आम भारतीय की ज़बान में आज़ादी से पहले तक दिल्ली का राष्ट्रपति भवन ‘बड़े लाट की कोठी’ कहलाता था. लॉर्ड से बना था लाट या लाट-साहब. इस कोठी के दक्षिण दिशा की सड़क जिस भवन पर समाप्त होती थी, उसमें ब्रिटिश सेना के कमांडर-इन-चीफ़ का निवास था और इसे जंगी-लाट की कोठी कहा जाता था. आज़ादी के बाद यह कोठी तीन मूर्ति भवन के नाम से प्रधानमंत्री आवास और कार्यालय बनी और इसी भवन के लॉन में सन् 1957 की एक सुबह चाय पर पंडित जवाहर लाल नेहरू के मेहमान थे सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह.
मौसम और माहौल ख़ुशनुमा था, लेकिन मुलाक़ात का कारण गंभीर था.
आज़ादी के बाद के शुरुआती दशकों में जब मज़ाक़ में कहा जाता था कि कांग्रेस की टिकट पर पेड़ और खंभे की हैसियत भी चुनाव जीतने की हो जाती है, तब कांग्रेस पार्टी का प्रदेशाध्यक्ष चुनाव हार जाए तो ज़ाहिर है बहुत बड़ी घटना बनती थी.
नया मध्य प्रदेश राज्य बनते ही ऐसा हुआ था. वह भी सारंगढ़ की सीमा पर. इतना ही नहीं, परिस्थितियों ने राजा नरेशचंद्र सिंह को घटना के केंद्र में पहुंचा दिया था. यही घटना पंडित नेहरू और नरेशचंद्र सिंह के उस सुबह चाय पर हो रही मुलाक़ात का कारण थी.
दूसरा आम चुनाव और नए मध्य प्रदेश की पचहत्तर रियासतें
घटना 1957 में हुए दूसरे आम चुनाव की थी लेकिन पृष्ठभूमि पहले आम चुनाव में तैयार हो चुकी थी, इसलिए उसकी थोड़ी चर्चा ज़रूरी है.
नवंबर 1956 में अस्तित्व में आए नए मध्य प्रदेश में आधिकारिक रूप से पचहत्तर रियासतें शामिल थीं, लेकिन इनके अलावा अनेक क्षेत्र ऐसे भी थे जिन्हें अंग्रेज़ कभी ज़मींदारी का दर्जा देते और कभी राज्य का. और कभी छीन भी लेते. लेकिन वहां की जनता इन इलाक़ों को ‘राज’ ही कहती और मुखिया को ‘राजा’. इन मुखियाओं के पास वोट प्रभावित करने की अपार क्षमता थी. विशेषकर उन इलाक़ों में जहां ‘राजा’ (और बड़ी संख्या में वोटर) आदिवासी थे.
आज़ादी के बाद 1951-52 में जब पहली बार देश में आम चुनाव हुए, संयोग से ‘राजाओं’ या ज़मींदारों के ऐसे समूह में अनेक परिवार ऐसे थे, जिनमें मुखिया की उम्र पच्चीस साल से कम थी और वे चुनाव नहीं लड़ सकते थे. लेकिन उनके समर्थन से विजय पाना आसान हो सकता था. अन्य रियासती इलाक़ों की तरह इन स्थानों में कांग्रेस पार्टी के संगठन की जड़ें कमज़ोर थीं या पूरी तरह अनुपस्थित लेकिन पार्टी के प्रति आम जनता में सहानुभूति थी.
स्वाभाविक था शुरुआती आम चुनावों में किसी उम्मीदवार के लिए ऐसा क्षेत्र सर्वाधिक सुरक्षित माना गया, जहां दोनों फ़ैक्टर मौजूद हों. पुराने मध्य प्रदेश के छत्तीसगढ़ इलाक़े में ऐसे दो विधानसभा क्षेत्र थे – सरायपाली और भटगांव.
दोनों विधानसभा सभा क्षेत्र सारंगढ़ ‘राज्य’ की सीमा से सटे हुए थे. भटगांव सीट के अंतर्गत आने वाली एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली ज़मींदारी रही है बिलाईगढ़.
दो खेमों में बंटी कांग्रेस
इस पहले चुनाव में सरायपाली और बिलाईगढ़, दोनों राजपरिवारों में मुखियाओं की उम्र पच्चीस साल से कम होने के कारण उनकी ओर से कोई दावेदारी नहीं थी. 1951 के पहले आम चुनाव में मुख्यमंत्री पंडित रविशंकर शुक्ल ने अपने लिए सरायपाली सीट का और तत्कालीन प्रदेश अध्यक्ष महंत लक्ष्मीनारायण दास ने भटगांव का चयन किया.
दोनों नेता न केवल बड़े नेता थे बल्कि समय के साथ-साथ नई कांग्रेस पार्टी के भीतर के दो खेमों की धुरी भी बन चुके थे.
रियासतों के विलय के बाद छत्तीसगढ़ के राजाओं के प्रतिनिधि के रूप में राजा नरेशचंद्र सिंह को नागपुर राजधानी वाले पुराने मध्य प्रदेश की विधानसभा में मनोनीत कर मंत्री बनाया गया था. 1951 में वे भी अपना पहला चुनाव सारंगढ़ से लड़ रहे थे.
चुनाव परिणाम आशातीत रहे और कांग्रेस प्रत्याशी के रूप में तीनों अपना अपना चुनाव जीत गए.
1957 में होने वाले दूसरे आमचुनाव के निकट आने तक स्थिति बदल चुकी थी. भोपाल में राजधानी के साथ नया मध्य प्रदेश बन चुका था. इससे अधिक महत्वपूर्ण बात यह रही कि तब तक सरायपाली और बिलाईगढ़ राजपरिवारों के मुखियाओं ने पच्चीस वर्ष की आयु पूरी कर ली थी. राजा नरेशचंद्र सिंह इन युवा मुखियाओं के अघोषित अभिभावक थे.
सरायपाली के राजपरिवार के मुखिया कुमार वीरेंद्र बहादुर सिंह ने चुनाव लड़ने का फ़ैसला किया. चूंकि पंडित शुक्ल सरायपाली से पिछला चुनाव लड़ चुके थे, इसलिए राजा नरेशचंद्र सिंह की सलाह पर कुमार वीरेंद्र बहादुर सिंह ने वहां दावा छोड़ते हुए अपने लिनए सरायपाली से सटे हुए अन्य विधानसभा क्षेत्र बसना का चयन कर लिया.
भटगांव में प्रदेशाध्यक्ष महंत जी हार गए
सारंगढ़ के दूसरी ओर था भटगांव विधानसभा क्षेत्र. यहां भी स्थिति सरायपाली जैसी ही थी. फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि आत्मविश्वास से सराबोर पार्टी अध्यक्ष महंत लक्ष्मीनारायण दास ने अपनी टिकिट स्वयं तय करते समय इस बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ कर दिया था कि इस क्षेत्र में आने वाले बिलाईगढ़ के कुमार जितेंद्र विजय बहादुर सिंह पच्चीस के हो चुके हैं. इस युवक ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ने का फ़ैसला कर लिया.

चुनाव परिणाम घोषित हुए तो पता चला कि कांग्रेस के सारे उम्मीदवार तो जीत गए पर भटगांव में प्रदेशाध्यक्ष महंत जी हार गए हैं. यहां निर्दलीय कुमार जितेंद्र विजय बहादुर सिंह जीते थे.
पार्टी के अंदर बड़ा बवाल मचा. महंत जी के ख़ेमे ने यह स्वीकार करने से इनकार कर दिया कि वे चुनाव जनता की इच्छा से हारे हैं.
भारत में चुनाव शुरू होने के बाद की यह तब तक की सबसे बड़ी हार थी. षड्यंत्र की थ्योरी को सजाने कहानियां गढ़ी जाने लगीं. आरोप लगाया गया कि महंत जी को हराने के लिए एक साज़िश के तहत बिलाईगढ़ के कुमार को चुनाव में उतारा गया था. सबूत के तौर पर एक पत्र मुख्यमंत्री के सामने रखा गया.
आरोप लगाया गया कि जितेंद्र विजय बहादुर सिंह को संबोधित पत्र सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह ने लिखा है. इसमें लगभग निर्देशात्मक भाषा में कुमार को चुनाव लड़ने के लिए कहा गया था.
डॉ. कैलाशनाथ काट्जू को मुख्यमंत्री बने कुछ ही दिन हुए थे. राजा नरेशचंद्र सिंह उनके मंत्रिमंडल के सदस्य थे. डॉ़ काट्जू ने वह पत्र नरेशचंद्र सिंह के सामने रखा. नरेशचंद्र सिंह ने देखकर कहा- दस्तख़त तो मेरे ही लगते हैं, पर यह पत्र मैंने नहीं लिखा.
मुख्यमंत्री को धर्मसंकट की स्थिति में देख कर यह कहते हुए कि इस आरोप के साए में मैं काम नहीं कर पाऊंगा, उन्होंने अपना त्यागपत्र डॉ. काट्जू को सौंप दिया और सारंगढ़ वापस आ गए.
मुख्यमंत्री डॉ. काट्जू के लिए राजा नरेशचंद्र सिंह का त्यागपत्र समस्या का समाधान नहीं था. उन्होंने मामला पंडित नेहरू के सामने रखा. सारंगढ़ पहुंचते ही राजा नरेशचंद्र सिंह को पत्र मिला, जिसमें पंडित नेहरू ने उन्हें दिल्ली बुलाया था.

नरेशचंद्र सिंह और आनंद भवन का नाता
वे पहुंचे दिल्ली. भेंट के लिए सुबह सात बजे का समय तय हुआ था. अपनी युवावस्था में नरेशचंद्र सिंह अक्सर इलाहाबाद जाते और वहां लगभग हर रोज़ आनंद भवन जाते थे. यह बात नेहरू जानते थे, इसलिए वे जानना चाहते थे कि जितना नरेशचंद्र सिंह का इलाहाबाद आना होता था उतनी उन दोनों की भेंट क्यों नहीं होती थी.
राजा नरेशचंद्र सिंह का इलाहाबाद में डेरा होता था उनके पिता के घनिष्ठ मित्र और नेहरू के बहनोई रणजीत पंडित का निवास, जो नरेशचंद्र सिंह के लिए आनंद भवन आने-जाने के माध्यम थे. रणजीत पंडित का सख़्त निर्देश होता – मेरे साथ आनंद भवन चलना है तो सुबह छह बजे तैयार रहना.
चाय पीने के दौरान जब पंडित नेहरू ने इलाहाबाद में भेंट कम होने का कारण पूछा, तो नरेशचंद्र सिंह का उत्तर था – मैं जब भी आनंद भवन गया ऐसे समय गया जब आप या तो जेल में होते या टॉयलेट में, भेंट कैसे होती?
प्रदेशाध्यक्ष की हार का मामला गंभीर था. पराजित प्रत्याशी ने सीधे तौर पर सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह को कटघरे में खड़ा कर ‘प्रमाण’ भी पेश कर दिया था.

समस्या का कैनवस जितना दिख रहा था उससे कहीं बड़ा था. आज़ादी के बाद के सालों में कांग्रेस में अनेक विचारधारा के लोग शामिल थे. नेहरू सभी विचारधाराओं को सम्मानजनक स्थान देते हुए आगे बढ़ने का प्रयास कर रहे थे. फ़र्ज़ी हस्ताक्षर वाली घटना नेहरू के प्रयासों में विघ्न डालने का प्रयास था और राजा नरेशचंद्र सिंह क्रॉस-फायर के शिकार हुए हैं, यह बात पंडित नेहरू से बेहतर कौन जानता. लेकिन इस साज़िश का ख़ुलासा करना या इसे साबित करना एक चुनौती थी. आरोप के साए में काम करना राजा नरेशचंद्र सिंह को स्वीकार नहीं था और वे त्यागपत्र वापस लेने के लिए तैयार नहीं हुए.
उन दिनों पुलिस अधिकारी केएफ रुस्तम जी पंडित नेहरू के व्यक्तिगत सुरक्षा अधिकारी के रूप में काम कर रहे थे और छाया की तरह नेहरू के साथ रहते थे. सुबह की चाय पर हो रही उस बैठक के दौरान भी वे वहां थे.
मध्य प्रदेश कैडर के अधिकारी रुस्तम जी रायगढ़ में पुलिस अधीक्षक रह चुके थे और सारंगढ़ के राजा नरेशचंद्र सिंह के साथ उनके मित्रवत् संबंध थे. इस पूरे घटनाक्रम से वे वाक़िफ़ थे. ‘फ़र्ज़ी’ हस्ताक्षर वाला पत्र भी उन्होंने देखा. पत्र नेहरू के हाथ में था पर अंग्रेज़ी में टाइप किए गए इस पत्र का एक अक्षर रुस्तमजी की आंखों में चुभ रहा था.
उन दिनों टाइपराइटर आसानी से उपलब्ध नहीं थे. रायगढ़ के पुलिस अधीक्षक के कार्यालय में एक टाइपराइटर हुआ करता था जिसका एक अक्षर हमेशा टेढ़ा टाइप होता था और रायगढ़ में पदस्थापना के दौरान रुस्तमजी की नज़रों में चुभा करता था. वही टेढ़ा अक्षर रुस्तमजी को उनके रायगढ़ के दिनों की याद दिला रहा था.
ड्यूटी के दौरान सरकारी और राजनीतिक कामों से दूर रहने वाले रुस्तमजी ने पंडित नेहरू के सामने एक अप्रत्याशित सुझाव रखते हुए मामले को सुलझाने का ज़िम्मा मांगा. ज़िम्मा मिल गया और मामला सुलझते देर नहीं लगी. पत्र रायगढ़ के पुलिस अधीक्षक के ऑफ़िस में ही टाइप किया गया था. टाइप करने वाले और जाली हस्ताक्षर करने वाले कांग्रेस के दो स्थानीय नेताओं की पहचान हुई. संगठन के करीबी एक नेता तो कांग्रेस की टिकट पर चुनाव भी लड़ चुके थे.

इसके आगे राजनीतिक कार्यवाही की कमान कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष को सौंपी गई. सौराष्ट्र निवासी अध्यक्ष का पूरा नाम था उच्छंगराय नवलशंकर ढेबर. वे ढेबर भाई के नाम से जाने जाते थे. नवंबर 1957 में ढेबर भाई सारंगढ़ आए और राजा साहब को इस्तीफ़ा वापस लेने के लिए तैयार किया और ससम्मान साथ लेकर भोपाल गनए.
पार्टी की ओर से जाली हस्ताक्षर करने वालों पर कार्यवाही हुई. पुलिस कार्यवाही को पार्टी के नज़रिए से वांछित नहीं माना गया. लेकिन दोनों नए मोहरे थे. बड़े खिलाड़ी अछूते रहे. खेल जारी रहा. और महंत लक्ष्मी नारायण दास की हार का ‘बदला’ पांच साल के बाद नेहरू के अत्यंत करीबी समझे जाने वाले मुख्यमंत्री डॉ. कैलाशनाथ काट्जू की हार से सुनिश्चित कर लिया गया.
(लेखक इतिहास-प्रेमी हैं, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं.)
