किताब स्थापित करती है कि संविधान कोई क़ानूनी दस्तावेज़ भर नहीं, बल्कि जनता की कल्पना और संघर्ष का जीवित इतिहास है. यह इतिहास याद दिलाता है कि संविधान सभा के बाहर भी एक और असेंबली है, जो कभी विरोध के नारे के रूप में, कभी किसी विश्वविद्यालय की दीवार पर लिखी इबारत में, तो कभी संविधान की प्रस्तावना दोहराती भीड़ में, जारी है.

(फोटो साभार: सोशल मीडिया)

काग़ज़ पर जो लिखा गया, वो हुक्म नहीं, वादा था,
जनता की सांसों में जो बसा, वही असल इरादा था.
संविधान यूं नहीं उतरा किसी किताब से,
वो उठा था भूख, दर्द और उम्मीदों के ज़वाब से.

भारत का संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि वह एक सामूहिक स्वप्न है जो उपनिवेशवादी दमन, सामाजिक अन्याय और जातिगत विषमता के बीच आकार लेता है. ऑर्नित शानी और रोहित डे की किताब ‘असेबलिंग इंडियाज़ कॉन्स्टिट्यूशन: ए न्यू डेमोक्रेटिक हिस्ट्री’ इसी बिंदु पर भारतीय संवैधानिक इतिहास को एक नया दृष्टिकोण प्रदान करती है.

यह किताब बताती है कि संविधान का निर्माण केवल संविधान सभा में नहीं हुआ बल्कि यह उन असंख्य भारतीय जनसमूहों के बीच जन्मा जिन्होंने अपने पत्रों, प्रस्तावों, जुलूसों और अपने सपनों के माध्यम से संविधान को संगठित किया. यह किताब भारतीय संवैधानिक इतिहास के उस प्रचलित आख्यान को उलट देती है जिसे ग्रेनविल ऑस्टिन ने छह दशकों पहले स्थापित किया था.

ऑस्टिन ने संविधान को एक ‘अभिजातीय सहमति’ बताया था. ऑस्टिन की पहली किताब द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन: कॉर्नरस्टोन ऑफ़ अ नेशन(1966) भारतीय संविधान को एक नैतिक दस्तावेज़ के रूप में प्रस्तुत करती है जो सामाजिक क्रांति, लोकतंत्र और राष्ट्रीय एकता को जोड़ने वाली एक ‘आधारशिला’ है. इस दृष्टि में संविधान एक ‘समाप्त’ पाठ तथा एक तयशुदा रूपरेखा है जिसके बाद राष्ट्र अपनी यात्रा शुरू करता है.

उनकी दूसरी किताब वर्किंग ए डेमोक्रेटिक कॉन्स्टिट्यूशन: ए हिस्ट्री ऑफ द इंडियन एक्सपीरियंस (1999) इस दृष्टि का विस्तार है, जहां ऑस्टिन दिखाते हैं कि कैसे संविधान ने दशकों तक भारतीय लोकतंत्र को संस्थागत स्थायित्व दिया. दोनों पुस्तकों में संविधान एक ऐसी प्राप्त उपलब्धि है जो अनुशासित व्यवस्था के माध्यम से भारत की विविधताओं को एकता में बांधती है.

आकांक्षाओं और कल्पनाओं का सृजन 

डे और शानी की नई किताब इस परंपरा के विपरीत है. वे संविधान को किसी स्थिर दस्तावेज़ की तरह नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रक्रिया के रूप में देखते हैं. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो संविधान सभा से बाहर, गांवों, कस्बों, संघटनों, महिला समूहों और जातीय संगठनों में घट रही थी.

मसलन, कोई आदिवासी समुदाय अपने प्रतिनिधित्व की मांग कर रहा था, कोई महिला संगठन समान अधिकारों की बात कर रहा था, तो कोई दलित संगठन जाति-व्यवस्था के अंत की मांग कर रहा था और कहीं बच्चों के अधिकारों की एक पूरी फेहरिस्त दिल्ली तक पहुंचाई जा रही थी. जिसके माध्यम से किताब यह दावा करती है कि यह संविधान ‘बनाया’ नहीं गया, बल्कि जनता के संघर्षों, आकांक्षाओं और कल्पनाओं से ‘गठित’ हुआ.

इसी प्रक्रिया ने लोकतांत्रिक आंकक्षाओं के साथ साथ आशा की राजनीति को जन्म दिया. और उन दावों को खारिज कर दिया जहां अब तक यह माना जाता रहा है कि संविधान सभा में जनता की भागेदारी लगभग शून्य थी और संविधान के सूक्ष्म विवरण भारतीय जनता की कल्पना, रुचि और क्षमता के परे थे. ‘अधिकांश भारतीयों को यह तक पता ही नहीं था कि उन्हें वास्तव में क्या मिला.’

इसके विपरीत किताब यह प्रमाणित करती हैं कि अनेक भारतीय ये अच्छी तरह जानते थे कि संविधान के द्वारा ही वे परिवर्तनकारी सामाजिक व्यवस्था तथा अपनी आकांक्षाओं को सांगठनिक आकार दे सकते हैं, जिसके लिए उन्होंने संविधान को अपनी भाषाओं में अनूदित किया, संविधान सभा को चुनौती दी और नए विचार प्रस्तुत किए.

उन्होंने संविधान सभा की समितियों के सदस्यों को पत्र लिखे, उन्हें आगाह किया और केवल औपचारिक उत्तरों से संतुष्ट न होकर वे दिल्ली तक प्रतिनिधिमंडल भेजते रहे, रैलियां आयोजित करते रहे, और अपनी आवाज़ को अधिक प्रभावशाली ढंग से सुनाने के लिए निरंतर सक्रिय रहे.

लेकिन इस वैकल्पिक व्याख्या के भीतर एक तरह की अतिशय आशा भी छिपी है. डे और शानी यह मान लेते हैं कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया में जनता की भागीदारी सर्वव्यापक और समान थी. फिर भी जनसहभागिता की यह तस्वीर उस समय की जातिगत और लैंगिक असमानताओं को उतनी गहराई से नहीं पकड़ पाती, जितनी ज़रूरत थी.

वंचितों, स्त्रियों, आदिवासियों या निम्नवर्गीय श्रमिक समुदायों की भागीदारी को किताब में प्रतीकात्मक रूप में ही देखा गया है, न कि संरचनात्मक रूप में. इसके विपरीत, ऑस्टिन की सीमाएं भले ही उनके औपनिवेशिक दृष्टिकोण में हों, जहां जनता की भूमिका कमज़ोर और नेताओं की छवि नैतिक होती है.

लेकिन उनकी विश्लेषणात्मक ठोसपन से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान की सफलता केवल जनता के जोश से नहीं, बल्कि संस्थागत अनुशासन से भी सुनिश्चित हुई. डे और शानी इस संस्थागत परिप्रेक्ष्य को कुछ हद तक ‘अभिजातीय’ कहकर खारिज कर देते हैं, जिससे संविधान के प्रशासनिक पक्ष पर चर्चा लगभग अनुपस्थित हो जाती है.

आधुनिकता और परंपरा का द्वंद्व 

इस किताब का एक सबसे मार्मिक अध्याय रूढ़िवादी हिंदू समूहों के उस प्रतिरोध को उजागर करता है जो लोकतंत्र और गणराज्य की धारणा के खिलाफ़ थे. द्वारका के शंकराचार्य द्वारा संविधान को ‘धर्मराज्य’ और ‘रामराज्य’ के आदर्शों पर आधारित करने की मांग इस बात का प्रतीक है कि संविधान निर्माण के दौरान केवल आधुनिकता की आवाज़ें नहीं थीं, बल्कि परंपरा की सत्ता भी उतनी ही मुखर थी.

ऑल इंडिया धर्म संघ ने तो 1944 में एक ऐसा संविधान मसौदा तैयार किया था जिसमें लोकतांत्रिक मताधिकार की जगह धार्मिक परिषदों की सलाह को सर्वोच्च बताया गया था. डे और शानी इस संघर्ष को तीव्रता से उजागर करते हैं, लेकिन उसके सामाजिक आयाम जैसे कि ये धार्मिक आग्रह किस वर्गीय और जातीय हितों की रक्षा कर रहे थे उस पर उनकी पकड़ थोड़ी ढीली पड़ती है?

डे और शानी की किताब का सबसे सत्याग्रही पहलू भी यही है कि वे संविधान को ‘असेंबलिंग’ अर्थात् जोड़ने की प्रक्रिया के रूप में देखते हैं. यह विचार ऐतिहासिक रूप से गहरी अंतर्दृष्टि देता है. वे दिखाते हैं कि मतदाता सूचियों का निर्माण, नागरिकता की परिभाषा और स्थानीय निकायों में प्रतिनिधित्व जैसे प्रश्न संविधान निर्माण से पहले ही जनता के जीवन का हिस्सा बन चुके थे.

यह दृष्टिकोण संविधान को एक स्थिर ग्रंथ से एक जीवंत समाज में बदल देता है. परंतु इस किताब की यह जीवंतता कभी-कभी रोमांटिकता का रूप ले लेती है. किताब जनता की आवाज़ को इतना व्यापक रूप में देखना चाहती है कि वे सत्ता के विरुद्ध उस आवाज़ के दमन, विघटन या पुनःअधिग्रहण को पर्याप्त रूप से नहीं पहचानते.

आज के भारत में, जब वही संविधान बहुसंख्यक राजनीति की व्याख्याओं में उलझा हुआ है, तब यह प्रश्न और गहरा हो जाता है कि क्या जनता की वह ‘असेंबलिंग शक्ति’ अब भी वैसी ही जीवित है जैसा किताब उन्हे चित्रित करना चाहती हैं?

संवैधानिक चेतना का सामाजिक मंथन 

इस किताब का सबसे दिलचस्प हिस्सा यह है कि संविधान कोई ‘उपहार’ नहीं था, बल्कि एक साझा सामाजिक मंथन का परिणाम था. मई 1947 में बालकन जी बाड़ी द्वारा आयोजित बाल कल्याण सम्मेलन इस दिशा में सबसे बड़ा उदाहरण है, जो भारतीय बाल अधिकार घोषणापत्र (Charter of Indian Children’s Rights) के माध्यम से संविधान बनने से पहले ही उसके अर्थों पर सक्रिय बहस कर रहा था.

इस दस्तावेज़ ने बच्चों को केवल ‘भविष्य के नागरिक’ नहीं, बल्कि ‘वर्तमान में अधिकारों के धारक’ के रूप में स्थापित किया. यह विचार उस समय के वैश्विक विमर्श से बहुत आगे था. जबकि यूरोप और अमेरिका में बाल अधिकारों पर चर्चा अभी आरंभिक स्तर पर थी, भारत के नागरिक बच्चे अपने अधिकारों के रूपरेखा खुद तय कर रहे थे.

घोषणापत्र में जाति, धर्म, लिंग और वर्ग से परे जाकर हर बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, आश्रय और खेल के अधिकार दिए गए थे जो संविधान के अनुच्छेद 21 और 45 के भावी आधार बने.

लेकिन जब हम इस ऐतिहासिक पहल को वर्तमान भारतीय लोकतंत्र की वास्तविकता से जोड़कर देखते हैं, तो एक गहरी विडंबना उभरती है. वह संवैधानिक चेतना जो समाज के निचले तबकों से फूट पड़ी थी, आज उन्हीं तबकों के बीच सबसे अधिक हाशिए पर है.

बालकन जी के घोषणापत्र ने जिस भयमुक्त घर, पर्याप्त पोषण और शिक्षा की बात की थी, वह आज भी भारत के करोड़ों बच्चों के लिए अधूरी आकांक्षा बनी हुई है.

बच्चों के अधिकारों का संवैधानिक वादा और कल्याण योजनाएं

बच्चों के अधिकारों का संवैधानिक वादा अब कल्याण योजनाओं की प्रशासनिक फाइलों में सीमित है, जहां ‘जन-चेतना’ की जगह ‘नीतिगत भाषा’ ने ले ली है.

किताब जिस ‘जननिर्मित संविधान’ की बात करती हैं, वह आज के भारत में नौकरशाही, पूंजी और राजनीति के गठजोड़ के बीच कहीं खोता हुआ प्रतीत होता है. संविधान अब एक जीवित सामाजिक दस्तावेज़ के बजाय एक औपचारिक अनुष्ठान में बदलने लगा है.

जहां अधिकारों की जगह ‘कर्तव्यों’ पर ज़ोर दिया जाता है, और असहमति को ‘अवांछनीय’ बताया जाता है. जिस ‘बाल अधिकार घोषणापत्र’ ने राज्य को उत्तरदायी और जनता को संवैधानिक बनाया था, उसी राज्य की आज की नौकरशाही संवैधानिक जवाबदेही से लगातार दूर जा रही है.

इस विडंबना को समझने के लिए यह याद रखना ज़रूरी है कि संविधान निर्माण का जनपक्ष कोई बीती हुई कहानी नहीं, बल्कि एक राजनीतिक उत्तरदायित्व है, जो हर पीढ़ी को निभाना होता है.

इस प्रकार, यह किताब हमें न केवल अतीत की संवैधानिक चेतना से परिचित कराती है, बल्कि यह प्रश्न भी उठाती है कि क्या आज का भारत उस चेतना के प्रति ईमानदार है? जब बच्चे कुपोषण, हिंसा और श्रम में फंसे हैं, तो क्या संविधान का वह जीवित स्वप्न अब केवल किताबों और अदालतों तक सीमित हो गया है?

संविधान कोई क़ानूनी दस्तावेज़ भर नहीं, बल्कि जनता की कल्पना और संघर्ष का जीवित इतिहास है. यह इतिहास हमें याद दिलाता है कि संविधान सभा के बाहर भी एक और असेंबली हैं. यह वही असेंबली है जो आज भी किसी न किसी रूप में जारी है, कभी विरोध के नारे में, कभी किसी विश्वविद्यालय की दीवार पर लिखी इबारत में, तो कभी संविधान की प्रस्तावना को दोहराती भीड़ में.

भारतीय संविधान को प्रायः एक ‘फाउंडिंग मॉन्यूमेंट’ के रूप में देखा जाता है. जैसे वह किसी एक समय और स्थान पर घटित एक अद्वितीय घटना हो. परंतु डे और शानी इस दृष्टिकोण को चुनौती देते हुए बताते हैं कि संविधान किसी मॉन्यूमेंट की तरह स्थिर नहीं, बल्कि एक ‘मूवमेंट’ की तरह जीवंत हैं जो इस किताब को संविधान का जनवादी लोकतांत्रिक अभ्यासके रूप में स्थापित करती हैं.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं)