नेपाल की राजनीति किसी सीधे रास्ते पर नहीं चलती. यह हर मोड़ पर उम्मीद जगाती है और फिर अधूरी रह जाती है. राणा शासन का अंत, 1990 का जनआंदोलन, माओवादी संघर्ष, राजशाही का पतन और 2015 का संविधान, हर घटना जनता को एक नई सुबह का भरोसा देती रही, लेकिन हर सुबह अधूरी साबित हुई.
सितंबर 2025 में केपी शर्मा ओली की विदाई उसी लम्बी कड़ी का ताजा अध्याय है. और इसी अशांत पृष्ठभूमि में सामने आया एक नाम सुशीला कार्की. नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश, और अब अंतरिम प्रधानमंत्री. यह नियुक्ति संवैधानिक उपाय के साथ एक थकी हुई राजनीति के बीच नैतिक आग्रह की वापसी भी है.
नेपाल: भूगोल, इतिहास और अधूरी यात्राएं
नेपाल हिमालय की ऊंची चोटियों और गंगा के उपजाऊ मैदानी इलाकों के बीच बसा एक ऐसा देश है, जो भले ही आकार में छोटा है, लेकिन इतिहास की करवटों और राजनीतिक उथल-पुथल का हिस्सा रहा है. इसकी राजनीति हमेशा आंतरिक आकांक्षाओं और बाहरी दबावों के बीच झूलती रही है. भारत और चीन की कूटनीतिक छाया में नेपाल ने लोकतंत्र का मार्ग अपनाया, लेकिन सत्ता-संघर्ष, सामाजिक असमानताएं और संस्थागत कमजोरी इसे कुतरती रहीं. प्रत्येक प्रयास ने कुछ परिवर्तन लाए, लेकिन स्थायित्व और विश्वास स्थापित करना करना चुनौतीपूर्ण रहा.
नेपाल और भारत का संबंध केवल सीमाओं या भूगोल तक सीमित नहीं है. मिथिला की प्राचीन परंपराएं, उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, वाराणसी का ज्ञान और संस्कृति, और काठमांडू की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत मिलकर इसे एक साझा सांस्कृतिक और ऐतिहासिक भूगोल बनाती हैं. यह साझा विरासत शिक्षा, राजनीति और साहित्य में भी स्पष्ट रूप से झलकती है. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय ने बीपी कोइराला, गिरिजाप्रसाद कोइराला, मातृका प्रसाद कोइराला, सुशील कोइराला, मनमोहन अधिकारी जैसे नेपाल के दूरदर्शी नेताओं को शिक्षा दी, जिन्होंने नेपाल में लोकतंत्र, न्याय और समाज की समझ को न केवल गहरा किया, बल्कि एक समृद्ध शैक्षणिक और राजनीतिक परिवेश का निर्माण भी किया.
इसी शृंखला में सुशीला कार्की भी आती हैं. उनकी शिक्षा और संवैधानिक प्रशिक्षण ने उन्हें न्याय और संवैधानिक मर्यादा की समझ दी है. नेपाल के इतिहास, भूगोल और सांस्कृतिक-सामाजिक परिवेश को समझे बिना उनके नेतृत्व और देश की वर्तमान राजनीति का महत्व पूरी तरह नहीं समझा जा सकता.
ओली का पतन: असफलताओं का बोझ
केपी शर्मा ओली को कभी आधुनिक नेपाल का राष्ट्रवादी चेहरा कहा गया था. लेकिन समय के साथ उनका नेतृत्व जनता की आकांक्षाओं से दूर होता चला गया. संसद को दो बार असंवैधानिक रूप से भंग करना, न्यायपालिका को कमजोर करने की कोशिश, और क्षेत्रीय असमानताओं को नज़रअंदाज़ करना, इन सबने उन्हें अविश्वसनीय बना दिया.
मधेस और जनजातीय समुदायों की मांगों पर उन्होंने ध्यान नहीं दिया. भ्रष्टाचार के आरोप लगातार बढ़ते गए. शुरुआत में जो लोकप्रियता उन्हें सीमा विवाद पर मिली थी, वह धीरे-धीरे अविश्वास और आक्रोश में बदल गई. 2025 तक जनता और राजनीतिक सहयोगियों का धैर्य टूट चुका था. उनका इस्तीफ़ा व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि एक व्यवस्था का संकेत था कि अब वह उन्हें सहने को तैयार नहीं.
ओली की केंद्रीयकृत नेतृत्व शैली और अधिनायकवादी रुख ने राजनीतिक गठबंधनों को कमजोर कर दिया. विपक्षी दलों और अंदरूनी सहयोगियों के साथ संवाद की कमी ने न केवल संसद की कार्यप्रणाली पर दबाव डाला बल्कि नीति निर्माण में भी जटिलताएं बढ़ाईं. उनके निर्णय अक्सर तात्कालिक लोकप्रियता पर आधारित दिखाई दिए, जिससे दीर्घकालिक स्थिरता की नींव कमजोर हुई. जनता की अपेक्षाएं और राजनीतिक समझदारी के बीच यह फ़ासला बढ़ता गया, और ओली का पतन अपरिहार्य हो गया.
सुशीला कार्की: उम्मीद और संदेह का चेहरा
सुशीला कार्की ने 2016 में नेपाल की पहली महिला मुख्य न्यायाधीश के रूप में इतिहास रचा. भ्रष्टाचार के मामलों में उनकी सख्ती और कार्यपालिका के दबाव के सामने अडिग रहने की क्षमता ने उन्हें विशिष्ट बना दिया. अब जब वे अंतरिम प्रधानमंत्री बनी हैं, उनकी छवि न्याय और नैतिकता की प्रतीक के रूप में जनता को भरोसा देती है.
लेकिन यह पद केवल सम्मान का नहीं, चुनौतियों का भी है. न्यायपालिका में फैसले सुनाने का अनुभव राजनीति में समझौतों और संतुलन बनाने में सीधे काम नहीं आता. उन्हें इस नाजुक संतुलन को साधना होगा. उनकी निष्पक्ष छवि जनता की उम्मीदों की प्रतीक है, लेकिन राजनीति की जटिलताओं में वह लगातार परखी जाएगी. ये उम्मीदें जितनी ताक़त देती हैं, उतनी ही दबाव भी बनती हैं और यही उनका सबसे बड़ा परीक्षण है.
अधूरी क्रांतियों की परंपरा
नेपाल को समझना उसके आंदोलनों और राजनीतिक परिवर्तनों को समझे बिना संभव नहीं है. यह सिर्फ एक पड़ोसी देश नहीं है, बल्कि दक्षिण एशिया में लोकतंत्र और सामाजिक-सांस्कृतिक विविधताओं को समझने का महत्वपूर्ण संदर्भ है.
इन अनुभवों से स्पष्ट होता है कि लोकतंत्र केवल बहुमत और सत्ता पर टिकता नहीं है. इसके लिए न्याय, पारदर्शिता और नैतिक नेतृत्व की मजबूती आवश्यक है. नेपाल की राजनीति को समझकर हम इसके आंतरिक संघर्षों के साथ-साथ दक्षिण एशिया में लोकतंत्र, सामाजिक समावेशन और संस्थागत भरोसे की चुनौतियों और संभावनाओं का भी विश्लेषण कर सकते हैं.
नेपाल का लोकतंत्र हमेशा अधूरी क्रांतियों के बीच से गुज़रता रहा है. 1951 में राणा शासन का अंत हुआ, जिसने लोकतंत्र की राह खोली, लेकिन राजशाही की सत्ता अब भी मजबूत बनी रही. लोकतंत्र की जड़ें कमजोर रहीं और राजनीतिक प्रक्रिया अक्सर अधूरी ही रही.
1960 में राजा महेंद्र ने राजनीतिक दलों को समाप्त कर पंचायती व्यवस्था लागू की. इसे ‘पार्टीविहीन लोकतंत्र’ कहा गया, पर यह केंद्रीकृत और अधिनायकवादी शासन था, जिसने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया और राजनीतिक संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला.
1990 का जनआंदोलन बहुदलीय लोकतंत्र को पुनः स्थापित करने में सफल रहा. जनता ने नए लोकतंत्र में उम्मीदें जगाईं, लेकिन दलगत कलह और भ्रष्टाचार ने भरोसे को कमजोर किया. सत्ता की होड़ और अवसरवादिता ने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की नींव हिला दी.
1996 से 2006 तक माओवादी संघर्ष ने देश में गहरा संकट पैदा किया. इस संघर्ष में 17,000 से अधिक लोग मारे गए और हजारों लोग विस्थापित हुए. शांति समझौते के बाद भी न्याय और समावेशन के सवाल अधूरे रहे, जिससे सामाजिक और राजनीतिक असमानताएं बनी रहीं.
2008 में नेपाल गणराज्य बना, लेकिन संविधान लागू करने की प्रक्रिया बार-बार लंबी और विवादास्पद रही. 2015 में नया संविधान आया, लेकिन मधेस और हाशियाई समुदायों की मांगों को पर्याप्त रूप से स्वीकार नहीं किया गया. इस तरह नेपाल का लोकतंत्र लगातार अधूरी क्रांतियों और अपूर्ण बदलावों की लंबी यात्रा से गुज़रता रहा है.
नेपाल की अधूरी क्रांतियां उसकी राजनीतिक विरासत को आकार देती हैं. यह याद दिलाती हैं कि लोकतंत्र की स्थिरता और विकास के लिए न्याय, पारदर्शिता और नैतिक नेतृत्व अनिवार्य हैं.
दक्षिण एशियाई परिप्रेक्ष्य
नेपाल की राजनीति केवल काठमांडू की गलियों तक सीमित नहीं है. यह पूरे दक्षिण एशिया के राजनीतिक ताने-बाने से गहराई से जुड़ी हुई है. इस क्षेत्र के देश अक्सर लोकतंत्र, सेना, और सत्ता संतुलन के संघर्ष में उलझे रहते हैं. पाकिस्तान में सैन्य छाया का दबदबा, बांग्लादेश में विवादित चुनाव, श्रीलंका में आर्थिक और राजनीतिक संकट—ये सभी दिखाते हैं कि लोकतांत्रिक संस्थाएं आसानी से स्थिर नहीं रहतीं.
ऐसे परिप्रेक्ष्य में नेपाल का अनुभव विशिष्ट है. सुशीला कार्की के नेतृत्व में देश यह परीक्षा ले रहा है कि नैतिकता, पारदर्शिता और संस्थागत भरोसा राजनीतिक स्थिरता की नींव बन सकते हैं. यह केवल सत्ता का हस्तांतरण नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि लोकतंत्र में बहुमत और शक्ति के साथ-साथ न्याय और नैतिक नेतृत्व भी निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं. यदि यह प्रयोग सफल होता है, तो यह नेपाल के लिए ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया के लिए प्रेरक मॉडल साबित हो सकता है.
उम्मीद और आशंका के बीच
नेपाल आज एक नाजुक मोड़ पर है. सुशीला कार्की के पास चमत्कार करने का समय नहीं है, पर उनके पास एक नैतिक पूंजी है जो किसी भी दलगत नेता के पास नहीं. मार्च 2026 तक उन्हें केवल चुनाव कराना है, संस्थाओं की विश्वसनीयता बहाल करनी है और यह दिखाना है कि राजनीति अब भी ईमानदारी से चल सकती है.
उनका नेतृत्व छोटा होगा, पर असर स्थायी हो सकता है. अगर वे निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव करा पाती हैं, तो यह केवल उनकी नहीं, पूरे नेपाल की जीत होगी. लोकतंत्र का भविष्य नेताओं पर नहीं, संस्थाओं पर टिका है. और यही उनकी सबसे बड़ी चुनौती है, संस्थाओं में जनता का विश्वास वापस लाना.
नेपाल का लोकतंत्र बार-बार टूटा है, लेकिन हर टूटन में जनता की आवाज़ फिर उठी है. सुशीला कार्की उस आवाज़ की ताज़ा प्रतिध्वनि हैं. क्या उनका कार्यकाल साबित कर पायेगा कि अधूरी क्रांतियों की इस लंबी यात्रा में उम्मीद की लौ अब भी जल रही है?
(आशुतोष कुमार ठाकुर मधुबनी–जनकपुर के सीमांत से आते हैं. वे साहित्य–संस्कृति पर नियमित लिखते हैं.)
