विद्यापति: इतिहास की देह में धड़कता कवि

पुस्तक समीक्षा: कमलानंद झा की किताब ‘विद्यापति: राजकाज और समाज’ मिथिला के उस सांस्कृतिक भूगोल में लौटने का आमंत्रण है जहां भाषा, सत्ता और कविता एक दूसरे से बात करती थीं. यह किताब उस कवि का पुनर्पाठ है जिसने राज्य को धर्म से नहीं, बल्कि लोक से जोड़ा.

कमलानंद झा का सबसे मूल्यवान योगदान यह है कि वे विद्यापति की भाषा को केवल काव्य माध्यम नहीं, राजनीतिक प्रतीक के रूप में देखते हैं. (फोटो साभार: अंतिका प्रकाशन)

जब हम ‘कवि कोकिल विद्यापति’ (1360-1450) का नाम लेते हैं, तो एक युग-दृष्टि सामने आती है. मिथिला की भूमि, राजदरबार का आंगन, संस्कृत-शास्त्र और लोक-गीत का संगम. कमलानंद  झा की पुस्तक ‘विद्यापति: राजकाज और समाज’ हमें विद्यापति को उसी दृष्‍टि से देखने का निमंत्रण देती है, जहां कवि सिर्फ प्रेम-गीतकार नहीं, बल्कि राज-सभा, लोकवृत्त, पुरोहित-पद, समाज-संवेदना एवं भाषा-उत्थान के साथ भाषा-संश्लेषण  की भूमिका में भी सक्रिय थी.

यह पुस्तक विद्यापति की रचनाओं में मिथिला के बहाने तत्कालीन भारतीय समाज की सुकृति और विकृति को ऐतिहासिक संदर्भों में देखने का प्रयास करती है. यह मिथिला के उस सांस्कृतिक भूगोल में लौटने का आमंत्रण है जहां भाषा, सत्ता और कविता एक दूसरे से बात करती थीं. यह उस कवि का पुनर्पाठ है जिसने राज्य को धर्म से नहीं, बल्कि लोक से जोड़ा. जिसने प्रेम में दर्शन देखा और शासन में करुणा की कल्पना की.

विद्यापति की स्मृति में मिथिला आज भी गाती है, खेतों में, विवाह गीतों में, संध्या की आरतियों में. पर पुस्तक बताती है कि यह स्मृति केवल भक्ति की नहीं, एक सुसंगठित सामाजिक चेतना की भी है.

विद्यापति  हमारे इतिहास में उतने ही गहरे हैं जितनी गंगा की रेत में बची हुई नमी, दिखाई भले न दे, पर सूखती नहीं.

इतिहास के भीतर कवि का संवाद

चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में मिथिला सामंतवाद और सल्तनती सत्ता के बीच अपनी अस्मिता बनाए हुए थी. राजा शिवसिंह और रानी लखिमादेवी के दरबार में कवि होना नीति और विवेक का प्रश्न था. मैथिली आलोचक मोहन भारद्वाज कहते हैं, ‘विद्यापति ने भक्ति को लोक में उतारा, उसे दरबार से निकालकर घरों की चौखट पर ला खड़ा किया.’

कमलानंद झा बताते हैं कि उनकी कविता दरबार और देहात के बीच की दूरी को पाटती है, राज-काज और लोक के सुख-दुख को समान रूप से समेटती है.

रामविलास शर्मा उन्हें ‘संक्रमणकाल का कवि’ कहते हुए उत्तर भारत में हुएआरंभिक नवजागरण का अग्रदूतकहा  क्योंकि संस्कृत की ऊंची दीवारों के पार जाकर मैथिली में लिखना उनका केवल भाषिक निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और सांस्कृतिक विद्रोह था. नामवर सिंह ने कहा, ‘विद्यापति की भाषा संस्कृत की स्मृति और लोक की लय का अद्भुत संगम है.’ झा बताते हैं कि यही संगम उन्हें कालातीत बनाता है.

विद्यापति की कविता, उनके पद, उनके नीति-वचन और भक्ति-गीत, तीनों विमर्श;  धर्म, प्रेम और राजनीति,  को एक साथ जोड़ते हैं. दरबार और देहात, संस्कृत और मैथिली, सत्ता और लोक, सभी के बीच उनकी संवेदना बराबर और समान रूप से प्रवाहित होती है. यही कारण है कि उनका समय बीत गया, पर उनकी कविता आज भी मिथिला की मिट्टी, उसकी नदी और उसके लोकगीतों में ध्वनित है.

पुस्तक की संरचना

यह 208 पृष्ठों की पुस्तक दस प्रमुख खंडों में विभाजित है और प्रत्येक खंड गहन विश्लेषण प्रस्तुत करता है. कमलानंद झा ने विद्यापति के व्यक्तित्व और रचनाशीलता को  परस्पर जुड़े तीन आयामों में देखा है. पहला, भाषावर्गीय संदर्भ, जिसमें कवि की संस्कृत, अपभ्रंश/अवहट्ट और मैथिली तीनों में सक्रियता और उनके प्रयोग का विश्लेषण किया गया है. दूसरा, राजपद और सामाजिकसिद्धि, जिसमें तिरहुत-मिथिला के दरबार, ब्राह्मण-ठाकुर परिवार और ओइनवार वंश के भीतर कवि की भूमिका का अध्ययन शामिल है. तीसरा, सामाजिक संवेदना और स्त्रीवर्गलोकभाषा, जिसके माध्यम से कवि की लोकचेतना, स्त्री के प्रति सहानुभूति और भाषा की जनपदीय आत्मा की पहचान की गई है.

पाठक समझ सकता है कि विद्यापति की कविता अपने  समय और समाज से विरक्त नहीं थी. वह अपने युग की राजनीतिक उथल-पुथल, सांस्कृतिक संक्रमण और सामाजिक विवेक के बीच सक्रिय रूप से धड़कती थी. यही दुर्लभ काव्यबोध विद्यापति की विगत सार्थकता और वर्तमान अर्थवत्ता का परिचायक है.

विद्यापति उस समय की भाषा का मौलिक संधान करते थे. देसिल बयना सभ जान मिट्ठामें अवहट्ट के प्रयोग से  यह संकेत मिलता है कि कवि ने ‘शास्त्र और लोक के बीच सेतु बनाया.

संस्कृत-रचनाएं, अपभ्रंश/अवहट्ट पदावलियां, मैथिली लोकगीत, यह त्रिभुज सिर्फ भाषा-भिन्नता नहीं, सामाजिक-वर्ग-भिन्नता की कहानियां भी कहता है. उनकी रचनाओं में  संस्कृत, हिंदी, मैथिली, फ़ारसी, बांग्ला, उड़िया तथा असमिया शब्दों की घुलावट भाषा का नया मानक बनाती है. पुस्तक रेखांकित करती है कि जिस समय ‘यवन-भाषा’ का प्रयोग ‘पापकर्म’ माना जाता था, विद्यापति ने अपनी रचनाओं में साहसपूर्वक ऐसे ‘विजातीय’ शब्दों का खूब प्रयोग किया है.

विद्यापति-साहित्य के अधिकारिक विद्वान मुनीश्वर झा विद्यापति की इस भाषा-नीति को ‘स्तुत्य’ प्रयास मानते हैं.

कमलानंद झा बताते हैं कि विद्यापति का संबंध मिथिला-तिरहुत के ओइनवार वंशीय ब्राह्मण-परिवार से  था, जहां उन्होंने पुरोहित, मंत्री, कवि, सलाहकार की भूमिकाएं निभाईं. इस पृष्ठभूमि को समझना आवश्यक है क्योंकि यह उनकी काव्य-भूमिका को दरबार से जोड़ता है. विद्यापति ने ऐसी कविताओं-लेखन पर बल दिया जो ‘साधारण जन’ की स्थितियों को उद्धृत करती हों. लेखक इस रूप से विद्यापति को सिर्फ श्रृंगारिक पद रचने वाले दरबारी-कवि नहीं बल्कि गहरे सामाजिक सरोकार का कवि मानते हैं.

लेखक के अनुसार, विद्यापति की उन्नत चेतना का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि वे आम मनुष्य के ‘मान’ की प्रतिष्ठा को सर्वोपरि मानते हैं. मध्यकाल के किसी कवि का यह कहना रोमांचित करता है कि जीवन में चाहे जितना बड़ा संकट क्यों न आ जाए उचित बात कहने से पीछे नहीं हटना चाहिए- मान बेचि यदि प्राण जो राखिअ, ता ते मरण  भला.’

भाषा का यह लोकप्रयोग ही राजनीति थी

कमलानंद झा का सबसे मूल्यवान योगदान यह है कि वे विद्यापति की भाषा को केवल काव्य माध्यम नहीं, राजनीतिक प्रतीक के रूप में देखते हैं. मैथिली का चयन दरअसल सत्ता की भाषा के विरुद्ध लोक की भाषा का चयन था.

विद्यापति ने अपनी संस्कृत रचना ‘लिखावाली’ में तिरहुत (मिथिला) राजसत्ता में दासप्रथा की दुश्वारियां, करप्रथा की कठिनाइयां और अमानवीय ऋण-व्यवस्था की सचाइयों  को उद्घाटित किया है. पूरी संस्कृत परंपरा में आमलोक की चिंता की ऐसी रचना ढूंढ पाना मुश्किल है. शास्त्र से लोक और लोक से शास्त्र की आवाजाही विद्यापति को अनूठा कवि बनाती है.

नामवर सिंह ने कहा था ‘विद्यापति की भाषा संस्कृत की स्मृति और लोक की लय का अद्भुत मेल है.’ यह वाक्य पुस्तक में प्रत्यक्ष होता है.

वे बताते हैं कि विद्यापति के यहां शब्द केवल ध्वनि नहीं, सामाजिक घटना हैं. उनके पद, नीति-वचन और भक्ति गीत एक साथ तीन विमर्श रचते हैं- धर्म, राजनीति और प्रेम का. लेखक की दृष्टि यहां विश्लेषणात्मक होते हुए भी भावनात्मक बनी रहती है. वे बताते हैं कि मैथिली में  विद्यापति का बोलना, एक तरह से, उस समय की वर्गीय संरचना के विरुद्ध भाषिक असहमति  थी.

यह वही स्वर था जो आगे चलकर कबीर के विरोध, सूर के करुण, और तुलसी के सामाजिक विवेक में बदल गया.

राज्यधर्म और नैतिकता का त्रिकोण

विद्यापति के लिए धर्म कोई सत्ता का औजार नहीं था, वह लोक की नैतिकता थी. उनकी राजनीति’ में नीति केवल शासन का उपकरण नहीं, न्याय की शर्त बनती है.

कमलानंद झा इस पर विस्तार से लिखते हैं. विद्यापति कहते हैं: राजा वही जो धर्म से जुड़ा होधर्म वही जो लोक के पक्ष में हो. रामविलास शर्मा ने इसे ‘लोकाधारित राजनीति’ कहा था, जहां सत्ता ईश्वर के आदेश से नहीं, समाज की आवश्यकताओं से संचालित होती है.

झा इस विचार को और गहराई में ले जाते हैं, विद्यापति धर्म को सत्ता की वैधता का आधार नहीं, उसकी सीमा बनाते हैं. यह दृष्टि आधुनिक भारतीय राजनीति के नैतिक विमर्श की जड़ में है, जिसे गांधी तक ने आगे बढ़ाया. राज, धर्म और न्याय की दृष्टि से उनकी पुस्तक ‘पुरुष परीक्षा’ को भाषाविद ग्रियर्सन ने विरलतम ‘पॉलिसी बुक’ माना, जिसे इंग्लैंड के सिविल सर्विसेज की परीक्षा के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया था.

स्त्रीप्रेम और सत्ता का नैतिक प्रतिरोध

पुस्तक का एक और महत्वपूर्ण आयाम है, ‘स्त्री दृष्टि’. कमलानंद झा ने विद्यापति की स्त्रियों को केवल नायिका नहीं, सामाजिक चेतना के प्रतीक के रूप में देखा है. वे बताते हैं ‘विद्यापति की स्त्रियां प्रतीक्षा नहीं करतींवे स्मृति में बोलती हैं. उनके प्रेम में सामाजिक जागृति है.

यहां कविता स्त्री की देह से नहीं, उसकी आत्मा से शुरू होती है. विद्यापति के यहां नायिका अपने समय की नैतिकता को तोड़ती है. लेखक इस कथन को पुनर्परिभाषित करते हैं, यह केवल प्रेम नहीं, प्रतिरोध है. विद्यापति के प्रेमगीत मिथिला के स्त्री-मन की पहली स्वतंत्र आवाज़ें हैं, जहां प्रेम भाव नहीं, अधिकार है.

लेखक के अनुसार मध्यकाल में विद्यापति अकेले कवि हैं जिन्होंने प्रेम और यौनिकता को पुरुषदृष्टि के बरक्स स्त्रीदृष्टि से देखने का प्रयास किया है. विद्यापति प्रेम की परवशता के सख्त ख़िलाफ़ थे-‘परबस जनु हो हमर पियार’. तत्कालीन समाज में स्त्री-दुर्दशा से आहत कवि विद्यापति अपनी एक पदावली में यहां तक कहते हैं कि – ‘स्त्री भए जनमे जनु कोई’ (स्त्री होकर किसी को पैदा नहीं होना चाहिए)

कमलानंद झा ने भाषा, सत्ता और समाज, इन तीनों को एक साथ देखने का जो प्रयास किया है, वह सामान्यतः काव्य चर्चाओं में अनुपस्थित रहता है. यह समय की जटिलताओं से जूझते कवि का पुनर्पाठ है.

लेकिन किताब से कुछ अपेक्षाएं रह जाती हैं. मसलन, कुछ जगहों पर विस्तार हो सकता था. यदि कवि के पदों के अधिक उद्धरण जोड़े जाते, तो पाठ कहीं प्रामाणिक  होता. तुग़लक आक्रमण और तिरहुत-कर्नाट वंश के ऐतिहासिक संदर्भों पर स्रोत-आधारित विश्लेषण अधिक हो सकता था.

इसके बावजूद यह किताब हमें एक नया विद्यापति दिखाती है, जो आज के समाज से भी संवाद करता है.

(आशुतोष कुमार ठाकुर एक मैनेजमेंट प्रोफेशनल हैं, साहित्य और कला पर नियमित लिखते हैं.)