गोवा और मणिपुर में राज्यपालों का फैसला सही

संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का मानना है कि गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के बजाय भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना संविधान सम्मत है. राज्यपाल अपने विवेक से किसी भी पार्टी को न्यौता दे सकता है.

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संविधान विशेषज्ञ सुभाष कश्यप का मानना है कि गोवा और मणिपुर में सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस के बजाय भाजपा को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित करना संविधान सम्मत है. राज्यपाल अपने विवेक से किसी भी पार्टी को न्यौता दे सकता है.

Manohar Parrikar 1

गोवा और मणिपुर विधानसभा में राज्यपाल की भूमिका को गैरसंवैधानिक बताना बिल्कुल गलत है. ऐसे मामलों में संवैधानिक स्थिति बिल्कुल स्पष्ट है. संविधान में साफ-साफ कहा गया है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेगा. ऐसे में राज्यपाल अपने विवेक से किसी की भी नियुक्ति कर सकते है.

राज्यपाल को ऐसे व्यक्ति में विश्वास करना होता है जिसे सदन में बहुमत मिलने की संभावना है. ऐसे में राज्यपाल अपनी समझ के अनुसार बहुमत हासिल करने के लिए किसी को बुला सकता है. गोवा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी कुछ इसी तरह का फैसला दिया है.

जहां तक बात सबसे बड़े दल को न्यौता देने की है तो संविधान में इसका कहीं उल्लेख नहीं है. संविधान में सिर्फ इतना उल्लेख है कि मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल करेंगे. इस मामले में परंपराएं भी अलग-अलग तरह की रही हैं.

सिर्फ बड़े दल को ही न्यौता दिया गया है ऐसा बिल्कुल भी नहीं है. कभी सबसे बड़े दल को मौका दिया गया है तो कभी सबसे बड़े गठबंधन को मौका दिया गया है. कई बार छोटे दलों को भी मौका दिया गया है.

जहां तक बात मणिपुर में कांग्रेस विधायक के भाजपा द्वारा बनाई जा रही सरकार में शपथ ग्रहण करने का है तो बगैर निर्वाचित हुए भी कोई व्यक्ति मंत्रिपद की शपथ ले सकता है. उसे छह महीने में चुनाव लड़कर जीतना होता है.

वैसे भी सदन में किसी भी पार्टी का विधायक व्हिप का उल्लंघन करता है तो पार्टी इसकी शिकायत विधानसभा अध्यक्ष से कर सकती है. इस पर विधानसभा अध्यक्ष संबंधित विधायक की सदस्यता को रद्द कर सकते हैं.

कई बार ऐसा भी देखा गया है कि विधायक अपनी पार्टी से इस्तीफा देकर दोबारा चुनाव लड़ जाते हैं. ऐसे में वह मंत्रिमंडल में छह महीने तक मंत्री रह सकता है.

(लेखक संविधान विशेषज्ञ हैं. लेख अमित सिंह से बातचीत पर आधारित है)