जनता की 90 लाख हेक्टेयर ज़मीन पर सरकार का अवैध क़ब्ज़ा

2006 में लागू वन अधिकार क़ानून कहता है कि जो ज़मीनें आज़ादी के पहले सामुदायिक अधिकारों के लिए थीं, वो यथावत बनी रहेंगी. लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 90 लाख हेक्टेयर ऐसी ज़मीनों पर सरकार का क़ब्ज़ा है.

//
Tribal women carry bundles of twigs and leaves near Shantiniketan, 150 km (95 miles) northwest of Calcutta on March 18, 2004. REUTERS/Jayanta Shaw/Files

2006 में लागू वन अधिकार क़ानून कहता है कि जो ज़मीनें आज़ादी के पहले सामुदायिक अधिकारों के लिए थीं, वो यथावत बनी रहेंगी. लेकिन मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 90 लाख हेक्टेयर ऐसी ज़मीनों पर सरकार का क़ब्ज़ा है.

Tribal women carry bundles of twigs and leaves near Shantiniketan, 150 km (95 miles) northwest of Calcutta on March 18, 2004. REUTERS/Jayanta Shaw/Files
फोटो: रॉयटर्स

सन 1950 में संविधान लागू होने के बाद इस देश में पहला सबसे क्रांतिकारी क़ानून मालगुजार, ज़मींदार, जागीरदार के उन्मूलन का बना. इस क़ानून के तहत मालगुजार, ज़मींदारों से सरकार ने ज़मीनें अर्जित कीं और इन ज़मीनों को वन विभाग ने अपने नियंत्रण में लीं. इसके बाद ये हुआ कि राजस्व ग्रामों में निजी भूमि छोड़कर सभी ज़मीनों पर, जंगल पर वन विभाग ने अपना नियंत्रण क़ायम कर लिया.

तब से लेकर आज तक वन विभाग उन ज़मीनों को वन भूमि मानकर काम कर रहा है. और राजस्व विभाग उन्हीं ज़मीनों को राजस्व भूमि मानकर काम कर रहा है. तो ज़मीन एक है और उस ज़मीन के दो मालिक बन गए. अब जिसकी जैसी मर्ज़ी होती है, वह गांव के लोगों को उस तरह से प्रताड़ित करता है. इसमें ग्रामीणों के साथ-साथ पूरे समाज का नुकसान है.

आपने 1950 में मालगुजार, ज़मींदारों से जो ज़मीनें अर्जित की थीं, उसके मुख्य रूप से दो उद्देश्य बताए गए थे. एक, भूमि सुधार के लिए इन ज़मीनों की आवश्यकता है. दूसरा, ये ज़मीनें नियंत्रण और प्रबंधन में रहेंगी. ये दोनों उद्देश्य पूरे नहीं हुए. प्रारंभ ही नहीं हुए. न भूमि सुधार हुआ, न ये ज़मीनें समुदाय के पास गईं. ये ज़मीनें वन विभाग ने अपने क़ब्ज़े में ले लीं. तब से लेकर आजतक ये पूरी प्रक्रिया उसी तरह से चलती चली आ रही है. दुर्भाग्य यह है कि 1996 में देश के सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक प्रभावी हस्तक्षेप किया. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के सामने ये बात लाई ही नहीं गई कि सच्चाई क्या है?

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के 1956 से 2000 तक के राजस्व विभाग और वन विभाग के आंकड़ों को लेते हैं तो 95 लाख हेक्टेयर भूमि अतिरिक्त होती है. अब सरकार अगर 95 लाख हेक्टेयर भूमि का हिसाब नहीं ढूंढ पा रही हो तो आप इसे राजस्व भूमि कहेंगे या वन भूमि कहेंगे?

1956 में वन विभाग और राजस्व विभाग ने ये बताया कि मध्य प्रदेश का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल 4 करोड़ 42 लाख हेक्टेयर था. इसमें से 3 करोड़ 66 लाख हेक्टेयर राजस्व भूमि थी और 1 करोड़ 71 लाख हेक्टेयर वन विभाग की थी. दोनों का जोड़ हुआ 5 करोड़ 38 लाख हेक्टेयर. मध्य प्रदेश का कुल रकबा 4 करोड़ 42 लाख हेक्टेयर है. राज्य में 95 लाख 73 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि है. यह अतिरिक्त भूमि कहां से आई?

राजस्व विभाग और वन विभाग ने 2000 में आंकड़ों में संसोधन किया. राजस्व विभाग ने कुल रकबा बताया 3 करोड़ 27 लाख 76 हज़ार हेक्टेयर, वन विभाग ने अपना रकबा बताया 1 करोड़ 54 लाख 50 हज़ार हेक्टेयर. दोनों का कुल योग हुआ 4 करोड़ 82 लाख 27 हज़ार करोड़ हेक्टेयर. यानी राज्य के कुल क्षेत्रफल से अतिरिक्त भूमि हुई 38 लाख 78 हज़ार हेक्टेयर.

यह ग़लत आंकड़ा 1956 से बता रहे हैं और इसी ग़लत आंकड़े पर सुप्रीम कोर्ट फ़ैसले पर फ़ैसला दिए जा रहा है. अगर सर्वोच्च अदालत ने इस 95 लाख 73 हजार हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि अभिलेख मंगवा लिया होता तो शायद ये वन विभाग और राजस्व विभाग दोनों के लिए बहुत अच्छा होता. इस हिसाब से सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ही ग़लत तथ्यों पर आधारित है.

जिन ज़मीनों को वन विभाग ने 1950 में संरक्षित वन भूमि मान लिया, जिन ज़मीनों को 1956 में वन भूमि अधिनियम के तहत अधिसूचित कर दिया गया, सुप्रीम कोर्ट उसी को वन विभाग की ज़मीन मान रहा है.

इस गड़बड़ी का सीधा-सीधा नुकसान समाज को है क्योंकि ये ज़मीनें सामुदायिक ज़मीनें हैं, जिस पर ग्रामीणों के चारागाह हैं, श्मशान हैं, जानवर बांधने के गोठान हैं, खलिहान हैं, जंगल हैं, जलाऊ लकड़ी लाने के स्थान हैं. जब इन ज़मीनों पर वन विभाग ने अपना क़ब्ज़ा जमा रखा है तो वह इन सारे सामुदायिक अधिकारों को अपराध मानने लगा और ग्रामीणों पर केस दर्ज करने लगा, उन्हें जेल भिजवाने लगा, उनके जानवर जब्त करनेे लगा, उनपर ज़ुर्माना करने लगा. इससे मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का पूरा ग्रामीण इलाक़ा प्रभावित है.

अब पूरे देश में वन विभाग यह प्रचारित करता फिरता है कि वन भूमि कम हो गई है. पूरा देश मान रहा है कि वन भूमि कम हो गई है. सुप्रीम कोर्ट भी मान रहा है कि वन भूमि कम हो गई है. लेकिन मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और भारत सरकार के आंकड़े देखिए तो 1956 से 2000 तक के बीच आरक्षित और संरक्षित वन क्षेत्र की भूमि में 10 लाख 60 हज़ार हेक्टेयर की वृद्धि हुई है. यह तब है कि जब वन विभाग कहता है कि हमने विकास के लिए ज़मीनें बांट दीं और ज़मीनें कम हो गईं. तो यह 10 लाख 60 हज़ार हेक्टेयर की वृद्धि कैसे हो गई?

ये ज़मीनें आई कहां से? वास्तव में ज़मीनें बढ़ी हैं. क्योंकि वन विभाग ने सामुदायिक संसाधनों को, मालगुजार व ज़मींदार से अर्जित संसाधनों को अपने क़ब्ज़े में लेकर अपनी अधिसूचनाओं के तहत वन भूमि घोषित किया, इसलिए ये आंकड़ा बढ़ा हुआ है.

1956 से लेकर 2000 तक वन विभाग ने मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 10 लाख 60 हज़ार हेक्टेयर सामुदायिक ज़मीनों को अपने क़ब्ज़े में रखा. उस पर कोई संसोधन प्रक्रिया तो आज तक नहीं शुरू हुई.

वर्ष 2000 तक राजस्व विभाग के अनुसार, उसकी ज़मीनों में 38 लाख 69 हज़ार हेक्टेयर की कमी हुई. वन विभाग के अनुसार, उसकी ज़मीनों में 17 लाख 95 हज़ार हेक्टेयर की कमी आई. अब दोनों विभागों द्वारा बताया जा रहा है कि 56 लाख 64 हेक्टेयर भूमि कम हो गई. इसकी आज तक जांच नहीं हुई कि अतिरिक्त हुई या कम हुई ज़मीनें कहां गईं?

राज्य की जनता के साथ यह एक ऐतिहासिक अन्याय था. इसे दूर तो नहीं किया गया, उल्टे वन अधिकार क़ानून लागू करके कुछ नये अन्यायों की आधारशिला रख दी गई.

2006 में वन अधिकार क़ानून लागू हो गया. यह क़ानून कहता है कि जो ज़मीनें मालगुजार, ज़मींदार के समय समाज के सामुदायिक अधिकारों के लिए थीं, वो यथावत बनी रहेंगी. वन विभाग के कंट्रोल में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 90 लाख हेक्टेयर ऐसी ज़मीनें हैं, जो आज़ादी के पहले ग्रामीणों की, सामुदायिक अधिकारों की थीं. यानी ग्रामीणों की 90 लाख हेक्टेयर ऐसी ज़मीनें हैं जिन पर सरकारों ने क़ब्ज़ा करके रखा है.

किन ज़मीनों पर किसका अधिकार है, एक एक खसरे का ब्यौरा सरकार के पास उपलब्ध है. लेकिन पिछले आठ सालों में इस 90 लाख हेक्टेयर में मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ग्रामीणों को 9 लाख हेक्टेयर ज़मीन भी ग्रामीणों को सौंपी नहीं जा सकीं.

भारत सरकार का वन मंत्रालय मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के वर्किंग प्लान अप्रूव करता है. उस वर्किंग प्लान में 70 लाख हेक्टेयर अधिसूचित भूमि दर्ज है जिसकी धारा 5 से 19 तक की जांच लंबित है. यह जांच है कि यदि किसी ज़मीन पर किसी ग्रामीण का गोठान था तो वह रहेगा कि नहीं रहेगा. वहां कब्रिस्तान था तो वह रहेगा कि नहीं रहेगा. इसी की जांच करना है. भारत सरकार के वन मंत्रालय ने आज तक मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ से नहीं कहा कि ये जो 70 लाख हेक्टेयर भूमि तुमने वर्किंग प्लान में दर्ज कर रखी है इसे जांच पूरी करके ग्रामीणों को लौटा दी जाए.

यह जो बातें हम कह रहे हैं, यह सिर्फ़ मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के आंकड़े पर आधारित हैं. ऐसी स्थिति पूरे देश में होगी. सरकारें ज़मीन के मामले में जनता के साथ, उनके सामुदायिक अधिकार के साथ ऐतिहासिक अन्याय करती आई हैं. वन अधिकार क़ानून उसी अन्याय की नई आधारशिला है.

(जंगल और ज़मीन के मसले पर कई किताबें लिख चुके अनिल गर्ग सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता हैं. यह लेख कृष्णकांत से बातचीत पर आधारित है.)

pkv games https://sobrice.org.br/wp-includes/dominoqq/ https://sobrice.org.br/wp-includes/bandarqq/ https://sobrice.org.br/wp-includes/pkv-games/ http://rcgschool.com/Viewer/Files/dominoqq/ https://www.rejdilky.cz/media/pkv-games/ https://postingalamat.com/bandarqq/ https://www.ulusoyenerji.com.tr/fileman/Uploads/dominoqq/ https://blog.postingalamat.com/wp-includes/js/bandarqq/ https://readi.bangsamoro.gov.ph/wp-includes/js/depo-25-bonus-25/ https://blog.ecoflow.com/jp/wp-includes/pomo/slot77/ https://smkkesehatanlogos.proschool.id/resource/js/scatter-hitam/ https://ticketbrasil.com.br/categoria/slot-raffi-ahmad/ https://tribratanews.polresgarut.com/wp-includes/css/bocoran-admin-riki/ pkv games bonus new member 100 dominoqq bandarqq akun pro monaco pkv bandarqq dominoqq pkv games bandarqq dominoqq http://ota.clearcaptions.com/index.html http://uploads.movieclips.com/index.html http://maintenance.nora.science37.com/ http://servicedesk.uaudio.com/ https://www.rejdilky.cz/media/slot1131/ https://sahivsoc.org/FileUpload/gacor131/ bandarqq pkv games dominoqq https://www.rejdilky.cz/media/scatter/ dominoqq pkv slot depo 5k slot depo 10k bandarqq https://www.newgin.co.jp/pkv-games/ https://www.fwrv.com/bandarqq/ dominoqq pkv games dominoqq bandarqq judi bola euro depo 25 bonus 25 mpo play pkv bandarqq dominoqq slot1131 slot77 pyramid slot slot garansi bonus new member pkv games bandarqq