क़िस्सा सारंगढ़: तीन दोस्त, और मोतीलाल नेहरू के सुझाव पर हुआ राजतरंगिणी का अनुवाद

इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान अब्दुल हफ़ीज़ और रणजीत पंडित अपने सीनियर जवाहरलाल नेहरू से बेहद प्रभावित हो चुके थे. नेहरू इनके ‘हीरो’ और ‘रोल-मॉडल’ थे. भारत लौटने पर स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों में शामिल होना अगला स्वाभाविक क़दम था. उनके साथ तीसरे मित्र जवाहिर सिंह भी शामिल हो गए थे. तीनों गांधी के संपर्क में आए और उनके संपर्क में आने वाले अन्य लोगों की तरह उनके रंग में रंग गए.

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राजा जवाहिर सिंह और रणजीत पंडित (स्रोत: गिरिविलास पैलेस,सारंगढ़ की लायब्रेरी, नयनतारा सहगल की पुस्तक 'प्रिज़न एन्ड चॉकलेट केक')

सन् 1890 के आसपास तीन बच्चों ने जन्म लिया. सर्वथा भिन्न भौगोलिक एवं सामाजिक पृष्ठभूमि से आने वाले ये तीनों बच्चे अपनी युवावस्था में घनिष्ठ मित्र बने और इस मित्रता का एक परिणाम यह रहा कि कश्मीर के इतिहास पर लिखे गए ग्रंथ ‘राजतरंगिणी’ तथा अन्य अनेक ग्रंथों के संस्कृत से अंग्रेज़ी में अनुवाद का कार्य छत्तीसगढ़ के सारंगढ़ में संपन्न हो पाया.

पहले बच्चे का नाम था अब्दुल हफ़ीज़ खां. इनके पुरखे मैसूर राज्य में हैदर अली और टीपू सुल्तान की फ़ौज में सिपाही थे. 1799 में ईस्ट इंडिया कम्पनी ने टीपू सुल्तान को मार कर युद्ध में विजय तो प्राप्त कर ली किन्तु मैसूर राज्य के सैनिकों की बहादुरी के क़ायल हुए बिना नहीं रह सके.

इधर युद्ध की समाप्ति पर सैनिकों के सामने बेरोज़गारी का ख़तरा था. पुराने सैनिकों के जिन परिवारों में पीढ़ियों से युद्ध में लड़ने की परम्परा चली आ रही थी उन्हें भी प्रोत्साहित किया गया और अंग्रेज़ों की मद्रास आर्मी में बीसवीं मद्रास रेजिमेंट खड़ी की गई.

सन 1903 में तीन फ़ौज – बंगाल आर्मी, मद्रास आर्मी और बॉम्बे आर्मी – का विलय कर भारतीय फ़ौज का गठन किया गया. तब तक चूंकि ब्रिगेड और डिविज़न की व्यवस्था नहीं थी, इसलिए एक बार किसी रेजीमेंट को जिस स्थान पर भेजा जाता वहीं उसका स्थायी मुख्यालय जैसा बन जाता था.

मध्य भारत के मराठों का प्रभाव

1817 में नागपुर में मराठों को हराने के बाद अंग्रेजों की मद्रास आर्मी ने कुछ समय नागपुर के पास कामटी नामक स्थान पर विश्राम किया और फिर मध्य भारत के मराठों के प्रभाव वाले क्षेत्रों में अपनी पकड़ मज़बूत बनाने के लिए निकल पड़ी.

इस तरह 20 मद्रास इन्फ़ैन्ट्री रेजिमेंट का रायपुर आना हुआ और यहां का बैरन बाज़ार मोहल्ला इसमें से अनेक परिवारों का स्थायी घर बना. फ़ौज के साथ बड़ी तादाद में पशुधन भी चलता था. बैरन बाज़ार में बसने वालों में बड़ी संख्या में मुस्लिम और हिंदू यदुवंशी परिवार शामिल थे.

ऐसा ही एक परिवार अकबर खां का था. रायपुर के गवर्नमेंट स्कूल में सन् 1885 में बैरन बाज़ार से निकल कर एन्ट्रेन्स परीक्षा पास करने वाले पहले छात्र अकबर खां थे. हाईस्कूल के समकक्ष यह परीक्षा उन दिनों यूनिवर्सिटी में भर्ती के लिए योग्य बनाती थी.

अकबर खां पढ़-लिखकर सरकारी नौकरी में आए और आगे चलकर एक्स्ट्रा असिस्टेंट कमिश्नर के रूप में सारंगढ़ स्टेट में दीवान नियुक्त हुए. यहां सेवानिवृत्ति के बाद के उनके तीन साल राजा के सलाहकार के रूप में भी बीते और यहीं 1930 में उनकी मृत्यु हुई. सारंगढ़ में उनके नाम पर अकबरगंज मोहल्ला, अकबरगंज रोड और अकबरटोला नामक गांव हैं.

ऊपर उल्लेखित तीन बच्चों में पहले अब्दुल हफ़ीज़ खां इन्हीं अकबर खां के बड़े बेटे थे.

दूसरे मित्र ने सौराष्ट्र के राजकोट में सीताराम नारायण पंडित के पुत्र के रूप में जन्म लिया. सौराष्ट्र रियासतों का इलाक़ा था. सीताराम पंडित के सारे मुवक्किल भी रजवाड़ों में से ही थे. सो उन्हीं के बीच लोकप्रिय नामों में से एक नाम – रणजीत – उनके पुत्र को मिला. कोंकण के ब्राह्मण सीताराम पंडित प्रतिष्ठित, सफल और धनी वकील थे.

मोहनदास करमचंद गांधी ने बैरिस्टर के रूप में इंग्लैंड में शिक्षा प्राप्त कर जब राजकोट में वकालत प्रारम्भ करने का निर्णय लिया तो उन्हें उनका पहला स्वतंत्र केस सीनियर सीताराम पंडित ने ही दिया था.

आदिवासी राजा का कथा में प्रवेश 

तीसरे मित्र थे सारंगढ़ के आदिवासी गोंड राजा (1918 के बाद से राजा बहादुर) जवाहिर सिंह. परिवार की मान्यता के अनुसार इनके पुरखे जब महानदी के दक्षिण में गोंडवाना के इस स्थान पर पहुंचे थे तब विशालकाय कछुओं ने अपनी पीठ पर नदी पार कराने में मदद की थी.

नर्मदा की तरह महानदी की उम्र गंगा से सैकड़ों दशक अधिक है. राष्ट्रीय अभिलेखागार के मुताबिक़ उनके पुरखों का इतिहास दो हज़ार साल पहले तक का मिला है.

दीवान अकबर खां के पुत्र अब्दुल हफ़ीज़ खां का बचपन सारंगढ़ में बीता तथा जवाहिर सिंह और उनके बीच मित्रता बचपन में ही हो गई थी. पिता राजा रघुवीर सिंह की मृत्यु के बाद जब पुत्र जवाहिर सिंह को राजगद्दी पर बैठाया गया तब उनकी उम्र एक वर्ष और नौ माह थी.

राजगद्दी ने उनके जीवन की दिशा तय कर दी. घर में अंग्रेज़ शिक्षकों के हाथों प्रारंभिक शिक्षा के बाद उन्हें रायपुर के राजकुमार कॉलेज में भेजा गया जहां शिक्षा के साथ-साथ मिले प्रशासनिक प्रशिक्षण ने राज-काज के लिए तैयार किया.

दीवान के बेटे अब्दुल हफ़ीज़ खां के साथ ऐसी कोई बंदिश नहीं थी. उन्हें सारंगढ़ स्टेट की ओर छात्रवृत्ति दी गई और वे वकालत पढ़ने इंग्लैंड भेजे गए. उधर राजकोट से इसी उम्र के रणजीत पंडित को भी इंग्लैंड रवाना किया गया. दोनों बैरिस्टर के साथ साथ घनिष्ठ मित्र बन कर भारत लौटे और यहां आकर राजा जवाहिर सिंह इस मित्र मंडली के तीसरे सदस्य बने.

इंग्लैंड में पढ़ाई के दौरान अब्दुल हफ़ीज़ और रणजीत पंडित अपने सीनियर जवाहरलाल नेहरू से बेहद प्रभावित हो चुके थे. नेहरू इनके ‘हीरो’ और ‘रोल-मॉडल’ थे. भारत लौटने पर स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों में शामिल होना अगला स्वाभाविक कदम था. यहां अब दो नहीं तीन मित्र थे. तीनों गांधी के संपर्क में आए और उनके संपर्क में आने वाले अन्य लोगों की तरह उनके रंग में रंग गए.

आगंतुक पुस्तक में प्रविष्टि (स्रोत: गिरिविलास पैलेस,सारंगढ़ की लायब्रेरी)

1920 में कांग्रेस का नागपुर अधिवेशन

1920 में कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने तीनों मित्र नागपुर पहुंचे. उन दिनों देश फ्लू महामारी की गिरफ़्त में था. दुनिया का कोई कोना नहीं था जहां यह महामारी न पहुंची हो. यह महामारी भारत में रेल लाइन के साथ बसे नगरों में भी पहुंच गई थी, जिनमें से एक नगर नागपुर था.

 प्रथम विश्वयुद्ध के दौरान फैली इस वैश्विक महामारी की शुरुआत अमेरिका में हुई थी. सारे देशों में सेंसरशिप लागू थी. स्पेन अपवाद था. वह इस युद्ध में तटस्थ था और वहां से इस महामारी के बारे में बहुत समाचार निकले, सो इस इनफ़्लुएंज़ा को ‘स्पैनिश फ्लू’ नाम दे दिया गया था. इस महामारी में बच्चों, वृद्धों और कमज़ोरों की अपेक्षा युवाओं की मौत अधिक हुई थी.

भारत में मरने वाले कोई एक करोड़ सत्तर लाख लोगों में मित्र बैरिस्टर अब्दुल हफ़ीज़ खां भी थे.

जवाहिर सिंह और रणजीत पंडित की मित्रता जारी रही. जब रणजीत पंडित का विवाह जवाहर लाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी के साथ संपन्न हुआ, तब जवाहिर सिंह उसमें बाराती के रूप में शामिल हुए.

संस्कृत के प्रकांड विद्वान रणजीत पंडित के लिए उन्नीस सौ बीस और तीस के दशकों में सारंगढ़ का गिरिविलास पैलेस दूसरा घर था. पहला घर जेल था. विभिन्न जेलों में रहने के दौरान उन्होंने बहुत लेखन किया. इनमें कालिदास के ‘ऋतुसंहार’ का अनुवाद नैनी जेल में रवींद्रनाथ ठाकुर के सुझाव से प्रेरित हो कर किया.

मुद्राराक्षस का एक हिस्सा उन्होंने देहरादून की जेल में जवाहर लाल नेहरू के साथ एक ही कोठरी में रहते हुए लिखा. यहां वे दोनों सविनय अवज्ञा आंदोलन में बंदी बनाए गए थे.राजतरंगिणी सहित सारे ग्रंथ जिन पर काम जेल में शुरू हुआ वे सारंगढ़ में पूरे हुए. कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना बारहवीं सदी में कश्मीर के राजा जयसिंह के कार्यकाल में की थी और कश्मीर के इतिहास पर इसे सबसे प्रमाणिक संदर्भ ग्रंथ का दर्जा प्राप्त है.

विजयलक्ष्मी पंडित की आत्मकथा

विजयलक्ष्मी पंडित ने अपनी आत्मकथा में लिखा है कि रणजीत पंडित ने ‘राजतरंगिणी’ का संस्कृत से अंग्रेज़ी अनुवाद का कार्य उनके पिता मोतीलाल नेहरू के लिए हाथ में लिया था जो स्वयं संस्कृत नहीं पढ़ पाते थे किंतु अपने पुरखों के कश्मीर का इतिहास जानने के लिए लालायित रहते थे. हालांकि 1934 में इस पुस्तक के प्रकाशन होने से पूर्व ही मोतीलाल नेहरू का निधन हो गया.

सारंगढ़ के अनेक प्रवासों के बाद दिसंबर 1938 से दिसम्बर 1939 के बीच का एक वर्ष उनका अंतिम प्रवास था. बिना पुल वाले नदी नालों और घने जंगल से घिरे और रेल लाइन से दूर सारंगढ़ की भौगोलिक स्थिति कुछ ऐसी थी कि यहां पहुंचना आसान नहीं था.

1939 का पूरा वर्ष कोलाहल से दूर शांत सारंगढ़ में बिता कर रणजीत पंडित ने दो उपलब्धियां हासिल कीं. पहला, उन्होंने अपने अधूरे छूटे अनुवादों का कार्य पूरा किया और दूसरा, गिरफ़्तारी वॉरंट लेकर घूम रहे अंग्रेज़ पुलिस को दूसरे कामों पर ध्यान देने का अवसर दिया.

इस सारंगढ़ प्रवास का एक बड़ा कारण और था. इंग्लैंड से लौटने के बाद से रणजीत पंडित अंग्रेज़ों की अलग-अलग जेलों में छह वर्ष से अधिक का समय गुज़ार चुके थे. इस दौरान कुछ लापरवाही, कुछ असावधानी लेकिन मुख्य रूप से जेलों में स्वास्थ्य सुविधाओं के न होने और सरकारी उपेक्षा के चलते वह गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के शिकार हो गए थे.

1933 में बरेली जेल के नजदीक फैक्ट्री से निकलते धुंए से उनके कमजोर फेफड़े प्रभावित हुए थे और वे गंभीर रूप से बीमार पड़ चुके थे. उनकी पत्नी और बड़ी बेटी (अन्य दो बेटियां बहुत छोटी थीं) इलाहाबाद में आनंद भवन के सदस्यों के साथ या तो जेल जा रही थीं, या स्वतंत्रता आंदोलन की अन्य गतिविधियों में मसरूफ़ थीं. सारंगढ़ में एक साल का प्रवास स्वास्थ्य लाभ के लिए आवश्यक था, लेकिन पर्याप्त नहीं साबित हुआ.

यहां से बिदा लेते समय तक अपने लगातार गिरते स्वास्थ्य का शायद उन्हे अंदाज़ा हो गया था. आगंतुक पुस्तक में उन्होंने लिखा – ‘सैर की, खूब फिरे, फूल चुने, शाद रहे. बाग़बान जाते हैं गुलशन तेरा आबाद रहे…’

यहां से जाने के बाद वे एक बार फिर गिरफ़्तार कर नैनी जेल भेजे गए. पत्नी विजयलक्ष्मी, इंदिरा, फ़िरोज़ गांधी, जवाहर लाल नेहरू, सभी अलग-अलग जेलों में बंद थे. कुछ दिनों में रणजीत पंडित को बरेली के उसी सेंट्रल जेल में दोबारा भेजा गया, जहां पूर्व में उनका स्वास्थ्य बिगड़ा था. यहां उन्हें दिल का दौरा पड़ा. इसके बाद भी अस्पताल नहीं भेजा गया.

14 जनवरी 1944 की सुबह बरेली जेल में रणजीत पंडित का निधन हो गया. दो वर्ष बाद, 11 जनवरी 1946 की रात सारंगढ़ के अपने महल में तीसरे बचे मित्र राजा जवाहिर सिंह भी नहीं रहे.

गिरिविलास पैलेस सारंगढ़ की आगंतुक पुस्तिका में अलग-अलग समय पर हिंदी, उर्दू, संस्कृत और अंग्रेज़ी में लिखी प्रविष्टियों और लायब्रेरी में रखी ‘राजतरंगिणी’ की प्रति ने उनकी स्मृतियों को जीवित रखा है.

(लेखक इतिहास-प्रेमी हैं, छत्तीसगढ़ में निवास करते हैं.)

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