परख: अशोक वाजपेयी के विशाल अनुभव-सागर की झलक

वरिष्ठ लेखक अशोक वाजपेयी के साथ युवा लेखिका पूनम अरोड़ा के साक्षात्कार की हालिया किताब 'परख' पर योगेश प्रताप शेखर लिखते हैं कि यह संवाद हमें उनके लेखन के साथ उनके सामाजिक सरोकारों और उनके वृहद अनुभव जगत को समझने में मदद करता है.

'परख' का आवरण और अशोक वाजपेयी. (साभार: सेतु प्रकाशन/रज़ा फाउंडेशन)

हिंदी में लेखकों के साक्षात्कार संकलित हो कर पुस्तक के रूप में प्रकाशित होते रहे हैं. ऐसी पुस्तकों की संख्या भी अच्छी-खासी (एक प्रकाशक ने तो ऐसे ‘साक्षात्कार’ की पूरी श्रृंखला ही प्रकाशित की है.) है लेकिन दो लेखकों के आपसी संवाद से निर्मित किताबें कम ही हैं. उस में भी एक वरिष्ठ लेखक और अपेक्षाकृत युवा रचनाकार के बीच की सघन बातचीत का दस्तावेजी रूप लगभग न के बराबर है.

लेखकों के आपसी संवाद के नाम से छपी दो किताबों को यहां याद किया जा सकता है. एक तो ‘मित्र-संवाद’ है जो दरअसल डा. रामविलास शर्मा तथा केदारनाथ अग्रवाल के पत्रों का संकलन है और दूसरी है, ‘सोबती-वैद संवाद’ जो ‘भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, शिमला’ में इन दोनों लेखकों के एकत्र होने की स्थिति में संभव हुई थी. इन दोनों किताबों में समकालीन लेखक एक-दूसरे से संवाद कर रहे थे. पर जैसा कि कहा गया कि एक वरिष्ठ लेखक और अपेक्षाकृत युवा लेखक के संवाद हिंदी में नगण्य हैं. इसी कमी को हालिया प्रकाशित किताब ‘परख’ बहुत हद तक पूरी करती है.

‘परख’ में वरिष्ठ कवि एवं आलोचक अशोक वाजपेयी तथा युवा कवयित्री और कथाकार पूनम अरोड़ा की बातचीत दर्ज़ है. यह बातचीत आमने-सामने बैठकर नहीं की गई है. पूनम ने ईमेल द्वारा प्रश्न पूछे और फिर अशोक वाजपेयी ने जवाब भी ईमेल से भेजा. ‘परख’ पुस्तक को कई रूपों में देखा जा सकता है. पहला, यह दो कवियों की बातचीत है. दूसरा, यह एक वरिष्ठ लेखक का युवा लेखिका के साथ संवाद है. तीसरा, यह एक पुरुष रचनाकार का एक स्त्री-रचनाकार के साथ संवाद है.

अशोक वाजपेयी हिंदी के वरिष्ठ लेखकों में सब से अधिक सक्रिय हैं. पिछले साठ-सत्तर वर्षों से वे साहित्य रच रहे हैं. स्वयं को मूलतः वे कवि मानते हैं लेकिन साहित्य के साथ-साथ उन की बहुत गहरी रुचि ललित कलाओं, शास्त्रीय संगीत तथा शास्त्रीय नृत्य में है. इन सबके साथ वे कई संस्थाओं के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाते रहे हैं और इस वक्त प्रख्यात चित्रकार सैयद हैदर रज़ा द्वारा स्थापित ‘रज़ा फाउंडेशन’ के प्रबंध न्यासी हैं. वे अपने व्याख्यानों, लेखन आदि से एक सक्रिय जन-बौद्धिक का दायित्व भी निभाते रहे हैं. उनका अनुभव-संसार बहुत दीर्घ, व्यापक और विविध है.

स्वाभाविक ही है कि ‘परख’ किताब में सबसे अधिक बातचीत कविता पर है. जैसा कि इस पुस्तक के ‘ब्लर्ब’ में प्रख्यात आलोचक मदन सोनी ने लिखा है कि ‘चूंकि अशोक वाजपेयी उत्कृष्ट कवि-आलोचक होने के साथ-साथ हिंदुस्तान के शीर्षस्थ संस्कृतिकर्मी भी हैं; और अपनी इन तमान भूमिकाओं में वे असामान्य रूप से विवादास्पद रहे हैं, उनके अधिकांश साक्षात्कार विवादपरक (पॉलिमिकल) हो जाते रहे हैं; उनमें से ज़्यादातर उनके विवादास्पद संस्कृति-कर्म को सम्बोधित हैं. इस वजह से इन साक्षात्कारों में एक कवि के रूप में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका प्राय: अलक्षित रही है.’

‘परख’ किताब में अशोक वाजपेयी के कवि-कर्म से संबंधित कई प्रश्न हैं जिनके उत्तर में उनके गद्य की सूत्रात्मकता और भाषा की अर्थपूर्ण चमक महसूस की जा सकती है. इन दोनों बातों की उपस्थिति इस किताब में आद्यंत देखी जा सकती है. उदाहरण के लिए एक सवाल के जवाब में अशोक वाजपेयी ने लिखा कि ‘कविता अदृश्य को, अकथ को दृश्य और कथन के अहाते में लाने की कोशिश करती है.’

इसी तरह एक सवाल के उत्तर में वे लिखते हैं कि ‘कविता भाषिक इबारत भी होती है और आवाज़ भी.’ इस तरह के ढेरों वाक्य इस पूरी बातचीत में फैले हुए हैं. अशोक वाजपेयी के लिए कविता का संसार व्यापक है, अपेक्षाकृत स्वायत्त है लेकिन कविता की व्यापकता तभी आकार लेती है जब कोई ‘रसिक पाठक’ उस में अपना सच मिलाता है. उसकी स्वायत्ता भी हवाई नहीं बल्कि गहरे सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों जे जुड़ी हुई है.

एक सवाल के जवाब में अशोक वाजपेयी लिखते हैं कि ‘कविता और साहित्य की अपनी वैचारिक सत्ता होती है – वे सोच-विचार की विधाएं भी हैं.’ साथ ही एक दूसरे प्रश्न के उत्तर में वे लिखते हैं कि ‘सच्ची कविता हमें दुनिया में रहना-रचना-बदलना सिखाती है. अगर मुक्ति है तो इसी दुनिया में रहकर, उसे ख़ारिज या तज कर या उससे भागकर नहीं.’ इन उदाहरणों से यह स्पष्ट है कि ‘परख’ किताब में कविता और साहित्य के अनेक बिंदुओं पर सैद्धांतिक चर्चा के सूत्र हमें मिलते हैं.

अशोक वाजपेयी के काव्य-अनुभव में संस्कृत, हिंदी और उर्दू कविता से लेकर विश्व कविता के श्रेष्ठतम का संस्कार शामिल है. उन्होंने दुनिया के कई श्रेष्ठ कवियों की कविताओं का अनुवाद भी किया है. यह भी उन के दृष्टिकोण को व्यापक करने में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है.

यह किताब हमें उनकी कविताओं को समझने के सूत्र एवं दृष्टि भी मिलती है. वे बार-बार इस पर इसरार करते हैं कि उनकी कविता के दो प्रमुख कारक इस संसार के प्रति उन का अनुराग और संसार के प्रति कृतज्ञता है. उनकी कविताओं का दूसरा सिरा स्वतंत्रता, समानता और न्याय की अवधारणा से भी जुड़ा है. इन कविताओं का एक सिरा उनकी इस मान्यता से भी जुड़ता है कि ‘धर्म-मुक्त अध्यात्म’ संभव है. साथ ही उन्होंने कविताओं के जो अनुवाद किए हैं उन का भी असर उन की कविता पर गहराई से पड़ा है जैसा कि वे

पूनम अरोड़ा के एक प्रश्न के जवाब में लिखते हैं कि ‘पोलिश कविता का अनुवाद करते हुए उसका इतना आन्तरिकीकरण हो गया कि मेरी कविता में एक पोलिश चरण देखा जा सकता है, ख़ासकर ‘इबारत से गिरी मात्राएं’, ‘उम्मीद का दूसरा नाम’, ‘दु:ख़ चिट्ठीरसा है’ आदि बाद के संग्रहों में.’

ऊपर यह भी संकेत किया गया है कि अशोक वाजपेयी अपनी लेखकीय सामाजिक प्रतिबद्धता के फलस्वरूप एक जन-बौद्धिक का दायित्व भी निभाते आ रहे हैं. हिंदी क्षेत्र की साहित्यिक और सांस्कृतिक विपन्नता को लेकर अशोक वर्षों से चिंतित बल्कि कई बार क्षुब्ध भी होते रहे हैं. उन्हें यह बार-बार लगता है कि हिंदी समाज साहित्य से प्रेरणा नहीं लेता. हिंदी क्षेत्र में जातिवाद, सांप्रदायिकता में भारी वृद्धि और हिंदी क्षेत्र के मध्य वर्ग की एक निष्क्रिय उदासीनता का बिंदु इस बातचीत में बार-बार आता है.

साथ ही पिछले कुछ वर्षों में ‘हिंदुत्व’ का वर्चस्व हिंदी क्षेत्र पर जो बढ़ता हुआ दिखता है उसकी विवेचना भी वे करते चलते हैं. कई बार यह कड़वा लग सकता है लेकिन इसमें व्यक्त सच्चाई से मुंह मोड़ना असंभव है.

वे साफ़-साफ़ लिखते हैं कि ‘सबसे ज़्यादा पतन तो हिंदी मध्यवर्ग का है, जो परंपरा, इतिहास, संस्कृति, स्वतंत्रता-समता-न्याय की संवैधानिक मूल्यत्रयी से, अपने साहित्य और मातृभाषा से विश्वासघात करने वाला उठाईगीर संप्रदाय बन कर रह गया है.’

इसी प्रकार पूनम अरोड़ा के ‘हिंदुत्व’ के प्रश्न पर स्पष्ट स्वरों में वे लिखते हैं कि ‘हिंदुत्व हिंदू धर्म का कोई नया या वैध संस्करण नहीं है. हिंदू परंपरा का अनिवार्य पक्ष रहा है प्रश्नवाचकता, विवाद, संवाद. … हिंदुत्व अब अपने प्रकट सत्तारूढ़ रूप में बहुलता, प्रश्नवाचकता और निर्भीकता का लगातार, क्रूर, और अलोकतांत्रिक, हनन करता है. … हिंदुत्व न सिर्फ़ हिंदू धर्म का कोई संस्करण है, वह न तो हिंदुओं का वैध या समुचित प्रतिनिधित्व करता है और न ही उसकी लंबी परंपरा से उसका कोई संबंध या संवाद है. वह धर्म का सहारा लेकर उसी की एक भयावह विकृति है.’

जैसा कि यह कहा ही गया कि ‘परख’ को एक पुरुष रचनाकार और एक स्त्री रचनाकार के संवाद के रूप में भी देखा जा सकता है. इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि पूनम अरोड़ा अशोक वाजपेयी से स्त्रीवाद, यौनिकता, दलित लेखन  आदि के मुद्दों पर भी सवाल पूछतीं. इनसे जुड़े जवाब बताते हैं कि अशोक वाजपेयी के दृष्टिकोण में इन मुद्दों पर एक उदार खुलापन है. मदन सोनी ने ठीक ही लक्ष्य किया है कि ‘यह पूनम के प्रश्नों की वेधकता है जो इस अंतरंग को बहिरंग में लाती है.’

दूसरी बात यह कि किसी भी नई विचार-स्थिति या तकनीक को अशोक वाजपेयी संदेह की निगाह से नहीं देखते बल्कि उसके प्रति एक आशा उनके मन में नज़र आती है, भले वे उस की सीमाओं को लेकर थोड़े चिंतित हों !

जब पूनम यह पूछती हैं कि ‘क्या आप मानते हैं कि आज का स्त्रीवाद, विशेष रूप से सोशल मीडिया के युग में, व्यक्तिगत अनुभवों पर अधिक ध्यान केंद्रित है, और इससे आंदोलन की समग्रता में कोई कमी आई है ?’ तो जवाब आता है कि ‘स्त्रीवाद अगर अपनी सामाजिकी में निजता की जगह बनाए रख रहा है तो यह बहुत विधेयात्मक बात है और मार्क्सवाद की एक बड़ी चूक से सबक़ लेने जैसा है. व्यक्तिगत अनुभव, उसकी उपस्थिति आदि किसी विचार के लिए बहुत समृद्ध उपजीव्य होते हैं. उनसे तो स्त्रीवाद अधिक समग्र बन रहा है.’

यौनिकता के सवाल पर अशोक लिखते हैं कि ‘विक्टोरियन मानसिकता से ग्रस्त और अपनी ही शृंगार की लंबी और महान् परंपरा से दायवंचित हिंदी मानस, ख़ासकर उसके पढ़े-लिखे मध्यवर्ग के लिए, यौनिकता हमेशा विवादास्पद मामला है.’ इन सबसे समझा और महसूस किया जा सकता है कि अशोक वाजपेयी के विचारों में एक युवापन, ताजगी और उदारता है जहां असहमति का निर्द्वंद्व स्वीकार भी है.

उनके भीतर उदारता के साथ आत्मसंयम भी है. यह आत्मसंयम इस पूरी बातचीत में अंत:सलिला रूप में विन्यस्त है. इसे भी एक उदाहरण से समझा जा सकता है. पूनम पूछती हैं कि ‘क्या आप अपने जीवन के सब से सुंदर और अर्थवान रिश्ते के विषय में हमसे साझा करना चाहेंगे?’ अशोक वाजपेयी उत्तर देते हैं कि ‘ऐसे सुंदर-सघन-सार्थक-स्मरणीय रिश्ते बहुत से रहे हैं और उनको मैंने, किसी हद तक अपने लिखे में संजोया और चरितार्थ किया है. उनके बीच चुनना या उनकी सार्वजनिक शिनाख़्त करना मुझे ज़रूरी नहीं लगता.’

इस किताब में ललित कला, संगीत और नृत्य से जुड़े सवाल तुलनात्मक रूप से संख्या में कम हैं. अशोक वाजपेयी का जितना व्यापक अनुभव इन क्षेत्रों में है, यदि उन से जुड़े सवाल कुछ अधिक होते तो यह और भी अच्छा होता. इसके बावजूद यह किताब उनके अनुभव-सागर की स्पष्ट, प्रचुर और उदात्त झलक है.

(लेखक दक्षिण बिहार केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी पढ़ाते हैं.)