उच्च शिक्षा में जाति से आगे: शारीरिक अक्षम छात्रों की अदृश्यता और संस्थागत भेदभाव का सवाल

यूजीसी के आंकड़ों में जाति-आधारित भेदभाव बढ़ने की बात सामने आई है, लेकिन उच्च शिक्षा में विकलांग या शारीरिक तौर पर अक्षम छात्रों की अदृश्यता पर चर्चा अब भी सीमित है. शारीरिक अक्षम व्यक्तियों की आर्थिक निर्भरता कोई व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि संस्थागत असमानता का परिणाम है. जब उच्च शिक्षा तक पहुंच सीमित होगी, तो कौशल, नेटवर्क और अवसर भी सीमित ही रहेंगे.

अक्सर मान लिया जाता है कि विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, मीडिया विषय शारीरिक तौर पर अक्षम छात्रों के लिए 'अनुकूल' नहीं हैं. लेकिन यह सवाल शायद ही पूछा जाता है कि क्या इन विषयों को कभी ऐसे छात्रों को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किया गया? (इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा प्रस्तुत हालिया आंकड़े, जिनके अनुसार उच्च शिक्षा संस्थानों में जाति-आधारित भेदभाव की शिकायतों में 118 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, एक बार फिर इस सच्चाई को रेखांकित करते हैं कि विश्वविद्यालय केवल ज्ञान के नहीं, बल्कि सामाजिक सत्ता के भी केंद्र हैं. बीते महीने द वायर हिंदी में प्रकाशित हुई यह ख़बर न केवल महत्वपूर्ण है, बल्कि आवश्यक भी, क्योंकि यह उस मिथक को तोड़ती है कि आधुनिक शिक्षा संस्थान अपने आप में लोकतांत्रिक और समानतावादी हो चुके हैं.

लेकिन इस पूरी बहस के बीच एक गहरी चुप्पी भी मौजूद है और वह है विकलांग या किसी शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे छात्रों से संबंधित चुप्पी. यह चुप्पी उनकी सहमति नहीं, बल्कि उनकी अदृश्यता का परिणाम है. जब हम उच्च शिक्षा में भेदभाव की बात करते हैं, तो जाति स्वाभाविक रूप से विमर्श के केंद्र में आ जाती है. इसके ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण हैं. लेकिन यह मान लेना कि भेदभाव केवल जाति की रेखाओं पर घटित होता है, वास्तविकता को छोटा कर देता है.

विश्वविद्यालयों में शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे छात्र ऐसा समुदाय हैं जो न केवल भेदभाव का सामना करते हैं, बल्कि अक्सर उसके साथ होने वाले भेदभाव को भेदभाव का नाम भी नहीं दिया जाता.

यूजीसी के आंकड़े यह तो बताते हैं कि शिकायतें बढ़ी हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि कितनी शिकायतें कभी दर्ज ही नहीं हुईं.

ऐसे छात्रों के संदर्भ में यह अंतर और भी गहरा है. भेदभाव यहां अक्सर अपमान, टिप्पणी या प्रत्यक्ष निषेध के रूप में नहीं आता, बल्कि प्रक्रिया, डिज़ाइन और उपेक्षा के रूप में आता है. जब किसी छात्र के लिए प्रवेश फॉर्म भरना ही संभव न हो, जब काउंसलिंग कक्ष तक पहुंचना शारीरिक रूप से असंभव हो, जब परीक्षा में सहायक सुविधा को ‘अतिरिक्त लाभ’ कहा जाए तब भेदभाव शिकायत का रूप नहीं लेता, वह रोज़मर्रा की सच्चाई बन जाता है.

मीडिया की भूमिका इस संदर्भ में और भी जटिल हो जाती है. पिछले कुछ वर्षों में मीडिया ने जाति और उच्च शिक्षा को लेकर कई निर्णायक क्षणों को उजागर किया है. लेकिन शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे छात्रों की भागीदारी अक्सर या तो पूरी तरह गायब रहती है, या फिर प्रेरणा की भाषा में सीमित कर दी जाती है. शारीरिक तौर पर अक्षम छात्र को या तो ‘संघर्ष की मिसाल’ बनाया जाता है या फिर ‘विशेष मामला’. उसे एक ऐसे नागरिक के रूप में शायद ही देखा जाता है जो अधिकारों की बात कर रहा हो.

इसका नतीजा यह होता है कि उच्च शिक्षा में विकलांगता एक राजनीतिक प्रश्न नहीं बन पाती. न तो न्यूज़रूम में, न नीतिगत बहसों में. यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब हम उच्च शिक्षा में बहाली और आरक्षण की वास्तविक प्रक्रिया को देखते हैं. इससे संबंधित क़ानून स्पष्ट हैं कि शारीरिक तौर पर अक्षम व्यक्तियों के लिए उच्च शिक्षा में न्यूनतम 5 प्रतिशत आरक्षण अनिवार्य है. लेकिन क़ानून और ज़मीनी हकीकत के बीच का अंतर यहां भी वैसा ही है, जैसा जाति के मामले में लंबे समय से देखा जाता रहा है.

कई संस्थानों में विकलांग कोटे की सीटें औपचारिक रूप से घोषित तो होती हैं, लेकिन व्यवहार में या तो उन्हें भरा नहीं जाता, या फिर यह कहकर खाली छोड़ दिया जाता है कि ‘उपयुक्त अभ्यर्थी उपलब्ध नहीं थे’.

यह तर्क अपने आप में समस्या का खुलासा करता है. जब पूरा शैक्षिक ढांचा शारीरिक तौर पर अक्षम छात्रों को बाहर रखकर बनाया गया हो, तो उपयुक्तता का पैमाना भी पक्षपाती ही होगा. योग्यता को अक्सर शारीरिक और संवेदी क्षमता के संकीर्ण दायरे में परिभाषित किया जाता है, जबकि बौद्धिक क्षमता, विश्लेषण और आलोचनात्मक सोच को गौण मान लिया जाता है.

इसका असर विषय चयन में भी साफ दिखाई देता है. उच्च शिक्षा के कई क्षेत्र ऐसे हैं जहां किसी शारीरिक अक्षमता से जूझ रहे छात्रों की उपस्थिति नगण्य है, मसलन विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा, मीडिया और संचार जैसे क्षेत्र इसका उदाहरण हैं. अक्सर यह मान लिया जाता है कि ये विषय इन छात्रों के लिए ‘अनुकूल’ नहीं हैं. लेकिन यह सवाल शायद ही पूछा जाता है कि क्या इन विषयों को कभी विकलांग छात्रों को ध्यान में रखकर डिज़ाइन किया गया?

जब प्रयोगशालाएं सहायक तकनीक से लैस नहीं होतीं, जब फील्डवर्क के तरीकों में लचीलापन नहीं होता, जब मीडिया संस्थानों में न्यूज़रूम शारीरिक रूप से ही पहुंच न हो, ऐसे में विषय नहीं, व्यवस्था शारीरिक अक्षम छात्र को बाहर करती है. और फिर उसी बहिष्कार को ‘स्वाभाविक अनुपस्थिति’ कहकर सामान्य बना दिया जाता है.

उच्च शिक्षा से यह बहिष्कार सीधे रोजगार से जुड़ जाता है. शिक्षा और रोजगार के बीच की कड़ी जितनी मज़बूत होती है, उतना ही स्पष्ट हो जाता है कि शारीरिक अक्षम व्यक्तियों की आर्थिक निर्भरता कोई व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि संस्थागत असमानता का परिणाम है. जब उच्च शिक्षा तक पहुंच सीमित होगी, तो कौशल, नेटवर्क और अवसर भी सीमित ही रहेंगे.

सरकारी नौकरियों में आरक्षण के बावजूद पदों का खाली रहना और निजी क्षेत्र में विकलांगता को जोखिम मानना ये दोनों इसी श्रृंखला के हिस्से हैं.

यह भी समझना ज़रूरी है कि विकलांगता कोई अलग-थलग पहचान नहीं है. इससे जूझ रहा विद्यार्थी दलित भी हो सकता है, आदिवासी भी, महिला भी. इन पहचानों का मेल भेदभाव को और जटिल बना देता है. इसलिए यदि जाति आधारित भेदभाव पर हो रही बहस में विकलांगता को शामिल नहीं किया जाता, तो वह बहस अधूरी ही रहेगी.

यूजीसी के आंकड़े हमें चेतावनी देते हैं, लेकिन वे पूरी कहानी नहीं कहते. पूरी कहानी तब सामने आएगी जब हम यह मानेंगे कि समानता केवल शिकायतों के निपटारे से नहीं आती, बल्कि संरचनाओं के पुनर्निर्माण से आती है. उच्च शिक्षा तभी सच में लोकतांत्रिक होगी जब सबसे हाशिये पर खड़ा छात्र भी बिना अतिरिक्त संघर्ष के उसमें अपनी जगह बना सके.

शारीरिक अक्षम छात्रों का सवाल सहानुभूति का नहीं, न्याय का सवाल है. और न्याय तभी संभव है, जब हम उन आवाज़ों को भी सुनें जो अब तक खामोश रखी गई हैं.

(शिव चंदेली स्वतंत्र पत्रकार एवं ‘डिसेबिलिटी जस्टिस’ मंच के अध्यक्ष हैं और शारीरिक अक्षमता से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रूप से लिखते हैं.)