मंच प्रवेश: भारतीय रंगमंच की अनूठी दास्तान

पुस्तक अंश: अलक़ाज़ी और पद्मसी परिवारों के आईने से आप भारतीय समकालीन रंगमंच के इतिहास को देख सकते हैं. कुछ बरस पहले इब्राहीम अलक़ाज़ी के बेटे और एलेक पद्मसी के भांजे फ़ैसल अलक़ाज़ी ने एक किताब लिखी, 'एंटर स्टेज राईट'. भारतीय रंगमंच की अनूठी दास्तान इस किताब का अनुवाद युवा नाट्य आलोचक अमितेश कुमार ने किया है. पढ़िए इसका एक अंश.

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भारतीय रंगमंच के इतिहास को पहले कभी इस तरह से दर्ज नहीं किया गया है. (साभार: राजकमल प्रकाशन)

शबाना आज़मी ने कभी कहा था कि अलक़ाज़ी और पद्मसी परिवारों के आईने से आप भारतीय समकालीन रंगमंच के इतिहास को देख सकते हैं. कुछ बरस पहले इब्राहीम अलक़ाज़ी के बेटे और एलेक पद्मसी के भांजे फ़ैसल अलक़ाज़ी ने एक किताब लिखी, ‘एंटर स्टेज राईट’. शिक्षाविद्, रंग निर्देशक और सामाजिक कार्यकर्ता फ़ैसल जब अपने परिवार की जीवनी लिखने बैठे, उनके पास थे दुर्लभ किस्से और अद्भुत अंतर्दृष्टि. बहुत जल्द यह किताब भारतीय रंगमंच की अनूठी दास्तान की तरह प्रख्यात हो गयी. 

इस किताब का अनुवाद युवा नाट्य आलोचक अमितेश कुमार ने किया है, ‘मंच प्रवेश’. यह अनुवाद मूल किताब की प्रवाहमयी लय और वैचारिक गहराई, दोनों को थामता है. पढ़िए इसका एक संपादित अंश. इसका प्रकाशन आज इसलिए भी मौज़ूं हैं क्योंकि सत्रह नवंबर एलेक पद्मसी की पुण्यतिथि है. 

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आज़ादी का जश्न पांच साल बाद तक चलता रहा. एक आदर्शवादी सरकार का साथ था जिसके सदर प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू थे. रूसी क्रांति के बाद कलाकारों ने जो भूमिका निभाई थी उसका अनुसरण करते हुए अलग-अलग फ़नकार नये भारत की ‘राष्ट्रीय अस्मिता’ गढ़ने के लिए काम कर रहे थे. चित्रकला, रंगमंच और सिनेमा में ऐसा ख़ास तौर पर देखा गया. शर्तिया तौर पर बॉम्बे इसका मरकज़ था और मेरे वाल‌िदैन उसके केंद्र में थे.

जैसा कि एम.एफ़. हुसैन बताते हैं, ‘जिसकी जड़ें हमारी संस्कृति में हों ऐसी भाषा गढ़ने के लिए हमारा एक समानान्तर राष्ट्रीय आंदोलन चल रहा था. यह ज़रूरी था क्योंकि मुल्क की तहज़ीब में कोई भी बड़ा बदलाव सांस्कृतिक हलक़े से ही शुरू होता है. संस्कृति दूसरे राजनीतिक और सामाजिक आंदोलनों से हमेशा आगे रहती है.’

संगीत और नृत्य पुरानी शास्त्रीय परंपरा की तरफ़ दोबारा जा रहे थे और आभिजात्य वर्ग की हिंदुस्तानी और कर्नाटक शास्त्रीय संगीत और भरतनाट्यम, कथकली, ओडिसी और कथक जैसे नृत्य रूपों में दिलचस्प बढ़ रही थी.

इस समय कला को संरक्षण सरकार की तरफ़ से नहीं बल्कि बॉम्बे या अन्य जगहों के जागरूक नागरिकों, धनिक कारोबारियों और पत्रकारों से मिल रहा था. भूलाभाई देसाई जैसे वकील, साराभाई और टाटा जैसे व्यावसायिक घराने अब संरक्षक की भूमिका निभा रहे थे. भारतीय कला परिदृश्य भी बहुत से निर्वासितों का ध्यान खींच रहा था. जर्मनी और ऑस्ट्रिया से नाजियों के सितम से बचकर भागे हुए तीन यहूदी अपना सारा असबाब बॉम्बे ले आए और यहीं घर बसाया जिसे भारत के संपन्न बंदरगाह की तरह देखा जाता था और जहां रिहाइश संभव थी क्योंकि अधिकांश लोग (एक ख़ास वर्ग के) धाराप्रवाह अंग्रेज़ी बोलते थे!

वाल्टर लैंगहैमर, रूडी वॉन लायाडेन और श्लीजिंगर ने अपने इर्द-गिर्द भारतीय कलाकारों का घेरा बना लिया जो अभी अपने जीवन के तीसरे दशक की शुरुआत में थे. उनके नेपियन सी रोड के आवास पर हर रविवार को, वाल्टर लैंगहैमर, जो ख़ुद भी एक अभ्यस्त कलाकार थे, अड्डेबाज़ी का इंतज़ाम करते थे.

यूरोप से आए ये तीन व्यक्ति वहां की जीवंत कला रवायतों से परिचित थे जो बॉम्बे के कला परिदृश्य के लिए उत्प्रेरक साबित हुआ. जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट में अभी तक पढ़ाए जा रहे अकादमिक रवायत से उनका कोई वास्ता नहीं था. वे वर्तमान में रहने वाले व्यक्ति थे. जो आंदोलन अभी नवजात ही था, उसके लिए बहुत उत्साही और मुखर समर्थक साबित हुए.

1938 के बाद से वाल्टर लैंगहैमर ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के कला निर्देशक बन गए, जबकि रूडी वॉन लायाडेन इसके कला समीक्षक. ‘उस दौर में एक कार्यालय संवाददाता को ही कला प्रस्तुतियों के बारे में लिखने के लिए कह दिया जाता था और वह कामचलाऊ ख़बर लिख लेता था कि अमुक ने बगीचे में एक गाय का चित्र बनाया है या ऐसा ही कुछ, जिसमें कहाँ क्या रँगा गया है इसका ज़िक्र-भर होता था. मेरे ख़याल से समीक्षा और कला पर चर्चा, या कला के बारे में लिखना सभी कुछ एक ही आदमी के प्रयास में साकार हो जाता जिससे नये तरह के माहौल को उत्तेजना मिलती,’ उन्होंने लिखा था.

बॉम्बे में कीकु गांधी के सक्रिय सहयोग से, जिन्होंने प्रोग्रेसिव आ‌र्टिस्ट ग्रुप की शुरुआती कलाकृतियों को फ़्रेम किया था, वाल्टर लैंगहैमर ने एक ‘खुला घर’ बनाया और अक्सर भारतीय कलाकारों को मुफ़्त में स्टूडियो की जगह मुहैया कराई. 1940 और 1950 का बॉम्बे सांस्कृतिक इंक़लाब की दहलीज़ पर था.

जर्सन डा कुन्हा याद करते हैं, ‘मुझे नहीं लगता किसी को यह एहसास था कि उस समय ज़िन्दगी जितनी अच्छी तरह गुज़र रही थी, उससे अच्छी होती. किसी को एहसास नहीं था कि वह कितना महान शहर था और उसका नागरिक होना कितनी सुविधाजनक बात थी. बुनियादी संरचना, पानी, साफ़-सफ़ाई, केंद्रीय और पश्चिमी रेलवे और बिजली सभी कुछ कमोबेश रहने वाली आबादी की ज़रूरतों के माकूल था.’

‘ट्राम और बस से सफ़र करना उस दौर में अपने को कमतर करने वाली बात बिलकुल नहीं थी. यह तार्किक था और हम सब ऐसा करते थे क्योंकि हम और क्या करते? टैक्सी लेते, लेकिन हम इतनी बड़ी रक़म क्यों ख़र्च करते?’

‘दूसरा, होटल और रेस्तरां बहुत ही जीवंत थे. 1950 के आख़िर में जैसा कि मैं याद करता हूं रेस्तरां में जैज़ संगीत के आठ अहम समूह थे. वोल्गा, द अदर रूम, द लिटिल हार्ट, बेरीज़. तो यह वह शहर था जो आबादी की ज़रूरतों से मेल खाता था. आपके पास एक महान विश्वविद्यालय था, बॉम्बे विश्वविद्यालय.’

‘ऐसा नहीं था कि बॉम्बे एक ज्ञान का शहर था लेकिन इसका असर और प्रभाव हम सब पर था. पार्टी में होने वाली बहसों की गुणवत्ता कमाल की होती थी. इसके विपरीत आज आपको अचानक पता चलता है कि आप घरेलू जीवन की बेवक़ूफ़ियों के बारे में अधिक बात कर रहे हैं जैसे कि आपके यहाँ का रसोइया ग़ायब है और आपका अगला ड्राइवर कहाँ से आएगा? उस समय इस तरह की कोई बात नहीं होती थी.’

‘सेमिनार होते थे जिनको डेरेक जैसे लोग आयोजित करते थे और उनके द्वारा अलक़ाज़ी जैसे लोगों को बुलाया जाता था. रूडी वॉन लायाडेन आधुनिक कला के बारे में बात करते. ऐसा अंतरंग सम्बन्ध उनके बीच था जो आख़िरकार दोनों तरफ़ फ़ायदा पहुंचाता था.’

‘उसके अलावा ये जगहें थीं जो प्रेरणा का केंद्र थीं. नई-नई स्थापित जहांगीर आर्ट गैलरी और उसके तुरंत बाद भूलाभाई देसाई इंस्टीट्यूट. प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप वहां दीवार की तरह खड़ा हो जाता जहां आधुनिक कला, आधुनिक चित्रकारी चलती रहती. हमारे पास इस शहर में दो सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा थे—द बॉम्बे सिम्फनी ऑर्केस्ट्रा और द बॉम्बे फिलहार्मोनिक. तो ये सब आपकी पसंद के मुताबिक़ ज्ञानोदय के केंद्र हो सकते थे.’

अलक़ाज़ी और पद्मसी परिवार. (साभार: राजकमल प्रकाशन)

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मेरे अब्बा जब भारत लौटे तो संयोग से उसी जहाज़ पर थे जो साढ़े तीन साल पहले उन्हें यहां से लेकर गया. वह नये विचारों से लैस थे और उन पर तुरंत अमल करना चाहते थे. रंगमंच के अलावा उनका पहला इश्क़ था चित्रकला. जब वे बाहर गए तब वे चित्रकला ही पढ़ना चाहते थे क्योंकि वह ख़ुद एक चित्रकार थे.

उनके मर्द और औरत के नाज़ुक लेकिन कामुक सम्बन्धों को चित्रित करते हुए क़लम और स्याही से बने, या चारकोल के रेखाचित्र जिनमें ईसा के जीवन के विषयों को चित्रित किया गया था, जिसका प्रदर्शन उन्होंने लन्दन की प्रतिष्ठित लीसेस्टर गैलरी में किया था.

अपनी शुरुआती कविता में मेरी अम्मा, अब्बा के चित्रों के बारे में लिखती हैं,

नग्न तसवीरों की निष्ठुर शक्ति,
मुक़म्मल करती है और ख़ारिज भी
कष्ट उठाते यीशु
उनका फ़‌िज़ूल मांस
महफ़ूज़ रखने को लेपित, डूबा और सूली पर चढ़ा हुआ
जीने का एक अलग रास्ता
सुलझे हुए सारे मसाइल
सभी भूदृश्य छुपाते हैं
दिखाते हैं

एक झिलमिलाती भूल-भुलैया
में बंधी वर्तमान और अतीत की
ख़ामोश की गई सिलेटी सुरों
और स्याह और साफ़ पारभासी सफ़ेद में
रहस्यमय खेल, मगर अलग-अलग
उस दिन के रंगों में जो दूर नहीं है
वक़्त के बोझ से आज़ाद
वे जीते हैं
गहरे महसूस होते ठहराव में
जीवन के शब्दों के बीच.

प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप के उनके बहुत से दोस्त अभी भी हैं, हालांकि सूज़ा अब नहीं रहे. निस्सिम, मेरे अब्बा और अम्मा ने यह तय किया था कि इंग्लैड प्रवास के दौरान अंग्रेज़ी, अमेरिकी और यूरोपियन कला के श्रेष्ठ म्यूज़ियमों और कला दीर्घाओं को देखेंगे. अब वह समय था कि बॉम्बे के बौद्धिक तबक़े को इन सबसे परिचित कराने के लिए ठोस प्रयास किया जाता कि बाहर की कला की दुनिया में क्या हो रहा है.

‘यह आधुनिक कला है’ प्रदर्शनियों का एक सिलसिला था जिसे थिएटर ग्रुप ने 1954 में आयोजित किया था. सभी पांच प्रदर्शनियां जहांगीर आर्ट गैलरी में आयोज‌ित की गई थीं जो बस दो साल पहले ही निर्मित हुआ था. हालांकि मौलिक कृतियाँ उपलब्ध नहीं थीं इसलिए प्रभाववादी, क्यूबवादी और सुर्रियलिस्ट चित्रों को बड़े आकार में रखा गया. इसके लिए कुछ किताबों को फाड़ा गया, उनके पन्नों को सफ़ाई से अलग किया गया और सुरुचिपूर्वक फ़्रेम कराया गया.

आधुनिक कला के बारे में निस्सिम के पहले संवाद की श्वेत-श्याम तसवीरों में ख़ुशगवार लोगों को शिरकत करते देखा जा सकता है. कोई भी युवा चित्रकार कृष्ण खन्ना और पूरे पद्मसी ख़ानदान को, पर्ल विज के साथ, जो बाद में एलेक की बेगम बनीं, पहली पंक्ति में पहचान सकता था. पृष्ठभूमि में मेरे अब्बा के अरब बहनोइयों को सूट-बूट में देखा जा सकता था. इन च‌ित्रों में कला आंदोलन के उत्साह और आनन्द की एक वाजेह अनुभूति थी जो उस समय अभी शुरुआती दौर में ही था.

उस दौर के एक और बड़े चित्रकार रज़ा याद करते हैं, ‘हम ख़ास तौर पर पाश्चात्य अकादमिक विचारों और पारम्परिक भारतीय कला जो बंगाली पुनर्जागरण से निकले थे और हमारी अपनी रवायत की तरफ़ हमारा ध्यान खींच रहे थे, के बीच बंटे हुए थे. फ़्रेंच प्रभाववादी और जर्मन अभिव्यंजनावादियों नें हमें प्रेरित किया.’

(साभार: राजकमल प्रकाशन)

कला परिदृश्य में सक्रिय भागीदारी का नतीजा यह भी हुआ कि मेरे वाल‌िदैन को गिरफ़्तारी का सामना करना पड़ा. यह अकबर पद्मसी के साथ एकजुटता दिखाने के लिए भी था जिनके न्यूड चित्र को अश्लीलता का आरोप लगाकर अदालत में ले जाया गया था. एक मर्द ने अपने हाथ से नग्न औरत के एक वक्ष को ढक रखा है. ऐसा चित्र कोई चित्रकार कैसे बना सकता है? अदालत की बहस के कुछ हिस्सों में अकबर के चित्रों से मिलते-जुलते बारहवीं सदी के खजुराहो मन्दिर की कलाकृतियों की दलील दी गई थी.

रंगमंच के मोर्चे पर मेरे अब्बा ने थिएटर ग्रुप के बिखरे हुए सदस्यों को इकट्ठा किया और अलग-अलग अवधि के तीन पाठ्यक्रम बनाए जिसमें वह सब शामिल था जो उन्होंने बाहर से सीखा था.

वैसे तो प्रत्येक पाठ्यक्रम अपने-आप में स्वतंत्र था लेकिन उनका विचार था कि बाद में छात्रों को एक साथ ले आया जाए क्योंकि बहुत गहन प्रशिक्षण की परिकल्पना की गई थी. योग, गति और सम्भाषण के ज़रिये व्यावहारिक प्रशिक्षण पर ध्यान दिया गया था जिसके साथ एक नाटक की दर्शकों के समक्ष प्रस्तुति भी होनी थी. कक्षाओं और रिहर्सल के साथ-साथ व्याख्यानों, कविता पाठ और कला-आस्वाद पर व्याख्यान भी रखे गए थे.

मुक्त कक्षाएं भी रखी गई थीं जिनमें साधारण जनता भी शामिल हो सकती थी. विचार यह था कि छात्रों को पेशेवर के तौर पर न केवल प्रशिक्षित किया जाए बल्कि अच्छे और सार्थक रंगमंच के ठीक आस्वाद के लिए जागरूक और सहृदय दर्शक भी तैयार क‌िये जाएं.

जो पहली प्रस्तुति उन्होंने निर्देशित की, वह थी इब्सन की ‘घोस्ट्स’ जिसका मंचन इंस्टिट्यूट ऑफ़ फ़ॉरेन लैंग्वेज ऑडिटोरियम की छोटी सी जगह में 1952 में हुआ था. जहां दर्शक एक छोटे से अभिनय स्थल के दोनों तरफ़ आमने-सामने बैठे थे. यह भारत में ‘एरेना शैली’ में हुआ शायद पहला मंचन था.

इब्सन के इस सशक्त नाटक में मशहूर अदाकार थे. उषा अमीन ने मिसेज़ एलविंग की और मेरे अब्बा ने पास्टर मैन्डर्स की भूमिका की थी जबकि एलेक पद्मसी ने एंग्सट्रेंड की और सिल्वी डा कुन्हा, जर्सन के भाई ने युवा ओसवाल्ड की. ‘पिता के पाप का बोझ बच्चों के सर पर हमेशा रहता है’ इस नाटक का सार है जो उत्तराधिकार, पाखंड, इनसेस्ट और उपदेशों की पड़ताल करता है.

टी.एस. इलियट का काव्य नाटक ‘मर्डर इन द कैथेड्रल’ और ज्याँ अनुई के ‘एंटिगनी’ का भी मंचन हुआ जिसकी काफ़ी प्रशंसा हुई जैसे कि स्ट्रिंडबर्ग की ‘मिस जूली’ की प्रस्तुति की भी हुई. मेरे अब्बा के प्रशिक्षण का नतीजा दिखने लगा था. नाटक के पाठ की व्याख्या, पंक्तियों के बीच के पाठ को उभारनेवाला उपपाठ और एक महीने की रिहर्सल के दौरान विस्तार से किरदार की तैयारी और साथ में मंच परिकल्पना, वेशभूषा, लयबद्ध गति, संगीत और प्रकाश, प्रस्तुति के दौरान सम्पूर्ण रंगानुभूति को बढ़ा देता था.

फ़्रेंच नाटककार ज्याँ अनुई यह अच्छी तरह से जानते थे कि अच्छे और बुरे की अपनी धारणा हमने ग्रीक मिथकों के ज़रिये निर्मित की है. एक मर्द को कौन सी चीज़ें गढ़ती हैं और कौन सी औरत को—न्याय और वफ़ादारी, जाति और राष्ट्र के प्रति निष्ठा, व्यक्ति और समाज के प्रत‌ि उसकी ‌ज़िम्मेदारी और सरहदें व सीमाएं इन सबको अनुई ने समकालीन आवाज़ देने की कोशिश की.

सोफ़ोक्लीज़ के ‘एंटीगनी’ को दूसरे विश्वयुद्ध के नाज़ी अधीन फ़्रांस में स्थित करके फिर से प्रस्तुत करना एक सधा हुआ क़दम था. एंटीगनी का थका हुआ और सनकी चाचा क्रियोन जो थीब्स का बादशाह भी है उसे अपने मरे हुए भाई पोलिनिकस को दफ़नाने की इजाज़त देने से इनकार कर देता है. वह बग़ावत में उठ खड़ी होती है और उसे फांसी की सज़ा मिलती है. राज्य की ताक़त, व्यक्ति का प्रतिरोध, युवा आदर्श को हमेशा के लिए कुचल देने की त्रासदी इसके विषय थे. फिरोज़ा कूपर ने एंटीगनी की जबकि हामिद सयानी ने क्रियोन की भूमिका अदा की थी.

‘डेथ ऑफ सेल्समैन’ में एलेक पद्मसी. (साभार: Alkazi Theatre Archives)

जर्सन याद करते हैं, ‘यह एक निर्देशात्मक तकनीकी और जज़्बाती तजुर्बा था हम सबके लिए, फिरोज़ा एक संयत युवा लड़की थी. हम देखते थे कि अलक़ाज़ी ग़ुस्सा और आक्रोश भरने के लिए मिसाल दे-देकर उसे उकसाते थे जो उस जैसी शान्त व्यक्ति से बहुत अलग था जिसे हम जानते थे.’

‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ ने समीक्षा करते हुए लिखा, ‘प्रस्तुति दिखाती है कि समूह काफ़ी निडरता से ऐसी प्रस्तुतियां कर रहा है जिसको पेशेवर कंपनियां भी करने से पहले दो दफ़ा सोचेंगी.’

इस मज़बूत, ‌ज़िद्दी और जवान लड़की के हरेक जज़्बात को अभिनेत्री (फिरोज़ा कूपर) ने मुक़म्मल तरीक़े से पेश किया था. हामिद सयानी द्वारा निभाई गई क्रियोन की भूमिका भी कमाल की थी और क्रियोन और एंटीगनी के लम्बे दृश्य जिनमें दोनों दिमाग़ी मुठभेड़ करते हैं और अपने अन्दरूनी ख़यालातों से पर्दा हटाते हैं वास्तविक रंगमंच और सच्चा आनन्द था.’

विख्यात नाटककार गिरीश कर्नाड का मानना था कि तर्जुमे के ज़रिये यूरोपीय नाटकों की बॉम्बे के रंगमंच पर प्रस्तुति ने शॉ के नाटकों की शुरुआती परंपरा को जिसमें नाटक ड्राइंग रूम में ही स्थित होता था, को एक ही साथ और सबके लिए बाहर निकाल दिया और भारतीय रंगमंच ने एक नई करवट ली.

शांता गोखले और सुनील शानबाग द्वारा लिए गए एक ग़ज़ब के वीडियो साक्षात्कार में कर्नाड कहते हैं, ‘अलक़ाज़ी द्वारा अनुई की प्रस्तुतियों ने मेरे ज़ेहन में यह विचार डाला कि हमें अपने मिथकों की पुनर्व्याख्या करनी चाहिए. हमारे पुराणों की परंपरा में कोई त्रासदी नहीं हो सकती थी. हम जानते हैं कि किसी भी मुसीबत से गुज़रने के बाद राजा हरिश्चन्द्र की भक्ति अंत में उनको मुक्ति दिला ही देगी.’

‘1950 के अंत और साठ के दशक की शुरुआत में बॉम्बे में मैंने जब इब्राहिम अलक़ाज़ी के निर्देशन में अनुई की ‘एंटीगनी’ और ‘यूर‌िडसी’ की प्रस्तुति को देखा तो इसने नई सम्भावनाओं की तरफ़ मेरी आंखें खोलीं. मैं प्रेरणा के लिए ‘महाभारत’ की तरफ़ गया. मेरा पहला नाटक ‘ययाति’ पुनर्व्याख्या ही था और वह इन प्रस्तुतियों को देखने का फ़ौरी नतीजा था.’

लुइजी पिरांदेलो का ‘सिक्स कैरेक्टर्स इन सर्च ऑफ़ एन ऑथर’ और ज्यां पॉल सार्त्र का ‘क्राइम पैशनेल’ और ‘नो एक्ज़िट’ थिएटर ग्रुप की शुरुआती प्रस्तुतियों में था, जो यूरोपीय नाटकों का अनुवाद था. सैमुअल बेकेट, यूजिन इओनोस्को, एडवर्ड एल्बी और हेराल्ड पिंटर के बारे में 1950 के आख़िर और 1960 के शुरुआत में ही बातें होने लगी थीं और भारतीय विषयों, किरदारों और पर‌िस्थितियों को व्यवहार में लाना इसके एक दशक बाद संभव हुआ.

हामिद ने जे. बी. प्रीस्टले के दो नाटकों को निर्देशित किया, सिल्वी डा कुन्हा ने ‘सिक्स कैरेक्टर्स इन सर्च ऑफ़ एन ऑथर’, केर्सी कतरक ने ‘टाइगर ऐट द गेट्स’ और एलेक और मेरे पिता ने कई नाटकों का निर्देशन किया.

एलेक के शुरुआती साल कालजयी कृतियों की पड़ताल करने और प्रस्तुत करने में गुज़रे—सोफ़ोक्लीज़ का ‘एंटीगनी’, कान्ग्रेव का ‘द वे ऑफ़ द वर्ल्ड’, शेक्सपियर का ‘द टेमिंग ऑफ़ द श्रू’, मार्लो का ‘डॉ. फ़ॉस्ट्स’, गोल्डस्मिथ का ‘शी स्टॉप्स टू कनक्वेर’, वाइल्ड का ‘ऐन आइडियल हसबैंड’, और बर्नार्ड शॉ का ‘कैंडिड’. ये प्रस्तुतियाँ इंग्लैंड में उनके ख़ुद के प्रशिक्षण और जानकारी की झलकी दे रही थीं. फ‌िर भी वो इस बात को जानते थे कि अंग्रेज़ी भाषी दर्शकों की एक सीमा है. इसलिए उन्होंने पश्चिमी नाटकों को हिंदुस्तानी में रूपान्तरित करने का फ़ैसला किया.

1950 में शबाना आज़मी की मां शौकत आज़मी ने एलेक की दो प्रस्तुतियों में अभिनय किया. पहला था ‘शीशे के खिलौने’ जो टेनेसी विलियम्स के नाटक ‘द ग्लास मनेजरी’ का रूपान्तरण था जिसमें शौकत ने रोबीली माँ का किरदार निभाया था जो अपनी शर्मीली और ग़ैर-मिलनसार लड़की के प्रति बहुत सुरक्षात्मक रहती है. दूसरा नाटक था ‘सारा संसार अपना परिवार’, जो आर्थर मिलर के नाटक ‘ऑल माई संस’ का रूपान्तरण था जिसमें शौकत ने एक बार फिर माँ का किरदार निभाया. दोनों ही प्रस्तुतियां बेहद कामयाब थीं.

कैफ़ी आज़मी के साथ शौकत कैफ़ी. (फोटो साभार: azmikaifi.in)

मेरी नानी के घर पर होने वाली कुछ ‘दावतों’ में क़ैफ़ी आज़मी ने ख़ुद शिरकत की थी और अपनी ख़ूबसूरत शायरी का पाठ किया था. थिएटर ग्रुप ने बहुत संकोच के साथ बहुत ही छोटा-सा दरवाज़ा हिंदी के लिए खोला.

दूसरे मोर्चों पर जैसे कि मंच परिकल्पना और प्रकाश-व्यवस्था में मौसा डेरेक गुजराती के मारूफ़ समूह इंडियन नेशनल थिएटर से नियमित रूप से बातचीत करते रहते थे. चूँकि थिएटर ग्रुप पश्चिम की बहुत सी नवीनतम तकनीकों की जानकारी रखता था तो यह बाक़ी रंग समुदाय के लिए एक ज़रिये का भी काम करता था. बॉम्बे के मराठी, गुजराती, हिंदी और अंग्रेज़ी भाषा रंग समूहों में सह-अस्तित्व था और एक-दूसरे में स्वस्थ दिलचस्पी भी थी.

लेकिन मुश्किलें थिएटर ग्रुप के भीतर शुरू हो गई थीं. अलग-अलग निर्देशक क़तार में लगकर अलग-अलग नाटक निर्देशित कर रहे थे जो कि मेरे अब्बा को पसंद नहीं था और न वे इसे स्वीकारने को राज़ी थे. खोर्शेद याद करती हैं, मुझे नहीं लगता कि पद्मसी परिवार बॉबी की भूमिका में किसी और को देखने को तैयार था, और अलक़ाज़ी वो भूमिका निभा रहे थे. उन्होंने नियम लागू करना शुरू किया कि हमें क्या करना चाहिए और क्या नहीं.

आख़िरकार कुछ लोगों ने महसूस किया कि ‘कला कला के लिए’ और ‘रंगमंच रंगमंच के लिए’ वह शय नहीं थी जिसे वो चाहते थे. अलक़ाज़ी के नाटक कभी पैसे कमाने के लिए नहीं होते थे. उनके पास एक तयशुदा तबक़ा था जो उनके नाटकों को देखने आता और सराहना करता. वे रुककर उनके बारे में बातचीत करते थे. रंगमंच कैसा होना चाहिए—इस बात पर दल के सदस्यों के बीच फ़ासला आ गया था.

‘अलक़ाज़ी मनोरंजन के बजाय सोचने वालों के रंगमंच के अधिक तरफ़दार थे और आख़िरकार अलक़ाज़ी जब अलग हुए थियटर ग्रुप सन्तुलित हो गया. वे दो या तीन नाटक करते जो पैसा कमाने के लिए होते थे और एक या दो वैसे नाटक जो ‘अच्छा’ रंगमंच करने के लिए होते थे.’

एलेक को वह निर्णायक दिन साफ़-साफ़ याद है जब थिएटर ग्रुप बिखरा और वे इसकी तुलना दूसरे विश्वयुद्ध के बाद के पोस्टडैम सम्मेलन से करते हैं. ‘बिखराव आख़िरकार इसलिए आया क्योंकि एल्क (इब्राहिम अलक़ाज़ी) ने एक शाम हम सबको थिएटर ग्रुप में बुलाया और कहा, ‘देखिए, मैं एक नीति के बारे में ऐलान करना चाहता हूं. मैं सदर हूं और आज के बाद केवल एक निर्देशक होगा क्योंकि बहुत सारे निर्देशक होने के कारण अभिनेता इस बारे में ग़फ़लत में पड़ रहे हैं कि अभिनय क्या है.’

रिहर्सल के दौरान इब्राहीम अलक़ाज़ी. (फोटो साभार: jaiarjun.blogspot.com)

‘मैं बहुत नाराज़ था, और सिल्वी भी, मैंने कहा, ‘लेकिन एल्क, यह जम्हूरियत नहीं है.’ उसने कहा, ‘कोई जम्हूरियत नहीं है…रंगमंच जीवन है, रंगमंच मज़हब है.’ और तब सदस्यों में से एक मेहली गोभाई ने कुछ ऐसा कहा जो थिएटर ग्रुप की तारीख़ में बहुत गहराई से दर्ज हो गया. उन्होंने कहा, ‘एल्क मज़हब का यह कैसा दिखावा है ये मुझे बहुत समझ में नहीं आता.’ एलेक खड़े हुए और चिल्ला पड़े, ‘दिखावा, तुम मेरे काम को दिखावा कह रहे हो? टुच्चे झींगे कहीं के’ और वह कहते चले गए…. मेहली हैरान रह गए और मुझे लगता है कि थोड़ी देर बाद ही वह बैठक से बाहर चले गए. लेकिन वह शाम बहुत याद रहने वाली थी.

बाद में हमने सुना कि एलेक ने फ़ैसला किया है कि ख़ुद का समूह बनाएँगे और थिएटर ग्रुप के सदस्य जो उनसे जुड़ना चाहेंगे उनका स्वागत रहेगा लेकिन वे थिएटर ग्रुप के लिए कभी अभिनय नहीं कर पाएंगे या किसी और के लिए भी. वे केवल थिएटर यूनिट के लिए ही अभिनय कर सकेंगे. मुझे यह बहुत बांधने वाला लगा. लेकिन कुछ लोग वहां गए. केर्सी (कतरक) ने कहा, ‘मैं उस्ताद से सहमत हूं, लेकिन वह एक ही तरह से तालीम देते हैं और मुझे नहीं लगता यह कोई अच्छी बात है. आपको अलग-अलग तरह का तजुर्बा होना चाहिए. अब क्या होने लगा था कि स्कूल में आपके पूरे जीवनकाल में आपको एक ही उस्ताद मिलने वाला था.’

यह बहुत उदास करने वाला दिन था लेकिन डेरेक सख़्त थे बहुत. उन्होंने कहा, ‘एलेक तुम सही हो, हमें बॉबी का थिएटर ग्रुप क्यों छोड़ देना चाहिए, क्या एल्क के कहने-भर से क्योंकि वह चाहते हैं कि केवल एक निर्देशक रहे? मैं भी निर्देशन करना चाहता हूं’ और उन्होंने निर्देशन किया.

उन्होंने आदि मर्जबान के साथ निर्माता-निर्देशक की एक अच्छी जोड़ी बनाई. उन्होंने एक ऐसी कामयाब प्रस्तुति की जैसी थिएटर ग्रुप ने कभी नहीं देखी थी उसका नाम था ‘द लिटिल हट.

एक तरफ़ उनके शौहर थे और दूसरी तरफ़ जन्म देने वाला परिवार. मेरी अम्मा के लिए यह फ़ैसला लेना बहुत ही कठिन रहा होगा. लेकिन उन्हें मालूम था कि मेरे अब्बा ने पद्मसी परिवार के सभी लोगों से क़रीबी रिश्ता बनाया था और बहुत प्यार भी मिला था उन्हें. उन्होंने दिखाया था कि वह सुल्तान के विचारों की सच्चे मशालवाहक हैं और समय के साथ चीज़ें ठीक होती गईं. सुल्तान को गुज़रे हुए आठ वर्ष बीत चुके थे.

(साभार: राजकमल प्रकाशन)