दलित किचेंस ऑफ मराठवाड़ा: भूख, जाति और भोजन की राजनीति का दस्तावेज़

पुस्तक समीक्षा: शाहू पटोले की ‘दलित किचेंस ऑफ मराठवाड़ा’ भूख, जाति और भोजन के जटिल रिश्तों का मार्मिक बयान है. यह बताती है कि कैसे दलित समाज ने संसाधनों के अभाव में भी अपनी खाद्य संस्कृति बचाई, और भोजन को हथियार बनाकर किए गए जातिगत शोषण का साहसपूर्वक सामना किया.

दलित खाद्य संस्कृति को बनाये रखने और सहेजने में दलित महिलाओं के अथक योगदान की भी उल्लेखनीय भूमिका है. (पुस्तक आवरण/हार्पर कोलिंस प्रकाशन)

विश्व का हरेक धर्म भोजन को आपस में साझा कर खाने का उपदेश देता है. सभी धर्मों के अनुसार भूखे को खाना खिलाना सबसे बड़ा सद्कार्य है. गरुड़ पुराण में तो भूखे को भोजन करवाने वाले को स्वर्ग में स्थान मिलने की बात तक कही गई है. तैत्तिरीय उपनिषद ने अन्न को ही ब्रह्म माना है, अर्थात जिस प्रकार ब्रह्मा ने इस संसार की रचना की है उसी प्रकार अन्न से मनुष्य की रचना हुई है.

यदि इंसान को जन्म से भरपूर, स्वादिष्ट, संतुलित, पौष्टिक व पांचों इन्द्रियों को प्रसन्न करने वाला भोजन मिले तो कहा जाता है कि उसका शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक विकास तेजी से होता है. एक प्रगतिशील समाजवादी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा तो यही होनी चाहिए, परंतु ऐसा होना एक यूटोपिया-सा लगता है. इसकी पड़ताल दलित किचेंस ऑफ मराठवाड़ा के लेखक शाहू पटोले करते हैं, इसके सहारे भारतीय खाद्य संस्कृति के विविधमूलक इतिहास में उतरने का प्रयास करते हैं.

 पटोले तैत्तिरीय उपनिषद के इस कथन से कि ‘अन्न ही पूर्ण ब्रह्म है’ से सहमत नहीं हैं और मानते हैं कि मनुष्य के जीवन की सच्चाई भोजन नहीं है, खासकर दलित समाज के लिए तो अन्न पूर्ण ब्रह्म न होकर हमेशा अपूर्ण ही रहा. मनुष्य की सबसे पहली और सबसे बड़ी ज़रूरत भोजन रही है किंतु इसी भोजन को पाना उनके लिए न केवल टेढ़ी खीर रहा बल्कि हमेशा अनुपलब्ध ही रहा.

अपनी पुस्तक में वह साहित्य, इतिहास, प्राचीन ग्रंथों में दिए विभिन्न प्रमाणों, उद्धरणों, उदाहरणों व अपनी अनुभवजन्य तर्कशक्ति से सिद्ध करते हैं कि कैसे दलितों के लिए भोजन का जुगाड़ करना, भोजन पाना, भोजन करना, कितना कठिन, अपमान भरा व आत्मसम्मान को ख़त्म करने वाला अनुभव रहा. भारत की जातिव्यवस्था में जो भोजन सबको सुलभ था उसके पाने के लिए दलितों ने अपने मन और तन दोनों गलाए हैं, अनवरत संघर्ष की भट्टी में अपने को झोंका है.

पेट भरने के लिए दलित ने अनेक ऐसे रास्ते अपनाएं हैं जिससे कि वह केवल जी भर सके और जीने के लिए खड़ा रह सके. अन्न ही पूर्ण ब्रहम है के सामने दलित जीवन की त्रासदी इसके ठीक विपरीत रही कि वह उसकी पहुंच से बहुत दूर रहा और उसने उस ब्रह्म के दर्शन कभी ठीक से किए ही नहीं. पिछले ढाई हज़ार साल से जाति के नाम पर बहिष्कृत समाज अपने मूलभूत मानवीय व संवैधानिक अधिकारों-जैसे भोजन, आवास, वस्त्र और गरिमामय जीवन के लिए लगातार संघर्ष करता आ रहा है.

इस भूख की पीड़ा को दलित साहित्य ने जब एक विश्वसनीय मार्मिकता से सबके सामने रखा तो कुछ लोगों के अहं पर चोट लगी, कुछ लोगों के मन में संवेदना जगी व कुछ लोगों ने इस दुख-दर्द-पीड़ा को सिरे से नकार दिया. दरअसल आत्मकथाओं ने उनके जातिगत सुविधाओं को आईना दिखाने का काम किया है.

दलित साहित्य में जितनी भी आत्मकथाएं आईं, चाहे वह मराठी की हों या हिंदी की अथवा किसी और अन्य भाषा की, सभी रचनाकारों ने उनमें अपने व अपने समाज के भूखे रहने की अकाट्य पीड़ा का ज़िक्र किया है.

हिंदी के प्रसिद्ध दलित साहित्यकार ओमप्रकाश वाल्मीकि की आत्मकथा ‘जूठन’ इसी जूठे भोजन को पाने के लिए उनके व उनके परिवार और समुदाय के अपमान की क्षोभभरी कथा है. जिस समुदाय को ही पूरी तरह भूख से मारने का षड्यंत्र हो, वह समाज अपने बारे में, अपनी प्रगति, अपनी शिक्षा और अपने इतिहास और भविष्य के बारे में कैसे सोचेगा?

वर्ण व्यवस्था में भोजन की राजनीति

वर्ण व्यवस्था में यदि हम भोजन की राजनीति पर बात करें तो पाएंगे कि दलितों को भोजन से दूर रखने और उन्हें अखाद्य खाने पर मजबूर करने के पूरे षड्यंत्र की रचना ही धर्म के आधार पर की गई है, जिसे वर्ण व्यवस्था ने और सुदृढ़ किया. वर्ण व्यवस्था में दलित सबसे निचले पायदान पर, शूद्र से भी नीचे हैं, जिनके साथ अमानवीयता की हद तक छुआछूत बरती गई. उनको हर तरह के रोज़गार से दूर रखकर ऐसे जातिगत पेशे सौंपे गए जो घृणित थे. उन्हें कोई भी सम्मानजनक कार्य करने का अधिकार नहीं था जिसके कारण उनकी आर्थिक-सामाजिक स्थिति सबसे बदतर बना दी गई. और इसका सबसे ज़्यादा असर उनके भोजन पर ही पड़ा.

एक तो दलितों के पास खाने के लिए वैसे ही कुछ नहीं था और जो भी थोड़ा-बहुत उपलब्ध था, उसे भी सवर्ण समाज द्वारा घृणा, उपेक्षा और अपमान मिला. उनकी धर्म-वर्ण आधारित सामाजिक दृष्टि में वे अखाद्य या निकृष्ट भोजन करने वाले समुदाय थे.

दलित किचेंस ऑफ मराठवाड़ा ग़रीबी, भूख और भोजन के साथ जाति को जोड़कर देखती है. पटोले अपनी किताब में दिखलाते हैं कि किस तरह दलितों ने संसाधनों के अभाव में भी अपने अनुभव से पाककला का विस्तार किया और स्थानीय रूप से, खेतों, जंगलों, नदी-तालाबों में उपलब्ध खाद्य वस्तुओं को अपने भोजन की वस्तुओं में ढाला.

वह चर्चा करते हैं कि कैसे दलित समाज की खाद्य संस्कृति, उसकी पाककला और उनके बनाएं व्यंजनों को कभी मुख्यधारा के तथाकथित ‘पाक शो’ या ‘पाक कला कॉलम’ में कभी जगह ही नही दी गई. क्या इसका कारण भारतीय भोजन को लेकर श्रेष्ठतावाद और शुद्धतावाद है? क्योंकि भारतीय समाज गहरे तौर पर एक जातिवादी समाज है जहां किसी भी क्षेत्र में व्यक्ति की योग्यता नापने का एकमात्र पैमाना जाति ही है.

प्रायः उन्हीं शाकाहारी सवर्ण समुदायों का वर्चस्व हर जगह कायम है और इसीलिए मांसाहार करना यानि शर्म और निंदा की बात हो गयी और शाकाहार यानी श्रेष्ठता और गर्व की बात.

इस पुस्तक की ख़ासियत यह है कि यह न सिर्फ जातीयता के संदर्भ में भोजन की राजनीति पर बात करती है अपितु यह दलित रसोई में बनने वाली साग-सब्जी-दाल आदि के बनाने की विशिष्ट विधियां भी साथ-साथ बताती चलती है. वह मांसाहारी व्यंजन जो अब प्राय लुप्त हो रहे हैं, उनके बनाने की विधि के साथ उनके सांस्कृतिक महत्त्व की बात भी पटोले करते हैं. खाने से जुड़े इतिहास को दिखलाने के क्रम में ही पाठकों को यह पता चलता है कि दलितों ने अकाल के समय अपनी विवेकशील और संग्रहणीय खाद्य पद्धति और कौशल का इस्तेमाल कर न केवल अपने आपको वरन अपने समुदाय को भी भूखा मरने से बचाया.

पटोले ज़ोर देते हैं कि मराठावाड़ा के मांग महार दलित समुदायों की रसोई में बनने वाले व्यंजनों की पद्धति, उनकी रसोई में इस्तेमाल होने वाले मसाले व साग- मीट-अनाज को कूटने, काटने, पीसने, छानने वाले बर्तन तथा औजार आदि को उनकी सांस्कृतिक धरोहर मानकर सहेजने की बहुत ज़रूरत है.

इस उद्देश्य से भी पुस्तक का एक बड़ा हिस्सा दलित समुदायों के घर मे बनने वाली तमाम तरह की साक- सब्जी, दाल, अनाज, मांस व तरह-तरह की चटनी बनाने की विधियां व उनमें प्रयोग होने वाली सामग्री की उपलब्धता व उनके संदर्भों पर बहुत सारगर्भित तथ्यात्मक जानकारी है. किताब दलित समुदाय की भोजन को लेकर उनकी सामुदायिक मूल्य-परंपरा, उनके अपने अंतर्द्वंद्व पर भी एक गंभीर विचार-विमर्श करती है. दलितों के खान-पान की स्थानीय परंपरा और संस्कृति के प्रति हिकारत के कारणों की जाति के परिपेक्ष्य में ऐतिहासिक, धार्मिक और मनोवैज्ञानिक व्याख्या की गई है.

दलितों से अमानवीय श्रम करवाया जाता रहा है क्योंकि उनके पास न खेत थे और न ही किसी प्रकार का पुश्तैनी ज़मीन-जायदाद. कारण कि जाति के आधार पर उनको इन सब चीज़ों से वंचित रखा गया. जब उनके पास कुछ था ही नहीं तो वे अपना जीवन यापन कैसे करते? दलित ऐसे गरीब मज़दूर थे जिनके साथ जातिगत हिंसा करते हुए उनको अगरिमापूर्ण काम करने को मजबूर किया गया, जैसे मैला सफाई का काम, खेतों में थोड़ा बहुत खाने का सामान देकर पूरे समय बंधुआ मज़दूर की तरह काम करवाना, मरे जानवरों को उठाना और उनको खाने के लिए मजबूर करना.

भोजन को शोषण के हथियार बनाए जाने की असीम पीड़ा, दुख, निराशा और भूख के ख़िलाफ़ उन्होंने आसपास के सस्ते, उपलब्ध जंगली घास-पात को खाकर अपने को जीवित रखा और इस सत्य को बोधगम्य बनाया.

भोजन का वर्गीकरण और दलितों का तिरस्कार

हिंदू शास्त्र में तीन प्रकार के भोजन-सात्विक, राजसिक और तामसिक-बताए गए हैं. इनके अनुसार सात्विक भोजन श्रेष्ठ खाद्य, राजसिक को बल प्रदान करने वाला और तामसिक को निम्न दृष्टि से देखा गया. सात्विक यानी शुद्ध भोजन-घी, दूध, फल, दाल, अनाज, दही, हरी सब्ज़ियों से पूर्ण-जो मन को शुद्ध रखता है, उसे उच्च माना गया और जिसका सेवन ऊंची जाति के लोग करते थे.

दूसरे प्रकार का भोजन, राजसिक भोजन जो ऊर्जावान व बलदायक विशेष तौर पर राजा महाराजा व क्षत्रियों का माना गया जो शारीरिक बल प्रदान करता है.

तीसरे प्रकार का तामसिक भोजन, जो दलितों का भोजन था, उसे निम्नतर माना गया. यह सात्विक और राजसिक दोनों श्रेणी के भोजन से श्रेष्ठ निम्नतर माना गया और इसी भोजन के कारण दलितों को भी निम्नतर मान कर वर्ज्य समझा गया. घी या तेल के अभाव में दलितों ने भोजन उबालकर व भाप से पकाकर खाया. खाली नमक-प्याज़ का इस्तेमाल कर रोटी खाई, नमक-मिर्च की चटनी से रोटी खाई, और जानवरों के अवांछित हिस्सों को पकाकर खाया.

हिंदू धर्म में शाकाहार को प्रमोट करते हुए किसी जीव की हत्या न करने के लिए कहा गया, परंतु दलित किसी जीव से भी निम्नतम माने गए. जो सवर्णों के लिए त्याज्य, अशुद्ध और अपवित्र था उसको दलितों को खाने के लिए मजबूर किया गया. पर यहां सवाल यह उठता है कि जिस सवर्ण हिंदू समाज ने दलितों पर अपना जातीय वर्चस्व कायम रखने के लिए उनके समाज को हर तरह के भोज्य पदार्थों से दूर रखा व उसके भोजन के अधिकार को नकार कर उनको अपमानित करने व उनके प्रति मानसिक-दैहिक हिंसा करने के लिए प्रेरित किया, तो क्या यह यह भोजन की राजनीति का भी एक हिस्सा था जिसे दलितों की सामाजिक स्थिति को और हीन बनाने के लिए एक हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया.

इस तरह दलित समाज को पेट भरने के लिए, जीवन को चलायमान करने के लिए भोजन की तलाश में जद्दोज़हद करते हुए देख क्या कभी सवर्ण समाज के, उनके धर्म के ठेकेदारों को शर्म आई कि उनके ही धर्म का एक हिस्सा किस तरह से अपमानित होकर, भूखा रहकर उनके “अन्न ही पूर्ण ब्रह्म है” की धारणा की गर्वोक्ति के नीचे दबा पड़ा कराह रहा है?

मराठवाड़ा की खाद्य संस्कृति में मरे जानवर की चर्बी को भूनकर खाना और उसका तेल के लिए इस्तेमाल करना, भले ही किसी के लिए घृणास्पद हो, परंतु दलितों ने उसे खाकर अपना वजूद बचाया है और अपनी संघर्षमय यात्रा करते हुए अपनी खाद्य संस्कृति को संभाल कर रखा है.

हालांकि दलित खाद्य संस्कृति को बनाये रखने और सहेजने में दलित महिलाओं के अथक योगदान की भी उल्लेखनीय भूमिका है. कब, कितना कैसे और किस तरह खाना बनेगा ताकि परिवार की भूख शांत हो, इसका निर्णय महिलाओं ने अपने लिए उपलब्ध सीमित साधनों में भी, मौसम और अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार कुशलता से लिए. यह पुस्तक मराठवाड़ा की खाद्य संस्कृति पर बात करने के साथ ही महिलाओं के इन अथक प्रयासों पर भी बात करती है.

वास्तव में दलित महिलाएं भोजन से जुड़ी संस्कृतियों और इतिहास की संरक्षणकर्ता हैं और अभी तक उनके इस सांस्कृतिक योगदान का आकलन नहीं हुआ है. कल्पना कीजिए, भूखे बच्चों को रोता-बिलखता देखकर उन्होंने प्रकृति से कैसे भोजन के लिए अपना सामंजस्य बैठाया- कभी इमली के बीजों को घिसकर उसकी लुगदी की गोली बनाकर उनको खाने के लिए दिया, तो कभी जंगल से बेर-जामुन तोड़कर, या फिर नदी किनारे उगने वाले जंगली साग को तोड़कर उनके पेट भरा.

यह सोचने वाली बात है कि जिस समाज की पूरी ऊर्जा भोजन की उपलब्धता को लेकर पशोपेश में रही हो, उस समाज को आगे बढ़ाने में कितनी दिक्कत आई होगी! कितनी बीमारियों ने उसे घेरा होगा, उसके बच्चों ने कितना अभाव झेला होगा, यह कल्पनातीत है. दुनिया में इतनी सारी भोजन सामग्री उपलब्ध होने के बाद भी उसको जीवित रहने के लिए कुछ सब्ज़ियों व कुछ जंगली साग-पात पर निर्भर रहना उसके साथ बरते गए अन्याय की पराकाष्ठा है.

दलित किचेंस ऑफ़ मराठवाड़ा  भोजन को पाने की ज़द्दोजहद के अलावा दलितों की जीवन जीने की जिजीविषा का आख्यान है जो दलित भोजन के साथ हुई षडयंत्रकारी राजनीति के आईने में जाति-धर्म-गरीबी के अटूट सम्बन्ध को भी रेखांकित करती है और उसके ख़िलाफ़ अपनी प्रतिरोधी आवाज़ बुलंद करती है.

(अनिता भारती कवि-कथाकार हैं.)