बिहार चुनाव में ‘जातीय गानों’ की गूंज: अस्मिता की राजनीति के नए हथियार

बिहार विधानसभा चुनाव में जातीय गानों ने नया रंग भर दिया है. हर जाति अपने नेताओं के लिए गीतों के ज़रिए शक्ति प्रदर्शन कर रही है. प्रधानमंत्री से लेकर स्थानीय प्रत्याशी तक इनका ज़िक्र कर रहे हैं. क्या ये गाने बिहार की राजनीति को और विभाजित कर देंगे?

भोजपुरी गानों में जातीय श्रेष्ठता, सामाजिक विभाजन और जातीय ध्रुवीकरण नज़र आता है. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

बिहार चुनाव में कलाकार और गायक अपनी समर्थित पार्टियों के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. जाति और पार्टी समर्थित गाने गांंव-गांंव, चौक-चौराहों और सोशल मीडिया पर चुनावी माहौल को अलग रूप दे रहे हैं. ये गाने राजनीतिक और सामाजिक संदेश के सशक्त माध्यम बन चुके हैं. चुनाव दर चुनाव इनकी तासीर, दायरा और असर बढ़ता ही जा रहा है.

लेकिन ये गाने सिर्फ़ राजनीतिक जातीय अभिव्यक्ति को बल देते हैं या सामाजिक विभाजन और जातीय ध्रुवीकरण का बड़ा कारण बन सकते हैं?

मसलन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चुनावी सभा में जिस तरह ‘जातीय गानों’ का ज़िक्र कर रहे हैं, वह रोटी, कपड़ा ,मकान, रोजगार, पलायन, बाढ़ और बिहार की स्थानीय समस्याओं को बहुत पीछे ले जाएगा. प्रधानमंत्री मोदी के भाषणों में एक बात गौर करने वाली है. उन्होंने उन्हीं गानों का ज़िक्र किया जो ‘यादव’ समुदाय से जुड़े हैं. ‘भईया के आवे दे सत्ता, सटा के उठा लेबौ घारा से रे’ (भईया की सरकार आने दो, सट्टा दिखाकर घर से उठा लेंगे) ‘मारब सिक्सर के छह गोली छाती में रे, पावर होला ई खाली अहीर जाती में’ (सिक्सर (बंदूक) की छह गोली छाती में मार दूंगा, और यह शक्ति केवल अहीर (यादव जाति) में होती है)

इन गानों का ज़िक्र प्रधानमंत्री को क्यों करना पड़ा? क्या ये गाने सिर्फ यादव समुदाय में हैं? दरअसल ऐसे गानों का ज़िक्र करके प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री पद के चेहरे तेजस्वी यादव और यादव बिरादरी पर निशाना साधा. उन्होंने ये संदेश भी दे दिया कि सत्ता में आने से पहले ये हाल है तो कहीं फिर से जंगलराज न आ जाएं. इस तरह उन्होंने जंगलराज के नैरेटिव से वोटर को डराया.

जबकि महागठबंधन अपनी सभाओं में जाति के गानों का ज़िक्र करने से बच रहा है. शायद महागठबंधन को डर है कि जाति के नाम पर नैरेटिव बनने में देर नहीं लगेगी. खासकर तब जब महागठबंधन के प्रमुख घटक दल आरजेडी पर एमवाई (मुस्लिम-यादव) समीकरण बनाने आरोप लगता रहा हो.

राहुल गांधी और तेजस्वी यादव मंचों से जनता को आश्वस्त कर रहे हैं कि महागठबंधन की सभी जातियों, सभी धर्मों की सरकार होगी.

दरअसल ऐसे जातीय गानों की भरमार बिहार के सभी जातियों में हैं. उदाहरण के तौर पर – ‘पॉवर स्टार’ पवन सिंह का ‘प्रखंड हो या जिला बबुआने से हिला’, ‘पॉवर होला कुर्मी जाति में रे’, ‘पासवान जाति में रे’. लेकिन प्रधानमंत्री ने इन गानों का ज़िक्र तक नहीं किया. प्रधानमंत्री ने बहुत चतुराई से जातीय विभाजन करके वोट मांगने का कार्य किया है. भाजपा-आरएसएस हमेशा हिंदू एकजुटता की बात करते हैं, लेकिन प्रधानमंत्री उसे जातीय स्वरूप प्रदान कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री भूल गये कि ऐसे गाने लगभग सभी जातियों में हैं. जातियां इन गानों को अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा और इतिहास से जोड़ कर देखती हैं.

बिहार में ही नहीं बल्कि हिंदी पट्टी के राज्यों में समाज अपनी जातीय पहचान से गहराई से जुड़ा है. यही जुड़ाव वोट बैंक में भी बदलता है. ये गाने पहले जहांं लाउड स्पीकर या प्रत्याशी की जीप पर बजते थे, वहीं बदलते समय में चुनावी प्रचार के तरीके और डिजिटल युग में इनका दायरा विस्तृत हुआ है. ऐसे गानों की यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, रील, मीम्स और व्हाट्सएप ग्रुप में भरमार है.

इन गानों की लोकप्रियता भी अधिक है, यही वजह है कि जातीय गानों ने राजनीति को एक नया आयाम दे दिया है. अब मंच पर भाषण देने से ज़्यादा असरदार हो गया है – अपनी जाति, पार्टी का गाना चलवाना. नेता जानते हैं कि चुनावी जनसभा में यदि ‘उनकी जाति का गाना’ बजे, तो भीड़ का उत्साह दोगुना हो जाता है.

भूमिहार, राजपूत, लाला, यादव, कुशवाहा आदि समुदाय अपने जाति के नेताओं के लिए सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर पुरजोर तरीके से मोर्चा संभाले हुए हैं. सोशल मीडिया नया जंग का मैदान बनता जा रहा है. स्थानीय गायकों की डिमांड चुनावी मौसम मे अपने आप बढ़ जाती है और समर्थकों के बीच इनकी सप्लाई. कॉन्टेंट क्रिएटर और पार्टी समर्थक ऐसे गानों को बढ़ावा दे रहे हैं. आरजेडी, एनडीए समर्थक गाने का उपयोग एकता और ताकत दिखाने के लिए करते हैं. ऐसे गानों की एक बानगी देखिए: ‘फैन अहि हम लालू के , ठेकेदारी करे ला बालू के,’ ‘एकतरफा ब भोट लालटेन के,’ ‘लालू बिना चालू ई बिहार न होई,’ ‘लालू जी के मैन फैन आरजेडी के हई,’ ‘रउआ सब के हाथ में बानी के जीती के हारी, सब पे भारी भैया खेसारी’.

इन गानों से ताकत का प्रदर्शन और ध्रुवीकरण दोनों होता है. ये गाने आरजेडी नेताओं तेजस्वी, खेसारी, ओसामा आदि के साथ रैलियों में माहौल बनाते हैं. दूसरी तरफ़ एनडीए समर्थित गाना ‘जोड़ी मोदी आ नीतीश जी के हिट होई,’ ‘फैन हई हम बीजेपी के’, ‘नदी नाला सरकार के बाकी सब भूमिहार के’, ‘केतना जोर लगाई बाकी साफ न होई भूरा बाल’ जैसे गाने बाहुबली भूमिहार नेताओं के रैलियों में शक्ति प्रदर्शन के लिए हैं.

यह चलन अब सिर्फ़ पार्टी तक ही सीमित नहीं रहा बल्कि समुदायों में भी पैर पसार रहा है. कुर्मी समुदाय नीतीश कुमार के सुशासन का बखान गाने, मीम्स के जरिए कर रहा है. वहीं निषाद समुदाय को वीआईपी प्रमुख मुकेश साहनी के साथ ‘दुश्मन के रूह कापे हमरे नाम से, कर ले मिलन हम निषाद खानदान से’ जैसे गाने के माध्यम से एकजुट करने की कोशिश है.

इन गानों के बोल में राजनीतिक संदेश डूबे हुए हैं. कहीं विपक्षी नेता पर तंज, तो कहीं अपनी जाति के नेता का कसीदा. ये गाने अब सुनियोजित प्रचार रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुके हैं. राजनीतिक सलाहकारों की टीमें अब प्रचार योजनाओं में ‘संगीत और जातीय टारगेटिंग’ को भी प्रमुखता से शामिल कर रही हैं.

बिहार का पारंपरिक लोकसंगीत जैसे भोजपुरी लोकगीत, सोहर और कजरी पहले सामाजिक एकता और संस्कृति का प्रतीक हुआ करते थे लेकिन अब इनकी जगह जाति-आधारित गानों गानों ने ले ली है. जातीय गानों की मांग सबसे ज़्यादा चुनावी मौसम में होती है. जो गाना जातीय अस्मिता से जुड़ा होता है, उसकी रिकॉर्डिंग, व्यू और शेयरिंग कई गुना बढ़ जाती है. अब यह एक अनौपचारिक उद्योग बन चुका है, जिसमें स्थानीय छुट भैया गायक, कॉन्टेंट क्रिएटर, पार्टी समर्थक सब सक्रियता के साथ शामिल रहते हैं.

लेकिन ऐसा न हो कि इन गानों के ओट में शिक्षा, रोजगार, पलायन, बाढ़, विकास के मुद्दे पीछे रह जायें . अगर गानों में सिर्फ जातीय समीकरण और रंगदारी गूंजेगी, तो असली मुद्दे पीछे छूट जाएंगे.

(कोमल यादव इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोधार्थी हैं.)