क़िस्सा सारंगढ़: जवाहर लाल नेहरू के क़रीबी डॉ. कैलाशनाथ काट्जू की कहानी

जवाहर लाल नेहरू और डॉ. कैलाशनाथ काट्जू के बीच परस्पर सम्मान का रिश्ता था. मोतीलाल नेहरू की मृत्यु के बाद उनकी राजनैतिक विरासत जवाहर लाल को और वकालत की विरासत काट्जू को हस्तांतरित हुई थी. सारंगढ़ के गिरिविलास पैलेस में काट्जू के लिखे अनेक पत्र संरक्षित हैं.

बाएं से - राजा नरेशचंद्र सिंह, डॉ. कैलाशनाथ काट्जू, पं. द्वारका प्रसाद मिश्र तथा रानी ललिता देवी. (सभी फोटो साभार: गिरिविलास पैलेस आर्काइव)

16 जनवरी 1957 के दिन मध्यप्रदेश के मंत्री और सारंगढ़ के राजा रह चुके नरेशचंद्र सिंह समेत सभी मंत्रियों को मुख्यमंत्री भगवंतराव मंडलोई के कार्यालय से एक पत्र प्राप्त हुआ.

नया राज्य अस्तित्व में आए ढाई महीने और राज्य के पहले मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल की मृत्यु हुए 16 दिन बीत चुके थे. आज़ादी के बाद देश में दूसरा आम चुनाव होने जा रहा था और नामांकन प्रक्रिया समाप्त होने में चार दिन बाक़ी थे. रविशंकर शुक्ल की अचानक हुई मृत्यु के बाद अंतरिम व्यवस्था के तहत मंडलोई को मुख्यमंत्री बनाया गया था.

पत्र के अनुसार, देश के प्रतिरक्षा मंत्री डॉ. कैलाशनाथ काट्जू का आगमन हो रहा था. (शुरुआती वर्षों में अनेक संबोधन ऐसे थे जिनके लिए मानक या सर्वमान्य शब्द ईजाद नहीं हुए थे. रक्षा मंत्री उनमें से एक था. इसी तरह न्यायाधीश के लिए न्यायाधिपति जैसे शब्द प्रचलन में थे.) मंत्रियों से कहा गया था कि एयरपोर्ट पहुंच कर अतिथि की अगवानी करें.

सब जानते थे कि डॉ. काट्जू किसी सामान्य यात्रा पर नहीं आ रहे थे. रविशंकर शुक्ल की मृत्यु से पैदा हुई रिक्तता को भरने के लिए एक ऐसे नए नेता की ज़रूरत थी, जो उम्र के साथ-साथ अपने राजनैतिक और सामाजिक क़द में भी दूसरों से बड़ा प्रतीत हो. चार इकाइयों के मेल से बने नए मध्यप्रदेश में तो ऐसा कोई था नहीं सो पंडित नेहरू ने डॉ. काट्जू को भेजा था.

कश्मीरी पंडित डॉ. काट्जू के पिता जावरा के नवाब के दीवान थे

प्रथम राज्यपाल सीतारमैया की तरह इस राज्य से अपने पुराने संबंधों का दावा करने वाली दलील डॉ. काट्जू के पास भी थी. इंदौर के पास जावरा नाम की रियासत थी. कश्मीरी पंडित डॉ. काट्जू के पिता जावरा के नवाब के दीवान थे और डॉ. काट्जू का जन्म और उनकी प्रारंभिक स्कूली शिक्षा जावरा में ही हुई थी.

उसके बाद वे इलाहाबाद चले गए थे और वहां क़ानून की शिक्षा लेकर मोतीलाल नेहरू के सहायक के रूप में वकालत शुरू की तो बहुत जल्द एक कुशल और सफल वकील के रूप में अपना स्थान बनाने में कामयाब हुए थे.

 जवाहर लाल नेहरू और उम्र में उनसे दो वर्ष बड़े काट्जू के बीच प्रेम और परस्पर सम्मान का रिश्ता था. मोतीलाल नेहरू की मृत्यु के बाद उनकी राजनैतिक विरासत पुत्र जवाहर लाल को और वकालत की विरासत काट्जू को हस्तांतरित हुई थी. दोनों एक दूसरे को ‘भाई’ कहकर संबोधित करते थे.

डॉ. काट्जू विद्वान थे. बताते हैं एक शाम पहले 500 पन्नों के केस की फ़ाइल पढ़ कर अगले दिन बिना कोई विवरण भूले कोर्ट में बहस कर लेते थे. अनुभवी भी थे. मुख्यमंत्री बनने से पहले रक्षा मंत्री के अलावा केंद्र में गृह मंत्री और दो राज्यों के राज्यपाल भी रह चुके थे.

1953 में रायपुर के पास महानदी पर बने एक पुल के उद्घाटन कार्यक्रम में विशेष आग्रह पर डॉ. काट्जू आए थे.

लेकिन मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने तक उन पर बढ़ती उम्र के असर दिखने लगे थे. इस कारण अत्यंत कुशल प्रशासक होने के बावजूद उनके भुलक्कड़पन के क़िस्से अधिक चलते थे. छतरपुर के विधायक दशरथ जैन मध्यप्रदेश मे मंत्री थे. डॉ. काट्जू जब दौरे में छतरपुर पहुंचे तो जैन सर्किट हाऊस में उनके प्रमुख स्वागकर्ता थे.

मुख्यमंत्री के हावभाव देखकर उन्हें लगा कि डॉ. काट्जू ने शायद उन्हें पहचाना नहीं. सो पास जा कर याद दिलाने का प्रयास किया – सर, मैं दशरथ जैन हूं डॉ. काट्जू ने नज़र उठाकर देखा, स्मृति पर ज़ोर देते नज़र आए, मुस्कुराए, और फिर निहायत भोलेपन से कहा – ओह! इसी नाम के एक सज्जन तो मेरे मंत्रीमंडल में भी हैं.

 वे कम सुनने लगे थे. कुर्ते के ऊपरी पॉकेट में सुनने की मशीन रखते थे किंतु ईयर-फ़ोन कानों में तभी लगाते थे जब ‘ज़रूरत’ महसूस हो. कुछ लोगों का मानना था कम सुनना दरअसल गुटबाज़ी में गहरे तक डूबी कांग्रेस पार्टी में विवादों से बचने के लिए उनका बहाना था.

एक बार पार्टी के एक पदाधिकारी को स्टेट प्लेन में उनके साथ दिल्ली तक की यात्रा करने का मौक़ा मिला. वे ही दो सवारी थे. नेता जी बहुत खुश थे. अपने विरोधियों की सारी शिकायतें मुख्यमंत्री के कानों तक पहुंचाने का इससे बेहतर अवसर मिलना मुश्किल था. उन्होंने इसका भरपूर लाभ उठाया. डॉ. काट्जू सिर हिलाते रहे, बीच बीच में कभी छोटे ‘हूं’ तो कभी लंबे आश्चर्य-मिश्रित भावों वाले ‘हूं’ से जवाब देते रहे.

मुख्यमंत्री के कानों में अपने विरोधियों का कच्चा चिट्ठा उड़ेलने में अपनी सफलता पर नेताजी बहुत खुश थे. दिल्ली पहुंचते ही नेता जी की सारी तसल्ली काफ़ूर हो गई जब उन्होंने डॉ. काट्जू को जेब से ईयर-फ़ोन निकाल कर कान में लगाते देखा.

बैतूल ज़िला मुख्यालय के दौरे में पहुंचने पर कलेक्टर सुशील चंद्र वर्मा ने उनकी अगवानी की, अपना परिचय दिया और मुख्यमंत्री को जीप में बैठाकर स्वयं ड्राईव करते हुए मीटिंग स्थल तक पहुंचे. वहां वर्मा जब सारे अधिकारियों से उनका परिचय करा चुके तब मुख्यमंत्री ने उनकी ओर देखा और पूछा – और आप ? वे वर्मा को ड्राइवर समझ बैठे थे. (आगे चलकर सुशील चंद्र वर्मा मुख्य सचिव तथा भोपाल से चार बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए)

डॉ. काट्जू के लिखे कुछ पत्र

डॉ. काट्जू का मध्यप्रदेश में सफर

डॉ. काट्जू मध्यप्रदेश में दस साल रहे. पहले पांच साल मुख्यमंत्री के रूप में शासकीय गेस्ट हाऊस में और बाद के पांच साल विधायक के रूप में राजा नरेशचंद्र सिंह के शासकीय आवास 6, शामला हिल्स में. सारंगढ़ के गिरिविलास पैलेस में प्रकृति से फक्कड़ और हद दर्जे तक ईमानदार और मितव्ययी डॉ. काट्जू के लिखे अनेक पत्र संरक्षित हैं. सिर्फ़ एक अपवाद को छोड़ सारे के सारे डाक विभाग के अंतर्देशीय पत्रों में लिखे गए हैं.

इन पत्रों में किनारों की ओर अंदर मोड़ने के लिए पट्टियां होती थीं. उन पट्टियों में भी आड़ी पंक्तियों में लिखा है पर महंगा लिफाफा इस्तेमाल नहीं किया. अंतर्देशीय पत्रों की क़ीमत दस पैसे होती थी. लिफ़ाफ़े के लिए पंद्रह पैसे लगते थे.

 बाद के पांच सालों में बढ़ती उम्र का प्रभाव हावी होता गया. राजा साहब के बच्चों में मेरी पत्नी मेनका देवी भी शामिल थीं. वे बताती हैं कि खाने की मेज़ पर बच्चे उनके बगल की कुर्सी लेने से बचते थे. डॉ. काट्जू कभी अपनी थाली से तो कभी बगल वाले की थाली से खाने लगते थे. बच्चों के लिए यह ऐसी परेशानी थी जिसकी शिकायत भी वे नहीं कर सकते थे. वे राजा नरेशचंद्र सिंह के पिता राजा जवाहिर सिंह के मित्र थे और घर में उनका स्थान विस्तारित परिवार के सबसे सयाने सदस्य के रूप में था.

दोपहर के भोजन के बाद बच्चे खेलने के लिए बाहर भागने की ताक में रहते थे. अगर पकड़ में आ गए तो  पूरी दोपहर डॉ. काट्जू के साथ बैठकर ताश खेलना पड़ता था. हालाँकि इस ज़बरदस्ती के हर्जाने के रूप में उनकी ओर से वह सब करने की छूट थी जिसे बच्चे ‘चीटिंग’ कहते थे.

डॉ. काट्जू ने मध्यप्रदेश आकर जावरा से अपना पहला चुनाव आसानी से जीत लिया था. लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में पहले पांच वर्ष पूरा करने के बाद 1962 में डॉ. काट्जू को कांग्रेस ने जब दोबारा जावरा से टिकट दी तो यह धारणा प्रबल हो गई कि अगले पांच वर्ष भी वे ही मुख्यमंत्री रहेंगे. पार्टी में नेहरू विरोधियों के साथ-साथ बड़ी संख्या में उम्रदराज़ होते नेताओं का समूह था जो काट्जू की वापसी को अपने मुख्यमंत्री बनने की संभावना का अंत मानता था.

पृष्ठभूमि में इनके साथ द्वारका प्रसाद मिश्र भी थे जो न विधानसभा में थे न ही कांग्रेस में लेकिन दोनों में वापसी के प्रयास में लगे थे. ये समूह डॉ. काट्जू की वापसी को हर हाल में रोकने के लिए पूरी तरह सक्रिय भी हो गया और सफल भी. चुनावी राजनीति की तिकड़मों में अनाड़ी डॉ. काट्जू जावरा से दूसरा चुनाव हार गए.

सारंगढ़ की हवाई पट्टी पर मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र तथा डॉ. काट्जू की अगवानी करते राजा नरेशचंद्र सिंह. कैमरे की ओर पीठ किये हुए विद्याचरण शुक्ल.

काट्जू की हार से नरेशचंद्र सिंह को धक्का

काट्जू की हार ने राजा नरेशचंद्र सिंह को बहुत धक्का पहुंचाया. यह हार नेहरू की हार के रूप में देखी गई थी.

1962 के इसी तीसरे आमचुनाव में नरसिंहगढ़ रियासत के राजा भानुप्रकाश सिंह ने विधानसभा के साथ-साथ लोकसभा का चुनाव भी लड़ा था और दोनों में वे विजयी रहे थे. दोनों में वे बतौर निर्दलीय जीते थे. विधानसभा चुनाव में तो उन्हें छयासी प्रतिशत वोट मिले थे. दोनों में से एक सीट छोड़ना अनिवार्य था. उनकी रुचि प्रदेश में रहने की थी.

राजा नरेशचंद्र सिंह ने उनसे बात की और विधानसभा सीट छोड़ने के लिए उन्हें तैयार कर लिया. इसके बाद अगला पड़ाव दिल्ली था जहां राजा नरेशचंद्र सिंह ने डॉ. काट्जू को नरसिंहगढ़ में होने वाले उपचुनाव में एक बार फिर उतारने के लिए पंडित नेहरू को राज़ी कर लिया. राजा नरेशचंद्र सिंह को चुनाव जीतने की ज़िम्मेदारी दी गई.

डॉ. काट्जू नामांकन दाखिल करने के बाद इलाहाबाद लौट गए. सारंगढ़ में रखा एक पत्र बताता है नरेशचंद्र सिंह ने अधिकार पूर्वक डॉ. काट्जू को मतगणना से पूर्व मध्यप्रदेश न आने की हिदायत दी थी.

कांग्रेस का कमजोर संगठनात्मक ढांचा 

सारंगढ़ से राजा साहब के विश्वस्त लोगों की टीम को नरसिंहगढ़ के लिए रवाना किया गया. वहां कांग्रेस का संगठनात्मक ढांचा बहुत कमज़ोर था. राजा भानुप्रकाश सिंह ने गांव गांव घूम कर लोगों से अपील की कि ‘मैं ही दोबारा चुनाव लड़ रहा हूं पर इस बार शेर की जगह दो बैलों की जोड़ी मेरा चुनाव चिह्न है’.

डॉ. काट्जू यह उपचुनाव जीत गए. किंतु पांच साल केवल विधायक रहे. इन पांच सालों में डॉ. काट्जू भोपाल में राजा नरेशचंद्र सिंह के सरकारी आवास में रहते या सारंगढ़  के उनके महल में. इस दौरान वे सागर विश्वविद्यालय के चांसलर भी नियुक्त हुए थे. तब कौन चांसलर होगा और कौन वाईस-चांसलर यह तय करने का अधिकार विश्वविद्यालयों के पास होता था.

मध्यप्रदेश में स्थिति बदली 1973 में जब राज्य सरकार ने एक क़ानून बना कर राज्यपाल को सभी विश्वविद्यालयों का पदेन कुलपति बनाया जाना अनिवार्य किया. वाईस चांसलर को उपकुलपति कहा गया. अब पद उन्नत हो चुके हैं. छत्तीसगढ़ में उपकुलपति को कुलपति तथा कुलपति को कुलाधिपति कहा जाता है. 2022 से मध्यप्रदेश में कुलपति कुलगुरु कहलाने लगे हैं.

उपचुनाव में डॉ. काट्जू की विजय सिर्फ़ प्रतिष्ठा के लिए थी. मुख्य चुनाव के परिणाम आने के बाद पूर्व में बाईस दिनों के मुख्यमंत्री रह चुके मंडलोई को दोबारा मुख्यमंत्री बना दिया गया था. इस बीच इंदिरा गांधी की सहायता से द्वारका प्रसाद मिश्र कांग्रेस में वापस आने में सफल हुए. 1963 में छत्तीसगढ़ के कसडोल नामक चुनाव क्षेत्र से उन्होंने एक उपचुनाव में जीत हासिल की और लगभग डेढ़ महीने की तिकड़म के बाद मुख्यमंत्री बनने में सफल हो गए.

मजे की बात यह कि इस डेढ़ महीने की अवधि में भोपाल में वे भी राजा नरेशचंद्र सिंह के सरकारी आवास में उनके मेहमान के रूप में रहे. दोनों समय भोजन की मेज़ पर परिवार के सदस्यों के साथ डॉ़ काट्जू और पंडित मिश्र की थाली भी होती थी.

एक रात सारे सदस्य मेज़ तक पहुंच गए लेकिन जब काफ़ी समय तक पंडित द्वारका प्रसाद मिश्र की कुर्सी ख़ाली पड़ी रही तो परिवार के मुखिया के नाते राजा साहब ने नौकरों को जानकारी लेने भेजा. पता चला दोपहर को वे मुख्यमंत्री निर्वाचित हो गए थे और शाम को अपना सामान लेकर नए सरकारी निवास आईना-बंगला में शिफ़्ट हो गए थे. जाते जाते परिवार के किसी सदस्य को सूचित करना या उनसे विदा लेना उनकी फ़ितरत में नहीं था.

(लेखक इतिहास-प्रेमी हैं, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं.)

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