बेंगलुरु: भारत ने 2028 में होने वाले 33वें वार्षिक जलवायु सम्मेलन (सीओपी33) की मेजबानी करने का अपना प्रस्ताव वापस ले लिया है. यह जानकारी क्लाइमेट होम न्यूज़ की 2 अप्रैल की एक रिपोर्ट में सामने आई है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिसंबर 2023 में सीओपी28 के दौरान दुबई में कहा था कि भारत सीओपी33 की मेजबानी करना चाहता है. उस समय विशेषज्ञों ने इसे भारत की ओर से एक मजबूत संदेश बताया था.
अब विशेषज्ञों ने इस फैसले को ‘रणनीतिक रूप से चूका हुआ मौका’ और वैश्विक प्रयासों के लिए ‘झटका’ बताया है.
विशेषज्ञों ने द वायर से कहा है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुए युद्ध जैसे हालिया तनावों के कारण भारत समेत कई देश सतर्क रुख अपना रहे हैं, जिसमें सीमित जलवायु लक्ष्य तय करना और पारंपरिक ईंधनों के जरिए अल्पकालिक ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देना शामिल है.
भारत ने क्यों वापस लिया प्रस्ताव
रिपोर्ट के अनुसार, पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के संयुक्त सचिव रजत अग्रवाल ने 2 अप्रैल को एक पत्र के जरिए यूएनएफसीसीसी के एशिया-पैसिफिक समूह को भारत के इस फैसले की जानकारी दी.
चार पैराग्राफ के इस पत्र में कहा गया कि 2028 के लिए अपनी जलवायु प्रतिबद्धताओं की समीक्षा के बाद यह निर्णय लिया गया. हालांकि, इसमें कोई अन्य कारण स्पष्ट नहीं किया गया. साथ ही भारत ने कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय समुदाय के साथ जलवायु कार्रवाई में सहयोग जारी रखेगा और मेजबानी के लिए एशिया-पैसिफिक देशों के समर्थन के लिए आभार व्यक्त किया.
अब तक केंद्र सरकार ने इस पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है.
‘रणनीतिक रूप से चूका मौका’
जलवायु कार्यकर्ता और सतत संपदा क्लाइमेट फाउंडेशन के संस्थापक निदेशक हरजीत सिंह ने मेजबानी के प्रस्ताव को वापस ले लेने को ‘रणनीतिक रूप से चूका हुआ मौका’ बताया.
उन्होंने कहा, ‘भारत ने जिस तेजी से हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में प्रगति दिखाई है, उसके बावजूद अब उसने अपने नवीकरणीय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी और अन्य उपलब्धियों को वैश्विक मंच पर दिखाने का अवसर खो दिया है.’
उन्होंने यह भी कहा कि इससे भारत वैश्विक दक्षिण की आवाज़ उठाने का एक अहम मंच खो रहा है, खासकर ऐसे समय में जब विकासशील देशों की जरूरतों को केंद्र में रखना जरूरी है.
उन्होंने द वायर से कहा, ‘सीओपी33 वह मंच होना चाहिए था, जहां भारत ऐतिहासिक उत्सर्जन के लिए जवाबदेही की मांग करता और यह सुनिश्चित करता कि हरित अर्थव्यवस्था की ओर न्यायपूर्ण बदलाव दुनिया के सबसे कमजोर लोगों की ऊर्जा पहुंच की कीमत पर न हो.’
वैश्विक प्रयासों के लिए ‘झटका’
क्लाइमेट एक्शन नेटवर्क साउथ एशिया के निदेशक संजय वशिष्ठ ने द वायर से बातचीत में इस फ़ैसले को वैश्विक जलवायु एजेंडा के लिए ‘झटका’ बताया.
उन्होंने कहा कि भारत की जलवायु नीति हमेशा न्याय और नैतिकता पर आधारित रही है और वह विकसित देशों को उनकी जिम्मेदारियों की याद दिलाता रहा है. ऐसे में इस प्रस्ताव से पीछे हटना वैश्विक प्रयासों को कमजोर करता है.
दिसंबर 2023 में जब मोदी ने भारत द्वारा जलवायु सम्मेलन की मेजबानी का प्रस्ताव रखा था, तब वशिष्ठ ने इसे ‘महत्वपूर्ण’ बताया था.
डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट के मुताबिक, उन्होंने कहा था कि अब भारत को अपनी प्रतिबद्धताओं पर अमल करते हुए ज़मीनी स्तर पर नेतृत्व दिखाना होगा, खासकर जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल में कमी लाने के मामले में.
जारी ईरान-अमेरिका संघर्ष का असर?
हरजीत सिंह ने कहा कि मौजूदा वैश्विक भू-राजनीतिक हालात और संघर्षों ने भारत समेत कई देशों को सतर्क रुख अपनाने पर मजबूर किया है. इसमें सीमित जलवायु लक्ष्य घोषित करना और पारंपरिक ईंधनों के जरिए अल्पकालिक ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता देना शामिल है.
उन्होंने द वायर से कहा, ‘हालांकि, मुझे पूरा विश्वास है कि यह एक अस्थायी दौर है, न कि कोई स्थायी विचलन. भारत का नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र पहले से ही अपनी आधिकारिक प्रतिबद्धताओं से आगे बढ़ रहा है. अंततः भारत के लिए असली ऊर्जा सुरक्षा और स्थिरता केवल नवीकरणीय स्रोतों से ही संभव है, और यह बदलाव पहले से ही जारी है और अपरिहार्य है.’
भारत का सीओपी की मेजबानी से पीछे हटने का फैसला ऐसे समय आया है, जब एक महीने से भी कम समय पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पेरिस एग्रीमेंट के तहत भारत की तीसरी राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित प्रतिबद्धता (एनडीसी) को मंजूरी दी थी.
भारत के नए लक्ष्यों में शामिल हैं- 2035 तक 2005 के स्तर की तुलना में जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता में 47% की कमी, 2035 तक कुल स्थापित विद्युत क्षमता का 60% गैर-जीवाश्म ईंधन स्रोतों से हासिल करना और 2035 तक वन और वृक्ष आवरण के जरिए 3.5 से 4.0 अरब टन सीओ₂ के बराबर कार्बन सिंक तैयार करना.
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि ये लक्ष्य ‘कम महत्वाकांक्षी’ हैं और भारत की स्वच्छ ऊर्जा क्षमता को कम करके आंकते हैं.
(इस रिपोर्ट को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
