छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में आदिवासी क्यों प्रदर्शन कर रहे हैं?

ग्राउंड रिपोर्ट: छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा ज़िले के किरंदुल क्षेत्र के तहत बैलाडीला की एक पहाड़ी को बचाने के लिए तकरीबन 20 हज़ार आदिवासी पिछले चार-पांच दिनों से प्रदर्शन कर रह हैं. सरकार ने इस पहाड़ी को लौह अयस्क के खनन के लिए अडाणी समूह को दे दिया है.

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छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल थाना क्षेत्र स्थित नेशनल मिनिरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के सामने प्रदर्शन कर रहे आदिवासी. (सभी फोटो: तामेश्वर सिन्हा)

ग्राउंड रिपोर्ट: छत्तीसगढ़ में दंतेवाड़ा ज़िले के किरंदुल क्षेत्र के तहत बैलाडीला की एक पहाड़ी को बचाने के लिए तकरीबन 20 हज़ार आदिवासी पिछले चार-पांच दिनों से प्रदर्शन कर रह हैं. सरकार ने इस पहाड़ी को लौह अयस्क के खनन के लिए अडाणी समूह को दे दिया है.

छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल थाना क्षेत्र स्थित नेशनल मिनिरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के सामने प्रदर्शन कर रहे आदिवासी. (सभी फोटो: तामेश्वर सिन्हा)
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल थाना क्षेत्र स्थित नेशनल मिनिरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन के सामने प्रदर्शन कर रहे आदिवासी. (सभी फोटो: तामेश्वर सिन्हा)

दंतेवाड़ा: आदिवासियों के लिए जल, जंगल, जमीन से बढ़कर कुछ नहीं होता. पहाड़ आदिवासी जीवनशैली में अत्यंत ही महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं. उनकी मान्यताएं, रहन-सहन इन्हीं पर केंद्रित होकर चलती हैं.

इसके उलट हमारी सरकारें एक पहाड़ को उखाड़ने में उफ तक नहीं करती हैं. उन्हें उस पहाड़ से खनिज संपदाएं चाहिए, लेकिन वो नहीं जानती हैं कि उन पहाड़ों में आदिवासी मान्यताओं के अनुसार, देवों का निवास होता है.

छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग के तहत दक्षिण बस्तर में ऐसे ही एक पर्वत श्रृंखला को बचाने के लिए क्षेत्र के आदिवासी पिछले चार-पांच दिनों से लामबंद हैं.

गौरतलब हो कि राष्ट्रीय खनिज विकास निगम (नेशनल मिनिरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन – एनएमडीसी) ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा ज़िले के किरंदुल क्षेत्र के अंतर्गत बैलाडीला की एक पहाड़ी ‘डिपॉजिट 13 नंबर’ को लौह अयस्क उत्खनन के लिए अडाणी समूह को लीज पर दे दिया है.

इसके विरोध में दक्षिण बस्तर क्षेत्र के आदिवासी बीते छह जून से अनिश्चितकालीन प्रदर्शन कर रहे हैं. अपना पहाड़ बचाने के लिए कई किलोमीटर पैदल चलकर एनएमडीसी मुख्यालय के सामने डटे 20 हजार से ज्यादा आदिवासी अपने साथ राशन-पानी लेकर भी आए हैं.

ग्राम पंचायत हिरोली की सरपंच बुधरी बताती हैं, ‘साल 2014 में एक फर्जी ग्रामसभा की बैठक कर डिपॉजिट 13 नंबर पहाड़ पर लौह अयस्क की खुदाई के लिए अनुमति दे दी गई. यह असल में हुई ही नहीं थी. मात्र 104 लोगों की मौजूदगी में ग्रामसभा के प्रस्ताव में ग्रामीणों के हस्ताक्षर हैं. जबकि ग्रामीण साक्षर ही नहीं थे तो कहां से हस्ताक्षर करेंगे? ग्रामीण अंगूठा ही लगाते हैं, फिर ये हस्ताक्षर किसने किए?’

बुधरी आगे कहती हैं कि 104 लोगों में से जिनके हस्ताक्षर ग्रामसभा प्रस्ताव में दर्शाए गए हैं उनमें से दर्जनों की मौत हो चुकी है.

गौरतलब है कि सरपंच ने आदिवासी नेताओं और संयुक्त पंचायत संघर्ष समिति के सदस्यों के साथ मिलकर खनन के लिए प्रस्ताव पास कराने वालों के खिलाफ किरंदुल पुलिस थाने में एफआईआर के लिए आवेदन दिया है. आवेदन में दंतेवाड़ा के तत्कालीन कलेक्टर और एनएमडीसी के सीएमडी के खिलाफ फर्जीवाड़े का केस दर्ज करने की मांग की गई है.

एनएमडीसी पिछले 60 सालों से बैलाडीला के पर्वतों पर कच्चे लोहे का खनन कर निर्यात कर रहा है. इन पांच दिनों के आंदोलन से एनएमडीसी किरंदुल का उत्खनन पूरी तरह बंद होने के कारण 24 करोड़ रुपये से ज्यादा का नुकसान होने की संभावना जताई जा रही है.

संयुक्त पंचायत संघर्ष समिति के सचिव और वर्तमान में कुआकोंडा ब्लॉक जनपद सदस्य राजू भास्कर ने बताया, ‘अगले कुछ दिनों में हमारे अनिश्चितकालीन प्रदर्शन को लेकर सरकार के द्वारा कोई निर्णय नहीं किया गया तो हम एनएमडीसी बचेली इकाई के समक्ष भी प्रदर्शन पर बैठेंगे.’

अनिश्चितकालीन प्रदर्शन में शामिल आदिवासियों का कहना है कि डिपॉजिट 13 नंबर पहाड़ में हमारे देवी-देवताओं का वास है. हम किसी भी सूरत में पहाड़ को खोदने नहीं देंगे.

एक ग्रामीण बुधराम मंडावी कहते हैं, ‘इस खदान ने हमारे खेतों को लाल कर दिया है. पीने का पानी भी लाल हो गया है. इस खदान से हमें मिला कुछ नहीं, बल्कि हमारा पूरा घर बार लाल कर दिया गया. ये सेठ लोग हमको ठगकर यहां से लोहा ले जाते हैं, अब हमारे देवस्थल को भी खोदेंगे, इसीलिए इस प्रदर्शन कर रहे हैं.’

आदिवासी समाज के तुलसी नेताम कहते हैं, ‘हमारे लिए बैलाडीला महज पहाड़ नहीं है. बैलाडीला बस्तर के आदिवासी समुदाय का एकमात्र पेन ठाना पुरखा पेन (देवताओं का स्थल) स्थान तो है ही साथ ही यह पहाड़ जैव विविधता से भी परिपूर्ण है.’

प्रदर्शन कर रहे आदिवासी.
प्रदर्शन कर रहे आदिवासी.

तुलसी आगे बताते हैं, ‘बैलाडीला के पर्वतों पर आदिवासियों के इष्टदेव नंदराज विराजमान हैं. इसका जतारा (मेला) 84 गांव के लोग एकजुट होकर मनाते हैं. अभी जिस 13 नंबर पहाड़ को खनन के लिए एनएमडीसी ने अडाणी समूह को लीज पर दिया है, उस पहाड़ में नंदराज की पत्नी पिटोड़ रानी विराजमान है.’

वे कहते हैं, ‘इसमें बस्तर संभाग के सभी आदिवासियों की आस्था जुड़ी हुई है, इसलिए पिछले पांच दिनों से हज़ारों की संख्या में आदिवासी अनिश्चितकालीन विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. हमारी मांग है कि इस पहाड़ को किसी भी कंपनी को नहीं दिया जाना चाहिए. जब तक सरकार या संबंधित कंपनी इस बात का श्वेत पत्र नहीं देती कि यहां खनन नहीं होगा, तब तक हमारा अनिश्चितकालीन प्रदर्शन जारी रहेगा.’

प्रदर्शनस्थल पर लगभग 200 गांवों के आदिवासी अपने पारंपरिक ढोल नृत्य, तीर-धनुष के साथ सीआईएसएफ चेक पोस्ट एनएमडीसी किरंदुल में रतजगा करते हुए केंद्र सरकार और राज्य की कांग्रेस सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं.

साथ ही आदिवासी फर्जी ग्रामसभा करना बंद करो, भारतीय संविधान का उल्लंघन करना बंद करो, जल जंगल जमीन नहीं देंगे… जैसे नारों से अपनी आवाज बुलंद करते भी नज़र आ रहे हैं.

आदिवासियों के इस प्रदर्शन में शामिल क्षेत्रीय आदिवासी संगठन सर्व आदिवासी समाज के अध्यक्ष सुरेश कर्मा ने बताया, ‘इस बैलाडीला पर्वत पर हमारे इष्टदेव नंदराज विराजमान हैं. हमारे आदिवासी भाइयों की आस्था इस पर्वत से जुड़ी हुई है.’

कर्मा संविधान का उल्लेख करते हुए कहते हैं, ‘भारतीय संविधान के अनुच्छेद 244(1) के अनुसार संपूर्ण बस्तर संभाग पांचवीं अनुसूची में शामिल है और इस पर पंचायती राज्य अधिनियम 1996 लागू होता है. इसमें ग्रामसभा की अनुमति के बिना, एक इंच जमीन न तो केंद्र की सरकार को और न राज्य की सरकार को दिया जा सकता है. उसके बाद भी फर्जी ग्रामसभा कर जमीनों का अधिग्रहण किया जा रहा है.’

उन्होंने कहा, ‘आदिवासियों के इस आंदोलन में सभी राजनीतिक दल समर्थन की बात तो जरूर कर रहे हैं, पर अभी तक शासन-प्रशासन हो या एनएमडीसी से कोई भी बात करने तक को तैयार नहीं है. हमारी मांग है कि इस पर्वत को बचाए रखा जाए, किसी कंपनी को खनन के लिए न दिया जाए.’

वहीं छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अडाणी समूह को खनन के लिए 13 नंबर पहाड़ लीज में देने के मामले में पत्रकारों से बातचीत में कहा है कि यह पूर्व सरकार के कार्यकाल में हुआ है. हम इस पर विचार कर रहे हैं.

हालांकि कांग्रेस-भाजपा दोनों पार्टियों के नेता इस पहाड़ी को अडाणी को लीज पर दिए जाने के मामले में आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं. आदिवासियों के इस विरोध का समर्थन आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सोनी सोरी के अलावा कांग्रेस, जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे), आम आदमी पार्टी, सीपीआई जैसे राजनीतिक दल कर रहे हैं.

मालूम हो कि अडाणी समूह ने सितंबर 2018 को बैलाडीला आयरन ओर माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड यानी बीआईओएमपीएल नाम की कंपनी बनाई और दिसंबर 2018 को केंद्र सरकार ने इस कंपनी को बैलाडीला में खनन के लिए 25 साल के लिए लीज दे दी.

बैलाडीला की डिपॉजिट 13 नंबर पहाड़ के 315.813 हेक्टेयर रकबे में लौह अयस्क खनन के लिए वन विभाग ने वर्ष 2015 में पर्यावरण क्लीयरेंस दे दिया है. जिस पर एनएमडीसी और राज्य सरकार की छत्तीसगढ़ मिनिरल डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (सीएमडीसी) को संयुक्त रूप से उत्खनन करना था.

प्रदर्शन के दौरान आदिवासी परंपरागत नृत्य करते हुए.
प्रदर्शन के दौरान परंपरागत नृत्य करते हुए आदिवासी स्त्री-पुरुष.

इसके लिए राज्य और केंद्र सरकार के बीच हुए करार के तहत संयुक्त उपक्रम एनसीएल का गठन किया गया था, लेकिन बाद में यह लीज निजी कंपनी अडाणी इंटरप्राइसेस लिमिटेड को 25 साल के लिए हस्तांतरित कर दी गई.

बताया जा रहा है कि डिपाॅजिट-13 पहाड़ के 315.813 हेक्टेयर रकबे में 326 मिट्रिक टन लौह अयस्क होने का पता सर्वे में लगा है.

आदिवासियों का यह विरोध सिर्फ खनन या अडाणी को इसे लीज पर दिए जाने का नहीं है. यहां सवाल आस्था से जुड़ी आदिवासियों की उन प्राचीन मान्यताओं का है, जिन्हें वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी से मानते आ रहे हैं.

बैलाडीला की डिपॉजिट 13 नंबर पहाड़ को नंदराज पर्वत कहा जाता है. आदिवासियों के अनुसार, इस देवस्थान पर दो पहाड़ हैं, नंदराज पहाड़ और उसके सामने का पहाड़ पिटोड़ मेटा देवी का पहाड़ है, जिसे वे पूजते हैं.

बीते रविवार नौ जून को जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) के सुप्रीमो अजीत जोगी 13 नंबर पहाड़ी आए थे और वहां की स्थिति देख कहा था, ‘मैं काफी व्यथित हूं. विकास के नाम पर सरकारों ने हमारे रहवास और देवी-देवताओं को बेचना शुरू कर दिया है. भाजपा सरकार के बाद कांग्रेस की भूपेश बघेल सरकार भी इसमें पीछे नहीं.’

अजीत जोगी ने आरोप लगाया था कि वर्तमान सरकार के वनमंत्री मोहम्मद अकबर ने चार अप्रैल 2019 को पहाड़ से 25 हजार पेड़ काटने की अनुमति दी है. इसके बाद उद्योग स्थापना के नाम पर हजारों पेड़ काटकर जला दिए गए हैं.

वहीं वन मंत्री मोहम्मद अकबर ने कहा था, ‘पेड़ काटने की अनुमति मैंने नहीं दी हैं. यह गलत आरोप है. पेड़ काटने की अनुमति 11 जनवरी 2018 को दी गई थी. प्रदेश की जनता को यह मालूम है कि उस वक्त किसकी सरकार थी.’

एनएमडीसी और सीएमडीसी की संयुक्त भागीदारी वाली कंपनी ने दिया स्पष्टीकरण

दंतेवाड़ा जिले के किरंदुल स्थित डिपॉजिट 13 नंबर पहाड़ के मालिकाना हक वाली कंपनी एनसीएल ने अपना पक्ष रखा है.

एनसीएल के सीईओ वीएस प्रभाकर ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर कहा है कि अडाणी समूह को खनन और विकास का काम पारदर्शी तरीके से टेंडर आमंत्रित कर नियम और प्रक्रियाओं के अधीन दिया गया है.

विज्ञप्ति के माध्यम से कंपनी ने स्पष्ट किया है कि नियमों के तहत केवल खनन और माइनिंग डेवलपमेंट का कॉन्ट्रैक्ट अडाणी समूह को दिया गया है. इस टेंडर प्रक्रिया में कुल चार कंपनियों ने हिस्सा लिया था, जिसमें से एक कंपनी का टेंडर निरस्त किया गया था. तीन कंपनियों ने निविदा प्रक्रिया में अंतिम तौर पर हिस्सा लिया. जिसके बाद अडाणी समूह को टेंडर जारी कर दिया गया.

बहरहाल, आदिवासियों के आंदोलन को देखते हुए क्षेत्र में बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया है और एनएमडीसी की सुरक्षा बढ़ा दी गई.

दंतेवाड़ा जिले के पुलिस अधीक्षक अभिषेक पल्लव ने कहा, ‘इस विरोध प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं ली गई है. हालांकि, लोकतंत्र में हर किसी को विरोध करने का अधिकार है. अगर प्रदर्शनकारी कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की कोशिश करेंगे, तब उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी.’

मुख्यमंत्री ने परियोजना से संबंधित कार्यों पर रोक लगाई

इस बीच बस्तर सांसद दीपक बैज और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम के नेतृत्व में आदिवासियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार रात मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से मुलाकात की.

मुलाकात के बाद मुख्यमंत्री ने अवैध वन कटाई पर रोक लगाने, अवैध वन कटाई और 2014 में हुए फर्जी ग्राम सभा में खनन प्रस्ताव पारित करने की जांच कराने तथा परियोजना से संबंधित कार्यों पर रोक लगाने के निर्देश दिए.

मुख्यमंत्री ने कहा कि इस मामले में राज्य शासन की जो भूमिका है, उसे निभाया जाएगा. इस दौरान राज्य शासन के वन मंत्री मोहम्मद अकबर भी उपस्थित थे.

इसके अलावा छत्तीसगढ़ सरकार की ओर से भारत सरकार को पत्र लिख कर जन भावनाओं की जानकारी दी जाएगी.

वहीं छह दिनों से आंदोलनरत आदिवासियों ने सरकार के इस फैसले का स्वागत किया, लेकिन उनका कहना है कि जब तक इस पर वे पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो जाते, तब तक उनका प्रदर्शन जारी रहेगा.

संयुक्त पंचायत संघर्ष समिति की तरफ से मुख्यमंत्री से मिलने वाले प्रतिनिधिमंडल में सुरेश कर्मा, बल्लू भावनी, नंदाराम, राजू भास्कर, भीमसेन मंडावी सहित आंदोलन में पहुंचे सरपंच शामिल थे.

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)