अंतिमा: कविता और चित्र की संगति, एक भारतीय दृष्टि की तलाश

रज़ा के लिए बिंदु किसी जपमाला की तरह था. जैसे जप करने वाला बार-बार एक ही बिंदु को मन में दोहराकर उदात्त चेतना हासिल करता है, उसी प्रकार रज़ा बिंदु के प्रयोग से चित्रों के भीतर उदात्तता महसूस करते हैं.

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‘अंतिमा: द लास्ट आर्ट ऑफ रज़ा’ में संकलित लेख इंगित करते हैं कि आधुनिक चित्रकला में अमूर्तन और भारतीय दर्शन के मिश्रण ने रज़ा के चित्रों को एक नई ज़मीन दी. (साभार: स्पीकिंग टाइगर)

सैयद हैदर रज़ा (1922-2016) आधुनिक भारत के विश्वप्रसिद्ध चित्रकार हैं. मध्य प्रदेश में जन्मे रज़ा ने चित्रकला की आरंभिक शिक्षा मुंबई (तब बम्बई) में ली. उसी दौरान उन्हें महसूस हुआ कि यदि कुछ सीखना है तो पेरिस जाना होगा और वे 1950 में पेरिस चले गए. वे वहां 60 वर्ष रहे और चित्रकला में अंतरराष्ट्रीय ख्याति अर्जित की. हालांकि उन्होंने भारतीय नागरिकता का त्याग नहीं किया और 2010 में लगभग 90 वर्ष की अवस्था में फ्रांस को छोड़कर दिल्ली में स्थायी रूप से रहने के लिए आ गए.

दिल्ली में रहते हुए उन्होंने लगभग साढ़े पांच वर्षों में तक़रीबन 600 चित्र बनाए. इस काल में उनके द्वारा बनाए गए कुछ चित्रों की प्रदर्शनी दिल्ली में 12 से 22 फरवरी 2025 को आयोजित भी हुई थी. इसका शीर्षक था, ‘अंतिमा: द लास्ट आर्ट ऑफ रज़ा’. दिल्ली निवास के दौरान रज़ा साहब द्वारा निर्मित इन्हीं चित्रों पर कुछ आलेखों का संकलन हाल ही ‘स्पीकिंग टाइगर’ से प्रकाशित हुआ है जिसका संपादन वरिष्ठ कवि और रज़ा फाउंडेशन के प्रबंध न्यासी अशोक वाजपेयी ने किया है.

सैयद हैदर रज़ा. (फोटो साभार: रज़ा फाउंडेशन)

किताब में उदयन वाजपेयी, वंदना कालरा, अर्चना खरे घोष, यशोधरा डालमिया, उमा नायर और अशोक वाजपेयी के लेख शामिल हैं. इस किताब की एक विशेषता यह है कि जिन चित्रों का संदर्भ उपर्युक्त आलेखों में आया है, वे लगभग सारे के सारे इसमें दिए गए हैं. इससे पाठकों को न केवल आलेखों को समझने में सुविधा होती है बल्कि रज़ा साहब की चित्रकला के विभिन्न आयामों का भी साक्षात्कार होता है.

मोटे तौर पर रज़ा की चित्रकला के दो दौर किए जा सकते हैं. 1962 के पहले और फिर उसके बाद.  यशोधरा डालमिया ने रज़ा की जीवनी लिखी है. अर्चना खरे घोष ने इसमें वर्णित एक प्रसंग का उल्लेख किया है जिससे यह पता चलता है कि रज़ा 1962 में अपनी फ्रांसीसी पत्नी जानीन के साथ अमेरिका के विख्यात ‘यूनिवर्सिटी ऑफ कैलीफोर्निया, बर्कले’ में पढ़ाने के लिए जाते हैं. बाद में वहीं उनको प्रतिष्ठित ‘रॉकफेलर फाउंडेशन फेलोशिप’ भी मिलती है.

इसी दौरान अमेरिकी कला समीक्षक हेस ने उनके चित्रों पर टिप्पणी करते हुए कहा: ‘बहुत अधिक फ्रांसीसी’!

रज़ा उस वक्त तो उसे रक्षात्मक रूप से स्वीकार कर लेते हैं पर उन्हें लगता है कि वे चित्रकला की फ्रांसीसी शैली के मात्र अनुकर्ता बनकर रह गए हैं. यही वह क्षण है जब वे भारत की विशाल विविधता और इसकी दार्शनिकता की ओर ध्यान देने लगते हैं. दिल्ली लौटकर उनके द्वारा बनाए गए चित्रों में यह लगातार बढ़ते क्रम में चित्रित होता जाता है.

रज़ा की कृतियां.

रज़ा जिस भारत में जन्म लेते हैं और जवान होते हैं, वह भारत बहुलता, बहुभाषिकता एवं धार्मिक विविधता से ओत-प्रोत था. रज़ा विभाजन के बाद पाकिस्तान जाना स्वीकार नहीं करते हैं. रज़ा का एक चित्रकार और एक व्यक्ति के रूप में जिस तरह से विकास होता है, वह एक व्यापक मनुष्यता के प्रतिमान के तौर पर भी देखा जा सकता है. जन्म से वे मुसलमान थे, भारत में रहने के कारण हिंदू परंपराओं से उन का बहुत गहरा परिचय था और बाद में पेरिस में रहने तथा फ्रांसीसी स्त्री को जीवन-साथी के रूप में चुनने के फलस्वरूप वे ईसाई परंपराओं से भी परिचित हुए. पर वे बार-बार भारत की ओर लौटते हैं.

 वे 1980 के आसपास से अपने चित्रों के शीर्षक देवनागरी में हिंदी में देने लगते हैं. यह सिलसिला अंत तक चलता है. हालांकि इसमें एक दिलचस्प मोड़ दिल्ली निवास के दौरान घटित होता है. वे अपने चित्रों के शीर्षक हिंदी में देने की जिम्मेदारी अशोक वाजपेयी को देते हैं. अशोक जी ने इसका रोचक वर्णन अपने लेख किया है. अशोक जी और रज़ा दोनों घंटों एक चित्र के शीर्षक पर विचार करते थे फिर रज़ा की सहमति से नाम पर अंतिम मुहर लगती थी.

‘अंतिमा: द लास्ट आर्ट ऑफ रज़ा’ में संकलित लेखों को पढ़ने से यह पता चलता है कि आधुनिक चित्रकला में अमूर्तन की व्यापकता के साथ भारतीय दर्शन के मिश्रण ने रज़ा के चित्रों को एक नई ज़मीन दी. उदयन वाजपेयी के लेख में इसका विश्लेषण करते हुए कहा गया है कि अमूर्तन किसी ख़ास आकृति या रूप की अनुपस्थिति को दर्ज़ करता है. यही वह सूत्र है जिससे रज़ा के चित्रों में बार-बार आने वाले ‘बिंदु’ को समझा जा सकता है.

पेरिस के सेंटर द पाम्पिदू में रज़ा के चित्रों की प्रदर्शनी. (फोटो साभार: रज़ा फाउंडेशन/फेसबुक पेज)

वंदना कालरा लिखती हैं

एक साक्षात्कार में रज़ा ने कहा है कि बिंदु उनके लिए जपमाला की तरह है. जैसे जप करने वाला बार-बार एक ही बिंदु को मन में दोहराकर उदात्त चेतना हासिल करता है, उसी प्रकार वे बार-बार बिंदु का प्रयोग कर चित्रों के भीतर उदात्तता महसूस करते हैं. स्पष्ट है कि बिना भारतीय दर्शन में गहरी पैठ के रज़ा बिंदु का सर्जनात्मक प्रयोग कर नहीं सकते थे.

उमा नायर के लेख में रज़ा का एक उद्धरण दिया गया है, जिसमें वे कहते हैं कि ‘जब मैं बिंदु को चित्रित करता हूं तो मैं वस्तुतः समय के गर्भ में चला जाता हूं ,जहां ध्वनि और दृष्टि की कोई बाधा नहीं होती और मैं देवत्व का स्फुलिंग रचता हूं.’ इससे यह भी समझा जा सकता है कि रज़ा के लिए बिंदु जीवन की संभावनाओं और क्षमताओं से परिपूर्ण है. यही कारण है कि रज़ा के अंतिम दिनों के चित्रों में बिंदु अपनी बहुरंगी छटाओं के साथ बार-बार चित्रित होता है. कभी एकदम श्वेत, तो कभी एकदम काला, तो कभी एकदम नीला. बिंदु अपने-आप में तो प्रतीकात्मक अर्थ ग्रहण तो करता ही है लेकिन रंगों के बदलने से उस की व्याप्ति और प्रभाव दोनों बदल जाते हैं.

(फोटो साभार: रज़ा फाउंडेशन)

रज़ा के चित्रों में जीवन के प्रति गहरा अनुराग उसके प्रति कृतज्ञता के साथ उपस्थित है. भारत की धरती में  व्याप्त चटख रंग उनके अंतिम दिनों के चित्रों में ख़ूब उपस्थित हैं. यह कहा जा सकता है कि रज़ा अपने अंतिम चित्रों में भारतीय दृष्टि से ज़िंदगी और दुनिया को देखते हैं. अपने अंतिम दिनों के चित्रों में रज़ा के मन में दुख की जगह उल्लास, उत्साह और उमंग परिलक्षित होता है. वे ख़ुद मृत्यु को महसूस कर रहे होते होंगे लेकिन वे जीवन की उपस्थिति को आह्लाद से स्वीकार करते चलते हैं. यही कारण है कि वे भारतीय दर्शन की प्रकृति और पुरुष की अवधारणा से भी जुड़े चित्र बनाते हैं.

यह अवधारणा दर्शन के साथ-साथ तंत्र में भी शामिल है. रज़ा के अंतिम चित्रों पर तंत्र के प्रभाव का अच्छा विश्लेषण यशोधरा डालमिया के लेख में किया गया है. इस लेख से यह भी पता चलता है कि रज़ा के चित्रों में अनुराग-युक्त आध्यात्मिकता विद्यमान रही है जो उनके अंतिम दिनों के चित्रों में और अधिक प्रकट होती है.

इस अनुराग-युक्त आध्यात्मिकता का पता इसी लेख में उनके एक उद्धरण से चलता है जिसमें वे कहते हैं कि ‘दिव्य शक्तियों के बिना चित्र नहीं बनते!’ यहां मशहूर शायर मिर्ज़ा ग़ालिब का एक शेर याद आता है:

आते हैं ग़ैब से यह मज़ामीं ख़याल में
ग़ालिब सरीर-ए-ख़ाम: नवा-ए-सरोश है

पेरिस के द पाम्पिदू में रज़ा की प्रदर्शनी में लगी उनकी तस्वीर और पेंटिंग. (फोटो: स्पेशल अरेंजमेंट)

किताब में लगभग सभी लेखकों ने इस बात का उल्लेख किया है कि रज़ा साहब को कविताएं बहुत पसंद थीं. जैसा कि ज्ञात है कि वे बहुभाषी थे. हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और फ्रांसीसी भाषा पर उन का समान अधिकार था. वे अपनी पसंदीदा कविताओं, जिनमें वेद, उपनिषद आदि से लेकर संस्कृत, हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी और फ्रांसीसी भाषा की कविताएं शामिल थीं, को अपनी डायरी ‘ढाई आखर’ में दर्ज़ करते थे.

रज़ा ऐसे आधुनिक चित्रकारों में विरल हैं जिन्होंने कविता की पंक्तियों का इस्तेमाल अपने चित्रों में किया है. यही नहीं वे कविता को भी चित्रों का रूप दे देते थे. तुलसीदास रचित ‘विनयपत्रिका’ के प्रसिद्ध पद ‘केसव कहि न जाइ का कहिये’ पर उनका बनाया चित्र इस दृष्टि से बेमिसाल है. इससे यह भी पता चलता है कि कविता और चित्र की संगति की भारतीय परंपरा रज़ा के चित्रों में प्रकट होती है.

(लेखक दक्षिण बिहार के केंद्रीय विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक (हिंदी) के पद पर कार्यरत हैं.)