द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली: औरतों की जानिब से ग़ैर-आधिकारिक हिंदू राष्ट्र युक्त भारत को एक जवाब

अनुषा रिज़वी की 'द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली' फिल्म के किरदारों के नाम भले मुस्लिम हैं मगर उनके अभिनय में हिंदू राष्ट्र के किरदारों की परछाई तैर रही है. नारों की ध्वनि सुनाई दे रही है. फिल्म के पर्दे पर इनमें से कोई साक्षात दिखाई नहीं देता लेकिन उनकी मौजूदगी का अहसास बना हुआ है. यही इस फिल्म का कमाल है.

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द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली' उन मुस्लिम बहनों की कहानी है जो विराट हिंदू राष्ट्र के नारों से पैदा हुई परिस्थितियों का प्रतिकार करती हैं. (फोटो साभार: अनुषा रिज़वी और जियो हॉटस्टार)

बहुत देर तक सोचता रहा. द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली देखते हुए हंसी ज़्यादा आई या बहुत सी हंसी आते-आते नहीं भी आई? मुसलमानों की हर चीज़ से नफ़रत के इस दौर में यह कहानी एक मुस्लिम फैमिली की है या एक मुस्लिम फैमिली आज कल की हिंदू फैमिली या विराट हिंदू राष्ट्र की कहानी कह रही है? मुझे यह फिल्म उस विराट हिंदू राष्ट्र (हिरा) की लगी, जिसकी स्थापना की आधिकारिक घोषणा तो नहीं हुई है मगर ग़ैर आधिकारिक रूप से स्थापना हो चुकी है.

फिल्म के किरदारों के नाम भले मुस्लिम हैं मगर उनके अभिनय में हिंदू राष्ट्र के किरदारों की परछाई तैर रही है. नारों की ध्वनि सुनाई दे रही है. फिल्म के पर्दे पर इनमें से कोई साक्षात दिखाई नहीं देता लेकिन उनकी मौजूदगी का अहसास बना हुआ है. यही इस फिल्म का कमाल है कि जो नहीं है या कम है, वही इस फिल्म में सबसे अधिक नज़र आ रहा है. आज जब हर दूसरी या तीसरी फिल्म में एक मुसलमान या कई मुसलमान विलेन बनाए जाते हैं, अनुषा रिज़वी एक मुस्लिम परिवार को हीरो की तरह पेश करती हैं.

मुस्लिम राजनीतिक स्पेस में मर्दों की मौजूदगी है लेकिन फिल्म की कहानी में मुस्लिम औरतें राजनीति का जवाब देती हैं. (फोटो साभार: जियो हॉटस्टार)

इसी समय में धुरंधर के रहमान डाकू के डांस पर अन-ऑफिशियल हिंदू राष्ट्र( हिरा) के फुल्ली एनटाइटल्ड नागरिक फिदा हैं, झूम रहे हैं, द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली में मुस्लिम बहनें नायक की तरह आती हैं और भीड़ के भय का मुकाबला करते हुए मंगल गीत गाने लग जाती हैं. उस गीत के बोल को हिंदू और मुसलमान में बांटना असंभव है. दिल्ली के एक बंद कमरे में उस भारत को बचाकर रखना और बचाए रखने का ऐलान करती हैं, जिस भारत के मिटा देने का विजय जुलूस रोज़ निकलता रहता है.

द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली में कोई मुस्लिम मर्द हीरो नहीं है. कोई औवैसी जैसा धारदार भाषण नहीं दे रहा है, इमरान प्रतापगढ़ी की तरह शेर-ओ-शायरी नहीं सुना रहा और न ही समर्पित होते हुए भी शाहनवाज़ हुसैन की तरह कार्यकर्ता और नेता के बीच झूलता नज़र आ रहा है. ऐसा कोई मर्द नहीं है. मुस्लिम राजनीति के स्पेस में मर्दों की मौजूदगी है लेकिन द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली की कहानी में मुस्लिम औरतें राजनीति का जवाब देती हैं.

अनुषा की यह फिल्म शम्सुद्दीन परिवार की औरतों की जानिब से अनऑफिशियल हिंदू राष्ट्र युक्त भारत को एक जवाब है.

आज कितने निर्देशक ऐसी कहानी को हाथ लगाएंगे, कई बार लगता है कि डरते-डरते उनके पास सेंसर की कैंची से बचाते हुए ऐसी कहानी कहने का फन भी नहीं बचा है. मुमकिन है द ग्रेट शम्सुद्दीन से भी अच्छी कहानी उनकी नज़र से गुज़री हो, जिसमें कोई मुस्लिम नाम वाला किरदार हीरो हो, गौ रक्षा के नाम पर फर्जी मुकदमे में फंसे मुस्लिम युवक की कहानी हो, लेकिन आज कोई भी इस कहानी पर फिल्म नहीं बनाएगा.

अनुभव सिन्हा की मुल्क अपवाद है. सेंसर बोर्ड को पता नहीं कि उसका काम कितना आसान हो गया है. उसकी मेज़ तक जो कहानियां पहुंचती हैं वो पहले ही सौ बार सेंसर हो चुकी होती हैं.

इस फिल्म का राष्ट्र एक कमरा है. इस कमरे में हिंदू राष्ट्र नहीं आया है लेकिन उसके आने की दहशत आती जाती रहती है. दरवाज़े पर है. खिड़कियों पर है. जब भी दरवाज़े की घंटी बजती है, लगता है कि वह भीड़ आ गई जिसके आने का डर किरदार जताते रहे हैं. जिस भीड़ के आने के डर से बहुत पहले ही बानी ने आदित्य से दूरी बना ली है. जिसने लिखने-बोलने से पहले हिसाब करना शुरू कर दिया है कि जान की सलामती के लिए कितना बोला जाए.

दरवाज़े पर भीड़ का इंतज़ार है लेकिन घंटी बजते ही आ जाती हैं कभी नबीला, कभी अमिताभ, कभी हुमायरा तो कभी पल्लवी को लिए ज़ोहेब चला आता है. बीच-बीच में मोबाइल पर गुरुग्राम की हिंसा की ख़बरें भी अलार्म की तरह बजती रहती हैं. जली हुई कार को अपना मान लेना भी हुमायरा के लिए कितना स्वाभाविक लगता है और यह भी मान लेता कि उसने अपने पति को हमेशा के लिए खो दिया है. आखिर तक वह इस यकीन से ख़ुद को अलग नहीं कर पाती है. हुमायरा के अभिनय का यह हिस्सा एक्टर का भी कमाल है और निर्देशक का भी.

यह फिल्म हंसने-हंसाने के लिए बनी है लेकिन दो हंसी के सीन के बीच उस भीड़ की मौजूदगी अपने समय की राजनीति से कनेक्ट हो जाती है. (फोटो साभार: जियो हॉटस्टार)

हिंसा में मार दिए जाने की आशंका से निकलकर कोई घर लौट आए और तो आने के बाद भी लगता है कि नहीं आया है. फिल्म ने अपनी तरफ से ऐसा कुछ नहीं कहा, हमने अपनी नज़र से ऐसे ही देखा है. इसी सीन से पहले जब हुमायरा अपने भीतर की दहशत को समेटते हुए बहन बानी से कहती है कि तुम बाहर के लिए अप्लाई कर दो. ठीक ऐन वक्त पर अनुषा का कैमरा ऐसे उठता है जैसे जिस छत पर यह बात कही जा रही है, उसी छत से एक जहाज़ उड़ा हो. यह सीन उस वादे पर ओस की तरह धीरे से बिखर जाती है, जो संविधान के पन्नों पर दर्ज है.

इस एक सीन के कारण द ग्रेट शम्सुद्दीन फिल्म में बटोरी गई सारी हंसी छूटकर गिर जाती है. अनुषा रिज़वी के क्राफ्ट का कमाल है कि उन्होंने इस फिल्म में ऐसे बहुत सारे रास्ते बनाए हैं जिनसे होकर बिना देश का सामना किए मनोरंजन करते हैं और फिल्म से बाहर आने के बाद मनोरंजन को भूलकर देश के बारे में सोचने लग जाते हैं.

यह फिल्म हंसने-हंसाने के लिए बनी है लेकिन दो हंसी के सीन के बीच उस भीड़ की मौजूदगी अपने समय की राजनीति से कनेक्ट हो जाती है. भीड़ आने वाली है. भीड़ आएगी ही इसके बाद भी बहनों के बीच छल-कपट, एक दूसरे को नीचा दिखाना, एक दूसरे को गले लगाने का सिलसिला जारी रहता है. जैसे टाइटैनिक डूबने वाला है और जहाज़ पर पार्टी चल रही है. टाइटैनिक डूब जाता है लेकिन द ग्रेट शम्सुद्दीन का परिवार और उनके सपनों का भारत नहीं डूबता है.

एक मुस्लिम परिवार में हिंदू लड़की और मुस्लिम लड़के का कहना कि शादी करेगा. अब यह केवल शादी का मामला नहीं है. ज़ोहेब पल्लवी के साथ आता है, जैसे जैसे औरतों की उस पर नज़र पड़ती है, लव जिहाद के नाम पर लिखी गईं झूठी हेडलाइनें, कहानियां, फर्ज़ी मुकदमे आंखों के सामने नाचने लगते हैं. भला हो घूस लेने वाले जज का, जो लव जिहाद के डर को किनारे कर घूस का रेट बढ़ा देता है लेकिन शादी की रजिस्ट्री करा देता है. इस फिल्म कोई लव जिहाद नहीं कहता है. कोई धर्मांतरण कानून का नाम नहीं लेता है, कोई आजीवन कारावास की बात नहीं करता है. सब भीड़ का नाम लेते हैं और भीड़ का नाम लेने से ही यह सब सुनाई देने लग जाता है.

कहानी के बीच-बीच में पल्लवी का फोन जब भी ज़ोर-ज़ोर से बजता है, पापा कॉलिंग, मम्मी कॉलिंग, दादी कॉालिंग, लगता है कि भीड़ का फोन आया है.

यह फिल्म भरोसा दिलाती है कि नारों से डरना अलग बात है जब तक इस देश में जज घूस लेता रहेगा, नोटबंदी के बाद भी कैश का चलन रहेगा, बैंक फेल होते रहेंगे, रिश्वत लेकर दीपक भाई बैंक में कैश जमा करवाते रहेंगे तब तक जीने के सारे रास्ते बंद नहीं होंगे. बस रिश्वत का रेट ज़्यादा देना होगा. रिश्वत लेने वाले अफसर उसी से घूस लेते हैं जो मजबूर होता है, ऐसा नहीं है कि मजबूर हिंदू से रिश्वत नहीं लेते हैं, बस इतना ही फर्क आया है कि मजबूर मुसलमान से थोड़ा ज़्यादा रिश्वत लेने लगे हैं.

लेकिन हुमायरा भी अपनी मां का दस्तख़त कर 25 लाख कैश निकालकर इरम को दे देती है और इरम से कोई हिंदू दोस्त विक्की बिज़नेस के लिए बहाने बनाकर झपट लेता है. विक्की गायब हो जाता है लेकिन लौट आता है तो बहाने बना देता है. विक्की का पच्चीस लाख लौटाने का आश्वासन को निर्देशक सबके खाते में पंद्रह लाख आने के वादे की तरह छोड़कर आगे बढ़ जाती हैं. इरम उन मुस्लिम महिलाओं की तरह लगीं जो गोदी चैनलों में जाकर एंकर और हिरा की बात करने वाली पार्टी में प्रवक्ता बन जाती हैं. विक्की का माफ़ कर देना बताता है कि इरम और हुमायरा के पास कोई चारा नहीं बचा है.

उधर सुप्रीम कोर्ट भी असल राष्ट्र में संदेसरा ब्रदर्श को माफी दे देता है. संदेसरा ब्रदर्स ने आदेश के मुताबिक 5, 100 करोड़ वापस कर दिया है, अब उन्हें बैंक फ्रॉड के केस से मुक्ति भी मिल जाएगी.

यही इस फिल्म का भरोसा है और यही आज के दौर में शम्सुद्दीन परिवार की औरतों का भरोसा है. ऐसा नहीं है कि हिंदू राष्ट्र के आने पर कुर्सी पर बैठे लोगों का चरित्र बदल गया है. वे सच के पुजारी हो गए हैं और न्याय करते हुए देवता. ऐसा कुछ नहीं हुआ और ऐसा कभी होगा भी नहीं. घूस के बिना इस राष्ट्र की कल्पना धर्म की हर अवधारणा के साथ बेवफाई है. लेकिन बहनें भी कहां नमाज़ और उमराह के नाम पर एक दूसरे को छोड़ती हैं. इस्लाम के पालन के नाम पर कट्टर कहे जाने वाले मुस्लिम परिवार की औरतें ही एक दूसरे की पोल खोल रही हैं और पता चला रहा है कि फर्ज़ से एडजस्टमेंट का मामला हिंदू परिवारों के एडजस्टमेंट के जैसा ही है.

बहनों को इनकम टैक्स का डर है, काला धन रखना गुनाह लगता है लेकिन कैश में मेहर की राशि स्वीकार करने का तर्क खोज लाती हैं. उन्हें रिश्वत देकर शादी से भी समस्या नहीं होती है. यहीं पर कहानी के किरदार जीवन और राष्ट्र में हावी धर्म का स्वीट विरोध करने लग जाते हैं. आप इसे इनोसेंट रेज़िस्टेंट भी कह सकते हैं. फिल्म का पूरा प्लॉट बता रहा है कि अनऑफिशियल हिंदू राष्ट्र युक्त भारत की राजनीति का संबंध राष्ट्र और पारिवारिक जीवन में नैतिकता और न्याय की स्थापना से नहीं है. इसलिए देश में जो चल रहा है वही घरों में भी चलता रहेगा.

हर एक्टर की आंखों में कितना कुछ दिखा लेकिन बानी की आंखों में अलग ही फिल्म चलती रही. (फोटो साभार: जियो हॉटस्टार)

निर्देशक अनुषा रिज़वी का कैमरा आंखों का दीवाना होगा तभी तो सभी किरदारों की आंखें इतनी निखरकर आई हैं. कब किसकी आंखों में होंठ हिल जाते, उन पर नज़र पड़ते ही कई बार ये अफसोस तो हुआ कि काश कैमरे के पीछे मैं होता. अच्छी फिल्म वही होती है जिसे देखते हुए आप ख़ुद भी बनाने लगते हैं. हर एक्टर की आंखों में कितना कुछ दिखा लेकिन बानी की आंखों में अलग ही फिल्म चलती रही जो इस फिल्म में मूर्त रूप में नहीं थी और जिसे समझना सेंसर वालों के बस की बात नहीं थी.

बानी के रूप में कृतिका कामरा की एक्टिंग शानदार था लेकिन तय करना मुश्किल है कि इतने सारे किरदारों में किसका रोल कमज़ोर है और अभिनय ढीला. एक बंद कमरे में इतने सारे किरदारों का शानदार अभिनय फिल्म में जान डालता है. 90 साल की फरीदा जलाल का अभिनय फिल्म में अपने उस हिंदुस्तान को खोज रहा है, जिस हिंदुस्तान में उन्होंने अभिनय की यात्रा शुरू की थी. इस उम्र में फ़रीदा जलाल के अभिनय का आत्मविश्वास उसी हिंदुस्तान के प्रति विश्वास को व्यक्त करता है जो कल भी था, कल भी रहेगा.

कई समीक्षकों ने कॉमेडी का ज़िक्र किया लेकिन यह कॉमेडी कैसे हो सकती है. मैं कॉमेडी की परिभाषा नहीं जानता लेकिन उस भाषा को जानता हूं जो इस वक्त इस हालात को कहते हुए ख़ुद पर हंसती है. अकेले में रोती है.

द ग्रेट शम्सुद्दीन फैमिली की कहानी उन मुस्लिम बहनों की कहानी है जो विराट हिंदू राष्ट्र के नारों से पैदा हुई परिस्थितियों का प्रतिकार करती हैं और उन हिंदू परिवारों से कहानी कहती है जो इस भय को समझते हैं मगर उनके पास न तो इस दौर में जीने और इस दौर से लड़ने की भाषा है. जिसे आप लिबरल कहते हैं, जिसे इस फिल्म में लिबरल कहा गया है. फिल्म हॉटस्टार पर स्ट्रीम हो रही है, देखिएगा.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं. )