कुछ पत्रकार होते हैं जो घटनाएं दर्ज करते हैं, और कुछ वे होते हैं जो पीढ़ियों को गढ़ते हैं. मार्क टली निस्संदेह दूसरे प्रकार के थे.
आज जब यह ख़बर आई कि सर मार्क टली दिल्ली में नब्बे वर्ष की आयु में नहीं रहे, तो यह किसी व्यक्ति के जाने से ज़्यादा एक आवाज़ के बुझ जाने जैसा लगा. वह गंभीर, ठहरी हुई, धीरे-धीरे टटोलती हुई आवाज़, जो कभी बीबीसी हिंदी सेवा से उठती थी और अनगिनत भारतीय घरों तक पहुंचती थी, मेरे घर तक भी. जिस पीढ़ी ने ट्रांजिस्टर रेडियो पर राजनीति को समझना सीखा, उसके लिए मार्क टली सिर्फ़ संवाददाता नहीं थे. वह उलझन में साथी थे, एक ऐसे देश के लिए दिशासूचक, जो स्वयं को समझने की कोशिश कर रहा था.
उनकी मृत्यु पत्रकारिता के एक लहजे का अंत लगती है. सिर्फ़ ब्रिटिश नहीं, बल्कि नैतिक.
आवाज़ के सहारे देश को समझना
मैंने उन्हें पहली बार अख़बार में नहीं, आवाज़ में पाया. रस्म सी थी. शाम ढल रही है. रेडियो ठीक से ट्यून किया गया. पहचान की धुन. और फिर वह आवाज़. शांत, हल्की विदेशी, और फिर भी बेहद अपनी. उन दिनों, जब ब्रेकिंग न्यूज़ का आतंक नहीं था और टीवी बहसें अभी तमाशा नहीं बनी थीं, ख़बर एक कथा की तरह आती थी. मार्क टली की रिपोर्ट्स आप पर हमला नहीं करती थीं. वह नतीजों से शुरू नहीं करते थे. वह लोगों से शुरू करते थे.
आज जब मीडिया फ़ैसलों का भूखा है, तब उन्होंने वर्णन का अभ्यास किया. घटनाओं को भाषा में धीरे-धीरे खुलने दिया और श्रोता पर भरोसा किया कि वह स्वयं अर्थ तक पहुंचेगा. यही उनका पहला सबक था कि पत्रकारिता मनवाने की कला नहीं, ध्यान की साधना है.
कम विदेशी, ज़्यादा मनुष्य
1935 में कलकत्ता में जन्मे, कुछ शिक्षा भारत में, फिर इंग्लैंड में, मार्क टली अपने साथ औपनिवेशिक बचपन की जटिल विरासत और उत्तर-औपनिवेशिक जिज्ञासा लेकर आए. साठ के दशक में युवा संवाददाता बनकर भारत लौटे और यहीं रह गए. अस्थायी मेहमान की तरह नहीं, बल्कि एक ऐसे साक्षी की तरह जो देश के साथ चलता है.
तीन दशकों तक दिल्ली में और बीस से अधिक वर्षों तक बीबीसी के ब्यूरो प्रमुख के रूप में उन्होंने वह किया जो बहुत कम विदेशी पत्रकार कर पाए. उन्होंने विदेशी बने रहने से इनकार कर दिया. यह इनकार वैचारिक नहीं था. यह नैतिक था.
उन्होंने हिंदी सीखी. सिर्फ़ इंटरव्यू लेने के लिए नहीं, बल्कि ख़ामोशियों में रहने के लिए. महानगरों से बाहर गए. कस्बों, गांवों, थानों, अदालतों, दुख और प्रतीक्षा के कमरों तक. उन्होंने सुना. उन्होंने इंतज़ार किया. उन्होंने धीरे लिखा. ग्राउंड रिपोर्टिंग नारा बनने से बहुत पहले, मार्क टली उसे नैतिक प्रवृत्ति की तरह जीते थे.
बीबीसी के साल और संयम की कला
बीबीसी में उनके साल आधुनिक भारत के निर्णायक दशकों के साथ जुड़े थे. 1971 का युद्ध, आपातकाल, भोपाल, ऑपरेशन ब्लू स्टार, इंदिरा और राजीव गांधी की हत्याएं, बाबरी मस्जिद ध्वंस और उसके बाद सांप्रदायिक हिंसा की लंबी परछाइयां. इतिहास और रिपोर्टिंग के संगम पर वे लगातार खड़े रहे.
लेकिन उनकी पत्रकारिता को विशिष्ट बनाता था उनका स्वभाव. वह आसान नैतिकताओं पर भरोसा नहीं करते थे. महान सिद्धांतों के आकर्षण से बचते थे. जहां दूसरे खलनायक और नायक ढूंढते थे, वह ढूंढते थे संरचनाएं, आदतें, इतिहास, सत्ता का साधारण जीवन पर धीमा असर.
वह उस पीढ़ी के थे, जो मानती थी कि पत्रकार का पहला धर्म रोचक होना नहीं, सही होना है. उस न्यूज़ रूम में तेज़ी लापरवाही का बहाना नहीं थी और सत्ता की नज़दीकी सहमति का लाइसेंस नहीं.
संदेह सिखाने वाले शिक्षक
युवा उम्र में उन्हें सुनते हुए मैंने वह सीखा जो कोई पाठ्यपुस्तक नहीं सिखाती. वह आवाज़ ऊंची नहीं करते थे. सरलीकरण से बचते थे. विरोधाभास को रहने देते थे. मतों की लत के इस दौर में उन्होंने वर्णन की साधना की.
उनमें पुराने उदार विवेक की छाया थी. सत्ता से सशंकित. नारों से सावधान. उन्माद से एलर्जिक. और साथ ही एक गहरी करुणा. शायद उस मनुष्य की जो दो संस्कृतियों के बीच रहता हो. इसी कारण वह हाशियों की ओर खिंचते थे. कर्ज़ और सम्मान के बीच फंसे किसान. डर और आस्था के बीच फंसे अल्पसंख्यक. प्रक्रिया और विवेक के बीच फंसे अफ़सर. वह उपदेशक नहीं थे. वह परिणामों की चिंता करने वाले पत्रकार थे.
भारत, जैसा उन्होंने देखा
मार्क टली के लिए भारत सिर्फ़ पोस्टिंग नहीं था. वह उनका चुना हुआ घर था. सेवानिवृत्ति के बाद भी वह दिल्ली में ही रहे. देश की धड़कन में बसे रहे. वह मानते थे कि भारत की ताक़त महान विचारधाराओं में नहीं, बल्कि उसकी जिद्दी बहुलता में है. विरोध को साथ रखने की क्षमता में.
उन्हें भारतीय लोकतंत्र उसकी दक्षता के कारण नहीं, उसकी सहनशीलता के कारण प्रिय था. और वे उसके क्षरण से इसलिए चिंतित थे क्योंकि उन्होंने देखा था कि जब भाषा कठोर होती है और सत्ता अधीर, तो संस्थाएं कितनी नाज़ुक हो जाती हैं.
इंडिया इन स्लो मोशन में उन्होंने सबसे सटीक रूपक दिया. एक देश जो टेढ़े-मेढ़े चलता है. कभी पीछे. कभी बगल. पर भीतर से आगे बढ़ता हुआ. प्रगति, जैसे सत्य, अक्सर नाटकीय नहीं होती. वह जमा होती है.
एक ख़ामोश विरासत
आज के पाठकों को समझाना कठिन है कि वैसी पत्रकारिता कैसी लगती थी. आज तेज़ी गुण है और जटिलता असुविधा. टली के समय धैर्य एक पेशेवर मूल्य था. और इसी कारण वह रोचक थे. क्योंकि वह रोचक होने की कोशिश नहीं करते थे.
उनकी किताबें नो फुल स्टॉप्स इन इंडिया, इंडिया इन स्लो मोशन, द हार्ट ऑफ इंडिया उनकी आवाज़ का विस्तार थीं. सम्मानों- नाइटहुड और पद्म भूषण के बावजूद, वह सत्ता से असहज ही रहे.
अंत नहीं, एक मानक
मेरे लिए उनकी सबसे बड़ी विरासत कोई रिपोर्ट नहीं, एक आदत है. ध्यान की आदत. बोलने से पहले सुनना. आंकने से पहले देखना. निष्कर्ष से पहले ठहरना. आज जब पत्रकारिता अभिनय बनती जा रही है, मार्क टली याद दिलाते हैं कि वह कभी लोक सेवा थी. उनकी आवाज़ की स्मृति में एक ख़ामोशी है जो अब दुर्लभ है.
उनकी मृत्यु भारतीय पत्रकारिता के एक अध्याय का अंत है. जब विदेशी संवाददाता लंबे समय का साक्षी होता था. हम लिखते रहेंगे, शायद तेज़, शायद ऊंचा शायद कभी तीखा. पर कभी-कभी रुककर याद करना ज़रूरी है एक ऐसे मनुष्य को जो धीरे लिखता था, धीरे बोलता और बहुत गहराई से समझता था.
मार्क टली चले गए. पर जो पद्धति उन्होंने छोड़ी, धैर्य, करुणा और ध्यान, वह अब भी हम सबके लिए एक कसौटी है. शायद यही सबसे सच्ची श्रद्धांजलि है. उपलब्धियों की सूची नहीं, बल्कि सुनने की याद.
(आशुतोष कुमार ठाकुर एक मैनेजमेंट प्रोफेशनल हैं, साहित्य और कला पर नियमित लिखते हैं.)
