‘बैचलर्स किचन’ स्वाद, स्मृति और जीवन के छोटे-छोटे सच नए अंदाज़ में पेश करती है

पुस्तक समीक्षा: विनीत कुमार की 'बैचलर्स किचन' निजी और सार्वजनिक स्पेस के बीच किए जाने वाले पितृसत्तात्मक विभाजन को प्रभावी रूप से चुनौती देती है. एक बैचलर व्यक्ति की रसोई को केंद्र में रखकर यह कृति उस प्रचलित धारणा को विघटित करती है, जिसके अनुसार रसोई किसी जेंडर विशेष का स्वाभाविक क्षेत्र माना जाता है.

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खाना बनाना न केवल श्रम से जुड़ा प्रश्न बनता है, बल्कि जेंडर, परिवार और घरेलू उत्तरदायित्वों से जुड़ी गहरी सामाजिक मान्यताओं को भी उजागर करता है. (आवरण साभार: अनबाउंड स्क्रिप्ट/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

विनीत कुमार की कृति ‘बैचलर्स किचन: अपना स्वाद, अपना अंदाज़’ नाम से भले ही पहली नज़र में इसे एक साधारण रेसिपी बुक का आभास कराए, लेकिन जैसे ही पाठक इसके पन्नों में उतरता है, यह भ्रम स्वतः टूट जाता है, क्योंकि ‘बैचलर्स किचन..’,  रेसिपियों की कोई सूची नहीं, बल्कि क़लम, करछुल और कर्सर की त्रिवेणी साधना का सजीव और विश्वसनीय दस्तावेज़ है.

यह किताब छात्र जीवन और एक बैचलर की रोज़मर्रा की दुनिया का जीवंत आख्यान रचती है, जहां क़लम विचारों को धार देती है, करछुल आत्मनिर्भरता का स्वाद सिखाती है और कर्सर आधुनिक समय से संवाद का सशक्त माध्यम बनता है. रसोई से उठती भाप, चूल्हे की आंच और दैनिक अनुभवों के बीच आकार लेती यह रचना अनुशासन, रचनात्मकता और आत्मसम्मान को एक सूत्र में पिरोती है- इन तीनों का संतुलन व्यक्ति को केवल शिक्षित ही नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित, व्यवहारिक और जागरूक नागरिक भी बनाता है.

15 जिल्दों में विन्यस्त इस किताब के अध्यायों की फ़ेहरिस्त पर एक नज़र डालते ही इसे पढ़ने की तीव्र जिज्ञासा मन में कुलबुलाने लगती है. मिसाल के तौर पर, मनोरमा रसोई‘, ‘लड़का भात बनाना नहीं जानता‘, ‘देखने का टीवी तो ताकता रहता है कड़ाही‘, ‘आओ सिंगल्स, अब फ़ेसबुक पर खाना बनाते हैं‘, ‘हॉस्टल की प्लेटें, पॉलिटिक्स बतियाती हैं– जैसे अध्याय-शीर्षक न केवल ध्यान खींचते हैं, बल्कि भीतर छिपे लज़ीज़ कंटेंट की झलक भी दे देते हैं. इन अध्यायों के माध्यम से किताब पाठक को अनुभवों की ऐसी दुनिया में ले जाती है, जहां स्वाद, स्मृति और जीवन के छोटे-छोटे सच एक नए और अनोखे अंदाज़ में सामने आते हैं.

सबसे पहले यह स्पष्ट कर देना ज़रूरी है कि यह न तो कोई रेसिपी बुक है और न ही लेखक की आत्मकथा. जैसा कि किताब के पहले ही पन्ने पर दर्ज है- लंच-डिनर तो छोड़ ही दीजिए, इसे पढ़ने के बाद अगर ब्लैक कॉफ़ी के लिए ठीक-ठीक पानी गर्म करना भी आ जाए, तो समझिए वह भी बहुत है.’

पर अगर आप इसे समाजविज्ञान की दृष्टि से पढ़ने की कोशिश करेंगे, तो इसमें एक स्पष्ट सामाजिक बहस भी साफ़ तौर पर दिखाई देती है. बैचलर्स किचन निजी और सार्वजनिक स्पेस के बीच किए जाने वाले पितृसत्तात्मक विभाजन को प्रभावी रूप से चुनौती देती है. एक बैचलर व्यक्ति की रसोई को केंद्र में रखकर यह कृति उस प्रचलित धारणा को विघटित करती है, जिसके अनुसार रसोई किसी विशेष जेंडर का स्वाभाविक क्षेत्र माना जाता है.

इसके विपरीत, यह पुस्तक किचन को एक साझा, सांस्कृतिक और वैचारिक स्पेस के रूप में पुनर्परिभाषित करती है. और यहीं इस पुस्तक की निजी अनुभूति एक व्यापक सामाजिक और राजनीतिक अर्थवत्ता ग्रहण कर लेती है. भोजन की प्रस्तुति, स्वाद और स्मृति से जुड़े प्रश्न यहां आत्म-सम्मान, स्वायत्तता और देखभाल (care) की राजनीति से अंतर्संबद्ध हो जाते हैं. इस प्रकार, घरेलू जीवन की रोज़मर्रा की गतिविधियों के माध्यम से बैचलर्स किचन जेंडर, श्रम और पहचान के नारीवादी विमर्श में एक सूक्ष्म किंतु महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरती है.

इस संदर्भ में बेल हुक्स (Bell Hooks) के विचार विशेष रूप से प्रासंगिक प्रतीत होते हैं. हुक्स के अनुसार आत्म-देखभाल (self-care) केवल व्यक्तिगत सुविधा या विलासिता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक अभ्यास है, जो दमनकारी सामाजिक संरचनाओं के भीतर आत्म-सम्मान और स्वायत्तता को सुदृढ़ करता है. इसी प्रकार, ‘everyday life politics’ की उनकी अवधारणा भी इस पुस्तक के संदर्भ में प्रासंगिक है जो बतलाती है कि कैसे राजनीति केवल औपचारिक सत्ता-संरचनाओं तक सीमित नहीं रहती, बल्कि घरेलू जीवन, कार्यस्थल और दैनिक व्यवहारों में भी सक्रिय रूप से विद्यमान रहती है.

बैचलर्स किचन  भी देखा जाए तो निजी अनुभवों को राजनीतिक अर्थ प्रदान करने वाली एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक कृति के रूप में उभरती है. लिहाज़ा, इस किताब की यही वैचारिक गहराई उस सामाजिक संदर्भ से जुड़ती है, जहां खाना बनाना- विशेषकर बैचलर अर्थात् एक अविवाहित व्यक्ति द्वारा खाना बनाना- भारतीय सामाजिक संरचना में एक साधारण घरेलू क्रिया भर नहीं रह गया है, बल्कि यह एक सांस्कृतिक संकेतक बन चुका है.

प्रचलित सामाजिक धारणा यह मानकर चलती है कि एक अविवाहित अकेला व्यक्ति, विशेषतः पुरुष, या तो खाना बनाने में अक्षम होगा या फिर इस क्रिया को जीवन की एक अस्थायी, ग़ैर-ज़रूरी और अवांछनीय गतिविधि के रूप में देखेगा. ‘अकेला है, क्या ही खाना बनाएगा- जो मिला, खा लिया’ जैसी टिप्पणियां इसी सोच की उपज हैं. इस प्रकार, खाना बनाना न केवल श्रम से जुड़ा प्रश्न बनता है, बल्कि जेंडर, परिवार और घरेलू उत्तरदायित्वों से जुड़ी गहरी सामाजिक मान्यताओं को भी उजागर करता है.

यह किताब इन्हीं स्थापित धारणाओं को प्रश्नांकित करती है. यह दिखाती है कि कैसे आधुनिक शहरी जीवन में बैचलर- विशेषकर नौकरीपेशा या छात्र जीवन जी रहा व्यक्ति- खाना बनाने की ज़िम्मेदारी से बचने के लिए ढाबों, रेस्तराओं और डिजिटल फूड डिलिवरी प्लेटफ़ॉर्म्स की ओर तेज़ी से आकर्षित होता है. यह चयन केवल सुविधा का मामला नहीं है, बल्कि उपभोक्तावादी संस्कृति द्वारा निर्मित उस मानसिकता का परिणाम है, जिसमें समय, श्रम और देखभाल को बाज़ार के हवाले कर देना सहज मान लिया गया है. परिणामस्वरूप, व्यक्ति न केवल भोजन से, बल्कि उससे जुड़े अनुभवों, स्मृतियों और आत्मीय क्षणों से भी कटता चला जाता है.

सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो स्वयं के लिए खाना बनाना, अपने स्वयं की देखभाल (self-care) का ही एक अभ्यास है, जो निजी होते हुए भी गहरे राजनीतिक निहितार्थ रखता है. यह अभ्यास व्यक्ति को अपने शरीर, स्वास्थ्य और समय के प्रति सचेत बनाता है. बाहरी भोजन पर निर्भरता जहां स्वास्थ्य संकटों को बढ़ावा देती है, वहीं घर का भोजन शरीर और मन- दोनों के लिए संतुलन प्रदान करता है. इस संदर्भ में खाना बनाना केवल पोषण का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि जीवन की गुणवत्ता से जुड़ा मुद्दा बन जाता है.

आर्थिक स्तर पर भी यह आदत महत्वपूर्ण है. यह आदत न केवल व्यक्तिगत बजट को संतुलित करती है, बल्कि व्यक्ति को विवेकशील उपभोग के लिए भी प्रेरित करती है. हालांकि, यह बात भी एक निश्चित आय वर्ग के बारे में अधिक सटीक है. निम्न आय वर्ग से आने वाले अनेकों विद्यार्थी या अकेले रहने वाले कामगारों के लिए रसोई बना पाने का विकल्प हमेशा मौजूद नहीं रहता.

सांस्कृतिक स्तर पर किचन एक ऐसा स्पेस बनकर उभरता है, जहां व्यक्ति का संबंध अपने अतीत, परिवार और घर की स्मृतियों से जुड़ता है. पढ़ाई, करिअर या नौकरी के कारण भले ही व्यक्ति भौगोलिक रूप से घर से दूर चला जाए, लेकिन खाना बनाने की आदत उसके साथ ‘घर’ को भी स्थानांतरित कर देती है. इस अर्थ में किचन एक गतिशील सांस्कृतिक दायरा बन जाता है, जो व्यक्ति को किसी भी शहर या परिस्थिति में अपनापन प्रदान करता है.

इसके अतिरिक्त, किचन में बिताया गया समय डिजिटल युग में एक प्रकार के डिजिटल डिटॉक्स की भूमिका भी निभाता है. यह व्यक्ति को स्क्रीन-आधारित जीवन से क्षणिक मुक्ति देता है और रोज़मर्रा की ज़मीनी वास्तविकताओं- जैसे बाज़ार, सब्ज़ी-दाल के दाम और मौसमी उपलब्धता से जोड़े रखता है. यह जुड़ाव सामाजिक जागरूकता का एक सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण रूप है, जो व्यक्ति को केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक संरचना का सजग हिस्सा बनाता है.

इस प्रकार, बैचलर का किचन केवल भोजन पकाने की जगह नहीं रह जाता, बल्कि यह आत्मनिर्भरता, स्वास्थ्य, संबंधों, स्मृतियों और सामाजिक चेतना का साझा मंच बन जाता है. यह किताब इसी मंच को केंद्र में रखकर रोज़मर्रा के जीवन की उन गतिविधियों को अर्थ देती है, जिन्हें अक्सर तुच्छ या अस्थायी समझकर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है. इस अर्थ में बैचलर्स किचन रसोई की सीमाओं से आगे बढ़कर छात्र एवं बैचलर्स जीवन के संघर्षों, सीखों और आत्मनिर्माण की कथा कहती है, जहां अनुभव शब्दों में ढलते हैं, रोज़मर्रा की जद्दोजहद स्वाद और गरिमा में बदलती है और पूरी यात्रा समकालीन संदर्भों से जुड़ती चली जाती है.

पाठक और लेखक के संबंध में उम्मीद और संभावना के बीच एक स्वाभाविक फ़ासला बना रहता है. पाठक अक्सर लेखक से यह अपेक्षा करता है कि उसकी रचना उसके सभी सवालों और बौद्धिक जिज्ञासाओं का समाधान प्रस्तुत करे. लेकिन लेखन लेखक के अपने अनुभवों और उसकी सीमाओं में ही संभव होता है. हर लेखक की अपनी रुचियां और सीमाएं होती हैं, और हर पाठक को संतुष्ट करना उसकी अनिवार्य ज़िम्मेदारी नहीं होती. इसी समझ के साथ, एक समीक्षक के रूप में इस कृति से कुछ अतिरिक्त अपेक्षाएं सहज ही उभरती हैं.

विनीत कुमार की किताब ‘बैचलर्स किचन….’  का अनुभव-जगत मुख्यतः शहरी, शिक्षित, मध्यवर्गीय बैचलर जीवन (निश्चिततया ‘पुरुष’ जीवन) की सामाजिक स्थितियों से निर्मित है. यह प्रस्तुति अपने संदर्भ में पूरी तरह स्वाभाविक और प्रासंगिक है, लेकिन साथ ही यह समाज में मौजूद अधिकारों और संसाधनों की असमान बनावट पर लेखकीय चुप्पी से थोड़ा हतप्रभ भी करती है.

अमर्त्य सेन के एंटाइटलमेंट्स अप्रोच के अनुसार, आत्मनिर्भरता को केवल व्यक्तिगत हुनर, इच्छा या नैतिक चुनाव भर नहीं माना जा सकता; यह संसाधनों, समय, जगह, श्रम और सामाजिक सुरक्षा तक वास्तविक और लगातार पहुंच से जुड़ी होती है. इस नज़रिये से देखा जाए तो सबऑल्टर्न या श्रमिक पृष्ठभूमि से आए कई छात्रों और बैचलर्स के लिए किचन-स्पेस और खाना बनाना अक्सर आत्म-सशक्तिकरण का साधन कम, और परिस्थितियों की मज़बूरी अधिक बन जाता है. वहां किचन और खाना एक रूमानियत भरी भावुकता का पर्याय नहीं बल्कि जीवन जीने की आवश्यकता अधिक है.

इसी तरह, बेल हुक्स जिस तरह केयर और सेल्फ-केयर को एक राजनीतिक अभ्यास के रूप में समझती हैं, वह भी तभी अर्थपूर्ण बन पाता है, जब उसे अपनाने के लिए ज़रूरी न्यूनतम अधिकार और अनुकूल हालात मौजूद हों. यदि यह किताब इन असमान अधिकारों और वर्गीय बाधाओं को कुछ और साफ़गोई के साथ सामने लाती, तो किचन आत्मनिर्भरता के प्रतीक से आगे बढ़कर सामाजिक असमानताओं पर संवाद/विमर्श का एक और सशक्त दायरा बन सकता था.

(मोहम्मद नौशाद सीएसडीएस, नई दिल्ली में रिसर्च एसोसिएट हैं.)