जालंधर: ऐसे समय में जब रूस-यूक्रेन युद्ध में रूसी सेना में शामिल हुए कई भारतीय लापता हैं. इस बीच, कुछ भारतीय युवकों को जबरन अग्रिम मोर्चे (फ्रंटलाइन) पर भेजे जाने का एक और मामला सामने आया है.
स्टडी और बिजनेस वीजा पर मॉस्को गए सात लोगों के एक समूह ने बताया कि उन्हें एक तीसरे पक्ष के एजेंट ने धोखा दिया और 18 अगस्त, 2025 को रूसी सेना के एक शिविर में ले जाया गया, जहां उन्हें बंकर बनाने के लिए मजबूर किया गया.
उन्होंने बताया कि उन्हें कथित तौर पर यह वादा करके फुसलाया गया था कि मॉस्को के बाहर निर्माण कार्य में उन्हें 20 लाख रुपये प्रति माह दिए जाएंगे, जो तीन महीने के अनुबंध के लिए 80 लाख रुपये के बराबर है. हालांकि, वास्तव में यह रूसी सेना में भर्ती होने के लिए दी जाने वाली राशि है.
सेना के शिविर में फंसे इन युवकों ने वॉट्सऐप के जरिए द वायर के साथ अपने वीडियो शेयर किए और रूस में भारतीय दूतावास और विदेश मंत्री एस. जयशंकर से उनकी शीघ्र और सुरक्षित रिहाई सुनिश्चित करने की गुहार लगाई.
यूक्रेन के डोनेट्स्क क्षेत्र के सेलीडोव में रूसी सेना के शिविर में रह रहे इन सात व्यक्तियों की पहचान – पंजाब, जम्मू और हरियाणा के गुरसेवक सिंह, सचिन खजूरिया, सुमीत शर्मा, बूटा सिंह, गीतिक कुमार, अंकित और विजय सिंह के रूप में हुई है.
पंजाब के गुरदासपुर जिले के मेहता गांव के 26 वर्षीय गुरसेवक को रूसी समयानुसार बुधवार (10 सितंबर) सुबह लगभग 6 बजे फ्रंटलाइन पर ले जाया गया. उनकी पत्नी सुमन, जो वर्क वीज़ा पर मॉस्को में हैं, ने कहा कि उन्होंने दूतावास और विदेश मंत्रालय दोनों से संपर्क किया था, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई.
गुरसेवक ने स्टडी वीज़ा के लिए 3.5 लाख रुपये खर्च किए. अन्य लोगों ने भी लगभग इतनी ही राशि खर्च की. उन्होंने मंगलवार रात द वायर को बताया कि उनका वर्क वीज़ा 19 सितंबर, 2025 को समाप्त होने वाला है, लेकिन रूसी सेना के अधिकारी उनकी बात नहीं सुन रहे हैं.
उन्होंने कहा, ‘इससे पहले मैं दो साल के लिए दुबई में था, लेकिन सितंबर 2024 में स्टडी वीज़ा पर रूस चला गया. मैंने मॉस्को स्टेट लिंग्विस्टिक यूनिवर्सिटी, मॉस्को में एक वर्षीय रूसी भाषा पाठ्यक्रम में दाखिला लिया. चूंकि पढ़ाई के दौरान काम करने की योग्यता थी, इसलिए मैंने निर्माण स्थलों पर काम करना शुरू कर दिया, जिससे अच्छी कमाई होने लगी.’
‘एजेंट ने अच्छे वेतन का झांसा देकर फंसाया’
मॉस्को में एक निर्माण स्थल पर काम करते समय गुरसेवक और अन्य युवक एक महिला के संपर्क में आए, जिन्होंने उन्हें एक निर्माण स्थल पर काम करने के लिए 20 लाख रुपये मासिक वेतन का वादा किया और मॉस्को के शेरेमेत्येवो हवाई अड्डे से चिलिमनी तक के उनके हवाई टिकट की व्यवस्था की.
उन्होंने कहा, ‘उस महिला ने हमें बताया कि यह एक रूसी सरकारी साइट है, जहां हमें निर्माण मज़दूरों के रूप में काम पर रखा जाएगा. हम ऊंची तनख्वाह के जाल में फंस गए और सोचा कि यह एक अच्छा सौदा है. हम सभी साधारण पृष्ठभूमि से हैं और हमें लगा कि बेहतर कमाई के लिए मॉस्को से बाहर जाना एक अच्छा विचार है.’
हालांकि, वहां पहुंचते ही युवाओं को रूसी सेना के शिविर में ले जाया गया, जहां रूसी सेना के अधिकारियों ने उन्हें 15 दिनों का बुनियादी प्रशिक्षण दिया और उन्हें युद्ध के मोर्चे पर भेजना शुरू कर दिया.
उन्होंने दावा किया, ‘रूसी सेना के अधिकारियों ने हमें पिस्तौल दिखाकर धमकाया और रूसी भाषा में अनुबंध पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया. अगर हमने इनकार किया, तो उन्होंने कहा कि हमें मार दिया जाएगा.’
गुरसेवक के अनुसार, वे 15 लोगों के समूह में आए थे, जिनमें से पांच युवाओं की कथित तौर पर युद्ध के मोर्चे पर मौत हो गई. पिछले कुछ दिनों में तीन युवाओं को सीमा पर भेजा गया है, जबकि वह 10 सितंबर, 2025 की सुबह रवाना हुए.
गुरसेवक की पत्नी सुमन ने रोते हुए कहा, ‘मेरे पति को युद्ध में भेज दिया गया है, जबकि मैं मॉस्को में अकेली रह रही हूं. मेरी मां का दो दिन पहले निधन हो गया और मैं उनके अंतिम संस्कार के लिए भारत भी नहीं जा सकती. हम एक साधारण परिवार से हैं और अच्छी कमाई के लिए इस नौकरी का जोखिम उठाया था. लेकिन हमें नहीं पता था कि रूसी एजेंट ने उन्हें फंसा लिया है.’
जम्मू निवासी एक अन्य युवक, सुमीत शर्मा (22), जो स्टडी वीज़ा पर रूस गए थे, ने रूसी एजेंट पर उन्हें गुमराह करने का आरोप लगाया है.
उन्होंने कहा, ‘शुरुआत में हम रेस्टोरेंट में काम करते थे, लेकिन निर्माण कार्य में बेहतर कमाई देखकर हमने वहां काम करना शुरू कर दिया. यहीं हमारी मुलाकात एक रूसी महिला से हुई, जिन्होंने हमें बेहतर पैसे और सुविधाओं के नाम पर गुमराह किया.’
शर्मा, जो एमएसएलयू विश्वविद्यालय में भी नामांकित हैं, ने कहा कि जब युवा चिलिमनी पहुंचे तो उन्हें बताया गया कि वे रूसी सेना के लिए बंकरों का निर्माण करेंगे.
उन्होंने आगे कहा, ‘शिविर अधिकारियों ने शुरू में हमें आश्वासन दिया था कि हमें युद्ध मोर्चे पर नहीं ले जाया जाएगा. कुछ ही दिनों में उन्होंने हम पर सेना में शामिल होने के लिए दबाव बनाना शुरू कर दिया. जब हमने इनकार किया, तो उन्होंने हमें रूसी भाषा में हस्ताक्षरित अनुबंध दिखाए. उन्होंने हमें धमकी दी कि अगर हम भागने या युद्ध में जाने से इनकार करेंगे तो वे हमें मार डालेंगे. मॉस्को में हमारे दोस्त भारतीय दूतावास गए, लेकिन उनकी गुहार पर कोई ध्यान नहीं दिया गया.’
सुमित ने आगे बताया कि उन्होंने कैंप में 30 से ज़्यादा भारतीयों को देखा, जिनमें से कई को अग्रिम मोर्चे पर भेज दिया गया और वे कभी वापस नहीं लौटे. उन्होंने कहा, ‘अब हम में से सिर्फ़ छह ही बचे हैं. हमने नेपाल, वियतनाम और बांग्लादेश के लोगों को भी वहां फंसा हुआ देखा.’
शर्मा के रिश्तेदार सचिन खजूरिया, जो जम्मू के ही रहने वाले हैं, ने कहा कि उनके साथ भी धोखा हुआ है.
उन्होंने कहा, ‘मैं एक रेस्टोरेंट में काम करता था, लेकिन ज़्यादा पैसे कमाने के ख्याल से निर्माण कार्य में लग गया. पहले रूसी सेना खुद विदेशी नागरिकों को नौकरी पर रखती थी. अब, तीसरे पक्ष के एजेंट इसमें शामिल हैं. हमें बाद में पता चला कि कई लोगों को कभी वेतन ही नहीं मिला. मेरे माता-पिता मेरी स्थिति के बारे में नहीं जानते. अगर उन्हें पता होता, तो वे बहुत दुखी होते.’
इस बीच, हरियाणा के फतेहाबाद के 24 वर्षीय विजय शर्मा ने बताया कि उनके परिवार ने मदद के लिए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी से संपर्क किया है.
उन्होंने द वायर को बताया, ‘मुख्यमंत्री ने मेरे माता-पिता को आश्वासन दिया है कि वह विदेश मंत्री एस. जयशंकर से बात करेंगे, लेकिन हमें नहीं पता कि आगे क्या होगा.’
विजय की यह दूसरी रूस यात्रा थी. इससे पहले वह एक साल के स्टडी वीज़ा पर रूस आए थे और वापस स्वदेश लौट गए थे. 15 जुलाई को वह बिज़नेस वीज़ा पर फिर से रूस आए.
उन्होंने भावुक होकर कहा, ‘मैं अभी बसने की कोशिश ही कर रहा था कि मुझे धोखे से सेना में भर्ती कर लिया गया. जैसे ही हम चिलिमनी पहुंचे, एजेंट ने हमारे फ़ोन उठाने बंद कर दिए. हमारे पास हमारा हाल पूछने वाला कोई नहीं था.’
ज़्यादातर लोगों ने कहा कि उन्हें रूस-यूक्रेन युद्ध की पूरी स्थिति के बारे में पता ही नहीं था, क्योंकि मॉस्को और सेंट पीटर्सबर्ग में ज़िंदगी सामान्य लग रही थी.
उनमें से एक ने उनकी जल्द रिहाई की गुहार लगाते हुए कहा, ‘रूसी एजेंट कम पढ़े-लिखे और आर्थिक रूप से कमज़ोर युवाओं को निशाना बना रहे हैं. गुरसेवक की मां मुझे उसके बारे में खबर लेने के लिए फ़ोन करती रहती हैं. मुझे नहीं पता कि उसे कैसे बताऊं कि उन्हें मोर्चे पर भेज दिया गया है.’
अपनों की तलाश में गए थे रूस
गौरतलब है कि इस साल की शुरुआत में तीन युवकों – जालंधर, पंजाब के जगदीप कुमार और उत्तर प्रदेश के अजय यादव और आजमुद्दीन खान के परिवार युद्ध में दो साल से लापता अपने रिश्तेदारों की तलाश में रूस गए थे.
उनकी यात्रा के बाद विदेश मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने द वायर को बताया कि संघर्ष में 18 भारतीय अभी भी लापता हैं और उनका पता लगाने के प्रयास जारी हैं.
जगदीप कुमार ने कहा, ‘हम फिर से रूस जाने की योजना बना रहे हैं और अपनी यात्रा के बारे में विदेश मंत्रालय को पहले ही सूचित कर चुके हैं.’
इसी बीच, सोमवार (11 सितंबर) को विदेश मंत्रालय ने एक बयान जारी कर भारतीयों से रूसी सेना में शामिल होने के किसी भी प्रस्ताव से दूर रहने का आग्रह किया.
बयना में कहा, ‘हमने हाल ही में रूसी सेना में भारतीय नागरिकों की भर्ती के बारे में रिपोर्ट देखी हैं. सरकार ने पिछले एक साल में कई मौकों पर इस तरह की कार्रवाई में निहित जोखिमों और खतरों से अगाह किया है और भारतीय नागरिकों को आगाह किया है.’
विदेश मंत्रालय ने कहा, ‘हमने दिल्ली और मॉस्को दोनों जगहों पर रूसी अधिकारियों के साथ इस मामले को उठाया है और अनुरोध किया है कि इस प्रथा को समाप्त किया जाए और हमारे नागरिकों को रिहा किया जाए.’
बयान में आगे कहा गया, ‘हम प्रभावित भारतीय नागरिकों के परिवारों के संपर्क में हैं. हम एक बार फिर सभी भारतीय नागरिकों से आग्रह करते हैं कि वे रूसी सेना में शामिल होने के किसी भी प्रस्ताव से दूर रहें क्योंकि यह ख़तरों से भरा है.’
(इस रिपोर्ट को अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)
