आज़ादी के बाद के छत्तीसगढ़ का राजनीतिक नक्शा वैसा नहीं था जैसा आज दिखता है. अंग्रेज़ों के द्वारा प्रशासित इलाके में मात्र तीन ज़िले हुआ करते थे. राजाओं वाले इलाक़े के भारत में विलय के बाद 1 जनवरी 1948 से एक नई प्रशासनिक व्यवस्था उभरी. कुछ छोटे राज्यों (रियासतों) के समूह बनाकर उन्हें ज़िले का दर्जा दिया गया. बस्तर और सरगुजा जैसे कुछ और बड़े ज़िले अस्तित्व में आए. सारंगढ़ के अलावा रायगढ़, सक्ती, धर्मजयगढ़ तथा जशपुर राज्यों के विलय से नया रायगढ़ ज़िला बना. ज़िले के दक्षिणी छोर से उत्तरी छोर की दूरी हरियाणा राज्य पार कराने के लिए पर्याप्त थी.
विलय बेशक एक जनवरी 1948 की मध्यरात्रि को रिकॉर्ड में दर्ज हुआ मगर यह एक लंबी चली प्रक्रिया थी. इलाक़े के प्रशासनिक इतिहास का अल्प चर्चित पहलू है कि यहां स्वतंत्र राज्यों (रियासतों) के भारत में विलयीकरण के लगभग दो वर्ष पूर्व अंग्रेज़ों की पहल पर कुछ ऐसा हुआ था जिसने अनजाने ही आज़ादी के बाद इन राज्यों के भारत में विलय के लिए ज़मीन तैयार करना शुरू कर दिया था. यह सब करते समय विलय की स्थिति या संभावना सामने नहीं थी. अंग्रेज़ों के लिए ऐसा करने के कारण दूसरे थे.
उन्हीं दिनों समाप्त हुए दूसरे विश्वयुद्ध ने अंग्रेज़ों को जो सबक सिखाया था उसमें एक पाठ युद्ध की स्थिति में देश के भीतर शांति के साथ-साथ आपसी सामाजिक सौहार्द और सहयोग की अनिवार्यता का था. एक पाठ आवागमन और यातायात के नेटवर्क के महत्त्व पर भी था. रेल लाइन और इसके ज़रिए होने वाले वाणिज्य का महत्व भी रेखांकित हुआ था.
विश्वयुद्ध की समाप्ति पर इन राज्यों के बीच प्रशासनिक समन्वय बनाने की अनौपचारिक प्रक्रिया शुरू हो गई थी. आपसी सहयोग के लिए मुद्दों की कमी नहीं थी. जैसे, रायगढ़ और सारंगढ़ राज्यों के पास अपने अपने नदी-तटों तक सड़कें थीं. गर्मी के दिनों में नदियों पर कच्चा पुल बनाना संभव था पर कौन बनाये और कौन रखरखाव करे इसका फैसला कोई थर्ड एम्पायर ही कर सकता था. बाढ़ से दोनों तट प्रभावित होते थे लेकिन कई स्थानों पर दोनों तट अलग-अलग राज्यों के थे.
सबसे प्रमुख मुद्दा रेल तक पहुंच का था. आसपास के सभी राज्यों के लिए रायगढ़ इकलौता रेलवे स्टेशन था. राज्यों का सारा आयात निर्यात यहीं से होता था. यह बुरी तरह प्रभावित हुआ था. इसमें हैदराबाद के नवाब की रसोई के लिए जाने वाला सारंगढ़ का चावल भी शामिल था. पटसन (जूट) गन्ना और गुड़ के अलावा हर्रा, चिरौंजी और बेहरा जैसी वनोपज का व्यापार भी शामिल था.
सवारियों के रूप में आमतौर पर राजा ही रेल का उपयोग करते थे. वह भी एक समस्या तो थी ही. सारंगढ़ के उदाहरण से समझें. उन दिनों राजा कहीं जाते तो साथ में सहायकों की फौज होती थी. इनमें व्यक्तिगत स्टाफ के अलावा रसोईया, धोबी, हज्जाम, जैसे तमाम लोगों के अलावा राशन पानी लादे बैलगाड़ियां रायगढ़ पहुंचती थीं. कार की सुविधा केवल राजा जवाहिर सिंह के पास थी. रेल के शुरुआती दिनों में आते-जाते रायगढ़ में उनके तंबू उस स्थान पर तनते जहां आजकल चक्रधर नगर है.
यह सब रायगढ़ के राजा चक्रधर सिंह के सौजन्य से होता था. 1929 में स्थिति बदल गई. उस वर्ष राजा जवाहिर सिंह की बेटी बसंतमाला का विवाह राजा चक्रधर सिंह के साथ हुआ. अब बेटी के घर राजा जवाहिर सिंह रायगढ़ का आतिथ्य नहीं ले सकते थे. सो उन्होंने रेलवे स्टेशन के पास लगभग बीस एकड़ भूमि ख़रीदी. वहीं उनके तंबू गड़ने लगे. गाहे-बगाहे सारंगढ़ से कोई सफ़र करता को इसी भूमि का इस्तेमाल करता. अब इस भूमि पर गोपी सिनेमा हॉल और अन्य भवन हैं.
इसी तरह के मुद्दों को लेकर समय समय पर इन राज्यों के दीवानों की बैठकें होने लगीं थीं. दीवान अपने राज्य के प्रधानमंत्री की तरह मुख्य प्रशासनिक अधिकारी हुआ करते थे. उन दिनों रामदास नायक सारंगढ़ राज्य में दीवान थे. उनके बड़े पुत्र रमाप्रसन्न नायक सारंगढ़ से इंग्लैंड जाने वाले दूसरे युवा थे. वे वहां भारतीय सिविल सर्विस की परीक्षा देने गए थे. पास होकर लौटे और सारंगढ़ से निकलकर मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव बनने वाले पहले व्यक्ति बने.
दूसरे श्री शरदचंद्र बेहार हुए. रमाप्रसन्न नायक उन अंतिम अधिकारियों में से थे जिनके सेवानिवृत्त होने के साथ ही भारत में आईसीएस का कैडर समाप्त हो गया.
सारंगढ़ दीवान के दूसरे पुत्र तारिणी प्रसन्न नायक मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय में न्यायाधीश रहे.
सक्ती राज्य के दीवान थे दास रति राव. उनके नाती का नाम था वेरी श्याम राव. चार वर्ष की उम्र में पिता की मृत्यु हो जाने के कारण नाना ने बच्चे का पालन पोषण किया था. वेरी श्याम राव आगे चलकर आर्य समाज में शामिल हुए और संन्यास लेकर स्वामी अग्निवेश के नाम से जाने गए. हरियाणा में एक समय मंत्री रहे अग्निवेश बंधुआ मज़दूरों के लिए किए कामों तथा माओवादी आंदोलन में अपने शांति प्रयासों के लिए जाने गए.
रायगढ़ के दीवान थे पंडित बल्देव प्रसाद मिश्र. कुशल प्रशासक, विद्वान और न्यायविद पंडित मिश्र छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव के निवासी थे और भारत में हिन्दी में किये गए काम के लिए ‘डी-लिट’ की उपाधि पाने वाले पहले व्यक्ति थे. यह उपाधि उन्हें सन 1939 में प्रदान की गई थी. वे लेखक, गांधीवादी चिंतक और अधिवक्ता कनक तिवारी के मामा-ससुर थे.
मार्च 1947 में लॉर्ड माउंटबेटन के भारत आने के बाद परिस्थितियां तेज़ी से बदलीं. अगस्त में भारत आज़ाद हुआ और रियासतों के भारतीय संघ में विलय होने की दिशा में गतिविधियां तेज हो गईं. बैठकों के दौर शुरू हो गए. छत्तीसगढ़ और पश्चिम उड़ीसा के राजाओं के बीच भी चर्चाओं और पत्र व्यवहार के दौर चले. सारंगढ़ में रखे उस दौर के पत्रों को पढ़कर मालूम होता है कुछ राजाओं को भविष्य की अनिश्चितता से उपजी शंकाएं परेशान कर रही थीं पर आमतौर पर विलय के विरोध में कोई नहीं था.
जैसा पुलिस अधिकारी केएफ रुस्तमजी ने अपनी पुस्तक में नोट किया, राजा नरेशचंद्र सिंह विलय के बाद अपने राज्य सारंगढ़ के विकास की संभावनाओं को लेकर बहुत उत्साहित थे. रुस्तमजी का सारंगढ़ आना और अतिथि के रूप में गिरिविलास पैलेस में रहना हुआ था दिसंबर 1947 के अंत में. जिस दिन, 31 दिसंबर, वे यहां से रायगढ़ गए, वह दिन राजा के रूप में नरेशचंद्र सिंह का अंतिम दिन था.

मूलतः नागपुर के एक पारसी परिवार के सदस्य श्री रुस्तमजी इंडियन पुलिस (भारतीय पुलिस सेवा को अंग्रेज़ों के समय आईपी कहा जाता था) के युवा अधिकारी थे जिन्हें अमरावती में पुलिस अधीक्षक रहने के दौरान स्थानांतरण आदेश मिला था. उन्होंने लिखा कि उन्हें उड़ीसा की सीमा पर एक ऐसे ज़िले के पुलिस अधीक्षक के रूप में स्थानांतरित किया गया था जिसका भारत के नक़्शे में अस्तित्व ही नहीं था. वह ज़िला था रायगढ़. वे अपनी पत्नी के साथ कार ड्राइव करते हुए सारंगढ़ और फिर रायगढ़ पहुंचे थे.
किंतु रुस्तमजी रायगढ़ पहुंचने वाले पहले अधिकारी नहीं थे. पंद्रह दिन पहले राजाओं ने विलय के लिए औपचारिक सहमति दे दी थी. उसके बाद अफ़सरों की एक कोर टीम को रायगढ़ भेजा गया था. एक जनवरी को प्रशासन संभालने के लिए तैयारी करने की ज़िम्मेदारी इनकी थी. डीआईजी शंकर दयाल शुक्ला तथा ज़िला कलेक्टर रामाधीर मिश्रा पहुंच चुके थे. ज़िला न्यायाधीश के रूप में बिनय कुमार (बीके) चौधरी और डीएफ़ओ के रूप में भवानी मिश्रा भी पहुंच चुके थे. ये सारे सीपी (सेंट्रल प्रॉविंसेस) राज्य के अधिकारी थे.
बीके चौधरी सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह के घनिष्ठ मित्र थे. इन दोनों की मित्रता राजकुमार कॉलेज रायपुर के टेनिस कोर्ट में हुई थी. दोनों अच्छे खिलाड़ी थे. चौधरी हरिपुर बंगाल के उस प्रतिष्ठित ज़मींदार परिवार से आते थे जिसके सदस्य थल-सेना प्रमुख रहे जनरल जयन्तो नाथ (जेएन) चौधरी और फिल्मों की शुरुआती दौर की सबसे सशक्त महिला अभिनेत्री और स्टूडियो मालिक देविका रानी भी रहीं. बिनय कुमार तथा उनके भाई कल्याण कुमार चौधरी सारंगढ़ के नियमित मेहमान हुआ करते थे.
जब बिनय कुमार चौधरी ने रायगढ़ में पदभार ग्रहण किया तब वर्तमान का सरगुजा संभाग इस न्यायिक ज़िले का हिस्सा था. 1 नवंबर 1956 को जबलपुर में हाईकोर्ट की स्थापना हुई तो चौधरी को यहां न्यायाधीश नियुक्त किया गया. सेवानिवृत्ति के बाद का जीवन उन्होंने पुदुचेरी के अरबिंदो आश्रम में व्यतीत किया.
नए बने रायगढ़ ज़िले के पहले कलेक्टर रामाधीर मिश्रा तीन सप्ताह बाद ही गंभीर रूप से अस्वस्थ हुए. पेट मे असहनीय दर्द हुआ. बाद मे पता चला अंतड़ियां आपस में उलझ गई थीं. रायगढ़ में इलाज की समुचित व्यवस्था न होने के कारण उन्हे रायपुर ले जाया गया जहां फरवरी ’48 में उनकी मृत्यु हो गई.

उन दिनों राज्य में सक्षम और अनुभवी अधिकारियों का अकाल चल रहा था. आज़ादी के समय सीपी राज्य के आधे से अधिक अधिकारी अंग्रेज़ थे, जो जा चुके थे. विलीनीकरण ने रातों रात राज्य का आकार बढ़ा दिया था. पर्याप्त अधिकारी उपलब्ध नहीं थे. जब तक भारत में अंग्रेज़ थे, प्रशासन का सर्वोच्च अधिकारी गवर्नर जनरल था. वही अधिकारी जब ब्रिटिश सरकार और राजाओं के बीच की कड़ी की भूमिका में होता तो वायसरॉय कहलाता था. उसी तर्ज़ पर विलय के बाद भारत में अधिकारियों के मुखिया को जब नए बने ज़िलों में प्रभार लेने भेजा गया तब वे सामान्य रूप से कलेक्टर या डिप्टी कमिश्नर थे किंतु विलय का काम करने के लिए इनका पदनाम था ‘ओएसडी’.
सेंट्रल प्रॉविंस राज्य के ‘पॉलिटिकल एंड मिलिटरी डिपार्टमेंट’ के तहत विभिन्न विभागों के वरिष्ठ अधिकारियों का एक समूह बनाकर इन्हें ‘ऑफ़िसर ऑन स्पेशल ड्यूटी’ (ओएसडी) का नाम दिया गया. यह ऐसा समय था जब क़ानून व्यवस्था की जगह ऑडिट, वित्त, जैसे विभागों में दक्ष ऐसे लोगों की मांग अधिक थी जो रियासती व्यवस्थाओं का ज़िम्मा संभाल सकें. आम जनता के साथ-साथ (या अधिक) इनका वास्ता राजाओं और उनके प्रशासनिक अधिकारियों से पड़ने वाला था. इनमें ख़ज़ानों की नगदी गिनने और हिसाब-किताब समझने के अलावा सारे प्रशासनिक रिकॉर्ड, बंदूकों और तोपों से लेकर हाथियों और घोड़ों तक को गिनना और चेक करना शामिल था.
श्री रामाधीर मिश्रा की मृत्यु से अचानक पैदा हुई रिक्तता में तत्कालीन पुलिस अधीक्षक केएफ रुस्तमजी को ज़िलाध्यक्ष का पदभार संभालने के आदेश दिए गए और जैसा रुस्तमजी ने अपनी पुस्तक ‘द ब्रिटिश द बैंडिट्स एंड द बॉर्डरमेन’ में लिखा, यह एक इतिहास बन गया. जब तक ओएसडी समूह से जेके वर्मा ने आकर चार्ज नहीं लिया, वे रायगढ़ कलेक्टर के पद पर रहे.
बीएसएफ के गठन और मुक्ति बाहिनी को प्रशिक्षण देकर बांग्लादेश के निर्माण में योगदान के लिए रुस्तमजी को देश ने सिर आंखों पर बैठाया. उन्हें पद्मविभूषण का सम्मान दिया गया. यह सम्मान पाने वाले वे भारत के एकमात्र पुलिस अधिकारी हैं.
लेकिन रायगढ़ में कलेक्टर कक्ष में कलेक्टरों के नामों की जो सूची टंगी है उसमें इतिहास बनाने वाले तीन सप्ताह के कलेक्टर रुस्तमजी का नाम नहीं है. अब के कलेक्टरों को कारण ज्ञात नहीं. संभव है लिस्ट बनाते समय सारे आईएएस वाले नामों के बीच एक पुलिस अधिकारी का नाम रखने में किसी को अटपटा लगा हो.
(लेखक इतिहास-प्रेमी हैं, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं.)
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