आज भी महिला प्रधान फिल्में बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है: तनुजा चंद्रा

साक्षात्कार: दुश्मन, संघर्ष, सुर: द मेलोडी ऑफ लाइफ और क़रीब-क़रीब सिंगल जैसी फिल्में बनाने वाली निर्देशक तनुजा चंद्रा से प्रशांत वर्मा की बातचीत.

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फिल्म निर्देशक तनुजा चंद्रा. (फोटो साभार: फेसबुक/@MumbaiFilmFestival)

साक्षात्कार: दुश्मन, संघर्ष, सुर: द मेलोडी ऑफ लाइफ और क़रीब-क़रीब सिंगल जैसी फिल्में बनाने वाली निर्देशक तनुजा चंद्रा से प्रशांत वर्मा की बातचीत.

फिल्म निर्देशक तनुजा चंद्रा. (फोटो साभार: फेसबुक/@MumbaiFilmFestival)
फिल्म निर्देशक तनुजा चंद्रा. (फोटो साभार: फेसबुक/@MumbaiFilmFestival)

आपकी पहली डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘आंटी सुधा और आंटी राधा’ का हाल ही में मैड्रिड इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल में वर्ल्ड प्रीमियर हुआ है. यह फिल्म दो सगी बहनें, जो आपकी बुआ हैं, की कहानी है. इसके बारे में बताइए?

दोनों बुआओं के साथ मेरा बहुत ही क़रीबी रिश्ता रहा है, लेकिन जब आप काम में व्यस्त हो जाते हैं तो रिश्तेदारों के लिए वक़्त नहीं मिल पाता. मुझे काफी सालों से ये दोनों लोग बुला रही थीं.

मैं उनसे आने के लिए कहती थी, लेकिन कभी जा नहीं पाती थी. मेरे माता-पिता हर साल सर्दियों में उनके गांव जाते थे. उन लोगों ने बताया था कि बहुत अच्छी जगह है. बुआ लोगों का एक ग्रुप है, जिसमें उनके केयरटेकर भी बहुत बूढ़े हैं, उनकी कुक हैं, माली हैं… ये लोग लगभग साथ में ही रहते हैं.

मेरे ख़्याल में ये बात थी कि उनकी ज़िंदगी पर कभी कोई फिल्म बनाऊंगी, लेकिन बतौर निर्देशक ये बात तब पक्की हो गई जब मुझे लगा कि गांव में दो बूढ़ी महिलाओं के साथ उनकी देखरेख करने वाला जो समूह है वो काफी मज़ेदार है.

इनका एक परिवार बन गया है, जिसे आप ‘एडॉप्टेड फैमिली’ कह सकते हैं. ये मुझे बहुत अच्छा लगा. एक ऐसा परिवार जिसमें सिर्फ एक व्यक्ति आपका रिश्तेदार है और बाकी सब लोग अपने मन से इसमें शामिल हैं.

दोनों बुआओं की ये लोग देखभाल करते हैं और बुआओं ने इन लोगों को अपनी ज़मीन दे रखी है, जहां ये लोग खेती-बाड़ी करते हैं. एक ऐसा सिस्टम बन गया है कि ये सभी लोग एक दूसरे पर निर्भर हो गए हैं.

ये सभी लोग साथ हंसते हैं, खाते हैं, एक-दूसरे से बातचीत करते हैं. आज के समय में हम समाज में देख रहे हैं कि लोगों के बीच में बैर, खासकर धर्म को लेकर, बढ़ता जा रहा है.

दो बूढ़ी औरतें और उनकी देखभाल करने वालों में मुसलमान, दलित और ब्राह्मण आदि शामिल हैं. ये लोग एक साथ हंसी-खुशी रहते हैं. ये जानकर मुझे लगा कि इस पर फिल्म बनाई जा सकती है.

इस फिल्म के माध्यम से धर्म को लेकर क्या कहना चाहती हैं?

धर्म का जो मुद्दा है मैं उसे बहुत गंभीरता के साथ नहीं दिखाना चाहती थी, क्योंकि हमने फिल्म का पूरा अंदाज़ बहुत हल्का-फुल्का रखा है. मेरे हिसाब से हल्के-फुल्के तरीके से आप गहरी बात गंभीरता से कह सकते हैं.

यह आज के समय में ज़रूरी भी है. ऐसे माहौल में ये कहना बहुत ज़रूरी है कि हम एक-दूसरे के साथ बहुत ही आदर के साथ रह सकते हैं और धर्म को लेकर एक-दूसरे से मतभेद नहीं रख सकते.

लोकतंत्र में हम सभी लोग समान हैं. अगर हमारा मज़हब अलग है तो भी एक-दूसरे का आदर करके, भेदभाव नहीं करते हुए हमें एक साथ रहना ही होगा. इसके अलावा हमारे पास कोई चारा नहीं है. हमें एक-दूसरे के साथ ही रहना है.

गांव में मेरी बुआ का जो परिवार बन गया है, उनके बीच धर्म का मुद्दा कभी नहीं उठा. धर्म ने इन लोगों के बीच कभी कोई अड़चन पैदा नहीं की. ये लोग एक-दूसरे का ख़्याल रखते हैं और आज के समय में ये बहुत ही अच्छी बात है.

तनुजा चंद्रा की पहली डॉक्यूमेंट्री फिल्म आंटी सुधा और आंटी राधा का एक दृश्य.
तनुजा चंद्रा की पहली डॉक्यूमेंट्री फिल्म आंटी सुधा और आंटी राधा का एक दृश्य.

धर्म को लेकर आज के समय में जो पूरा बवाल चल रहा है, बतौर फिल्मकार इस बारे में क्या सोचती हैं?

मेरी सोच ये रही है कि सामाजिक न्याय और सामाजिक मुद्दों को फिल्मों में लाया जा सके. मेरे लिए ये महत्वपूर्ण बात है. अन्य फिल्मकारों का भी अपने तरीके से इन मुद्दों को उठाना ज़रूरी है. फिल्मों में ये मुद्दे उठाए भी जाते हैं.

फिल्म इंडस्ट्री में उस तरह का भेदभाव नहीं है, क्योंकि यहां लोग एक दूसरे पर आर्थिक और रचनात्मक तौर पर निर्भर रहते हैं. फिल्म एक टीम वर्क है.

कहने का मतलब ये है कि कोई किसी भी मज़हब या तबके या फिर सेक्सुअल ओरिएंटेशन का हो सकता है और ये सभी लोग बराबर हैं.

अगर हम इस साधारण बात को मानकर चलें तो समस्या नहीं होगी. हालांकि पता नहीं दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है वह बहुत दुखद है. न सिर्फ देशों के बीच लड़ाई चल रही है, बल्कि एक देश में विभिन्न समुदायों के बीच भी वही हाल है. यह समस्या है.

एक इंसान के तौर पर हमारी कोशिश यही रहनी चाहिए कि हम दूसरे इंसान को बराबरी का दर्जा दें. वास्तव में फिल्मों का प्रभाव बहुत सीमित रहता है. क्योंकि फिल्मों की कहानियां वास्तविक जीवन से ही आती हैं. कहानियों से ज़िंदगी नहीं बनती.

कहानियों से हमें प्रेरणा ज़रूर मिल सकती है लेकिन हमें वास्तविक जीवन में बराबरी की भावना वाली सोच पैदा करनी होगी, तभी कहानियों का असर होगा. लोगों की यही कोशिश होनी चाहिए. मेरी फिल्म में हमने यही दिखाने की कोशिश की है.

आपका परिवार लेखकों का परिवार है. आपकी मां फिल्म लेखक हैं. आपके भाई विक्रम चंद्रा (सेक्रेड गेम्स) उपन्यासकार हैं. आपकी बहन अनुपमा चोपड़ा भी लेखक और फिल्म पत्रकार हैं. लेखकों के परिवार से होने का क्या असर पड़ता है?

हम तीनों ही भाई-बहन बहुत ही स्वाभाविक तरीके से इस रचनात्मक क्षेत्र (लेखन) में आ गए. किसी ने कोशिश नहीं की. बचपन में हम सभी लोगों को पढ़ने के प्रति प्रोत्साहित किया जाता था.

परिवार में हम सबकी रुचि शुरू से ही किताबें पढ़ने में रही है. परिवार में सिर्फ मेरे पापा ही रसायन विज्ञान के क्षेत्र में थे.

मां क्योंकि लेखन के क्षेत्र में हैं, तो उनका असर हमारे ऊपर रहा. हमें बहुत कोशिश नहीं करनी पड़ी हम सबका रूझान बहुत ही स्वाभाविक तरीके से लेखन की तरफ रहा.

भाई विक्रम चंद्रा तो वास्तव में बहुत ही गंभीर उपन्यासकार हैं. वो पूरी तरह से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय हैं. बहन अनुपमा चोपड़ा ने भी नॉन-फिक्शन किताबें लिखी हैं. मैंने 2017 में लघु कहानियों पर आधारित किताब ‘बिजनिस वुमन’ लिखी. ये उत्तर प्रदेश की कहानियां हैं.

तनुजा चंद्रा अपनी मां कामना चंद्रा और बहन अनुपमा चोपड़ा के साथ. (फोटो साभार: फेसबुक)
तनुजा चंद्रा अपनी मां कामना चंद्रा और बहन अनुपमा चोपड़ा के साथ. (फोटो साभार: फेसबुक)

हमारा पूरा परिवार मौसी-बुआ सब उत्तर प्रदेश से ही हैं. इनसे मैं हंसी मज़ाक से भरी अद्भुत कहानियां सुनती आई हूं. हमारे यहां जो लेखन के क्षेत्र में नहीं हैं, वे भी अच्छी कहानियां सुनते और सुनाते हैं.

ये एक संस्कृति है. मुझे नहीं लगता है कि अगले 10-20 सालों तक ये बची रहेगी.

मुझे लगता है कि अगर हम इन चीज़ों को किताबों और फिल्मों के माध्यम से संजोएंगे नहीं तो ये हमेशा के लिए खो जाएंगी. किताबें और फिल्में हमारे बाद भी ज़िंदा रहती हैं.

गांव में मेरी बुआ जिस तरह से रह रही हैं. अभी जो युवा हैं, उन्हें इस तरह की जीवनशैली का तो बहुत ही कम तर्जुबा है. इसलिए इन्हें रिकॉर्ड पर रखना ज़रूरी है.

आपकी मां कामना चंद्रा ने प्रेम रोग (1982), चांदनी (1989), 1942 अ लव स्टोरी (1994) जैसी फिल्मों की कहानी लिखी. उस जमाने में एक महिला का फिल्म इंडस्ट्री में पैर ज़माना कितना आसान था?

मुझे लगता है कि उस जमाने में फिल्म इंडस्ट्री में क़दम रखना आज के ज़माने से काफी आसान रहा होगा. ऐसा इसलिए क्योंकि उस दौर में किसी बड़े प्रोड्यूसर या निर्देशक तक फोन के माध्यम से पहुंचना उतना मुश्किल नहीं था, जिनता आज है.

वास्तव में आज हमारी इंडस्ट्री बहुत बड़ी हो गई है और यहां कॉम्पटीशन भी बहुत बढ़ गया है.

मेरी मां ने राज कपूर साहब के दफ्तर में फोन कर उनके सेक्रेटरी से बात की थी. उन्होंने कहा था कि मैं एक साधारण हाउसवाइफ हूं, लेकिन मेरे पास एक बहुत अच्छी कहानी है.

सेक्रेटरी ने कहा कि आप कहानी मुझे सुना दीजिए तो मेरी मां ने कहा कि कहानी आपको नहीं उन्हीं (राज कपूर) को सुनाऊंगी.

इसके बाद मेरी मां को दोबारा उनका फोन भी आ गया. राज जी से मिलने की बात तय हो गई. दो से ढाई घंटे उन्होंने मेरी मां से कहानी सुनी और उसी समय कहा कि मैं इस पर फिल्म बनाना चाहता हूं. इस तरह से उनकी शुरुआत हो गई.

हाल-फिलहाल में उन्होंने क़रीब-क़रीब सिंगल फिल्म की कहानी लिखी, जिसे मैंने निर्देशित किया है. एक रेडियो प्ले पर आधारित ये कहानी उन्होंने कई साल पहले लिखी थी. हमने आज के समय के हिसाब से इसमें बदलाव कर ये फिल्म बनाई थी.

फिल्म इंडस्ट्री में आपकी शुरुआत कैसे हुई?

मैंने अमेरिका से फिल्म निर्माण में मास्टर डिग्री ली है. पढ़ाई ख़त्म कर मैं भारत आ गई. साल 1996-97 में सैटेलाइट टीवी की शुरुआत हुई थी. उस समय टेलीविज़न का अच्छा दौर था. उस समय मैंने ज़मीन-आसमान नाम का एक टीवी सीरियल निर्देशित किया.

इसे मनोहर श्याम जोशी जी ने लिखा था. उस वक़्त सीरियल रोज़ाना नहीं बल्कि साप्ताहिक बना करते थे. बहुत रचनात्मक और अच्छी गुणवत्ता वाले सीरियल बना करते थे.

उसके बाद मैंने स्क्रीन राइटिंग शुरू की. महेश भट्ट की फिल्म तमन्ना (1997) और जख़्म (1998) का सह-लेखन किया. इसके बाद अपनी ख़ुद की फिल्में बनानी शुरू की.

हर काम सीखते हुए अब मैं एक स्वतंत्र फिल्म निर्देशक बन गई.

आपको फिल्म इंडस्ट्री में आए हुए 20 साल से ज़्यादा का वक़्त हो चुका है. इतना समय गुज़ारने के बाद क्या बदलाव देखती हैं?

आज के समय में हमारी इंडस्ट्री बहुत बड़ी हो गई है और प्रतिद्वंद्विता भी काफी बढ़ गई. इसकी वजह से नए लेखकों और निर्देशकों को ज़्यादा काम मिल रहा हैं, जो कि बहुत अच्छी बात है.

तनुजा चंद्रा ने दुश्मन, सुर, क़रीब-क़रीब सिंगल और संघर्ष जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है. (फोटो: फेसबुक/ट्विटर)
तनुजा चंद्रा ने दुश्मन, सुर, क़रीब-क़रीब सिंगल और संघर्ष जैसी फिल्मों का निर्देशन किया है. (फोटो: फेसबुक/ट्विटर)

लेखक अब जाकर बहुत व्यस्त हुए हैं. अब तक लेखकों को बहुत संघर्ष करना पड़ता था. मैंने जब शुरू किया था तब महिला निर्देशक बहुत कम थीं. अब संख्या तो बढ़ गई है लेकिन उतनी नहीं बढ़ी है, जितनी मुझे उम्मीद थी.

ऐसी फिल्में जिसमें लीड रोल में महिला हो, अब भी बहुत कम बनती हैं. 100 फिल्मों में से 30 से 40 फिल्में तो महिला निर्देशकों की होनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. जब तक निर्देशकों के समुदाय में आधी महिलाएं नहीं होंगी, ये काफी नहीं.

इसके अलावा महिलाओं से जुड़ी कहानियां भी हमने फिल्मों में बहुत कम सुनाई हैं. कहानियां भी जितनी ज़्यादा औरतों के बारे में हों फिल्मों में उनती ही ताज़गी आएगी.

टीवी पर महिलाओं की कहानियां कही जा रही हैं, लेकिन फिल्मों में ऐसा अब भी बहुत कम हो रहा है. फिल्मों में ही नहीं समाज के हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़नी चाहिए.

भारतीय फिल्म इंडस्ट्री बहुत बड़ी हो गई है, इसके बावजूद महिला फिल्म निर्देशकों की संख्या काफी कम है. इसकी क्या वजह मानती हैं?

मुझे लगता है कि इसके पीछे वजह हिचकिचाहट रही होगी. महिलाओं की अपनी हिचक. ये समाज पुरुष प्रधान तो है ही और फिल्म इंडस्ट्री भी ऐसी ही है, लेकिन इसकी वजह से आपको अपनी प्रगति नहीं रोकनी चाहिए.

मैं हमेशा यही कहती हूं कि अगर कोई महिला फिल्म बनाना चाहती है तो उसे ये बनानी चाहिए. किसी को अपने रास्ते में नहीं आने देना चाहिए.

मैं हमेशा एक महिला प्रधान विषय फिल्म बनाने के लिए चुनती हूं, उसमें मुझे संघर्ष करना पड़ता है. ऐसा इसलिए क्योंकि ज़्यादातर लोगों का मानना है कि महिला लीड रोल वाली कहानियों को कम लोग देखना पसंद करते हैं.

ऐसे में अपनी फिल्मों के लिए मुझे बहुत कोशिश करनी पड़ती है. कलाकारों को ये विश्वास दिलाने में कि ये अच्छी फिल्म बनेगी. हालांकि इन स्थितियों के बावजूद अब ऐसी फिल्में बन रही हैं, जिसमें किसी हीरो को लेना ज़रूरी नहीं है.

इसके अलावा महिला कलाकार के लीड रोल वाली फिल्म के लिए फंड भी कम मिलता है. आपको बहुत बड़ा बजट नहीं मिल पाता है. ऐसी फिल्में आपको मध्यम या कम बजट में ही बनानी पड़ती हैं.

दरअसल हर फिल्म का बजट उससे होने वाली कमाई पर निर्भर करता है. ऐसा मानना है कि महिला प्रधान फिल्मों की कमाई बहुत कम होती है, क्योंकि लोग मानते हैं कि ऐसी फिल्मों को कम लोग देखना पसंद करते हैं.

ऐसी सोच किस वजह से है ये मैं आज भी समझ नहीं पाई हूं.