संस्मरण: मनरेगा श्रमिकों की उम्मीद बन गया था…

नरेगा का लागू होना देश के श्रमिक इतिहास में पहली घटना थी जब महिलाओं को भी पुरुषों के समान मज़दूरी मिलने लगी थी. बेबस और लाचार ग्रामीण दलित आदिवासी महिलाओं में एक अदृश्य राजनीतिक, सामाजिक सौदेबाज़ी की ताक़त का संचार तेज़ी से हुआ था. अब सरकार ने उनकी उम्मीद छीन ली है.

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(प्रतीकात्मक फोटो साभार: UN Women Asia and Pacific/Flickr CC BY NC ND 2.0)

बतौर भ्रूण भारत के संविधान की कोख में अनुच्छेद 41 के रूप में साढ़े पांच दशकों तक पल्लवित हुआ था वो. भारत की चौदहवीं लोकसभा के मानसून सत्र ने उसे जन्म दिया था और प्रेम से उसका नाम राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी कानून 2005 रखा गया. 2 फरवरी 2006 से उनके नन्हे कदम देश के प्रथम 200 जिलों में पड़े. दो जून की रोटी के लिए हाड़तोड़ मेहनतकश मजदूरों ने अपने गांव, पंचायतों और ब्लॉको में अति उत्साह से उसे गले लगाया, अपनाया.

उसकी लोकप्रियता और स्वीकार्यता इतनी तेजी से फैलने लगी कि जल्द ही वह देश के जम्मू कश्मीर को छोड़कर सभी ग्रामीण इलाकों में लागू हुआ. देश के मजदूर इतिहास में पहली घटना थी जब महिलाओं को भी पुरुषों के समान मजदूरी मिलने लगे. बेबस और लाचार ग्रामीण दलित आदिवासी महिलाओं में एक अदृश्य राजनीतिक, सामाजिक सौदेबाजी की ताकत का संचार तेजी से होने लगा.

याद है मुझे वो वाकया जब राजधानी रांची से सुदूर गढ़वा जिला मेराल ब्लॉक की दलित भूमिहीन महिला सुनीता देवी की सौदेबाजी के झारखंड के लिए दो कीर्तिमान स्थापित किए.

सन् 2008, बारिश का समय जब गांव के जमींदार मजदूर बस्तियों में जाकर उन्हें अपने खेतों में बिचड़ा उखाड़ने और धान की रोपाई के लिए सुबह-सुबह हांकने पहुंचते हैं. दिनभर का मेहनताना मजदूरों को 2 किलो मकई या ऐसे ही कुछ अनाज दी जाती थी, जिसे शाम में लाकर मजदूरों के परिवार ढेंकी में कूटते और शाम का खाना बनाकर खाते. उनकी दैनिक नियति यही थी. ठीक उन दिनों गांव में नरेगा सड़क निर्माण का काम चल रहा था, सुनीता देवी सहित अन्य महिला मजदूर नरेगा ने अप्रत्याशित जोश भर ही दिया था.

उन्होंने जमींदारों से खुलेआम मजदूरी दर की सौदेबाजी की, कि नरेगा में कमाएंगे तो हमें 86 रुपये मिलेंगे और आपके खेत में कमाएंगे तो मात्र दो किलो अनाज जिसका बाजार मूल्य 30 रुपये होगा. स्मरण रहे उस वक्त नरेगा की एक दिन की मजदूरी 86 रुपये निर्धारित थी. कई दिनों तक जमींदार मजदूरों को मनाने आते रहे लेकिन मजदूर टस से मस नहीं हुए, कृषि का सीजन निकलता जा रहा था, अंतत: जमींदारों को 86 रुपये मजदूरी देकर धान की रोपाई करनी पड़ी.

दूसरी परिघटना भी उसी साल की है.

उस साल झारखंड के कुछ जिले अनावृष्टि की चपेट में थे. बारिश न होने की वजह से मिट्टी खुदाई में मजदूरों को अधिक मेहनत करनी पड़ रही थी. सुनीता देवी के ही इलाके में सड़क निर्माण का काम चल रहा था. कार्यस्थल पर प्रखंड से अभियंता आए और मजदूरों को धमकाया कि जो मजदूर एक दिन में 100 घनफीट मिट्टी नहीं काट सकेगा, उसे उस दिन की आधी मजदूरी ही भुगतान की जाएगी.

मेहनतकश सुनीता ने तुरंत पलटकर उनको चुनौती देते हुए कहा- इंजीनियर साहब आप तो मर्द हैं न! मान्यता ऐसी है कि पुरुष महिलाओं की अपेक्षा अधिक काम करता है. लीजिए कुदाल और गैंता, आप आज हमारे साथ काम कीजिए. यदि आप 7 घंटे में 100 घनफीट मिट्टी काट देंगे तो हम सभी 3 दर्जन मजदूर आज की पूरी कमाई आपको दे देंगे. यहां दो साल से सूखा पड़ा है और आप यहां ऑर्डर देने आए हैं!

सुनीता के इस सवाल ने सरकार को नरेगा मजदूरों के दैनिक कार्य निर्धारण को पुनर्परिभाषित किया. फिर 22 अक्तूबर 2008 को सरकार ने दैनिक कार्य मापी को मिट्टी के प्रकार के अनुसार 73, 54 और 44 घन करने संबंधी संकल्प जारी किया.

जब-जब नरेगा से लोग अगाध प्रेम करते रहे हैं तब-तब नरेगा के दुश्मनों ने उन्हें हमेशा के लिए रास्ते से हटाने का काम किया है. झारखंड में तापस सोरेन, तुरिया मुंडा, शिवशंकर साव, जग्गू भुइयां, नेयामत अंसारी आदि एक लंबी फेहरिस्त है, नरेगा के लिए अपनी जान न्योछावर करने वालों में.

नरेगा के लिए सबसे चर्चित, पलामू जिले के ललित मेहता हत्याकांड ने पूरे देश को झकझोर दिया था. 14 मई 2008 को उनकी हत्या डाल्टनगंज छत्तरपुर मार्ग पर कंडा घाटी में क्रूर तरीके से ठेकेदारों और प्रशासनिक गठजोड़ ने पत्थरों कुचलकर की गई थी. बताया गया था कि वे उस समय नरेगा सोशल ऑडिट गतिविधि के क्रम में डाल्टनगंज से छत्तरपुर को जा रहे थे. इसके बाद 26 मई की जनसुनवाई के दौरान तत्कालीन यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इस जघन्य हत्या की कड़ी निंदा करते हुए शोक संवेदना व्यक्त की थी.

सन 2009 में जब नरेगा तीन बरस का हुआ, सरकार ने उसका पुन: नामकरण किया और उसका नाम महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम 2005 हो गया. इस दौर तक आते-आते सिर्फ नाम नहीं बदला, लेकिन प्रशासनिक कार्यों में पारदर्शिता और जवाबदेही के नए आयाम स्थापित हुए.

सोशल ऑडिट में बड़े से बड़े ओहदे में पदस्थापित अधिकारी भी ग्राम सभा में, जनसुनवाइयों में फाइलें दिखाने और जवाब देने को बाध्य थे. वित्तीय गड़बड़ियों के लिए उन्हें दंडित भी होना पड़ा है. झारखंड में भारतीय प्रशासनिक सेवा की पूजा सिंघल इसका नायाब उदाहरण है. दूसरे अधीनस्थ कर्मियों और ठेकदारों का तो कोई हिसाब ही नहीं कि विगत 20 सालों मनरेगा भ्रष्टाचार में कितनी कारर्वाइयां हुई. मनरेगा ने ग्राम सभाओं और बाद में ग्राम पंचायतों को सशक्त करने में एक बड़ी भूमिका अदा की.

हमें याद है कि झारखंड में पहली बार 32 सालों बाद पंचायत चुनाव हुए और 2012 में सबसे पहले मनरेगा में चेक काटने का अधिकार पंचायतों को मिला था. सिर्फ देश ही नहीं पूरी दुनिया जब 2008 में वैश्विक आर्थिक सुनामी से जूझ रही थी, तब भारत में अर्थशास्त्रियों का आकलन है, कि इस आर्थिक संकट का दुष्प्रभाव भारत में कम रहा. क्योंकि देश में नरेगा था और इसके चलते ग्रामीण मजदूरों की बड़े हिस्सेदारी रहने के कारण लोगों के क्रय शक्ति में कोई कमी नहीं हुई.

दूसरी वैश्विक त्रासदी 2020 में कोविड काल था. दो वर्षों तक देश में सभी आर्थिक गतिविधियां ठप्प पड़ गई. कारखाने, फैक्ट्रियां, विनिर्माण कार्य सभी बंद हो गए. इन क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने जब मजदूरों को दुत्कारा तब गांव में मनरेगा ने इन बेबस मजदूरों को गले लगाया. उन्हें ग्राम पंचायतों में पंजीकरण कर काम दिया गया. वित्तीय वर्ष 2020-21 में 15 वर्षों के मनरेगा के इतिहास में सर्वाधिक वित्तीय खर्च 1 लाख 10 हजार करोड़ खर्च दर्ज किया गया.

फिर आया 2023. वैसे तो देश के माननीय प्रधानमंत्री ने साल 2015 के बजट सत्र में ‘मनरेगा को यूपीए सरकार की विफलताओं का स्मारक’ बताते हुए उसके प्रति नकारात्मक मंशा जाहिर कर दी थी, पर पहली जनवरी 2023 से देशभर के सभी मनरेगा योजनाओं में नेशनल मोबाइल मॉनिटरिंग सिस्टम (एनएमएमएस) से मजदूरों और उनके हाजिरी दर्ज करने वालों की तकनीकी परेशानी दोगुनी हो गई.

यह एक ऐसी निगरानी प्रणाली थी, जिसमें मजदूरों को कार्यस्थल पर ही कार्य के दौरान दो बार, सुबह और शाम मोबाइल के जरिये हाजिरी लेनी होती थी. इसके लिए मनरेगा मेटों के पास स्मार्टफोन होना अनिवार्य था. मोबाइल के साथ, नेटवर्क, इंटरनेट डाटा, चार्जिंग हेतु बिजली और तकनीकी जानकारी भी.

जब तक मजदूर एनएमएमएस के सदमें से उबर पाते, उनको एबीपीएस रूपी नए तकनीकी उलझन में फंसा दिया गया. ठीक अगले महीने, 1 फरवरी से सरकार ने आधार आधारित भुगतान प्रणाली अनिवार्य कर दी.

सरकार इतने से भी संतुष्ट नहीं थी, बाद में सरकार ने ड्रोन कैमरे से कार्यस्थल निगरानी हेतु अधिसूचना जारी कर दी. मनरेगा को लगातार कमजोर किया जा रहा था. इसी दौरान अंदेशा हो गया था कि मनरेगा की हत्या की गहरी साजिशें की जा रही है.

अंतत: मौकापरस्त दुश्मनों ने 26 करोड़ श्रमिकों की आशा बने ‘मनरेगा’ को बीते दिनों ख़त्म कर डाला. विपक्ष हमारी उम्मीद को बचाने की कोशिश करता रहा लेकिन कुछ बदल नहीं सका. सरकार से बस यही कहना है कि आप भले ही बहुमत के घमंड में चूर दोनों सदनों में जीत गए हों, लेकिन बिलखते मजदूरों के दिलों से हमेशा के लिए दूर हो गए.

(जेम्स हेरेन्ज झारखंड नरेगा वॉच के संयोजक हैं.)