ममता बनर्जी का पीड़िता को ही कटघरे में रखना जुर्म से ध्यान भटकाना, जवाबदेही से बचना है

दुर्गापुर गैंगरेप मामले में सभी आरोपी पुलिस की गिरफ़्त में आ चुके हैं. हालांकि, इस दौरान पश्चिम बंगाल की महिला मुख्यमंत्री का सर्वाइवर के बाहर जाने के समय और चरित्र पर सवाल उठाना उस व्यवस्था को दिखाता है जहां पीड़ित को जांच के दायरे में रखा जाता है, उसके साथ हुए अपराध को नहीं.

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सीएम ममता बनर्जी एसआईआर के विराध में मार्च का नेतृत्व करेंगी. (फोटो साभार: पीटीआई)

पश्चिम बंगाल की महिला मुख्यमंत्री ने दुर्गापुर बलात्कार मामले पर महिलाओं की सुरक्षा को लेकर हाल ही में जो बयान दिया है, उसकी चौतरफा आलोचना हो रही है. ये बयान पीड़ित को और अधिक प्रताड़ित करने के साथ ही महिलाओं की सुरक्षा को ‘कर्फ्यू’ का मसला बना देता है.

सीएम ममता बनर्जी जिनके पास कानून-व्यवस्था का प्रभार भी है, अपने इस बयान के जरिए ध्यान अपराधियों से हटाकर पीड़िता पर केंद्रित कर देती हैं और उसे ही सवालों के कटघरे में खड़ा कर देती हैं.

हालांकि, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, वे ऐसा पहले भी कर चुकी हैं.

दुर्गापुर गैंगरेप मामले में ममता बनर्जी ने रविवार को कहा, ‘वह एक निजी मेडिकल कॉलेज में पढ़ रही थी. इसकी जिम्मेदारी किसकी है? वह रात के 12.30 बजे बाहर कैसे आ गई. ? जांच चल रही है. लेकिन प्राइवेट मेडिकल कॉलेज को अपने छात्रों का खुद भी ध्यान देने की जरूरत है. खासतौर पर रात को छात्रों को बाहर जाने की इजाज़त नहीं होनी चाहिए. ‘

अपने इस बयान में ममता बनर्जी ने कॉलेज प्रशासन की जवाबदेही समेत कई अन्य बातें भी कहीं, लेकिन उनकी छात्रा के रात के समय बाहर जाने को लेकर की गई टिप्पणी पर सोशल मीडिया से लेकर राजनीति के गलियारे तक आलोचना शुरू हुई.

अभी शायद ही कोई बीते साल का आरजी कर बलात्कार मामला भूला हो, ऐसे में महज़ 14 महीने के भीतर इस तरह की चौथी बड़ी घटना ने उनके शासन में कानून व्यवस्था और महिलाओंं की सुरक्षा को लेकर उनकी प्रतिबद्धता पर भी सवालिया-निशान लगा दिए हैं.

जवाबदेही और ममता बनर्जी

वैसे भी जवाबदेही और ममता बनर्जी का दूर-दूर तक कोई नाता नहीं है. फिर वो मामला चाहे बाढ़ संकट का हो या बड़े घोटाले का, वह हर बार दोष से बचने के लिए किसी न किसी को बलि का बकरा बना ही देती हैं. दुर्गापुर बलात्कार मामले में भी उन्होंने अपनी जवाबदेही से बचने के लिए कॉलेज प्रशासन की लापरवाही और पीड़िता के रात के समय में बाहर रहने के मसले को मुख्य मुद्दा बनाने की कोशिश की.

हालांकि, उनकी यह ध्यान भटकाने की जानबूझकर की गई कोशिश, आरजी कर और दक्षिणी कोलकाता लॉ कॉलेज के कैंपस में हुए रेप और हत्या मामलों में सरकार की विफलाता को एक तरह से ढकने का प्रयास जान पड़ता है, जहां राज्य सरकार खुद अपने द्वारा संचालित इन संस्थानों में महिलाओं को सुरक्षा प्रदान करने में विफल रही.

दुख की बात है कि यह पीड़िताओं को शर्मिंदा करने की सीएम बनर्जी की पुरानी परंपरा के अनुरूप है. यह सिलसिला उनके शासन के शुरुआती वर्षों से चल रहा है.

इसकी शुरुआत 2012 में पार्क स्ट्रीट सामूहिक बलात्कार की घटना से हुई थी. जब पीड़िता सुज़ेट जॉर्डन सामने आईं, तो ममता बनर्जी ने इस अपराध को एक ‘मनगढ़ंत कहानी’ (सज़ानो घोटोना) बताकर बदनाम करने की कोशिश की. इससे पीड़िता को कटघरे में खड़ा करने के लिए संस्थागत हरी झंडी मिल गई.

मुख्यमंत्री से प्रेरणा लेते हुए लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस की उपनेता काकोली घोष दस्तीदार ने दावा किया कि यह घटना महज एक ‘गलत सेक्स डील’ थी.

महिला पुलिस अधिकारी दमयंती सेन, जिन्होंने सफलतापूर्वक इस मामले में कार्रवाई करते हुए गिरफ्तारियां कीं, उनका कुछ ही समय बाद एक लो-प्रोफाइल तबादला कर दिया गया. इससे पुलिस फोर्स को एक स्पष्ट संदेश गया कि ‘इस शासन में जवाबदेही एक पेशेवर जोखिम है.’

आगे भी इनकार का यह सिलसिला यूं ही बड़ी-बड़ी ग़लतियों के साथ जारी रहा. बनर्जी ने कटवा में हुए एक बलात्कार को फिर से ‘मनगढ़ंत’ करार दिया, और पीड़िता के लंबे समय से मृत पति को तत्कालीन मुख्य विपक्षी दल मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) से जोड़कर बेबुनियाद आरोप लगाया कि यह शिकायत एक राजनीतिक साजिश थी.

ऐसे ही 2013 में उन्होंने कामदुनी बलात्कार और हत्या का विरोध कर रही महिलाओं को ‘माकपा की राजनीति’ करने का आरोप लगाते हुए चुप करा दिया था.

वर्षों बाद 2022 में, उन्होंने नदिया के हंसखली में एक किशोरी के सामूहिक बलात्कार और उसकी मौत पर सार्वजनिक रूप से सवाल उठाया, इस सोच के साथ कि क्या यह एक क्रूर हमले के बजाय ‘प्रेम प्रसंग’ या ‘गर्भावस्था’ का मामला था.

शासन-प्रशासन की विफलता को छिपाने की कोशिश

पीड़िता को प्रताड़ित करने वाले इस दृष्टिकोण के भयंकर व्यावहारिक परिणाम होते हैं. पीड़िताओं के चरित्र और गतिविधियों पर सवाल उठाकर बनर्जी प्रभावी रूप से व्यवस्था को निर्देश देती हैं कि वह अपराध की नहीं, बल्कि पीड़िता की जांच करे.

उनका यह तर्क कि एक वयस्क महिला को देर तक बाहर रहने के लिए ‘अनुमति’ की जरूरत है, पितृसत्ता की सबसे पुरानी और सबसे घिसी-पिटी लाइन है.

अक्सर ज़िम्मेदारी लेने के बजाय मुख्यमंत्री का बचाव हमेशा संदेहास्पद ढंग से टालमटोल वाला रहा है. जब उनसे सवाल किया जाता है, तो वे ‘वहां भी तो ये हुआ, वो हुआ’ सरीखी बहानेबाज़ी वाली बातें करती हैं, अपनी सरकार की नाकामियों की तुलना विपक्ष शासित राज्यों या अपने पूर्ववर्ती सरकारों की नाकामियों से करती हैं.

राज्य में ‘दीदी’ के नाम से मशहूर होते हुए ममता ने अपनी राजनीतिक छवि बंगाल की एक निर्भीक बेटी के रूप में बनाई है, जो बाहरी राजनीतिक ताकतों के खिलाफ एक ढाल हैं. फिर भी, जब बात उनके अपने राज्य की सबसे कमज़ोर महिलाओं की आती है, तो ये ढाल न केवल कमज़ोर हो जाती है, बल्कि अक्सर महिलाओं को बदनाम करने का हथियार भी बन जाती है.

महिलाओं के खिलाफ अपराधों पर उनकी बार-बार की गई बेरुखी भरी टिप्पणियों ने अपराधियों के सज़ा से बचाने की संस्कृति को बढ़ावा दिया है. महिलाओं के खिलाफ अपराधों में राज्य में सबसे कम सज़ा दर इसका एक अनुमानित परिणाम है.

उल्लेखनीय है कि दुर्गापुर मामले को नैतिक स्पष्टता के लिए एक ठहराव होना चाहिए था. इस मामले में तीन चीज़ों की मांग थी – पीड़िता पर भरोसा, पुलिस की नाकामियों पर स्पष्ट कार्रवाई, और इस बात पर ज़ोर देना कि जांच का भार अभियुक्त और व्यवस्था पर है – न कि किसी महिला के कपड़ों पर, न वो किसके साथ थी या किस समय बाहर थी पर.

इसके बजाय ममता बनर्जी ने सिर्फ़ वही जाना-पहचाना, घिनौना सवाल पूछा: ‘वह रात में बाहर क्यों थीं?’

करीब तीन दशक से भी ज़्यादा पहले ममता बनर्जी ने 1992 में एक प्रतिद्वंद्वी सरकार पर आरोप लगाने के लिए एक मूक-बधिर बलात्कार पीड़िता को राइटर्स बिल्डिंग में नाटकीय ढंग से परेड कराई थी. सालों बाद पीड़िता गुमनामी में चल बसीं. उनकी मां ने कहा कि उनके साथ राजनीतिक मोहरों जैसा व्यवहार किया गया, जो तमाशे के दिन तो काम आते हैं, लेकिन बाद में बेकार हो जाते हैं.

गौरतलब है कि ऐसे मामलों में जवाबदेही मुश्किल नहीं है, लेकिन इसके लिए ईमानदारी ज़रूरी है.

महिलाओं का ‘इस्तेमाल करो और फिर फेंक दो’ का यही तरीका ‘ममता मॉडल’ है. वेमहिलाएं उनकी सरकार की किसी प्रोत्साहन योजना की लाभार्थी बन सकती हैं, लेकिन उनकी सरकार को बदनाम करने वाली नहीं. भीड़ में एक चेहरा बन सकती हैं, लेकिन खामोशी तोड़ने वाली आवाज़ नहीं.

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