‘फ्रॉम डायनेस्टीज़ टू डेमोक्रेसी’: भारतीय लोकतंत्र का थर्मामीटर बरास्ता राजस्थान

पुस्तक समीक्षा: दीप मुखर्जी और तबीना अंजुम की ‘फ्रॉम डायनेस्टीज़ टू डेमोक्रेसी: पॉलिटिक्स, कास्ट एंड पावर स्ट्रगल इन राजस्थान’ पत्रकारीय अनुभवों का रोज़नामचा भर नहीं है, किताब के निरीक्षण बहुत सूक्ष्म हैं. यह भाषा में पत्रकारीय सरलता रखते हुए भी समझ और प्रस्तुति में शोधपूर्ण इतिहास ग्रंथ का अहसास देती है.

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(आवरण साभार: पैन मैकमिलन/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

इस किताब को पढ़ते हुए लगातार मैं हैरान हूं कि दो प्रवासी ( ग़ैर-राजस्थानी) पत्रकार भारत के सबसे बड़े प्रदेश को कैसे अपना मान लेते हैं, इतनी गहराई से देखने समझने की कोशिश करते हैं, इतनी शिद्दत से परखने की कोशिश करते हैं. यह किताब है, पैन मैकमिलन द्वारा प्रकाशित- पत्रकारों- दीप मुखर्जी और तबीना अंजुम की ‘फ्रॉम डायनेस्टीज़ टू डेमोक्रेसी: पॉलिटिक्स, कास्ट एंड पावर स्ट्रगल इन राजस्थान’.

किताब पत्रकारीय अनुभवों का रोजनामचा भर नहीं है, किताब के निरीक्षण बहुत सूक्ष्म हैं. किताब भाषा में पत्रकारीय सरलता रखते हुए भी समझ और प्रस्तुति में शोधपूर्ण इतिहास ग्रंथ का एहसास देती है. मुझे कोई संदेह नहीं कि इतिहास के अकादमिक इलाकों में इसे एक गंभीर संदर्भ पुस्तक का दर्ज़ा मिलेगा. पत्रकारों से इतिहासकार होना की उम्मीद कोई नहीं करता, पर इस मामले इस किताब के लेखक दोनों भूमिकाओं में बारी-बारी सफलता से स्विच करते हुए दिखते हैं.

आजादी के बाद के राजस्थान के राजनीतिक इतिहास पर ऐसी किताब का लगभग अभाव सा था, ऐसे में दीप और तबीना इस काम से इस कमी को भरा है.

राजस्थान यानी पुराना राजपूताना आज़ाद भारत के बहुत से अन्य राज्यों से अलग रहा है, क्योंकि यह सीधे अंग्रेजों के राज में नहीं था, 1818 की संधियों से राजपूताना के रजवाड़े अंग्रेजों के अधीन अपनी सत्ता कायम रख पाए थे, याद रखने लायक बात है कि 16,780 जागीरों वाले राजपूताना यानी राजस्थान ने आजादी के बाद पहले आम चुनाव में कांग्रेस के प्रति आजादी के आंदोलन के लिए वह शुक्राना और नए भारत में राज के लिए उन पर उतना भरोसा नहीं जताया था जितना बाकी देश ने, क्योंकि जहां पूरे देश में कांग्रेस को 364 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत मिला था, वहीं राजस्थान में विधानसभा में कांग्रेस को 160 में से बहुमत से मात्र दो सीटें ज्यादा यानी 82 सीटें मिलीं, और लोकसभा में राजस्थान की 22 सीटों में आधे ही कांग्रेसी उम्मीदवार जीत पाए थे.

यानी जनता और रजवाड़े दोनों ही पूरे मन से नए भारत, लोकराज में उतने उत्साह, समर्थन से आगे नहीं बढ़े थे. इस पृष्ठभूमि ने राजस्थान के आधुनिक इतिहास को अलग अर्थ और आजाद भारत के राज्य के रूप में अलग स्वरूप दिया है. किताब इस महीन फर्क को जानते समझते हुए अपने मूल्यांकन करती चलती है.

दूर से आकर्षित करता राजस्थान का सांस्कृतिक बहुरंगीपन अहसास नहीं दिलाता कि राजस्थान की राजनीति इतनी जटिल भी हो सकती है, और यह जटिलता कई मायनों में भारत के बाकी राज्यों से बहुत अलग है कि बाहर के लोग उसका अंदाजा भी नहीं लगा सकते, यह किताब उसी जटिलता को बड़ी सरलता के साथ संबोधित करती है.

मेरी आजीविका सिनेमा के आसपास है. इस किताब को जब एक फिल्म की तरह पढ़ता हूं तो पहला दृश्य है, फिल्म में फिल्मी प्रसंग यानी पद्मावत फिल्म के लिए करणी सेना के विरोध और प्रतिरोध का दृश्य, जो ‘कट टू’ – फ्लैश बैक में जाता है, दिवराला के रूप कंवर सती प्रकरण के दृश्य पर. क्या ही अद्भुत ट्रांजिशन है! क्या ही मेधावी रचनात्मक प्रस्थान बिंदु चुना है लेखक द्वय ने! उन्होंने जता दिया कि राजस्थान की राजनीति और इतिहास के डीएनए को ठीक से पहचानते हैं. उन्होंने एक कुशल नाड़ी वैद्य की तरह नब्ज़ थामकर रोग जान लिया है.

समयकाल के लिहाज से किताब का कैनवस बड़ा है. हर पन्ने में राजस्थान की राजनीति की प्रकट और छुपी हुई हकीकतें धड़कती हैं. किताब राजनीतिक हस्तियों को उनके किरदार और राजनीतिक व्यवहार को कई लेंस से देखने परखने की चेष्टा करती है. उनमें से कई तो ऐसी हैं, जिन्होंने न सिर्फ प्रदेश, बल्कि देश की राजनीति में बड़ी लकीर खींची है, इसलिए इस किताब को पढ़ना दिलचस्प अनुभव हो जाता है.

लगभग आधी किताब (सेकेंड हाफ) लगभग पिछले तीन दशकों पर केंद्रित है, और यह भी लगता है कि लेखक को प्राथमिक स्रोतों की सहजता रही है, यही इसे ज्यादा प्रमाणिक भी बनाती है. सचिन पायलट के उभार और नई राजनीति को तो उन्होंने बिल्कुल एफआईआर की तरह दर्ज किया है, स्पष्ट, सूक्ष्म और गहरी समझ के साथ.

किताब किसी भी पन्ने पर, किसी भी पंक्ति में, किन्हीं दो पंक्तियों के अंतराल में पाठक को ‘आउटसाइडर्स प्रस्पेक्टिव’ यानी बाहरियों के नजरिये का बोध नहीं देती. मैं देख पा रहा हूं कि किताब के लेखक राजस्थान की राजनीति में हाल के दशकों में उभरे मुश्किल सवाल उठाने से नहीं घबराते, न ही विवादित विषयों पर लिखने को उनकी कलम हांफती है. अलवर में पहलू खान की मॉब लिंचिंग का प्रसंग इसका उदाहरण है.

जैसे-जैसे इस किताब के पन्ने पलटते जाते हैं, यह किताब चावल का वह दाना बन जाती है, जिस अकेले से आप पूरे भगोने के चावल की जांच की जा सकती है कि कितना पका है, कितना कच्चा है, परोसने लायक हुआ या नहीं, इस लिहाज से यह किताब भारतीय लोकतंत्र का थर्मामीटर है. दूसरे शब्दों में इस अध्ययन के जरिए दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र का सबसे बड़ा राज्य लोकतंत्र के बोनसाई के रूप में लोकतंत्र की गहरी परख का उपकरण बन जाता है!

मेरी निगाह में एक अच्छा समाज विज्ञानी या इतिहासकार बदलावों को दर्ज करते हुए उनके प्रभावों की ओर इशारा करता है, और जैसे उर्दू साहित्य में कहा जाता है कि शायरी इशारे का फन है, समाज विज्ञानी और इतिहासकार ज़ेरे बहस समय को पोएटिक जस्टिस देते हैं, इस नजरिए से भी दीप मुखर्जी और तबीना अंजुम कवि साबित होते हैं.

कुल मिलाकर, मेरी नज़र में यह किताब राजनीति विज्ञानियों, इतिहासकारों के लिए तो उपयोगी है ही, राजस्थान के युवा नेताओं, नए राजनीतिक पत्रकारों, पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए भी एक व्यवहारिक पाठ्यपुस्तक होने के काबिल है.

(दुष्यंत लेखक हैं, हिंदी फिल्म जगत से जुड़े हैं.)