आपकी मौत के बाद आपके डिजिटल डेटा का मालिक कौन होगा?

डिजिटल दुनिया में हमारी यादें अब सिर्फ तस्वीरों और संदेशों तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि एक विशाल ‘डेटा विरासत’ बन चुकी हैं. यह लेख बताता है कि मृत्यु के बाद हमारा डिजिटल डेटा, एआई क्लोन्स और ऑनलाइन अकाउंट्स कैसे कानूनी, नैतिक और पर्यावरणीय संकट पैदा कर रहे हैं, और ‘डिजिटल अमरता’ का सच क्या है.

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इंटरनेट की दुनिया में बढ़ते ‘डिजिटल मलबे’ और मृत्यु के बाद भी जिंदा रहने वाली ऑनलाइन पहचान की प्रतीकात्मक तस्वीर. (इस तस्वीर को एआई की मदद से तैयार किया गया है.)

जरा सोचिए, आज से कुछ दशकों के बाद अगर हम इंटरनेट की दुनिया को देखेंगे तो वहां जीवित लोगों से ज्यादा मरे हुए लोगों के अकाउंट्स होंगे. एक तरह का पूरा ‘डिजिटल कब्रिस्तान’. जी हां, अरबों प्रोफाइल ऐसे लोगों की होगी, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं. यह एक ऐसा विशाल ‘डिजिटल मलबा’ होगा जिसके बारे में हमने कभी सोचा भी नहीं था.

एक अध्ययन के अनुसार, साल 2100 तक अकेले फेसबुक पर करीब 4.9 अरब मृत यूजर्स की प्रोफाइल होगी. पुराने समय में जब कोई इस दुनिया से जाता था, तो उसके पीछे छोड़ी गई यादों का दायरा बहुत सीमित होता था- कुछ कपड़े, कुछ पत्र, कुछ सामान या चंद तस्वीरें. लेकिन आज तो इंसान की एक दिन की डिजिटल यादें ही उसके पूरे जीवन की भौतिक यादों से अधिक मात्रा में होती हैं.

डेटा विश्लेषक स्टैटिस्टा और आईडीसी के अनुमान के अनुसार, साल 2026 में दुनिया भर में कुल 221 ज़ेटाबाइट्स डेटा पैदा होने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष से लगभग 22% अधिक है. यदि इसे दिनों में विभाजित किया जाए, तो इस वर्ष प्रतिदिन लगभग 60.5 करोड़ (605 मिलियन) टेराबाइट्स डेटा पैदा हो रहा है.

इस विशाल डेटा और डिजिटल विरासत के कानूनी संकट को समझने के लिए भारत में हुई एक हालिया घटना को देखना बेहद जरूरी है.

गांधीनगर की सिविल कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: डिजिटल डेटा अब ‘चल संपत्ति’

हाल ही में गांधीनगर (गुजरात) की एक सिविल कोर्ट ने डिजिटल विरासत को लेकर एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व फैसला सुनाया. एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनका परिवार उनके लॉक हो चुके आईफोन और उससे जुड़े आईक्लाउड अकाउंट का एक्सेस पाना चाहता था, जिसमें उनकी महत्वपूर्ण पारिवारिक तस्वीरें, दस्तावेज और यादें संग्रहित थीं. तकनीकी दिग्गज कंपनी ‘एप्पल’ ने अपनी कड़ी प्राइवेसी पॉलिसी का हवाला देते हुए बिना अदालती आदेश के यह डेटा देने से साफ इनकार कर दिया था.

अदालत ने एप्पल को आदेश दिया कि वह मृतक के कानूनी वारिस को डेटा रिकवर करने और पासवर्ड रीसेट करने में पूरी तकनीकी सहायता प्रदान करे. यह फैसला डिजिटल युग में ‘वसीयत’ और डिजिटल उत्तराधिकार की अहमियत को रेखांकित करने वाला देश का पहला बड़ा उदाहरण बन गया है.

डिजिटल पदचिह्न: आत्मकथा बनाम गुप्त डायरी

मरने के बाद पीछे छूटने वाले इस संपूर्ण डेटा को हम मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांट सकते हैं. पहली है सक्रिय विरासत (एक्टिव लिगेसी) और दूसरी है निष्क्रिय अवशेष (पैसिव ट्रेसेस).

सक्रिय विरासत को समझना काफी आसान है. यह वह डेटा है जिसे हम अपने जीवनकाल में जानबूझकर इंटरनेट पर सहेजते हैं. जैसे- सोशल मीडिया फोटो, ट्वीट, कमेंट, ब्लॉग, मेल आदि. यह हमारी चुनी हुई यादें हैं; यानी यह हमारा वह चेहरा है जिसे हम दुनिया को दिखाना चाहते हैं.

लेकिन इस कहानी का दूसरा और कहीं अधिक विशाल हिस्सा ‘निष्क्रिय अवशेष’ हैं. जब हम इंटरनेट ब्राउज़ कर रहा होते है, तो बैकग्राउंड में कुकीज़ और ट्रैकर्स लगातार चुपचाप काम कर रहे होते हैं. वे सिर्फ यह नहीं देखते कि हमने क्या खरीदा, बल्कि यह भी दर्ज करते हैं कि आपने किसी उत्पाद की तस्वीर पर अपना माउस कर्सर कितनी देर तक रोका. आपके टाइप करने की गति, सर्च बार में लिखकर तुरंत मिटा दिए गए शब्द, रात के दो बजे आपकी सटीक भौगोलिक स्थिति और आपके बैंक ट्रांजैक्शन का पैटर्न- सब कुछ रिकॉर्ड होता है.

बिग-टेक कंपनियां अब महज़ आपका नाम या ईमेल नहीं चाहतीं, वे एल्गोरिदम के जरिए आपके ‘दिमाग’ का नक्शा तैयार करती हैं. ताकि आपके व्यवहार का सटीक अनुमान लगाकर आपको लक्षित विज्ञापन दिखाए जा सकें.

यह पूरी तरह से व्यावसायिक मुनाफे के लिए गढ़ी गई एक गणितीय छवि है. यह हमारी आदतों का एक खाका तो ज़रूर है, लेकिन इसमें हमारी मानवीय चेतना, भावनाएं या इरादे शामिल नहीं हैं.

कानूनी उलझन: डेटा का मालिक कौन?

सामान्य डिजिटल डेटा- जैसे ईमेल, चैट्स और तस्वीरें- का किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद कानूनी तौर पर मालिक कौन होगा? भौतिक दुनिया में नियम बेहद स्पष्ट हैं; यदि किसी के पास मकान, ज़मीन या अन्य भौतिक संपत्ति है, तो उत्तराधिकार और वसीयत के माध्यम से उसका हस्तांतरण सुगमता से हो जाता है. लेकिन डिजिटल दुनिया में यह व्यवस्था इतनी स्पष्ट क्यों नहीं है?

इसका मुख्य कारण यह है कि हमारे अधिकांश मौजूदा कानून भौतिक संपत्तियों को ध्यान में रखकर बनाए गए थे, डिजिटल एसेट्स के लिए नहीं. उदाहरण के लिए, भारत में वसीयत और संपत्ति के हस्तांतरण को संचालित करने वाला मुख्य कानून भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (इंडियन सक्सेशन एक्ट) है. लगभग एक सदी पुराने इस कानून में ‘डिजिटल संपत्ति’ शब्द का कोई ज़िक्र तक नहीं है.

इसी प्रकार, भारत का मुख्य साइबर कानून सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम (आईटी एक्ट), 2000 डिजिटल दुनिया में इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स और डिजिटल हस्ताक्षरों को कानूनी मान्यता तो देता है, लेकिन किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसके सोशल मीडिया अकाउंट्स या पर्सनल डेटा के मालिकाना हक और उत्तराधिकार के मुद्दे पर पूरी तरह मौन है. कानून की इसी खामोशी का फायदा उठाकर बिग-टेक कंपनियां यूज़र्स के डेटा पर अपनी मनमानी शर्तें थोपती हैं.

इस कानूनी शून्यता के बीच, भारत सरकार द्वारा लाया गया डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम (डीपीडीपी एक्ट) 2023 में उम्मीद की किरण दिखाता है. इस नए कानून की धारा 14 नागरिकों को ‘नामांकन’ का एक विशेष अधिकार देती है. इसके तहत आप अपने जीवनकाल में ही किसी व्यक्ति को अपना डिजिटल नॉमिनी चुन सकते हैं, जो आपकी मृत्यु या अक्षमता की स्थिति में आपके डिजिटल डेटा संबंधी अधिकारों का प्रबंधन कर सकेगा.

हालांकि, इसके पूर्ण अनुपालन के लिए अभी लंबी समयसीमा (मई 2027) तय की गई है, जिससे तत्काल उत्पन्न होने वाले डिजिटल उत्तराधिकार के संकटों का पूर्ण समाधान फिलहाल भविष्य के गर्भ में ही छिपा है.

टर्म्स ऑफ सर्विस और डिजिटल वसीयत का उदय

जब कोई व्यक्ति किसी सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म या ईमेल सर्विस पर अपना अकाउंट बनाता है, तो वह ‘सेवा की शर्तों’ वाले उस लंबे-चौड़े एग्रीमेंट पर बिना पढ़े ‘आई एग्री’ का विकल्प चुन लेता है. लेकिन कानूनी रूप से उस अनुबंध के अनुसार, वह अकाउंट कभी भी यूज़र की निजी संपत्ति नहीं बनता. यूज़र को केवल उस प्लेटफ़ॉर्म की सेवाओं का उपयोग करने का एक सीमित लाइसेंस मिलता है

इसी कानूनी और तकनीकी पेंच के कारण अब दुनिया भर में ‘डिजिटल वसीयत’ का विचार तेज़ी से उभर रहा है. डिजिटल अधिकारों के लिए काम करने वाली संस्था इलेक्ट्रॉनिक फ्रंटियर फाउंडेशन के अनुसार, डिजिटल आफ्टरलाइफ प्लानिंग अब महज़ एक विकल्प नहीं, बल्कि आधुनिक नागरिक का अनिवार्य कर्तव्य बन चुकी है. इसके माध्यम से लोग अपने जीवनकाल में ही यह निर्धारित कर सकते हैं कि उनके जाने के बाद उनके ईमेल, वित्तीय डेटा और सोशल मीडिया अकाउंट्स को हमेशा के लिए डिलीट कर दिया जाए या परिवार के किसी भरोसेमंद सदस्य को उसका एक्सेस सौंप दिया जाए.

‘क्लाउड’ का भ्रम और पर्यावरणीय संकट

जब कोई व्यक्ति गुज़र जाता है और उसका ईमेल या सोशल मीडिया अकाउंट डिलीट नहीं किया जाता, तो उसके पुराने स्पैम ईमेल्स, धुंधली तस्वीरें, कैब बुकिंग की रसीदें और डिजिटल अवशेष किसी न किसी भौतिक हार्ड ड्राइव (क्लाउड) के अंदर जगह घेर रहे होते हैं. इन सर्वर्स को 24 घंटे चालू रखने के लिए भारी मात्रा में विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता होती है.

इन विशाल डेटा सेंटर्स में लाखों सर्वर्स दिन-रात बिना रुके काम करते हैं, जिससे बेतहाशा गर्मी पैदा होती है. इस अत्यधिक तापमान को नियंत्रित करने और सर्वर्स को ठंडा रखने के लिए विशाल कूलिंग सिस्टम्स का उपयोग किया जाता, जो रोज़ाना लाखों गैलन साफ पानी की खपत करते हैं.

यूएस नेशनल रिन्यूएबल एनर्जी लैबोरेटरी के शोध के अनुसार, डेटा सेंटर्स को ठंडा रखने के लिए अरबों लीटर पानी का उपयोग किया जा रहा है, जो वैश्विक जल संकट को सीधे तौर पर बढ़ा रहा है. एक औसत डेटा सेंटर प्रतिदिन लगभग 3 लाख से 5 लाख गैलन पानी का उपयोग करता है, यह उतना ही पानी है जितना किसी बड़े शहर के हजारों घरों में उपयोग किया जाता है.

इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि एक इंसान इस दुनिया से चला गया, लेकिन उसके इनबॉक्स में पड़ा प्रमोशनल ईमेल्स का वह फोल्डर आज भी किसी डेटा सेंटर में बैठकर हमारी बिजली और साफ पानी की खपत कर रहा है. यही ‘डिजिटल कचरा’ है. हमारे यह निष्क्रिय अवशेष केवल सर्वर पर पड़ी कुछ मृत फाइलें नहीं हैं, बल्कि ये हमारी धरती के वास्तविक संसाधनों का निरंतर दोहन कर रहे हैं.

प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका ‘नेचर’ और बीबीसी की रिपोर्ट से पता चलता है कि इन डेटा सेंटर्स का कार्बन फुटप्रिंट इतनी तेज़ी से बढ़ रहा है कि यह बहुत जल्द पूरी एविएशन इंडस्ट्री के कुल कार्बन उत्सर्जन को भी पीछे छोड़ देगा. डेटा सेंटर्स कभी बंद नहीं होते. यदि कोई व्यक्ति इस दुनिया से विदा भी हो चुका है, तब भी उसके पुराने ईमेल और तस्वीरों को ‘जिंदा’ रखने के लिए सर्वर्स 24 घंटे चल रहे हैं.

यह आधुनिक युग का एक भयानक विरोधाभास है; हम आभासी यादों और अदृश्य डेटा को सुरक्षित रखने के लिए अपने वास्तविक पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं. हम इस धरती के वास्तविक संसाधनों को केवल इसलिए जला रहे हैं ताकि हम उन चीज़ों को सहेजकर रख सकें, जिनकी शायद अब इस दुनिया में किसी को ज़रूरत ही नहीं है.

क्या हमारी यादों की कीमत घट रही है?

आज औसतन एक स्मार्टफोन में 2500 से लेकर 10 हज़ार तक तस्वीरें संग्रहित होती हैं. हम सुबह के नाश्ते से लेकर सड़क के ट्रैफिक जाम तक, हर सामान्य घटना को कैमरे में कैद कर लेते हैं.

जब हमारे पास हर क्षण की तस्वीर उपलब्ध होने लगती है, तो किसी एक विशेष पल की वास्तविक अहमियत स्वतः समाप्त हो जाती है. डेटा की इस प्रचुरता ने हमारी स्मृतियों के वास्तविक मूल्य को घटा दिया है. सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह विशाल डिजिटल तिजोरी, जिसके रखरखाव के लिए हम अपना वास्तविक पर्यावरण तक दाव पर लगा रहे हैं और जिसे हम अभेद्य मानते हैं, वह खुद भी स्थायी नहीं है.

कानूनी रूप से कंपनियों पर इस डेटा को अनंत काल तक सुरक्षित रखने का कोई उत्तरदायित्व नहीं होता. जब आप किसी ऐप पर साइन-अप करते हैं, तो उसकी ‘सेवा की शर्तों’ (टर्म्स ऑफ सर्विस) में स्पष्ट लिखा होता है कि कंपनियां डेटा की सुरक्षा या उसे हमेशा बनाए रखने की कोई गारंटी नहीं देतीं. वे बिना किसी पूर्व सूचना के अपनी सेवा को आंशिक या पूर्ण रूप से बंद करने का कानूनी अधिकार सुरक्षित रखती हैं.

इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जब बड़ी डिजिटल जागीरें ताश के पत्तों की तरह ढह गईं. किसी समय इंटरनेट की जान रहे ऑरकुट और याहू, इसके प्रत्यक्ष गवाह हैं. जब इन प्लेटफॉर्म्स ने अपनी सेवाएं बंद कीं, तो अरबों लोगों की बातचीत, समूह और यादें हमेशा के लिए मिट गईं. कंपनियों द्वारा बैकअप का सीमित समय दिए जाने के बावजूद लाखों यूज़र्स अपनी डिजिटल विरासत को समय रहते नहीं बचा सके.

इससे भी बदतर स्थिति तब होती है जब कंपनियां तकनीकी लापरवाही का शिकार होती हैं. इसका सबसे बड़ा उदाहरण मायस्पेस है.

द गॉर्डियन की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक सर्वर माइग्रेशन के दौरान हुई तकनीकी खराबी के कारण इस प्लेटफ़ॉर्म ने साल 2003 से 2015 के बीच यूज़र्स द्वारा अपलोड किया गया अपना सारा म्यूजिक और डेटा (लगभग 5 करोड़ गाने और तस्वीरें) हमेशा के लिए खो दिया. यह घटना साबित करती है कि निजी सर्वरों पर टिकी हमारी यादों की तिजोरी कितनी कमज़ोर बुनियाद पर खड़ी है.

डिजिटल अमरता: एक तकनीकी भ्रम

इस पूरी बहस के बीच सबसे बड़ा सच यह है कि हमारे द्वारा सहेजा गया यह विशाल डेटा समय के साथ खुद-ब-खुद नष्ट होने लगता है. तकनीकी दुनिया में इस प्रक्रिया को ‘डेटा डिग्रेडेशन’ या ‘बिट रॉट’ कहा जाता है.

इंटरनेशनल काउंसिल ऑन आर्काइव्स के डिजिटल प्रिजर्वेशन गाइड के अनुसार, बिना निरंतर रखरखाव के किसी भी डिजिटल मीडिया की औसत उम्र महज़ 10 से 20 वर्ष ही होती है.

सिर्फ हार्डवेयर की खराबी ही नहीं, बल्कि सॉफ्टवेयर का पुराना पड़ जाना भी एक अत्यंत गंभीर संकट है. ज़रा सोचिए, आज से 15-20 वर्ष पहले लोकप्रिय रहे फाइल फॉर्मेट्स (जैसे फ्लॉपी डिस्क का डेटा, .PCX या .3GP वीडियो फॉर्मेट) को आज के आधुनिक कंप्यूटर्स पढ़ भी नहीं सकते. तकनीकी रूप से इसे ‘सॉफ्टवेयर ऑब्सेलेसेंस’ कहा जाता है.

यूनेस्को के डिजिटल हेरिटेज चार्टर के अनुसार, यह तकनीक का एक ऐसा अंधा मोड़ है जहां फाइलें तो सर्वर पर मौजूद होती हैं, लेकिन उन्हें खोलने या चलाने वाले सॉफ्टवेयर दुनिया से गायब हो चुके होते हैं.

डिजिटल वसीयत

मरणोपरांत अपनी डिजिटल गरिमा को बनाए रखने के लिए ये पांच कदम उठाए जाने चाहिए:

‘लिगेसी कॉन्टैक्ट’ और ‘इनऐक्टिविटी मैनेजर’ सेट करें: प्रमुख टेक कंपनियां अब यह सुविधा देती हैं कि आपकी मृत्यु या लंबे समय तक निष्क्रियता के बाद आपके अकाउंट का क्या हो. (Google: https://myaccount.google.com/inactive , Meta: https://www.facebook.com/help/1568013990080948 एप्पल: https://support.apple.com/en-in/HT212360)

डिजिटल इन्वेंट्री तैयार करें: एक सूची बनाएं जिसमें आपके सभी महत्वपूर्ण डिजिटल खातों का विवरण हो (सोशल मीडिया, ईमेल, क्लाउड, वित्तीय संपत्तियां आदि).

पासवर्ड मैनेजर का उपयोग करें: एक विश्वसनीय पासवर्ड मैनेजर का उपयोग करें।

डिजिटल स्वच्छता अपनाएं: आने वाली पीढ़ी को ‘डेटा के मलबे’ से बचाने के लिए अनावश्यक स्पैम ईमेल और बेकार की फाइलों को नियमित रूप से डिलीट करें.

लिखित वसीयत में उल्लेख करें: अपनी वसीयत में स्पष्ट रूप से उल्लेख करें कि आपकी मृत्यु के बाद आपकी ‘डिजिटल बौद्धिक संपदा’ का अधिकार किसे मिलेगा और एक ‘डिजिटल निष्पादक’ नियुक्त करें.

और अंत में…

अंततः हमारा डिजिटल वजूद हमारी यादों का विस्तार होना चाहिए, न कि मशीनों के बीच लावारिस भटकता कोई कोड. आज आपके द्वारा उठाए गए ये छोटे कदम भविष्य में आपके प्रियजनों को एक स्पष्ट और गौरवशाली विरासत सौंपने में मदद करेंगे. डिजिटल दुनिया में ‘अमरता’ मुफ़्त नहीं है. इसे जिंदा रखने के लिए धरती के संसाधनों की निरंतर आहुति देनी पड़ रही है. जिस क्षण हम बिजली देना और देखभाल करना बंद करेंगे, हमारी पूरी डिजिटल सभ्यता ‘बिट रॉट’ का शिकार होकर धूल में मिल जाएगी.

(नीरज लाकड़ा स्वतंत्र लेखक और विश्लेषक हैं.)