उद्धव को माफ़ी मांगनी चाहिए कि पहले ‘चौकीदार चोर है’ कहा, फिर चोर के साथ हो लिए: संजय निरुपम

साक्षात्कार: आगामी लोकसभा चुनाव, महाराष्ट्र कांग्रेस के भीतर मची अंदरूनी कलह और राज्य में विभिन्न दलों के साथ गठबंधन की संभावना पर मुंबई कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष संजय निरुपम से प्रशांत कनौजिया की बातचीत.

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संजय निरुपम (फोटो: फेसबुक प्रोफाइल)

साक्षात्कार: आगामी लोकसभा चुनाव, महाराष्ट्र कांग्रेस के भीतर मची अंदरूनी कलह और राज्य में विभिन्न दलों के साथ गठबंधन की संभावना पर मुंबई कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष संजय निरुपम से प्रशांत कनौजिया की बातचीत.

संजय निरुपम (फोटो: फेसबुक प्रोफाइल)
संजय निरुपम (फोटो साभार: फेसबुक प्रोफाइल)

मुंबई: महाराष्ट्र में साल 2014 कांग्रेस के लिए एक असफल साल रहा क्योंकि इसी साल केंद्र और राज्य की दोनों की सत्ता कांग्रेस के हाथ से फिसलकर एनडीए के पास चली गई. पिछले लोकसभा चुनाव में कांग्रेस का यह प्रदर्शन आज़ादी के बाद से उसका सबसे ख़राब प्रदर्शन रहा क्योंकि राज्य में पार्टी 17 सीटों से सीधे दो सीटों पर सिमटी, विधानसभा में भी कांग्रेस को 82 सीटों में से केवल 40 सीटें मिलीं.

उत्तर प्रदेश के बाद सबसे ज़्यादा लोकसभा सीट वाला महाराष्ट्र आगामी लोकसभा चुनाव में केंद्र सरकार बनाने में अहम भूमिका निभाने वाला है. 48 लोकसभा सीटों में से 41 सीटें भाजपा-शिवसेना के पास है, जबकि चार राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और दो कांग्रेस के पास है.

आर्थिक राजधानी मुंबई इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महाराष्ट्र के हर जिले से लोग मुंबई में मौजूद हैं, वहीं उत्तर भारतीयों के साथ दक्षिण भारतीय लोग भी बड़ी संख्या में यहां मौजूद हैं. वर्तमान में मुंबई की सभी छह लोकसभा सीटों पर भाजपा-शिवसेना का कब्ज़ा है, जबकि 2009 लोकसभा चुनाव में छह में से पांच सीट कांग्रेस को वहीं एक एनसीपी को मिली थी.

मुंबई में उत्तर भारतीयों का वोट भाजपा खेमे में जाने से परेशान कांग्रेस ने मूल रूप से बिहार के रहने संजय निरुपम को 31 मार्च, 2017 को मुंबई कांग्रेस की कमान सौंपी गई, जिसके बाद से पार्टी के भीतर निरुपम के ‘बाहरी’ होने को लेकर विरोध देखा गया कि इतने वरिष्ठ नेताओं के मौजूद होने के बावजूद शिवसेना से आए एक नेता को मुंबई कांग्रेस की जिम्मेदारी क्यों दी गयी.

मुंबई अध्यक्ष को प्रदेश अध्यक्ष बोला जाता है क्योंकि मुंबई अध्यक्ष पर महाराष्ट्र प्रदेश अध्यक्ष नियंत्रण नहीं कर सकता, इसी लिहाज़ से मुंबई प्रदेश अध्यक्ष को बड़ी भूमिका में देखा जाता है.

शिवसेना हिंदी मुखपत्र दोपहर के सामना का पूर्व संपादक निरुपम 2005 में शिवसेना और राज्यसभा से इस्तीफ़ा देकर कांग्रेस में शामिल हो गए और 2009 लोकसभा चुनाव के दौरान उन्हें मुंबई के उत्तर मुंबई सीट से मैदान में उतारा गया. तब उन्होंने उत्तर प्रदेश के मौजूदा गवर्नर और पूर्व भाजपा नेता राम नाइक को लगभग 6000 वोटों से हराया था. हालांकि 2014 लोकसभा चुनाव में वे भाजपा के गोपाल शेट्टी से साढ़े चार लाख वोटों से हार गए.

मुंबई में कांग्रेस विधायक और पूर्व विधायकों का एक धड़ा पार्टी आलाकमान से निरुपम को हटाने की शिकायत करता रहा है. हाल ही में कांग्रेस वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे के मुंबई दौरे पर विधायक नसीम खान, विधायक अमीन पटेल, पूर्व विधायक बाबा सिद्दीकी और कृपाशंकर सिंह ने निरुपम को हटाने की मांग की थी. हालांकि पार्टी ने कोई निर्णय नहीं लिया.

मुंबई कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष संजय निरुपम ने 2019 आम चुनाव, इसमें प्रभावी रहने वाले मुद्दों, प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन अघाड़ी (भारिप बहुजन महासंघ, एआईएमआईएम और अन्य छोटे दलों का गठबंधन) के साथ गठबंधन, शिवसेना और भाजपा के दोबारा साथ आने के साथ-साथ मुंबई कांग्रेस की भीतर अंदरूनी गुटबाज़ी पर प्रशांत कनौजिया से बातचीत की.

2019 लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस के सबसे अहम मुद्दे क्या हैं?

देखिए कांग्रेस हमेशा जनता के मुद्दों को उठाती रही है और जब से मेरे हाथ में मुंबई की कमान सौंपी गई है, हमने जनता के हर मुद्दे पर आंदोलन किया है. हमारी पार्टी ने अभी एक स्वंत्रत सर्वे करवाया, जिससे मालूम पड़ता है कि जनता अब भी सड़क, बिजली और पानी के मुद्दों को लेकर प्रतिनिधि से उम्मीद करती है. उस सर्वे में हमने पाया कि भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे अभी भी 6-7 नंबर पर है.

मुंबई में आवास सबसे बड़ी समस्या है. हमने देखा है कि मुंबई में 57% लोग एक कमरे में रहते हैं और हमारी योजना है कि न्यूनतम 500 वर्ग फीट का मकान होना चाहिए, जो हमारा सबसे बड़ा मुद्दा है. आप यकीन मानिए कि मुंबई में कुपोषण के शिकार बच्चे भी हैं, लेकिन लोगों को पता नहीं है.

मुंबई में एक बड़ी आबादी झुग्गी-झोपड़ी में रहती हैं, जहां गटर का पानी खुले में बहता है और आप पाएंगे कि लाखों लोग पानी से फैलने वाली बीमारियों से ग्रस्त हैं. सरकार मीडिया का सहारा लेकर कुछ भी एजेंडा चलाये, लेकिन जनता प्रोपगेंडा से एक बार तो उत्तेजित होती है, लेकिन अंत में उसे सड़क, शौचालाय, रोज़गार, बिजली और पानी से मतलब है.

रफाल, पुलवामा और पाकिस्तान से संबंध पर चर्चा होगी लेकिन जनता की जो बुनियादी मांग है उस पर भी काम करना होगा. मुझे मालूम है कि ये सब काम सांसद के नहीं है कि वो गटर साफ़ करवाए, लेकिन जनता जो चाहती है वो उसको बतौर प्रतिनिधि के रूप में देना होगा और जो राष्ट्रीय मुद्दे हैं उसमें भी योगदान देना होगा.

मोदी सरकार का हिसाब लिया जायेगा कि उनके राज के दौरान सबसे ज़्यादा जवान क्यों शहीद हुए.

कांग्रेस ने 1993 मुंबई दंगों के बाद बनी श्रीकृष्णा आयोग की सिफारिशों को लागू करने का वादा किया था, हालांकि केंद्र में 10 साल और राज्य में 15 साल रहने के बावजूद सिफ़ारिशें आज तक लागू नहीं हुईं. दंगा पीड़ित आज भी न्याय की उम्मीद में हैं, जबकि कई आरोपी पुलिस अफसरों को कांग्रेस-एनसीपी सरकार में प्रमोशन मिला और किसी भी नेता को सजा नहीं हुई. आज जब कांग्रेस सांप्रदायिकता के मुद्दे पर लगातार मुखर है ऐसे में क्या ये माना जाए कि भविष्य में अगर कांग्रेस की सरकार बनती है, तो वो श्रीकृष्णा आयोग की सिफारिशों को लागू करेगी?

मुझे नहीं लगता है कि 2019 के चुनाव में श्रीकृष्णा कमीशन आयोग की रिपोर्ट की अब प्रासंगिकता है. हर दंगा देश के लिए काले अध्याय के रूप में दर्ज़ है. मुंबई दंगे के जो मुख्य चेहरा थे वो अभी दुनिया में नहीं है.

मैं बता दूं कि दंगों से सिर्फ आम आदमी का नुकसान है क्योंकि दंगों में कभी नेता नहीं मरता न उनका कभी नुकसान होता है. बाबरी के बाद मुंबई में जो दंगे हुए वो यक़ीनन मुंबई पर एक धब्बे की तरह है. दंगों का प्रभाव सिर्फ आम जनमानस पर है बशर्ते आमजन ये समझ जाएं कि दंगा मसले का हल नहीं बल्कि मानवता की बर्बादी का एक औजार है.

मुझे लगता है कि 1993 के दंगों से मुंबई के लोगों ने सीखा और अब दोनों समुदाय के बीच तनाव न के बराबर है. कुछ लोग और भाजपा दंगा भड़काना चाहते हैं क्योंकि उनकी रोटी इसी से आती है, लेकिन अब वे कामयाब नहीं होंगे. इतने साल बाद वापस इस मुद्दे को छेड़ना सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने जैसा है.

शिवसेना के भाजपा के साथ आने को कांग्रेस किस रूप में देखती है? क्या 2014 का जैसा परिणाम दोहराया जा सकता है?

भाजपा और शिवसेना दोनों ही दल असहज स्थिति में एक साथ आए हैं. भाजपा को पता था कि वो अकेले हार जाएगी और शिवसेना को भी यही लगता था कि ऐसा होगा इसलिए ये दोनों अपनी सत्ता बचाने के लिए साथ आए हैं.

चुनाव का परिणाम बाद में आता है पहले नैतिक हार हो जाती है, तो मुझे लगता है कि ये दोनों की नैतिक हार है. शून्य और शून्य मिलकर शून्य ही होता है.

शिवसेना ने पूरे पांच साल भाजपा को पानी पीकर गाली दी और उद्धव ठाकरे पंढरपुर की रैली में कहते हैं कि चौकीदार चोर है और उसके बावजूद उनके साथ गठबंधन कर लिया, तो मतलब चोर के साथ चले गए.

मैं तो उद्धव से कहना चाहूंगा कि उन्हें अपने सभी बयान और आलोचनाओं के लिए माफ़ी मांगनी चाहिए. एक बार तो मराठी मानुस को कहा कि ये चोर है और फिर साथ हो लिए, तो उद्धव को महाराष्ट्र की जनता से माफ़ी मांगी चाहिए कि पहले उन्होंने चोर कहा फिर चोर के साथ हो लिए.

अमित शाह ने कहा कि पटक-पटक के मरूंगा और फड़णवीस ने कहा कि टाइगर की पूंछ दबाकर रखूंगा इस पूरे क्रम में टाइगर लाचार है. मुझे लगता है कि शिवसेना ने ख़ुदकुशी की है और इस पूरे चुनाव में सबसे ज़्यादा नुकसान में शिवसेना दिखती है.

Sanjay Nirupam Rahul Gandhi Twitter
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ संजय निरुपम (फोटो साभार: ट्विटर/@sanjaynirupam)

प्रकाश आंबेडकर और एआईएमआईएम और अन्य छोटे दलों के गठबंधन वंचित बहुजन अघाड़ी को कैसे देखते हैं? अघाड़ी ने 12 सीट मांगी, लेकिन कांग्रेस अब तक सहमत नहीं हुई है.

एआईएमआईएम और प्रकाश आंबेडकर का जो गठबंधन है अगर वो सही मायनों में भाजपा और शिवसेना जैसी पार्टियों को सत्ता से हटाना चाहता है, तो उसे तीसरा मोर्चा बनकर चुनाव नहीं लड़ना चाहिए. अगर ये गठबंधन तीसरा मोर्चा बनकर काम करता है, तो इसका सीधा फायदा भाजपा को मिलेगा क्योंकि सेकुलर वोटों का विभाजन हो जाएगा.

कांग्रेस ने बहुत प्रयास किए कि इस गठबंधन को भी साथ लिया जाए. कांग्रेस के बड़े नेता अशोक चव्हाण, माणिकराव ठाकरे और एनसीपी के छगन भुजबल गए उनके घर पर गए, लेकिन वो खुद देर से आए. चलो बाबा साहेब के पोते हैं, तो उनका सम्मान है. पर उन्होंने 12 सीटों की मांग की, अब बताइए, हमारे पास 20 सीट है और 12 उनको देंगे तो हम क्या करेंगे?

उन्होंने कहा कि कांग्रेस को आरएसएस के ख़िलाफ़ स्टैंड लेना होगा, तो मैं कहना चाहता हूं कि इस देश में आरएसएस के ख़िलाफ़ राहुल गांधी से ज़्यादा कौन बोलता है. ये हमको सीखा रहे हैं. अगर ये खुद आरएसएस विरोधी हैं, तो आरएसएस विरोधी वोटों को बांटने का काम क्यों कर रहे हैं.

अगर बांटना ही है, तो सब भाषणबाज़ी और दिखावा है. वंचित बहुजन अघाड़ी ने 23 फरवरी को दादर के शिवाजी मैदान में जो रैली की, उसमें सबसे ज़्यादा हमले कांग्रेस पर हुए. मुझे ऐसा लगता है कि इनका पूरे अभियान भाजपा को लाभ पहुंचाने का है और महाराष्ट्र की जनता को इनके इरादों को बारीकी से देखना और समझना चाहिए.

हमने चार सीट की पेशकश की और उन्हें ले लेनी चाहिए क्योंकि अकेले तो वो एक भी नहीं जीत पाएंगे. हम स्थानीय पार्टियों के साथ-साथ सपा को भी साथ लेना चाहते हैं और यह ज़रूरी नहीं की हर कोई लोकसभा चुनाव लड़े. कुछ अभी लड़ेंगे और कुछ विधानसभा में.

हम तो सभी सेकुलर ताकतों को साथ लाना चाहते हैं, लेकिन उनकी ताकत और क्षमता के आधार पर उन्हें सीटें दी जा सकती हैं. 12 सीट अव्यावहारिक है क्योंकि आप की शक्ति क्या है और जनाधार क्या है?

आंबेडकर साहब अकोला से लड़े थे, तो तीसरे या चौथे नंबर पर रहे थे. तो मुझे लगता है कि पहले ये अपना एजेंडा साफ़ करें कि करना क्या चाहते हैं? हम खुद चाहते हैं कि आंबेडकर साहब लोकसभा पहुंचे और हम सहायता करेंगे. कांग्रेस ने कभी उनका नुकसान नहीं किया और न कभी कुछ कहा, लेकिन व्यवहार दोनों तरफ से होता है.

मुंबई में कांग्रेस में आपके ख़िलाफ़ रोष है और दो बड़े नेताओं ने चुनाव लड़ने से भी इनकार कर दिया है.

देखिए प्रिया दत्त जी चुनाव नहीं लड़ेंगी और उन्होंने इसका ऐलान किया और दक्षिण मुंबई से पूर्व सांसद मिलिंद देवरा ने भी कुछ ट्वीट किया था. मुझे यह भी जानकारी है कि कुछ लोग मुझे हटाने की मांग को लेकर पार्टी के विभिन्न फोरम पर जाते रहते हैं.

मैं निजी रूप से आलोचना का स्वागत करता हूं और करना भी चाहिए. हम मशीनों के साथ काम नहीं कर रहे हैं और पार्टी के भीतर असहमति होना स्वाभाविक है, लेकिन मुझे लगता है ट्विटर पर अपना रोष जाहिर करना ठीक नहीं है.

मुझे राहुल गांधी जी ने मुंबई कांग्रेस की कमान सौंपी है और उसको मजबूत करने के लिए हर प्रयास करूंगा. मैं किसी व्यक्ति विशेष को खुश करने का काम नहीं कर सकता. मुझे जो ज़िम्मेदारी मिली है मैं उसका निर्वहन करूंगा.

जब तक पार्टी नेतृत्व को मुझ पर भरोसा है तब तक दी हुई ज़िम्मेदारी को पूरा करूंगा. पार्टी हित श्रेष्ठ है, निजी हितों के लिए पार्टी को मुश्किल में डालने का अधिकार किसी को नहीं है, मुझे भी नहीं.

मुंबई में सभी छह सीटें भाजपा-शिवसेना के पास हैं, आज की तारीख में कांग्रेस अपने लिए कितनी सीटों पर संभावना देख रही है?

मुंबई में कांग्रेस पांच सीट तो एनसीपी एक सीट पर लड़ती आई है. हमारा अभी जो आकलन है उसके अनुसार हम तीन सीटों पर तो निश्चित ही जीत दर्ज़ करने वाले हैं.

यह मैं इसलिए कह रहा हूं कि भाजपा-शिवसेना ने पांच सालों में जनता को जो दुख दिया है, उससे वो त्रस्त हैं और अब इनके राज से मुक्ति चाहते हैं. मोदी ने रोजगार के नाम पर लोगों को धोखा दिया और मुंबई आर्थिक राजधानी होने के नाते नोटबंदी में सबसे ज़्यादा प्रभावित हुई थी. जनता को एक बार मौका मिलता है, तो वो सबक सिखाएगी.

फिर हमारा संगठन भी मजबूत हुआ है और कांग्रेस अब खेमेबाज़ी से बाहर आ रही है. राहुल गांधी के आदेशों और उनके द्वारा बनाये गए ढांचे के अनुसार अब काम हो रहा है उसका परिणाम अभी तीन राज्यों के चुनाव में दिखा और मुझे उम्मीद है कि 2019 लोकसभा में भी कांग्रेस का ऐसा  ही प्रदर्शन  होगा.

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