साल 2025 बीतने पर है और नया साल बस कुछ ही दूरी पर खड़ा है. गुज़रते और आते इन सालों की संधि पर खड़े होकर हमने अपने समय के कुछ रचनाकारों-चिंतकों से यह जानना चाहा है कि साहित्य की दुनिया की किन चुनिंदा पुस्तकों को उन्होंने पिछले साल पढ़ा और उनकी क्या ऐसी अनोखी बात रही कि वह उनके जेहन में रह गई.
इस श्रृंखला के माध्यम से हम न केवल कुछ लोकप्रिय साहित्य के विषय में जानेंगे बल्कि उन्हें भी ढूंढ पाएंगे जो प्रसिद्धि के कोलाहल से कहीं दूर अपना पाठक खुद चुपचाप ढूंढ लेते हैं. इसकी पहली क़िस्त आपकी नज़र:
मृदुला गर्ग

तीन किताबें हैं, जिक्र करने को. दो नई पीढ़ी की हैं. एक, जया जादवानी की ‘इस शहर में इक शहर था’, दूसरी, लीलाधर मंडलोई की आत्मकथा ‘जब से आंख खुली है’ और तीसरी बहुत पहले पढ़ी अविस्मरणीय किताब है, अंग्रेज़ी की, आज की पीढ़ी के लिए पढ़नी ज़रूरी है- जॉन स्टाइनबेक की ‘शॉर्ट रेन ऑफ पिप्पिन द फ़ोर्थ.‘
जादवानी का उपन्यास विस्थापन से उपजे हेरवे की कहानी है, जिसमें तीखा दर्द भरती है,अनकही छूटी बचपन की मुहब्बत. खास बात, हेरवे का मरकज़ लाहौर नहीं, सिंध का कस्बा शिकारपुर है. सबसे दर्दीला है, छूटी सिंधी भाषा का दंश, जो जब सुनने को मिल जाए, वापस आया जीव, रस में डूब जाए.
मैंने पढ़ी, आनंद आया, आगे क्या होगा जानने की बेताबी हुई. छूटी महबूबा के दर्शन होंगे? हुए तो बात कही न जा सकी. कोई अड़चन नहीं थी, बस यही अड़चन थी.
जब से आंख खुली है, तंगहाली और भयावह स्थितियों में काम करने वाले खदान मजदूरों की आत्मकथा है, जिनमें लेखक समेत छोटे बच्चे शामिल हैं. पर लिखी इस अंदाज़ में गई है कि भयावह से भयावह हालात में भी, लालित्य और जिजीविषा खोज ली गई है. यूं कि रोने को तत्पर मुझ-सा पाठक भी, एक बारगी मुस्करा दे और समझे कि लो, ये तो अभाव के त्रासद विवरण के बीच, जिंदगी जीने का गुर सिखा गई. वह न सीखा और रो कर रह दिए तो माफ़ कीजिए, कुछ और पढ़ लें तो बेहतर होगा.
द शॉर्ट रेन ऑफ पिप्पिन द फ़ोर्थ पढ़ी तो त्रासदी के इंतहाई लम्हों में भी औचक हंसी आ गई. पढ़ डालिए. हमारे देश में आजकल जो राजनीतिक प्रहसन चल रहा है, उसकी प्रतिध्वनि मिलेगी.
उम्मीद है कि इतनी हिम्मत तो कर ही लेंगे कि उसका असली स्वरूप देख समझ लें. उसे हटाने की कल्पना से ही डर गए तो अचरज न होगा. पर एक बार पढ़ तो लें. आगे आपकी शख्सियत और आपकी कबूलियत.
रश्मि भारद्वाज

इस साल पढ़ी गई किताबों में मुझे सबसे अधिक प्रभावित अरुंधति रॉय द्वारा अपनी मां मेरी रॉय पर लिखे गए संस्मरण (memoir) मदर मैरी कम्स टू मी ने किया. मां से जुड़ी यादों को लिखती हुई अरुंधति ने पूरी निर्ममता, ईमानदारी और निर्भीकता से अपने जीवन की परतें भी खोली हैं. एक व्यक्ति और लेखक के रूप में अपनी असुरक्षाओं, उद्देश्यों और प्रतिबद्धताओं को उन्होने जिस बेबाकी और संजीदगी से पाठकों के सामने रखा है, वह दुर्लभ और अनुकरणीय है.
किताब पढ़ते हुए हम कई जगह उनके निजी निर्णयों और चुनावों से असहमत हो सकते हैं; यहां तक कि निर्णायक भूमिका में भी आ सकते हैं, लेकिन उनकी दुस्साहसी स्वीकरोक्ति एक मनुष्य और लेखक के तौर पर उनकी छवि को और उदार ही बनाती है. अपनी असुरक्षाओं, निर्णयों, मां और परिवार के अन्य सदस्यों के बारे में उनका निरपेक्ष लेकिन बहुत ही रोचक और विनोदपूर्ण वर्णन किताब से अंत तक बांधे रखता है.
‘पूर्व-राग’
सुपरिचित लेखक जयशंकर की यह किताब एक पाठक की नोटबुक, एक लेखक की तड़प, तलब और तलाश के नोट्स हैं, जो न सिर्फ़ रचनाकार के तौर पर उसकी निर्मिति की यात्रा-कथा कहते हैं, जीवन और कला को बेहद संजीदगी से देखने- परखने- महसूसने का नज़रिया भी देते हैं. इसे पढ़ते हुए आप सिर्फ़ रचनाकार के रूप में ही नहीं बल्कि एक मनुष्य के रूप में भी बहुत समृद्ध होते जाते हैं.
युवा लेखकों के लिए यह एक ज़रूरी किताब हैं जहां से उन्हें अपनी यात्रा के लिए ज़रूरी रसद मिल सकता है. रिल्के की ‘लेटर्स टू ए यंग पोएट’ की तरह यह भी लेखकों को लिखने-पढ़ने से गहनता से जोड़ने और उनकी दृष्टि विकसित करने में सहायक हो सकती है.
‘सह-सा’
जैसा कौतुकविहीन, अनाटकीय, धीमी लगभग यांत्रिक गति से जीवन बीतता जाता है, पन्ने-दर-पन्ने इस किताब का कथानक भी उसी तरह बीतता है, सहे जाने की हद तक, पाठक के धैर्य की प्रतीक्षा लेता हुआ. इसे पढ़ना जीवन के साथ उसकी स्वाभाविक गति से बहना है, उसकी अनुपस्थित उपस्थितियों, उसकी निर्ममता से संवाद करना है, जहां कई बार बहुत कुछ सामने होते हुए भी हमारी दृष्टि से अदृश्य हो जाता है.
फिर एक दिन जब वह वास्तव में अदृश्य हो जाता है, हम चौंकते हैं, हमें एहसास होता है कि हमने क्या खोया. गीतांजलि श्री भाषा के तयशुदा व्याकरण में नहीं समातीं, भाषा के साथ उनका कौतुक कभी विचलित करता है तो आनंद भी देता है.
‘Living to Tell the Tale’
गैब्रियल गार्सिया मारकेज द्वारा अपने आरंभिक 30 वर्षों के जीवन के बारे में लिखी यह किताब एक लेखक के जुनून, समर्पण और मुश्किल हालातों में भी उसके लेखक बनने के सपने के ज़िंदा रहने की कथा है. कई अद्भुत चीज़ों के बीच इस किताब की जो सबसे अनोखी बात है कि इसे पढ़ना केवल एक विलक्षण लेखक की आत्मकथा पढ़ना भर नहीं है- इसका स्वरूप तथ्यात्मक चीज़ों से परे जाता है और उस दुनिया के आसपास घूमता है, जो लगभग उतनी ही रहस्यमयी लगती है जितना कि उसे लिखने वाला.
‘रचना का गर्भगृह’
कृष्णा सोबती के उपन्यासों से अधिक उनके कथेतर गद्य ने मुझे प्रभावित किया. आर. चेतनक्रांति द्वारा संपादित कृष्णा सोबती के लेखों की यह किताब एक लेखक के तौर पर हमारी प्राथमिकताओं, प्रतिबद्धताओं और आवश्यक निर्णयों को रेखांकित करते हुए हमें स्त्री -पुरुष के खांचे से अलग ‘लेखक- नागरिक’ की समदर्शी और लोकतांत्रिक अवधारणा से जोड़ती है.
इन लेखों को पढ़ते हुए हम लेखक के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारियों के प्रति सजग और संवेदनशील होते हैं.
मनोज कुमार झा

जब बीते महीनों में विनोद कुमार शुक्ल जी की अस्वस्थता के बारे में जाना तो अपने किताब की रैक से एकबार पुनः उनकी कृति ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ निकालकर पढ़ने को पसार ली. यह उपन्यास जैसा मैं पहले भी लिख चुका हूं कि साधारण दिखने वाले जीवन के भीतर छिपी असाधारण संवेदनाओं और आत्मिक संसार की कथा है. इसके केंद्र में एक ऐसा व्यक्ति है जो बड़े सपनों, नाटकीय संघर्षों या ऊंची महत्वाकांक्षाओं से दूर, बेहद सहज और मौन जीवन जीता है. उसकी दुनिया बाहर से कम, भीतर से अधिक विस्तृत है.
उपन्यास का शीर्षक ही इसका मूल संकेत देता है. दीवार में रहने वाली खिड़की भीतर और बाहर के संसार के बीच एक कोमल सेतु है- जहां से व्यक्ति दुनिया को देखता है, पर उसमें पूरी तरह घुलता नहीं. नायक समाज, व्यवस्था और रोज़मर्रा की अपेक्षाओं से टकराता नहीं, बल्कि उनसे थोड़ा हटकर, चुपचाप जीवन को महसूस करता है. यहां अकेलापन शिकायत नहीं बनता, बल्कि एक तरह की स्वीकृति है. दफ़्तर, रिश्ते, घर-सब कुछ साधारण हैं, पर उन्हीं साधारण स्थितियों में मानवीय गरिमा, संकोच, कल्पना और संवेदना जीवित रहती है. उपन्यास यह दिखाता है कि जीवन का अर्थ शोर में नहीं, बल्कि ठहराव, दृष्टि और अनुभव की गहराई में छिपा होता है.
ख़ालिद जावेद का उपन्यास मौत की किताब उर्दू साहित्य में इसलिए क्रांतिकारी माना जाता है क्योंकि यह उपन्यास की नैतिक और सौंदर्यात्मक धुरी को समाज से हटाकर सीधे शरीर और अस्तित्व की ओर ले जाता है. उर्दू कथा पर लंबे समय से हावी प्रगतिशील–मानवतावादी दृष्टि के विपरीत यह रचना पीड़ा को न तो सामाजिक प्रतिरोध में रूपांतरित करती है, न किसी नैतिक गरिमा या मुक्ति का आधार बनाती है.
सईद अख़्तर मिर्ज़ा की ‘अम्मी: लेटर टु अ डेमोक्रेटिक मदर’ और राही मासूम रज़ा की ‘आधा गाँव’ या ‘टोपी शुक्ला’ ऐसी किताबें हैं जिनको मैं कभी भी उठा लेता हूं. आधा गाँव और टोपी शुक्ला पर पहले भी काफी बोल/लिख चुका हूं, आज अम्मी की बात.
अम्मी मूलतः मां के रूप में स्त्री के मौन, अदृश्य और सतत योगदान का मार्मिक आख्यान है. यह किताब मातृत्व को केवल पारिवारिक संबंध नहीं, बल्कि नैतिक चेतना, मानवीय संवेदना और जीवन-दर्शन के रूप में प्रस्तुत करती है. किताब का एक महत्वपूर्ण विषय है- स्मृति (याद) को एक नैतिक और प्रतिरोधक कर्म के रूप में देखना. अम्मी को याद करना, उनके जीवन को शब्दों में दर्ज करना, दरअसल उन अनकही स्त्री-कथाओं को दर्ज करना है जिन्हें समाज अक्सर भुला देता है.
निजी स्मृतियां यहां राजनीतिक और सामाजिक अर्थ ग्रहण कर लेती हैं. अम्मी में धर्म और मानवीयता का संबंध भी सूक्ष्म रूप से उभरता है. अम्मी की आस्था किसी कट्टर विचारधारा में नहीं, बल्कि व्यवहारिक इंसानियत, सह-अस्तित्व और करुणा में निहित है. यह धार्मिकता दिखावे से मुक्त और जीवन से जुड़ी हुई है.
(अदिति भारद्वाज के साथ बातचीत पर आधारित)










