यह अंश द्रविड़ आंदोलन के प्रमुख चिंतक ई.वी. रामासामी ‘पेरियार’ की वैचारिक विरासत को समझने में मदद करता है. राजकमल प्रकाशन से छपी पुस्तक ‘धर्म और विश्वदृष्टि’ में संकलित यह लेख पेरियार की तर्कप्रधान, मानवतावादी और धर्म-विरोधी सोच को स्पष्ट रूप से सामने रखता है. पेरियार धर्म को सत्ता, भय और दासता का औज़ार मानते थे और बुद्धि, समानता व स्वतंत्रता को लोकतांत्रिक समाज की आधारशिला मानते थे. 1969 में विदुथलई में प्रकाशित यह संपादकीय आज भी धर्म, राज्य और समाज के रिश्तों पर गहन सवाल खड़े करता है.
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किसी भी देशभक्त अथवा मानवतावादी सरकार, लोकसेवा संस्थान अथवा सामाजिक चेतना सम्पन्न व्यक्ति का सबसे अहम दायित्व है—देश के लोगोंं को बुद्धिमान बनाना और उनमें तार्किक विचार को जन्म देना. निश्चित रूप से ऐसे प्रयास किए जाने चाहिए; ताकि लोगों का जीवन स्तर सुधर सके. उनको चिन्ताओं और दिक्कतों से मुक्ति मिल सके और आर्थिक और सामाजिक समता कायम हो सके. इन गुणों से युक्त राज्य को ही सही मायनों में एक मुक्त राज्य कहा जा सकता है. अगर ये बातें उसमें मौजूद नहीं हैं, तो राज्य बस एक जेल बनकर रह जाएगा. ऐसा समाज दासों का समाज होगा.
आमतौर पर राजाओं द्वारा शासित राज्य और समाज अपनी अलग तरह की दिशा तय करते हैं. ऐसे शासक धर्म और धार्मिक सिद्धान्तों को शासन का आधार बनाते हैं. बहरहाल, एक लोकतांत्रिक राज्य का आधार बुद्धिमत्ता और स्वतंत्रता को होना चाहिए. धर्म और धर्म-शास्त्र के निर्माण का एकमात्र उद्देश्य बौद्धिकता और आजादी को नष्ट करना और लोगों को मूर्ख और दास बनाना है. यह उस समय चलन में आया, जब मनुष्य आदिम अवस्था में रहा करता था; कमोबेश जानवरों की तरह. जिस प्रकार लोग भूत-प्रेत और आत्माओं से भयभीत रहते थे, ठीक वही डर धर्म और धार्मिक शास्त्र भी पैदा करते थे.
हालांकि, धर्म और धर्म-सिद्धान्तों में ईश्वर ही प्राथमिक शक्ति था; लेकिन हमें यह कहना होगा कि ईश्वर और धार्मिक लेखन और शास्त्र की अवधारणा प्राय: विपरीत थी. ऐसा इसलिए, क्योंकि ईश्वर की अवधारणा की शुरुआत अज्ञानता से हुई. धर्म और धर्म लेखों का उद्भव बेईमानी से हुआ. यानी लोगों को बेवकूफ बनाने और उनको दास बनाने के इरादे से इनकी शुरुआत हुई. दुनिया भर के बुद्धिमान लोगों ने इसका समर्थन किया; खासतौर पर पश्चिम के जाने-माने विद्वानों ने.
उन्होंने कहा—‘आप ईश्वर की अवधारणा रचने वाले व्यक्ति को माफ कर सकते हैं; वह मूर्ख था. वह अपनी बौद्धिक अक्षमता की वजह से ऐसा विचार तैयार करने पर मजबूर हुआ. लेकिन, धर्म और धर्म शास्त्र (आत्मा, स्वर्ग, नर्क) आदि का निर्माण करने वाला व्यक्ति ईमानदार नहीं रहा होगा. उसने ऐसा केवल लोगों को भयभीत करने के लिए किया.’ ईश्वर का निर्माण करने वाले व्यक्ति का इस बात पर जोर था कि कोई-न-कोई ऐसी शक्ति है, जिसने यह विश्व और इसकी व्यवस्था निर्मित की होगी. उसने ईश्वर के अस्तित्व को सन्देह का लाभ दिया.
लेकिन, धर्म और धर्म-शास्त्र के साथ यह बात नहीं है. यह एक पूर्ण झूठ है; जिसका निर्माण लोगों को धोखा देने और उनका शोषण करने के लिए, उनके बीच भेद उत्पन्न करने के लिए किया गया. धर्म और धर्म-सिद्धान्तों की रचना इसी उद्देश्य से की गई. इसका सबसे बड़ा सबूत यही है कि दुनिया में अलग-अलग तरह के धर्म और धर्म-शास्त्र हैं और वे सभी एक-दूसरे से विरोधाभासी हैं. दूसरा सबूत यह है कि इसके रचयिता मानवीय प्रकृति से ऊपर प्रतीत होते हैं और हिन्दू-धर्म के शास्त्र प्राकृतिक कानूनों से विरोधाभासी हैं.
ये न केवल हमारी बौद्धिकता को नष्ट करते हैं, बल्कि हमारे चरित्र को भी क्षति पहुँचाते हैं. इनकी वजह से हमारी ईमानदारी, प्रेम, एकता, समता आदि सभी प्रभावित होते हैं. हमारे विकास पर असर पड़ता है; विज्ञान को नुकसान पहुँचता है और अज्ञानता को बढ़ावा मिलता है. हम इन सब बातों के खिलाफ हैं. आपको ये सारी बातें समझने के लिए बहुत दूर जाने की आवश्यकता नहीं है. इनका उत्तर तो अपने धर्म और उसके सिद्धान्तों का विश्लेषण करके ही मिल जाएगा.
यह विचार दीगर है कि हम तमिलों (द्रविड़ों) का कोई देवता है भी या नहीं. लेकिन, हम हिन्दू-धर्म को अपना धर्म मानते रहे हैं. यह अपने आप में एक बहुत बड़ी चूक है. ऐसा क्यों आखिर हिन्दू-धर्म है क्या? इसका अर्थ क्या है? धर्म शब्द की बात करें, तो इस्लाम अथवा ईसाइयत के गुणों के आधार पर पहचान करें, तो क्या इसका कोई आदर्श, कोई प्राधिकार या कोई इतिहास है? क्या हिन्दुत्व का कोई उल्लिखित सिद्धान्त है या इसे लेकर कोई लेखन-कर्म किया गया है? ब्राह्मण कहते हैं कि हिन्दू-धर्म वैदिक-धर्म है. ब्राह्मण खुद को आर्य बताते हैं. ऐसे में वे अपने धर्म को भी आर्य धर्म बताते हैं. अंग्रेजी के शब्दकोशों में हिदू-धर्म को ब्राह्मणों का धर्म बताया गया है. यह एक गैर-ईसाई, गैर-मुस्लिम धर्म है.
इसकी और अधिक व्याख्या करने की आवश्यकता है. लेकिन, मैं इसे संक्षेप में कहूँगा. हिन्दू-धर्म का पूरा ब्यौरा वेदों, शास्त्रों और पुराणों में मिलता है. उसके इतिहास में अतीत के कुछ ऐतिहासिक और कुछ मिथकीय किस्से जुड़े हैं. इस धर्म के मुताबिक, हम चौथी और पाँचवीं जाति में आते हैं. इस हिसाब से हमें उपरोक्त ग्रंथों को पढ़ने तक की इजाजत नहीं है.
वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास आदि सभी ने हमारे लोगों को नीचा दिखाया है. हमें बेईमान के रूप में चित्रित किया गया और कई तरह से हमें अपमानित किया गया. इसीलिए हम कहते हैं कि ईश्वर, धर्म, धर्म-सिद्धान्त, पुराणों और इतिहास आदि में भरोसा समाप्त करना होगा.
(विदुथलई, सम्पादकीय-17.12.1969)
(अंग्रेजी से अनुवाद : पूजा सिंह)
