क्यों झारखंड के आदिवासी किसानों को अपना खेत और घर खोने का डर सता रहा है?

ग्राउंड रिपोर्ट: सूखे की मार झेल रहे हैं झारखंड के चतरा ज़िले के किसानों पर वन विभाग की सख़्ती ने उनकी चुनौतियों को और बढ़ा दिया है. बीते एक साल में चतरा के हज़ारों किसानों की ज़मीन और खेत को वन विभाग ने वनभूमि बताकर उन्हें वहां से बेदख़ल कर दिया है.

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झारखंड के चतरा ज़िले के लावालौंग प्रखंड के इन किसानों की जमीन वन विभाग द्वारा छीन ली गई है. अपनी जमीन का कागजात दिखाते किसान. (सभी फोटो: मोहम्मद असगर ख़ान)

ग्राउंड रिपोर्ट: सूखे की मार झेल रहे हैं झारखंड के चतरा ज़िले के किसानों पर वन विभाग की सख़्ती ने उनकी चुनौतियों को और बढ़ा दिया है. बीते एक साल में चतरा के हज़ारों किसानों की ज़मीन और खेत को वन विभाग ने वनभूमि बताकर उन्हें वहां से बेदख़ल कर दिया है.

झारखंड के चतरा ज़िले के लावालौंग प्रखंड के इन किसानों की जमीन वन विभाग द्वारा छीन ली गई है. अपनी जमीन का कागजात दिखाते किसान. (सभी फोटो: मोहम्मद असगर ख़ान)
झारखंड के चतरा ज़िले के लावालौंग प्रखंड के इन किसानों की जमीन वन विभाग द्वारा छीन ली गई है. अपनी जमीन का कागजात दिखाते किसान. (सभी फोटो: मोहम्मद असग़र ख़ान)

झारखंड के चतरा जिले के हंटरगंज प्रखंड में आने वाले तिलहेट पंचायत के एकतारा गांव के रहने वाले प्रमोद दास कहते हैं कि उनकी आठ एकड़ जमीन पर वन विभाग ने एक साल पहले ही वन भूमि बताकर खेती करने पर रोक लगा दी है.

यही चिंता तिलहेट पंचायत के एकतारा गांव के हरिशचंद्र, राजकुमार दास, आनंदी दास की भी है जिनकी क्रमशः दो एकड़, पांच एकड़ व तीन एकड़ भूमि को वन विभाग ने अतिक्रमण बताया है.

हालांकि इसी हंटरगंज के सुरेश भुइयां, नंदलाल भुइयां, राजेंद्र भुइयां, बबलू भुइयां, अमीत भुइयां, गनौरी, भुइयां, प्रेमन रवि दास, अंजू भुइयां, बिजय भुइयां समेत उन दो दर्जन किसानों की परेशानी कहीं ज्यादा है, जिनकी जमीन के अलावा छत भी छीन ली गई है.

इन ग्रामीणों का कई साल पुराना घर वन विभाग की नजर में अवैध और अतिक्रमण हो गया है, इसलिए उन्हें बुलडोजर से ढहाया जा रहा है.

फिलहाल अब इन किसानों के समक्ष आजीविका का संकट आ खड़ा हो गया है और इसी की चिंता और चुनौती में वे वन विभाग के अंचल कार्यलय से लेकर जिला कार्यालय तक के चक्कर लगा रहे हैं.

परिवार पालना हो रहा मुश्किल

हंटरगंज खावाबार गांव के रहने वाले प्रेमन रवि दास बताते हैं, ‘पिछले साल अगस्त में वन विभाग ने घर और जमीन खाली करने का नोटिस दिया और खेती करने से मना कर दिया है. हमारे पूर्वजों ने घर और जमीन का जो कागज-पत्तर हमें दिया था, उसे उन्हें दिखाया और अनुरोध भी किया. पर वो नहीं माने और दो महीने के अंदर ही बुलडोजर से हमारा घर ढहा दिया.’

खावाबार गांव हंटरगंज के दंततार पंचायत में पड़ता है. यहां पिछले साल अगस्त से अक्टूबर के बीच 13 किसानों के घरों को वन विभाग ने अतिक्रमण बताकर तोड़ दिया. इसमें प्रेमन रवि दास का भी घर शामिल है.

फिलहाल दिन में दिहाड़ी मजदूरी कर परिवार पाल रहे 45 वर्षीय प्रेमन रवि दास कहते हैं, ‘साल भर का गेहूं-चावल और परिवार का पालन-पोषण अब मुश्किल हो रहा है. पूर्वजों से इसी जमीन को देखते-जोतते आ रहे हैं. अब अगर बेदखल कर दिया जाएगा तो बूढ़े बाप और पांच छोटे-छोटे बच्चों (तीन लड़की और दो लड़का) को लेकर कहां जाएंगे.’

प्रेमन के 40 वर्षीय पड़ोसी अंजू भुइयां की समस्या भी यही है. परिवार में इनकी पत्नी के अलावा चार छोटे बच्चे (एक लड़का, तीन लड़की) हैं. इन दोनों के मुताबिक इनके पास जमीन के जो कागजात हैं वो हुकुमनामा है, जिसे वन विभाग वैध नहीं मानता है. इन्हें कहा गया है कि सरकार से आपको जो पट्टा मिलेगा वही मान्य होगा.

पुराने समय में जो लोग जमींदार के लिए काम करते थे, उन लोगों को वो जीवनयापन के लिए कुछ जमीन दे देता था. इस जमीन के कागजात को हुकुमनामा कहते हैं.

जमीन का पर्चा या हुकुमनामा, जिसके आधार पर ग्रामीण जमीन पर अपना दावा करते हैं.
जमीन का पर्चा या हुकुमनामा, जिसके आधार पर ग्रामीण जमीन पर अपना दावा करते हैं.

चतरा में 14 लाख लोग वनों पर आश्रित

वन विभाग के अधिकारी की माने तो झारखंड के चतरा जिले में 93 हजार हेक्टेयर जंगल है. वहीं लोकसभा चुनाव से पूर्व झारखंड के वनवासियों को लेकर झारखंड वन अधिकार मंच और इंडियन स्कूल ऑफ बिजनेस (आईएसबी) हैदराबाद की जारी रिपोर्ट के मुताबिक झारखंड में लगभग एक करोड़ 25 लाख लोग जंगलों पर आश्रित हैं.

इसी सर्वे रिपोर्ट की माने तो चतरा लोकसभा की लगभग 22 लाख आबादी में करीब 14 लाख वन अधिकार कानून 2006 के लाभार्थी हैं.

कम्युनिटी फॉरेस्ट राइट लर्निंग एडवोकेसी (सीएफआरएलए) के आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई इस रिपोर्ट के अधिकतर आंकड़ें 2011 की जनगणना पर आधारित हैं.

इससे इतर भारत सरकार के द्वारा जारी आंकड़ों में बताया गया है कि झारखंड से वन अधिकार कानून 2006 के तहत पट्टा के लिए प्राप्त हुए आवेदन सवा लाख के लगभग हैं.

इनमें से भी करीब 27 हजार आवेदन को सरकार ने अस्वीकृत कर दिया है. यानी सरकार की नजर में वैध वनवासियों की संख्या अब एक लाख भी नहीं है.

इस आंकड़ें पर झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक संजय बसु मलिक कहते हैं, ‘झारखंड में 75 फीसदी से भी अधिक लोगों का अस्तित्व प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जंगलों से जुड़ा है. यानी स्वाभाविक है कि वो वन अधिकार कानून 2006 के लाभार्थी होंगे. लेकिन यह भी सच्चाई है कि उनमें से अधिकतर वनवासियों को पता ही नहीं कि वो जिस जमीन पर अपने पूर्वजों के समय से रहते आ रहे हैं, उस पर वो कानूनन दावा कैसे करेंगे.’

वन विभाग की कार्रवाई चतरा में क्यों?

वैध वनवासियों के आकंड़ों में अंतर के लिए संजय बसु सरकार को जिम्मेदार मानते हैं. उनके मुताबिक सरकार को चाहिए था कि जंगलों में रहने वालों को वन अधिकार कानून के प्रति जागरूक करती, ताकि अधिक से अधिक लोग पट्टे के लिए आवेदन कर सकते.

वन विभाग की ऐसी कार्रवाई चतरा की तुलना में झारखंड के अन्य जिलों में देखने को नहीं मिलती. इस बारे में चतरा साउथ के जिला वन अधिकारी (डीएफओ) काली किंकर कहते हैं, ‘अतिक्रमण के खिलाफ कार्रवाई पूरे झारखंड हो रही है. चूंकि चतरा में 58 प्रतिशत वन क्षेत्र है और यहां अतिक्रमण भी काफी अधिक है, साथ ही माओवादी प्रभावित जिला होने के कारण भी यहां कार्रवाई ज्यादा हो रही है.’

चतरा में इस समस्या का सामना करने वाला अधिकतर परिवार दलित हैं या फिर आदिवासी. ये लोग इस मौसम में खेती और बाद के दिनों में दिहाड़ी मजदूरी कर अपने परिवार का पेट पालते हैं.

हंटरगंज प्रखंड के खावाबार गांव के रहने वाले प्रेमन रवि दास. पीछे उनका घर, जिसे वन विभाग द्वारा तोड़ दिया गया.
हंटरगंज प्रखंड के खावाबार गांव के रहने वाले प्रेमन रवि दास. पीछे उनका घर, जिसे वन विभाग द्वारा तोड़ दिया गया.

इन लोगों की लड़ाई में इनका साथ दे रहे किसान नरेश राम भारती बताते हैं, ‘यह समस्या समूचे जिले में है. सिर्फ हंटरगंज और परतापुर प्रखंड में करीब दो हजार ऐसे परिवार हैं जिन पर वन विभाग की सख्ती जारी है. अधिकारी डरा-धमका रहे हैं. खेती करने से मना कर हैं और जेल में डालने की धमकी भी दे रहे हैं. कई के घर तोड़ दिए गए हैं.’

वे कहते हैं, ‘हम लोग अपने पूर्वजों के समय से इसी जमीन पर खेती-बाड़ी करते आ रहे हैं. जवान से बूढ़े हो गए. अब बताया जा रहा है कि यह वन भूमि है, जिस पर हम लोगों ने अतिक्रमण कर रखा है. जमीन ही हमारी आजीविका का मुख्य साधन है और सबका परिवार इस पर निर्भर है. हमें अगर बेदखल कर दिया जाएगा, तो हम कहां जाएंगे और क्या करेंगे.’

नरेश राम हंटरगंज के औरू पंचायत के गांव कांसी केवाल से आते हैं. वे भी वन विभाग की कार्रवाई से अछूते नहीं है. उनकी भी आठ एकड़ जमीन पर वन विभाग की तरफ से पिलर गाड़ दिया गया है और उन्हें खेती से करने मना किया गया है.

नरेश राम के मुताबिक बीते दो साल में कई किसानों पर मुकदमा भी हुआ है और जेल तक जाना पड़ा है.

ग्रामीणों का कहना है कि जिस जमीन से वन विभाग उन्हें बेदखल कर रहा है वे उस पर कई पीढ़ियों से खेती करते और रहते आ रहे हैं.

किसानों के घर तोड़े जाने वाली बात जिला कलेक्टर और डीएफओ दोनों ही मानते हैं. सवाल पूछे जाने पर चतरा जिला कलेक्टर जितेंद्र कुमार सिंह कहते हैं कि यह मामला जंगल का है, इसलिए डीएफओ से बात कीजिए, जबकि डीएफओ काली किंकर इसे कानून सम्मत कार्रवाई बताते हैं.

उजाड़े गए लोगों का पुनर्वास नहीं

इस पूरे मामले पर चतरा नॉर्थ के डीएफओ नरेश सिंह मुंडा ने कहा, ‘ये लोग जंगल की जमीन पर अवैध ढंग से घर बनाकर रह रहे हैं, खेती कर रहे हैं. उन्हें बस खाली करवा जा रहा है.’

मुंडा कहते हैं, ‘नियमानुसार नोटिस देकर उन लोगों को 15-20 दिन का समय दिया जाता है. ये लोग जमीन के जो कागजात दिखा रहे हैं वो 100 प्रतिशत फर्जी है. जंगल का एरिया बहुत बड़ा है. इसे पूरी तरह से चिह्नित नहीं किया गया है, कुछ क्षेत्र बचे हुए हैं, जिन्हें चिह्नित कर वन विभाग का पिलर लगाया जा रहा है. जो लोग जंगल पर अतिक्रमण कर रह रहे हैं, उन पर कार्रवाई की जा रही है.’

डीएफओ मुंडा बताते हैं, ‘ग्रामीणों को पहले नोटिस दी जाती है ताकि वे अपना पक्ष रख सकें. और जमीन जब उनका दावा निरधार होता है तब बिहार लैंड एंक्रोचमेंट एक्ट के तहत उन पर केस होता और कार्रवाई की जाती है.’

पुनर्वास के सवाल पर वे कहते हैं कि इसमें पुनर्वास की कोई व्यवस्था नहीं है, बल्कि उन्हें जल्द-जल्द हटना होगा.

वन विभाग के द्वारा पिलर गाड़कर ग्रामीणों की जमीन को चिह्नित कर रहा है.
वन विभाग के द्वारा पिलर गाड़कर ग्रामीणों की जमीन को चिह्नित कर रहा है.

किसान नरेश राम भारती बताते हैं, ‘परतापुर, चतरा और हंटरगंज के जिन किसानों को इस परेशानी से जूझना पड़ रहा है, उनमें से अधिकतर के पास जमीन पर दावा करने का कोई कागजात नहीं है. और जिन किसी के पास पर्चा या हुकुमनामा है, वो वन विभाग के नजर में मान्य नहीं है.

वे कहते हैं, ‘पिछले साल अगस्त में जब मैं चतरा के लावालौंग, कान्हा और कुंदा प्रखंड के गांवों में पहुंचा तो ठीक इसी तरह की समस्या देखने को मिली. वन विभाग की कार्रवाई से यहां भी तकरीबन एक हजार किसान प्रभावित हुए हैं.’

भारती कहते हैं, ‘बीते एक साल में चतरा में ग्रामीणों और किसानों पर वन विभाग का शिकंजा झारखंड के अन्य जिलों की तुलना में कहीं अधिक हैं. ग्रामीणों का कहना है कि वन विभाग ने उनकी खेतिहर जमीन पर कहीं पिलर गाड़ दिया है तो कहीं बोर्ड लगा दिया है.’

झारखंड लैंड बैंक के लिए कार्रवाई तो नहीं हो रही

वन विभाग का कहना है कि जंगल की जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराने के लिए कार्रवाई की जा रही है. हालांकि झारखंड जंगल बचाओ आंदोलन के संस्थापक संजय बसु मलिक इस कार्रवाई को अतिक्रमण से अलग देखते हैं.

संजय का कहना है, ‘वन विभाग की ओर से इस तरह की कार्रवाई झारखंड लैंड बैंक योजना शुरू किए जाने के बाद ज्यादा तेज हुई है. बहुत हद तक मुमकिन है कि इस तरह की जमीन पर रह रहे हैं ग्रामीणों को पट्टा दिए जाने के बजाय उसे चिह्नित कर सरकार हो सकता है इन जमीनों को लैंड बैंक योजना के तहत उद्योगों को दे दे.’

मालूम हो कि जनवरी 2016 में झारखंड सरकार ने लैंड बैंक शुरू किया है. इसके तहत निवेशकों को उद्योग लगाने के लिए जमीन देने का प्रावधान है.

संजय बसु का कहना है कि जिन लोगों के पास जंगल की जमीन का पर्चा या हुकुमनुमा है, वो कागजात 1956 के बाद से वैध नहीं है. चतरा के किसानों को चाहिए कि जल्द से जल्द वे ग्रामसभा में बैठक कर पट्टे के लिए आवेदन करें.

चतरा में वन विभाग की कार्रवाई से फिलहाल हजारों किसान प्रभावित हुए हैं. किसान नरेश भारती कहते हैं कि पिछले साल जमीन के पट्टे के लिए उन्होंने एक हजार किसानों वाली सूची डीएफओ को सौंपी थी. नरेश जैसे ही कई किसानों को अब भी ये उम्मीद है कि उन्हें उनकी जमीन पर दावा मिलेगा और वे अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकेंगे.

(यह रिपोर्ट एनएफआई मीडिया फेलोशिप प्रोग्राम 2019-20 के तहत प्रकाशित की गई है. लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं.)

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